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THE HIMALAYAN DISASTER: TRANSNATIONAL DISASTER MANAGEMENT MECHANISM A MUST

We talked with Palash Biswas, an editor for Indian Express in Kolkata today also. He urged that there must a transnational disaster management mechanism to avert such scale disaster in the Himalayas. http://youtu.be/7IzWUpRECJM

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS TALKS AGAINST CASTEIST HEGEMONY IN SOUTH ASIA

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Tuesday, February 21, 2012

राजनीतिक महाभारत में धृतराष्‍ट्र बना बैठा है अनुच्‍छेद 14

राजनीतिक महाभारत में धृतराष्‍ट्र बना बैठा है अनुच्‍छेद 14



 नज़रिया

राजनीतिक महाभारत में धृतराष्‍ट्र बना बैठा है अनुच्‍छेद 14

21 FEBRUARY 2012 ONE COMMENT

♦ कपिल शर्मा

हाभारत निश्चित तौर पर एक महान ग्रंथ है, जो जीवन के हर पहलू को समझने की गहन दृष्टि देता है। संयोग से कुछ दिनों पहले महाभारत और भारतीय संविधान साथ में पढ़ने का मौका मिला, तो समझ में आया कि धृतराष्‍ट्र और भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 की हालत एक ही सी है। बेबस, कमजोर और दोहरी चरित्र वाली। कारण साफ है, दोनों के ही हालात उनके सिद्धांतों और व्यवहारों में भारी-भरकम अंतर कर देते हैं।

बात धृतराष्‍ट्र से शुरू करते है। धृतराष्‍ट्र जन्म से ही अंधा था लेकिन था तो हस्तिनापुर का राजा। सिद्धांतों के आधार पर न्याय और समानता को संरक्षण देना उसका धर्म होना चाहिए था। धृतराष्‍ट्र चाहता तो द्रौपदी चीर-हरण के समय दुर्योधन और दुःशासन को डपटकर बैठाल सकता था। लेकिन व्यवहार में धृतराष्‍ट्र ने क्या किया, पुत्र मोह में आकर मूकदर्शक बन बैठा और अपनी न्याय पर आधारित सत्ता से दुर्योधन और दुःशासन को निरकुंश तरीके से खेलने दिया। पांडवों से खूब छल होने दिया। इसका परिणाम क्या हुआ, अठारह दिन का महायुद्ध, खून-खराबा और मारकाट।

ठीक यही हाल भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 का है, जो सिद्धांत में भारत के प्रत्येक नागरिक को बिना किसी भेदभाव के सभी भारतीय विधियों, सीधे शब्दों में कहें तो कानूनों के समक्ष समानता और संरक्षण देने के मौलिक अधिकार की गारंटी देता है। यहां मौलिक अधिकार से तात्पर्य उस अधिकार से है, जिसकी पूर्ति करना किसी भी राज्य के अस्तित्व की अनिवार्य शर्त है। लेकिन व्यवहार में इस मौलिक अधिकार की कहानी भी उल्टी है।

हमारे देश का संपन्न वर्ग जिसमें ज्यादातर राजनेता, नौकरशाह, उधोगपति और माफिया आते हैं, वो तो अनुच्छेद 14 द्वारा दी गयी कानूनों की समानता और संरक्षण की गारंटी पा लेते है। कानूनी विशेषाधिकारों से सुसज्जित हो जाते हैं। लेकिन दबा-कुचला आम आदमी हमेशा ठगा हुआ सा ही महसूस करता है और रोजाना कानूनी समानता की गारंटी के बावजूद आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक और प्रशासनिक कानूनों के सामने पक्षपात और भेदभाव का शिकार बनता है। भारतीय लोकतंत्र का निर्माण करने वाले आम आदमी को ही भारतीय कानूनों के सामने दोयम दर्जे का नागरिक माना जाता है।

मेरे इस तर्क पर कई लोग आपत्ति कर सकते हैं, लेकिन अगर ऐसा नहीं है तो आखिर क्यों देश के आठ राज्यों में गरीबी, भुखमरी, प्रशासनिक भ्रष्‍टाचार और शोषण से परेशान आम जनता के बीच में नक्सली बिगुल बज रहा है। आजादी के साठ साल बाद भी उत्तर-पूर्वी राज्यों में अलगाववाद खत्म नहीं हुआ है। कहीं कोई असमानता तो है, जो उन्हें भारत की मुख्यधारा में शमिल नहीं होने देती है।

क्यों मानवाधिकार हनन में हुई हत्याओं और केसों में गरीब-गुरबा और कमजोर आदमी ही फंसता है? संपन्न वर्ग के लोगों का मानवाधिकार हनन क्यों नहीं होता है? पिछले साठ सालों में ढेरों रोजगार योजनाओं, अरबों के बजट और रोजगार गारंटी कानूनों के बावजूद बेरोजगारी का शनि अभी भी आम आदमी की कुंडली में क्यों मंडरा रहा है। भूमि सुधार कानूनों और गहन समीक्षा वाली राष्‍ट्रीय स्तर की नीतियों के बावजूद देश का 80 फीसदी किसान आज भी कंगाल क्यों है।

सरकार की सशक्त शिक्षा नीतियों और सफल साक्षरता अभियानों से उपजे गांव के विद्यालयों और शहरी नगर निगम स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों की नौकरियों में क्यों नहीं फिट बैठ पाते हैं? सशक्त न्यायपालिका होने के बावजूद आम आदमी न्याय की शत फीसदी आस क्यों नहीं रख सकता है?

ऐसे न जाने कितने क्यों है, जिनका उत्तर अगर ढूंढने शुरू किये जाएं तो पीएचडी की मिल जा सकती है। लेकिन अंत में बात यहीं समझ में आएगी कि खोट अनुच्छेद 14 की संवैधानिक गारंटी में ही है, जिससे उपजे कानून और नीतियां सैद्धांतिक तौर पर तो आम आदमी के लिए सच हैं, लेकिन व्यवहार में झूठ।

शायद अनुच्छेद 14 भी धृतराष्‍ट्र की तरह बेबस है, क्योंकि यह भी भारतीय संविधान में उल्लेख किया गया एक मूकलिखित वाक्य ही तो है, जिसका खुद का कोई जीवित अस्तित्व नहीं है, जो अपनी दी गयी गारंटी के प्रयोजन के लिए प्रयास कर सकें। अनुच्छेद 14 की सत्ता से उपजे कानूनों में छेड़छाड़ करने, उसे तोड़ने-मरोड़ने और अपनी जरूरतों के हिसाब से ढालने के बाद आम आदमी पर उसे थोपने की ताकत तो सिर्फ राजनीति और प्रशासन की कूटनीति जानने वाले खिलाड़ियों के हाथ में है, न कि आम आदमी के हाथ में। ये राजनीतिक और प्रशासनिक कूटनीति जानने वाले लोग ही आज की महाभारत के दुर्योधन और दु;शासन हैं, जो द्रौपदी बनी जनता का चीर हरण कर रहे हैं और अनुच्छेद 14 द्वारा दी गयी कानून की समानता और संरक्षण की गारंटी का माखौल उड़ाते हैं।

अब ऐसे में असमानता और भ्रष्‍टाचार के साए में लाचार आम आदमी को बचाने कोई अन्ना टीम आगे आ जाएं या कोई बाबा या कुछ अंसतुष्‍ट नागरिक ही बंदूक उठा कर नक्सली बन जाएं। तो इसे भारतीय लोकतंत्र का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा, जहां अनुच्छेद 14 जैसे महान अधिकार की गारंटी के बावजूद आम आदमी व्यवहार में अपने अधिकारों को पाने के लिए रोजाना एक महाभारत लड़ रहा है।

प्रशासन और राजनीति के क्षेत्र की बौद्धिक उल्टी करने वाले लोग कह सकते हैं कि भई कानूनों के निर्माण में और उनके क्रियान्वन में काफी अंतर होता है। उनके क्रियान्वन के समय थोड़ी लोचशीलता होना तो जरूरी ही है। लॉलीपाप थोड़े ही है, जो सबको बराबर-बराबर बांट दें।

लेकिन इसमें मेरा तर्क तो यही होगा, चूंकि देश में एक सी ही समस्याएं पिछले साठ सालों से घर बना कर बैठी है, जिसका साफ मतलब तो यही है कि जो भी कानून और उनके अंतर्गत नीतियां बनी हैं। उनका क्रियान्वयन सभी नागरिकों के बीच समान स्तर पर नहीं किया गया है और दिनोंदिन मजबूत होते भ्रष्‍टाचार को देखते हुए इसकी उम्मीद भी लगातार कम होती जा रही है। ऐसे में एक ही रास्ता सूझता है कि अनुच्छेद 14 को मौलिक अधिकार की गारंटी से हटाकर राज्य के नीति निर्देशक तत्वों में रख देना चाहिए। क्योंकि मौलिक अधिकार वे अनिवार्य शर्त है, जो प्रत्येक राज्य की ओर से उसके नागरिकों को मिलनी ही है, उन्‍हें रोका नहीं जा सकता है। जबकि राज्य के नीति निर्देशक तत्व राज्य के लिए लक्ष्‍य है, इन्हें लागू करना न करना राज्य की राजनीतिक और प्रशासनिक मशीनरी की इच्छा पर ही निर्भर है। ऐसा करने से आम आदमी भी हर कदम पर होने वाले अनुच्छेद 14 के हनन की दुहाई नहीं दे सकेगा और सभी को कानूनों की समानता और संरक्षण देना भी राज्य के लिए अनिवार्य शर्त नहीं होगी, बल्कि एक लक्ष्‍य होगा।

(कपिल शर्मा। पेशे से पत्रकार। इंडियन इंस्‍टीच्‍यूट ऑफ मास कम्‍युनिकेशन से डिप्‍लोमा। उनसे kapilsharmaiimcdelhi@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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