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THE HIMALAYAN DISASTER: TRANSNATIONAL DISASTER MANAGEMENT MECHANISM A MUST

We talked with Palash Biswas, an editor for Indian Express in Kolkata today also. He urged that there must a transnational disaster management mechanism to avert such scale disaster in the Himalayas. http://youtu.be/7IzWUpRECJM

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS TALKS AGAINST CASTEIST HEGEMONY IN SOUTH ASIA

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Thursday, February 9, 2012

जमीन जाने के डर से आशंकित हैं किसान लेखक : सूरज कुकरेती :: अंक: 05 || 15 अक्टूबर से 31 अक्टूबर 2011:: वर्ष :: 35 :October 31, 2011 पर प्रकाशित

जमीन जाने के डर से आशंकित हैं किसान

पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल 'निशंक' द्वारा उत्तराखंड में चार नये जिलों, रानीखेत, डीडीहाट, यमुनोत्री व कोटद्वार के गठन की घोषणा के बाद जश्न का माहौल है तो कोटद्वार में कई किसानों को अपनी जमीनों से हाथ धोने का भी डर सता रहा है। यहाँ जिला मुख्यालय को लेकर भी विवाद चल पड़ा है।

kotdwar-landकोटद्वार जिले की माँग बहुत पुरानी है। यहाँ से मौजूदा जिला मुख्यालय पौड़ी जाने में बहुत समय और यात्रा व्यय लगने के साथ तुरंत काम न होने पर रहने-खाने में भी काफी खर्च करना पड़ता है। वह समस्या नया जनपद बनने पर भी रहेगी ही। धुमाकोट, बीरौंखाल व नैनीडांडा जैसे दूरस्थ क्षेत्र के लोगों को उन्हीं दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा।

जनपद मुख्यालय को लेकर कोटद्वार सहित सभी जगह के किसानों में डर शुरू हो गया है। राजस्व विभाग 5 बीघा से ऊपर के किसानों की लिस्ट तैयार कर रहा है। भूमि का अधिग्रहण न हो, इसके लिये किसान शंकित हैं और लामबंद होने लगे हैं। यहाँ जमीनों के सरकारी रेट नहीं बढ़े। बाजार भाव एक करोड़ रुपया प्रति बीघा से ऊपर पहुँच गया है, जबकि सर्किल रेट 7 लाख से ऊपर नहीं है। कोटद्वार भाबर के किसान नेता एवं सांसद प्रतिनिधि आलोक रावत व किसान सभा के अध्यक्ष जगदीश रावत का कहना है कि इन दस सालों में उत्तराखंड काला धन खपाने का अड्डा हो गया है। किसानों को धन का लालच दिखाकर भूमिहीन बनाना व कृषि को खत्म करने वाले पूँजीपतियों पर सरकार नकेल नहीं लगा पाई है। बाजार भाव के सापेक्ष सर्किल रेट कम से कम 60-70 लाख रु. बीघा तो होना ही चाहिये था, जिससे कालेधन पर रोक लगती और सरकार को स्टांप ड्यूटी के तहत राजस्व का लाभ मिलता। किंतु भूमाफिया, राजनेताओं और नौकरशाहों के गठजोड़ के फलस्वरूप यहाँ पर खेती खत्म हो चुकी है। जनजाति व अनुसूचित जाति के परम्परागत गाँवों, एंडीचैड़, जशोधपुर, हल्दूखाता आदि में पूरी जमीन भू माफियाओं के कब्जे चली गयी है। जनपद बनने पर यदि सरकार भूमि का अधिग्रहण करती है तो किसान बाजार भाव से कम पर अपनी जमीन देने को तैयार नहीं हैं। उनका कहना है कि जोर जबर्दस्ती करने पर यहाँ भी भट्टा पारसौल जैसे हालात बनेंगे।

भाबर व पहाड़ी क्षेत्रों में सड़कों के नजदीक जमीनों की इतनी भारी खरीद-फरोख्त क्यों हो रही है, यह जमीनें कौन व क्यों खरीद रहा है, इसका लाभ किसे मिल रहा है, ऐसे सवाल किसानों को सोचने व एकजुट होने के लिये प्रेरित कर रहे हैं। कोटद्वार के प्रथम औद्योगिक आस्थान सिताबपुर के लिये किसानों ने जमीन इस लालच में दी थी कि उन्हें रोजगार मिलेगा। उद्योगपतियों ने वह जमीन किसानों से कौडि़यों के भाव खरीदी, उद्योग तो लगाये नहीं, बल्कि वह भूमि पाँच गुने अधिक दाम पर अन्य लोगों को बेच दी। जबकि यदि इस भूमि पर उद्योग नहीं लगने थे तो इसे मूल भू स्वामी को लौटा दिया जाना चाहिये था। लेकिन जमीन के धंधे में सरकार भी शामिल है। कोटद्वार के 'ग्रोथ सेंटर' के लिये किसानों की भूमि अधिग्रहीत की गई थी। जशोधरा स्टील उद्योग के लिये 16-17 वर्ष पूर्व भूमि अधिग्रहण हुआ था और किसानों को 5-7 हजार प्रति बीघा की दर से कीमत मिली थी। परन्तु आज यहाँ भूमि की बाजार कीमत 25-30 लाख रुपया प्रति बीघा है। यह संस्थान प्रदूषण फैलाने के साथ ही हर तरह से अपराधों का केन्द्र बन चुका है। इन सब कारणों से किसान अब विकास के नाम पर धोखे पर नहीं रहना चाहता। यही कारण है कि कोटद्वार में एक आई. आर. डी. स्थापित नहीं हो पा रहा है। जिला बनाने व कोटद्वार को जिला मुख्यालय बनाने के पीछे भी जमीन के कारोबारियों का हाथ होना बताते हुए आलोक रावत का कहना है कि मुख्यालय पहाड़ पर ही बने। वहाँ भी सर्किल रेट बढ़ा कर बाजार भाव के आसपास हो।

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