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THE HIMALAYAN DISASTER: TRANSNATIONAL DISASTER MANAGEMENT MECHANISM A MUST

We talked with Palash Biswas, an editor for Indian Express in Kolkata today also. He urged that there must a transnational disaster management mechanism to avert such scale disaster in the Himalayas. http://youtu.be/7IzWUpRECJM

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS TALKS AGAINST CASTEIST HEGEMONY IN SOUTH ASIA

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Saturday, January 14, 2012

प्रेमचंद रंगशाला के लिए ही कुर्बान हुए थे कवि कन्‍हैया?

प्रेमचंद रंगशाला के लिए ही कुर्बान हुए थे कवि कन्‍हैया?



14 JANUARY 2012 2 COMMENTS
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♦ अरुण कमल

कवि कन्हैया पर अरुण कमल का यह अप्रकाशित लेख विशेष प्रयोजन से छापा जा रहा है। हालांकि यह यह लेख काफी पुराना है, जो बहुत दिनों तक खोया-सा पड़ा रहा था। पटना की प्रेमचंद रंगशाला नयी सजधज के साथ तैयार है। बिहार सरकार आज ही यानी मकर संक्रांति के दिन इसका लोकार्पण करने जा रही है। इसे लेकर पटना के संस्कृति जगत में भी विशेष सरगर्मी देखी जा रही है।

मगर इस सब के बीच एक ऐसे ज्वलंत सत्य से आंख चुराने की कोशिश की जा रही है, जिसका जिक्र किये बिना प्रेमचंद रंगशाला के इस पुनर्जीवन की बात सोची भी नहीं जा सकती है। यहां यह याद दिलाने की जरूरत है कि प्रेमचंद रंगशाला एक लंबे समय तक सीआरपीएफ के कब्जे में पड़ा रहा था। वहां सांस्कृतिक पताका की जगह जवानों की लंगोटियां लहराया करती थीं। इस शर्मनाक स्थिति से निजात दिलाने के लिए रंगकर्मियों संस्कृतिककर्मियों के गुहार का कोई असर तत्कालीन राज्य सरकार पर नहीं पड़ा।

अंततः सीआरपीएफ के कब्जे से प्रेमचंद रंगशाला को मुक्त कराने के लिए इप्टा की अगुवाई में संयुक्त कलाकार संघर्ष समिति बनायी गयी, जिसके पीछे सबसे अहम भूमिका कवि कन्हैया की रही थी। उन्हीं के नेतृत्व में कलाकारों संस्कृतिकर्मियों का एक जुझारू जुलूस निकाला गया। बिहार विधान सभा की ओर बढ़ने के क्रम में जुलूस को इनकमटैक्स चौराहे पर रोक कर सीआरपीएफ जवानों द्वारा प्रदर्शनकारियों पर जबर्दस्‍त लाठीचार्ज किया गया। चूंकि कवि कन्हैया सबसे आगे थे, लाठियां सबसे अधिक उन्हीं के सिर पर गिरीं। उन्हें बचाने के चक्कर में प्रख्यात रंगकर्मी जावेद अख्तर एवं अन्य युवा कलाकार भी बुरी तरह जख्मी हुए थे। कवि कन्हैया इस सांघातिक लाठी प्रहार की चोट से कभी उबर नहीं पाये और कुछ वर्षों बाद ही उनकी मृत्यु हो गयी। अब आज अगर प्रेमचंद रंगशाला पुनः सांस्कृतिक कर्म का केंद्र बनने के लिए तैयार है, तो वह भूलना कि इसके लिए कवि कन्हैया और अन्य रंगकर्मियों को अपना खून बहाना पड़ा था, निहायत क्षोभ और शर्म की बात है। लेकिन इस दिशा में हर तरफ से एक गहरी चुप्पी छायी हुई है।

अरुण कमल का यह लेख इसी मायने में एक खास अर्थ रखता है, जो अकस्मात इस मौके पर हमारे हाथ लग गया है। यह लेख गवाह है कि कवि कन्हैया का प्रेमचंद्र रंगशाला के प्रति कितना गहरा अनुराग था और जिसकी मुक्ति के लिए उन्हें खून बहाने में हिचक नहीं हुई।

मॉडरेटर


मुंझे याद है कि काफी पहले, सन सत्तर-इकहत्तर में एक गोष्ठी हुई थी। यह गोष्ठी उसी रंगशाला में हुई थी, जिसे आज हम प्रेमचंद रंगशाला के नाम से जानते हैं। उस वक्त रंगशाला बन कर खड़ा ही हुआ था। धूल से भरे हुए उसके भीतरी प्रांगण में हमने खुद ही झाड़-बहार कर ब्रेख्त पर एक गोष्ठी की थी। इसमें कन्हैया जी ने ब्रेख्त के महाकाव्यात्मक रंगमंच के बारे में एक पर्चा पढ़ा था। गोष्ठी की अध्यक्षता रामेश्वर सिंह कश्यप जी [लोहा सिंह] ने की थी। उस रंगशाला में होने वाली शायद यह पहली गोष्ठी थी। उसके बाद तो वहां फौजियों की लंगोट ही सूखने लगी। पहली बार यहीं पर हमने ब्रेख्त के बारे में जाना। हममें कई नौजवानों ने पहली बार ही ब्रेख्त का नाम सुना। कन्हैया जी ने ही हम नौजवानों का परिचय पहली बार ब्रेख्त, नेरुदा और नाजिम से कराया। ब्रेख्त पर होने वाली यह छोटी सी गोष्ठी कई माने में बहुत महत्‍वपूर्ण रही। यह वह समय था, जब पटना में भी एब्सर्ड नाटक हो रहे थे और पूरा शहरी हिंदी रंगमंच 'अंधायुग' की गिरफ्त में था। ऐसे में ब्रेख्त के नाटकों और ब्रेख्त के रंगमंचीय सिद्धांतों की चर्चा अपने आप में एक आंदोलन से कम नहीं था।

दूसरी बात यह कि जहां यह गोष्ठी हो रही थी वहीं, उसी स्थान की मुक्ति के सवाल पर बाद में पूरे राज्य के संस्कृतिकर्मी एकजुट हुए और सफल संघर्ष किया, इसी के लिए खुद कन्हैया जी ने लाठियां खायीं।

कन्हैया जी का सारा जीवन एक आंदोलन था। एक तो रचना और सिद्धांत के स्तर पर उन्होंने नये मूल्यों के संवाहक ब्रेख्त, नाजिम और नेरूदा से नौजवानों का परिचय कराया और दूसरे इन मूल्यों को साकार करने के लिए आंदोलन खड़ा करने को प्रेरित किया। कन्हैया जी ने कभी भी सिर्फ आंदोलन पर जोर नहीं दिया। आंदोलन के लिए सैद्धांतिक ट्रेनिंग को वह बहुत जरूरी मानते थे। सैद्धांतिक शिक्षा, नये सौंदर्य-मूल्यों की पहचान, हुस्न के नये मयार के बिना कोई भी आंदोलन सफल नहीं हो सकता। इसीलिए कन्हैया जी ने इन क्रांतिकारी कवियों की कविताओं का अनुवाद पुस्तक के रूप में प्रकाशित कराया और अपने भाषणों में, बातचीत में हमेशा ही उनकी रचनाओं से लेकर कुछ न कुछ बातें बतायीं। ब्रेख्त के एक नाटक की ये पंक्तियां उन्हें बहुत प्रिय थीं जिन्हें वह अक्सर सुनाते थे…

जिस शहर में जुल्म के खिलाफ कोई बोल नहीं रहा हो
तो अच्छा है कि
सुबह होने से पहले
पूरा शहर जल कर राख हो जाए


कन्‍हैया जी की दुर्लभ तस्‍वीर

न्हैया जी के उन भाषणों का उस समय जवान हो रही पीढ़ी पर गहरा असर पड़ा। इससे हम लोग नये साहित्य और नयी कला की ओर मुड़े। प्रगतिशील लेखकों और कलाकारों के आंदोलन में कई बार एक ऐसे व्यक्ति की भी भूमिका बहुत क्रांतिकारी होती है, जो नये लोगों को नये सौंदर्य-मूल्यों की दीक्षा देता है, भले ही वह स्वयं किसी जुलूस में या किसी मोर्चे में प्रत्यक्ष हिस्सा न ले। लेकिन कन्हैया जी ने अपने आचरण से भी नये लोगों को प्रभावित किया। हमें याद नहीं कि कभी हम बिना चाय पिये उनके दरवाजे से लौटे हों। हममें कई बार वैचारिक असहमति भी होती थी, भीतर से गुस्सा करते हुए भी कभी उन्होंने हमें डांटा नहीं, कभी किसी के बारे में हल्के ढंग से बात नहीं की, कभी कुछ भी अशोभन न होने दिया। खुद वह बहुत खटते थे। छोटा से छोटा काम करने लगते और कई बार हमें शर्मिंदा कर देते। ऊपर से ये बातें छोटी लग सकती हैं। लेकिन एक आंदोलन में, खासकर लेखकों-कलाकारों के आंदोलन में, जहां नाजुक मिजाज लोग ही ज्यादातर आते हैं, ये छोटी बातें बहुत महत्‍व रखती हैं और व्यक्तिगत पचड़ों से हमें दूर रखती हैं। आंदोलन की सफलता के लिए ऐसे ही नेता का होना जरूरी है, जो नेता जैसा न लगे।

प्रगतिशील लेखक संघ में हमारे बाजाप्ता शामिल होने में कन्हैया जी की दुआएं ही ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। रामकृष्ण पांडेय पहले ही उनके सान्निध्य में आ चुके थे। सुमंत हमारे मित्र थे और हममें से अधिकांश लोग नक्सलवाद से प्रभावित थे। लेकिन क्रांतिकारी साहित्य से हमारा परिचय जैसा मैंने पहले भी कहा, कन्हैया जी ने ही कराया। बहुत तरह की बातें होती थीं। और हमारे कुछ साथी कन्हैया जी के साथ बांदा सम्मेलन में गये। धीरे-धीरे हम बहुत कुछ उनके असर से प्रगतिशील लेखक संघ में शामिल हुए। एक तरह से नये लेखकों की एक पूरी कतार शामिल हुई। कन्हैया जी ऐसे व्यक्ति थे, जो वैचारिक रूप से अपने विरोधियों को भी अपने पास खींचते थे। 'मिल बैठे तो दुश्मन का भी साथ गंवारा गुजरे था', ये हालत थी। तरह-तरह के लोग कन्हैया जी के घर पर मिलते थे। आंदोलन चलाने के लिए ऐसे व्यक्तित्व की जरूरत होती है, ऐसे चुंबक की जरूरत होती है, जो सिर्फ लोहे को ही नहीं, पीतल और अल्मुनियम को भी अपनी ओर खींच सके। कन्हैया जी की बर्राक ईमानदारी के सब कायल थे। इतना ही नहीं हर मौके पर, हर तरह के लोगों की उन्होंने खुले दिल से सहायता की। ऐसे कई उदाहरण हैं। लेकिन एक घटना मुझे खास तौर से याद है…

अनामिका प्रकाशन में उमा बाबू के पास कन्हैया जी बैठे थे। वहीं उनके साथ कोई सोलह सत्रह साल का एक लड़का बैठा था। कन्हैया जी ने बताया यह लड़का नवादा का (हो सकता है जगह का नाम मैं भूल रहा होऊं) रहने वाला है, बहुत अच्छा तबला बजाता है। लेकिन अचानक उसकी दोनों बांहें सूखने लगी हैं। उंगलियां सूख रही हैं। कन्हैया जी उस लड़के की दवा का इंतजाम कर रहे थे। वह गरीब लड़का एक तरह से कन्हैया जी पर ही आश्रित हो गया था। वह इप्टा का सदस्य भी था। अपने साथियों के लिए ऐसे प्रेम और मदद करने की भावना के बिना कोई भी व्यक्ति लोगों का प्यार और आदर नहीं पा सकता। आंदोलन को भाईचारे और पारस्परिक प्रेम पर आधारित होना चाहिए। कन्हैया जी ने हमें यह सिखाया। रांची के साथी नसीम के लिए उन्होंने अपनी बीमारी के बावजूद बहुत कोशिश की। हममें से शायद ही कोई ऐसा हो जो कन्हैया जी का शुक्रगुजार न हो। कन्हैया जी ने आंदोलन को कभी भी औपचारिक न बनाया, कभी भी इसे सिर्फ घर के बाहर होने वाला एक जमावड़ा न समझा। हर आदमी को उन्होंने अपना समझा।

और इन सबके ऊपर भी कन्हैया जी की संघर्ष करने की शक्ति। इप्टा को फिर से जिलाने के लिए वह सक्रिय हुए और पूरे बिहार का दौरा किया। एक तरह से बिल्कुल शून्य से शुरू करना था। पैसों की भी दिक्कत थी। लेकिन जल्दी ही उन्होंने एक ढांचा खड़ा कर लिया। मुश्किलें जरूर रही होंगी और कवि-स्वभाव को क्षोभ भी हुआ होगा, लेकिन वह लगे रहे और आज उन्हीं के पुण्य-प्रताप से इतना बड़ा संगठन तैयार हो गया। मैं पक्का तो नहीं कह सकता, लेकिन ऐसा मुझे आभास है कि बिहार में प्रगतिशील लेखक संघ और इप्टा दोनों को फिर से सक्रिय करने में कन्हैया जी की सबसे बड़ी भूमिका है। इतना ही नहीं, नसीम साहब के साथ उन्होंने पेंटर एसोसिएशन की भी नींव डाली थी, जिसे आगे बढ़ाने के लिए दोनों में से कोई जीवित न रह सके।

लेकिन कन्हैया जी के लिए लेखकों-कलाकारों का आंदोलन एक बड़े जन-आंदोलन का हिस्सा था। कभी-कभी हमलोगों में ऐसा भाव आता है कि कलाकारों को खेत मजदूरों के संघर्षों से क्या वास्ता? लेकिन कन्हैया जी ने हमेशा ही कलाकारों के आंदोलन को मनुष्यता की मुक्ति के लिए चल रहे विराट संघर्ष का एक भाग समझा। चाहे पॉल रॉब्सन की लड़ाई हो, चाहे नेल्सन मंडेला की, चाहे बंबई के कपड़ा मजदूरों की हड़ताल हो, चाहे बिहार के खेत-मजदूरों की, कन्हैया जी को हर मौका याद रहता था और तुरत कुछ न कुछ वह करते ही थे। कई बार जुलूस भी निकाले, धरना पर बैठे और सारी सीमाओं के भीतर जो कर सकते थे, जरूर किया।

प्रेमचंद रंगशाला की मुक्ति के लिए उन्होंने लाठियां खायीं, उनके सिर पर चोट आयी और काफी खून बहा। इप्टा की महान, गौरवशाली परंपरा के अनुरूप ही यह सब हुआ। कन्हैया जी के लिए आदर्शों की हिफाजत ज्यादा जरूरी थी, आंदोलन का अबाध चलना ज्यादा जरूरी था।

कन्हैया जी उन थोड़े से लोगों में हैं जिनसे सीखने के लिए बहुत कुछ था और है।

(अरुण कमल। वरिष्‍ठ कवि। अब तक चार कविता संग्रह, अपनी केवल धार, सबूत, नये इलाके में और पुतली में संसार। आलोचना की भी कुछ पुस्‍तकें। कई पुरस्‍कार, मसलन पहला भारत भूषण अग्रवाल पुरस्‍कार, साहित्‍य अकादमी पुरस्‍कार आदि। प्रगतिशील लेखक संघ के जिम्‍मेदार सदस्‍य। मशहूर साहित्यिक पत्रिका आलोचना के संपादक। पटना विश्‍वविद्यालय में अंग्रेजी के प्रोफेसर हैं।)

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