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THE HIMALAYAN DISASTER: TRANSNATIONAL DISASTER MANAGEMENT MECHANISM A MUST

We talked with Palash Biswas, an editor for Indian Express in Kolkata today also. He urged that there must a transnational disaster management mechanism to avert such scale disaster in the Himalayas. http://youtu.be/7IzWUpRECJM

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS TALKS AGAINST CASTEIST HEGEMONY IN SOUTH ASIA

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Saturday, February 11, 2012

सभ्यता के विद्रूप

सभ्यता के विद्रूप


Saturday, 11 February 2012 10:28

प्रमोद भार्गव 
जनसत्ता 11 फरवरी, 2012: जब किसी समाज की दशा और दिशा अर्थतंत्र से तय होने लगती है तो इंसान को देखने या आंकने के तरीके बदलने लगते हैं। यही कारण है कि हम जिन्हें सभ्य और आधुनिक समाज का हिस्सा समझते हैं, वे प्राकृतिक अवस्था में रह रहे लोगों को इंसान मानने के बजाय जंगली जीव ही मानते हैं। आधुनिक कहे जाने वाले समाज की यह एक ऐसी विडंबना है, जो सभ्यता के दायरे में कतई नहीं आती। अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में लुप्तप्राय जारवा प्रजाति की औरतों को स्वादिष्ट भोजन का लालच देकर सैलानियों के सामने नचाने के जो वीडियो-दृश्य ब्रिटिश अखबारों में सिलसिलेवार छपे हैं उन्हें शासन-प्रशासन के स्तर पर झुठलाने की कवायद कितनी भी की जाए, लेकिन हकीकत यह है कि अभयारण्यों में दुर्लभ वन्यजीवों को देखने की मंशा की तरह, दुर्लभ मानव प्रजातियों को भी देखने की इच्छा नवधनाढ्यों और रसूखदारों में पनप रही है। 
अफसोसनाक यह है कि जिस सरकारी तंत्र को आदिवासियों की सुरक्षा के लिए तैनात किया गया है, वही इन्हें लालच देकर नचवाने का काम कर रहा है। इसी कुत्सित मानसिकता के चलते जारवा लोग इंसानों के बजाय, मनोरंजक खिलौने होकर रह गए हैं। यह विचित्र है कि एक ओर तो हम दया दिखाते हुए सर्कसों और मदारियों द्वारा वन्यजीवों के करतब दिखाए जाने पर अंकुश लगाने की वकालत करते हैं, वहीं दूसरी ओर अपने में मगन निर्वस्त्र या अर्ध-निर्वस्त्र जन-जातियों को नाचने के लिए मजबूर करते हैं।
लंदन के अखबार 'आब्जर्वर' ने एक बार फिर जारवा जनजाति के बारे में मोबाइल फोन से फिल्माई गई दो फिल्में जारी की हैं। इनमें से एक फिल्म 3.19 मिनट की है, जिसमें एक पुलिस अधिकारी के सामने नृत्य करती हुई जारवा जाति की अर्धनग्न लड़कियां दिखाई गई हैं। दूसरे वीडियो में सेना की वर्दी पहने बैठे एक व्यक्ति के सामने अन्य जारवा युवतियां नाच रही हैं। अखबार ने दावा किया है कि ये वीडियो नए हैं और वहां सुरक्षा में लगे अधिकारियों की मिलीभगत से सामने आए हैं। इनमें से एक वीडियो दो माह पहले पोर्टब्लेयर में भी प्रकट हो चुका है। इसके पहले विदेशी सैलानियों के सामने इन महिलाओं को नचाने के जो वीडियो जारी किए गए थे, उनका फिल्मांकन गोपनीय ढंग से इसी अखबार के पत्रकार ने किया था। इस कारण देश में हल्ला मचा और केंद्र सरकार ने वीडियो की हकीकत जानने के लिए एक जांच भी बिठा दी। यह जांच कुछ खुलासा कर पाती उससे पहले दो और नए वीडियो आ गए।
आधुनिक विकास और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए वन कानूनों में लगातार हो रहे बदलावों के चलते अंडमान में ही नहीं, देश भर की जनजातियों की संख्या लगातार घट रही है। आहार और चिकित्सा जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी होती जा रही है। अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह में अलग-अलग दुर्गम टापुओं पर जंगलों में समूह बना कर रहने वाली जनजातियों का अन्य समुदायों और प्रशासन से बहुत सीमित संपर्क है। जारवा लोगों की संख्या घट कर महज तीन सौ इक्यासी रह गई है। 
एक अन्य टापू पर रहने वाले ग्रेट अंडमानी जनजाति के लोगों की संख्या महज साठ के आसपास है। इन लोगों में प्रतिरोधात्मक क्षमता इतनी कम होती है कि ये एक बार बीमार हुए तो इनका बचना नामुमकिन हो जाता है। एक तय परिवेश में रहने के कारण इन आदिवासियों की त्वचा बेहद संवेदनशील हो गई है। लिहाजा अगर ये बाहरी लोगों के संपर्क में लंबे समय तक रहते हैं तो ये रोगी हो जाते हैं और उपचार के अभाव में दम तोड़ देते हैं। अब जनजातीय मामलों के केंद्रीय मंत्री वीके चंद्र देव ने एलान किया है कि इनकी प्रतिरोधात्मक क्षमता बढ़ाने के लिए टीकाकरण करने और पौष्टिक खुराक देने के उपाय किए जाएंगे। 
करीब एक दशक पहले तक ये लोग पूरी तरह निर्वस्त्र रहते थे, लेकिन सरकारी कोशिशों और इनकी बोली के जानकार दुभाषियों के माध्यम से समझाने-बझाने पर इन्होंने थोडेÞ-बहुत कपड़े पहनने या पत्ते लपेटने शुरू कर दिए हैं। इसीलिए ब्रिटिश अखबार के जरिए जिन वीडियो दृश्यों की जानकारी सामने आई है, उनमें जारवा महिलाओं को कपडेÞ पहने नृत्य करते दिखाया गया है। इससे तय है ये वीडियो नए हैं। पुलिसिया पूछताछ से खुलासा हुआ है कि ब्रिटिश अखबार 'द आॅब्जर्वर' के पत्रकार को पोर्टब्लेयर के राजेश व्यास और टैक्सी चालक इनके निवास स्थल तक ले गए थे। वहां इन्होंने स्वादिष्ट भोजन के चंद निवाले डाल कर उन आदिवासियों से नृत्य कराया और नृत्य करते हुए उनका फिल्मांकन किया। जबकि यह इलाका सर्वोच्च न्यायालय और स्थानीय प्रशासन के दिशा-निर्देशों के अनुसार पर्यटन के लिए पूरी तरह प्रतिबंधित है। इन्हें संपूर्ण संरक्षण देने की दृष्टि से अंडमान ट्रंकरोड को बंद करके समुद्र से ऐसा मार्ग बनाए जाने की संभावनाएं तलाशी जा रही हैं, जो जारवा संरक्षित क्षेत्र से होकर न गुजरे।
भारत की सांस्कृतिक विविधता एक अनूठी खूबसूरती है। यहां विभिन्न आदिवासी समुदायों को अपने पुरातन और सनातन परिवेश में रहने की स्वतंत्रता हासिल है। जबकि मानवाधिकारों की सबसे ज्यादा वकालत करने वाले अमेरिका जैसे देश में आदिम जनजातियों को सुनियोजित ढंग से समाप्त किया गया और यह सिलसिला वहां अब भी जारी है। अमेरिका महाद्वीप में कोलंबस के मूल्यांकन को लेकर दो तरह के दृष्टिकोण सामने आए हैं। एक दृष्टिकोण उन लोगों का है, जो अमेरिकी मूल के हैं और जिनका विस्तार और वर्चस्व उत्तरी और दक्षिणी   अमेरिका के अनेक देशों में है। 

दूसरा दृष्टिकोण उन लोगों का है, जो दावा करते हैं कि अमेरिका का अस्तित्व ही हम लोगों ने खड़ा किया। इनका कहना है कि कोलंबस का आना इनके लिए कहर साबित हुआ। क्योंकि कोलंबस के आने तक अमेरिका में वहां की जनजातियों की जितनी आबादी थी वह घट कर अब आधी रह गई है। इतने बडेÞ जनसंहार के बरक्स जुल्म की दूसरी बड़ी कहानी अफ्रीका से लाए गए अश्वेतों को गुलाम बनाने की है। दास प्रथा तो खत्म हो गई, पर अश्वेतों के साथ भेदभाव का सिलसिला अब भी जारी है। ब्रिटेन के भी हालात बहुत अच्छे नहीं हैं। वहां हाल ही में नस्लीय आधार पर भारत के अनुज बिदवे की हत्या का मामला इसका उदाहरण है।
शोषण और सुनियोजित संहार के ऐसे ही पैरोकारों का एक दल हमारे यहां भी पैदा हो गया है जिसमें योजनाकार और अर्थशास्त्री शामिल हैं। ये भूमि, जंगल और खनिजों को महज आर्थिक उत्पाद मानते हैं। इनका कहना है कि इस प्राकृतिक संपदा पर दुर्भाग्य से ऐसी छोटी और मझोली जोत के किसानों और वनवासियों का वर्चस्व है, जो अयोग्य और अक्षम हैं।
सकल घरेलू उत्पाद दर में लगातार वृद्धि के लिए जरूरी है, ऐसे लोगों से खेतीयोग्य भूमि छीनी जाए और उसे विशेष व्यावसायिक हितों, शॉपिंग मॉलों और शहरीकरण के लिए अधिग्रहीत कर लिया जाए। इसी तर्ज पर जिन जंगलों और खनिज ठिकानों पर जन-जातियां आदिकाल से रहती चली आ रही हैं, उन्हें विस्थापित कर संपदा के ये अनमोल क्षेत्र औद्योगिक घरानों को उत्खनन के लिए सौंपे जा रहे हैं। 
इस मकसद की पूर्ति के लिए 'क्षतिपूर्ति वन्यरोपण विधेयक 2008' बिना किसी बहस-मुबाहिसे के पारित करा दिया गया था। जबकि इसके मसविदे को जनजातियों, वनों और खनिज संरक्षण की दृष्टि से गैर-जरूरी मानते हुए संसद की स्थायी समिति ने खारिज कर दिया था। लेकिन कंपनियों को सौगात देने की कड़ी में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने समिति की सिफारिश को दरकिनार कर यह विधेयक पारित करा दिया। 
यही कारण है कि देश में जितने भी आदिवासी बहुल इलाके हैं, उन सभी में इनकी संख्या तेजी से घट रही है।जारवा जनजातियों को भोजन का लालच देकर नचाने की घटना जहां शोषण और अमानवीयता का ही एक रूप है, वहीं इससे देश की कथित प्रगति का एक विद्रूप भी उभरता है। चंद निवालों के लालच में अगर परदेशियों के सामने अर्धनग्न जारवा महिलाएं नाच रही हैं तो विकास का ढिंढोरा पीट रहे देश के लिए यह लज्जा की बात है। क्योंकि ये भोले और मासूम जारवा नहीं जानते कि कथित रूप से सभ्य मानी जाने वाली दुनिया में नग्नता बिकती है। लेकिन इसके ठीक विपरीत जो लोग धन का लालच देकर इनकी नग्नता के दृश्य कैमरे में कैद कर करवा रहे थे, वे जरूर अच्छी तरह जानते थे कि यह नग्नता उनके व्यापारिक प्रतिष्ठान की टीआरपी बढ़ाने की सस्ती और जुगुप्सा जगाने वाली अचरज भरी वीडियो क्लीपिंग है। इसीलिए जन्मजात अवस्था में रह रहे जारवाओं की मासूमियत को बेचने की कोशिश की गई। पर यह एक क्रूर मजाक है। 
इसी तरह का एक मामला ओड़िशा के प्राचीन आदिवासियों को लेकर भी सामने आया है। इन्हें एक सरकारी मेले में नुमाइश की तरह पेश किया गया। हालांकि हमारे देश के सांस्कृतिक परिवेश में नग्नता कभी फूहड़ता या अश्लीलता का पर्याय नहीं रही। पाश्चात्य मूल्यों और भौतिकवादी आधुनिकता ने ही प्राकृतिक और स्वाभाविक नग्नता को दमित काम-वासना की पृष्ठभूमि में रेखांकित किया है। वरना हमारे यहां तो खजुराहो, कोणार्क और कामसूत्र जैसी रचनाधर्मिता से स्पष्ट होता है कि एक राष्ट्र के सामाजिक-सांस्कृतिक परिदृश्य में हम कितनी व्यापक मानसिक दृष्टि से परिपक्व थे। लेकिन कालांतर में विदेशी आक्रांताओं के शासन और उनकी संकीर्ण कार्य-प्रणाली ने हमारे सोच को बदला और नैसर्गिक नग्नता फूहड़ सेक्स का हिस्सा बन गई।
इसीलिए कहना पड़ता है कि कथित रूप से हम आधुनिक भले हो गए हों, लेकिन सभ्यता की परिधि में आना अभी बाकी है। वरना जो आदिम जातियां प्रकृति से संस्कार और आहार ग्रहण कर अपना जीवनयापन कर रही हैं, उन्हें मानव मानने के बजाय चिंपांजियों जैसे रसरंजक वन्यप्राणी मान कर नहीं चलते और न ही भोजन के चंद टुकडेÞ डाल कर उन्हें बंदर या भालुओं की तरह नाचने को बाध्य करते। अगर इसे ही मुख्यधारा की सभ्यता कहा जाता है तो अच्छा है इन्हें अपने ही दायरे में, आदिम सभ्यता में रहते हुए बख्शा जाए। प्राकृतिक परिवेश में रहने वाले इंसानों की लाचार मासूमियत को भुनाने या बेचने का यह प्रसंग आदिवासियों के प्रति हमारे नजरिए पर एक बार फिर सवालिया निशान लगाता है।

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