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THE HIMALAYAN DISASTER: TRANSNATIONAL DISASTER MANAGEMENT MECHANISM A MUST

We talked with Palash Biswas, an editor for Indian Express in Kolkata today also. He urged that there must a transnational disaster management mechanism to avert such scale disaster in the Himalayas. http://youtu.be/7IzWUpRECJM

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS TALKS AGAINST CASTEIST HEGEMONY IN SOUTH ASIA

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Friday, February 10, 2012

संसदीय लोकतंत्र का मुखौटा

संसदीय लोकतंत्र का मुखौटा


Friday, 10 February 2012 10:00

शंकर शरण 
जनसत्ता 10 फरवरी, 2012: चुनावों के समय ही नहीं, विविध राष्ट्रीय प्रसंगों में महसूस होता है कि हमारे राजनीतिक दल सत्ता से मिलने वाली सुख-सुविधा से आगे किसी बात पर गंभीरता से ध्यान नहीं देते। उनके लिए राज-काज मुख्यत: राज-भोग है। कोई राज-धर्म, देश-हित, प्रजा की चिंता भी होती है, यह उनके सार्वजनिक विमर्श या व्यवहार में शायद ही कभी दिखता है। निस्संदेह जनता यह नहीं चाहती। तब ऐसा राजनीतिक परिदृश्य देश में कैसे चल रहा है? कहां गड़बड़ी है? 
इस बात पर प्राय: ध्यान नहीं जाता कि स्वतंत्र भारत की राजनीतिक व्यवस्था किसी राष्ट्रीय विचार-विमर्श से नहीं बनी थी। यहां तक कि संविधान सभा में भी इस पर बुनियादी चिंतन नहीं हुआ था। संविधान निर्माताओं ने जो राजनीतिक व्यवस्था 1950 में अंगीकार की, वह औपचारिकता मात्र थी। देश में प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद तो पहले ही से काम कर रहे थे! यानी ब्रिटिश संसदीय प्रणाली यहां अपनाने का निर्णय पहले ही हो चुका था। संविधान सभा ने उस पर केवल मोहर लगाई। 
इस तरह हमारी राजनीतिक व्यवस्था 1935 में अंग्रेजों के बनाए 'ब्रिटिश इंडिया एक्ट' पर आधारित है। यानी जो व्यवस्था एक विदेशी, औपनिवेशिक सत्ता ने मूलत: अपने हित में बनाई, वही स्वतंत्र भारत में अपना ली गई। गांधीजी जैसे सर्वोच्च नेता ने भी जिन मूलभूत बिंदुओं पर जीवन भर आग्रह रखा था, उसे भी संविधान सभा में किसी चर्चा के लिए रखा तक नहीं गया! नेहरू जी पहले ही गांधीजी को कह चुके थे कि हिंद स्वराज वाली बातें भूल जाएं। 
तब भारतीय जनगण के जीवन-मूल्यों, भावनाओं, आदि को किसी गिनती में न लेना तय बात थी। यानी ऐसा 'लोकतांत्रिक' विधान अपनाया गया, जिसमें लोक की भूमिका ही बाद में शुरू होती थी। शासन-तंत्र और बुनियादी नीतियां एक अल्पतंत्र ने अपनी मर्जी से पहले ही तय कर ली थीं। इस प्रकार, आरंभ से ही देखा जा सकता है कि यहां ब्रिटिश संसदीय प्रणाली अपनाने में उसकी आत्मा नहीं आई। केवल उसका ऊपरी रूप रहा। कागज पर एक नियम, व्यवहार में दूसरी प्रक्रिया, यह दोहरापन स्वतंत्र भारत की राजनीतिक व्यवस्था की बुनियादी दुर्बलता रही है। 
यह दोहरापन स्वतंत्रता-प्राप्ति के पहले कांग्रेस संगठन में ही था। पार्टी की सांगठिक पद्धति संसदीय या सामूहिकतावादी थी, लेकिन वास्तविक कार्यसंचालन एक प्रकार की अध्यक्षीय व्यवस्था से होता था, जिसमें सभी महत्त्वपूर्ण निर्णय कोई 'आलाकमान' लेता था। चाहे वह आला व्यक्ति पार्टी के किसी पद पर भी न हो। जिस प्रकार गांधीजी कांग्रेस पार्टी को चलाते थे और दो दशक तक चलाते रहे, वह ब्रिटिश लेबर या कंजरवेटिव पार्टी में अकल्पनीय था। 
यह उदाहरण है कि यूरोपीय संगठन और भारतीय मिजाज का मेल नहीं बैठता था। मगर इस दोहरेपन और बेमेल स्थिति के दुष्परिणामों पर उनका ध्यान नहीं गया। कांग्रेस का औपचारिक विधान एक चीज कहता था, वास्तव में संगठन के नेतागण दूसरी चीज करते थे। किसी को इसमें बड़ी आपत्ति नहीं होती थी, तो इसीलिए कि भारतीय परंपरा में आदरणीय बडेÞ-बुजुर्ग की बात नापसंद होने पर भी लोग चुप रहते या मानते रहे हैं। कांग्रेस में गांधी इसका भरपूर उपयोग करते थे, जबकि संगठन के यूरोपीय सिद्धांत की भावना इसके नितांत विपरीत थी। 
यही दोहरापन स्वतंत्र भारत में पूरी राजनीतिक प्रणाली में स्थानांतरित हो गया। स्वयं प्रथम प्रधानमंत्री तय किए जाने की प्रक्रिया इसकी गवाह बनी, जब कांग्रेस नेताओं की पहली पसंद न होने के बावजूद गांधीजी ने नेहरू को उस पर और देश पर थोपा। फिर नेहरू जी ने इसी शैली को सरकार चलाने में दोहराया। वल्लभभाई पटेल के निधन के बाद उन्हें इसमें और आसानी हो गई। सारे महत्त्वपूर्ण फैसले नेहरू लेते थे, कई बार मंत्रिमंडल की बैठक में निर्णयों को केवल 'सूचित' किया जाता था। 
दूसरी ओर, अपने कई निर्णयों के दुष्परिणामों की सीधी जिम्मेदारी से नेहरू बच जाते थे, क्योंकि सिद्धांतत: सभी निर्णय मंत्रिमंडल के लिए माने जाते थे। लिहाजा, पूरी मंत्रिपरिषद उसकी जिम्मेदारी लेकर बचाव करने, और नेता बदलने के बजाय हर छल-छद््म का उपयोग कर पूरे मामले की लीपा-पोती करने के लिए बाध्य हो जाती थी (जैसे, कश्मीर, तिब्बत, पंचशील, आदि कई मामले)। इस प्रकार, सिद्धांत-व्यवहार में दोहरेपन ने हमारे राजनीतिक तंत्र में एक ऐसी विकृति पैदा की, जिसने जल्द ही पूरे तंत्र को ग्रस लिया। अगर सर्वोच्च स्तर पर कोई भयंकर भूल करके भी बार-बार बच सकता था, तो नीचे के लिए भी वही उत्तरदायित्व-विहीन अधिकार-भोग की शैली का आकर्षण और प्रचलन स्वाभाविक था। ध्यान दें, ऐसा ब्रिटिश संसदीय व्यवहार में नहीं होता था। गलती करने वाला प्रधानमंत्री तो क्या, सामान्य अधिकारी भी लंदन हो या दिल्ली, बिना दंड पाए शायद ही रहता था।
इस प्रकार, समय के साथ हमारे देश के राजनीतिक तंत्र में संसदीय लोकतंत्र एक मुखौटा-सा रहा, जबकि वास्तविक व्यवस्था अघोषित रूप से अध्यक्षीय जैसी रही। न केवल गांधी, नेहरू, बल्कि बाद में बीजू, सिद्धार्थ शंकर रे, एनटी रामाराव, जयललिता, लालू, मुलायम, मायावती, करुणानिधि आदि से लेकर सोनिया तक अनेक नेताओं ने उसी शैली को अपनाया।दिखाने के लिए परिषद, लेकिन वास्तव में एक व्यक्ति सर्वाधिकार रखता रहा। 

नतीजतन एक अनुत्तरदायी अध्यक्षीय तंत्र बना, जिसमें न संसदीय प्रणाली की आत्मा है, न अध्यक्षीय प्रणाली का लाभ। बल्कि दोनों की कमियां हमारे   सिर आ गई हैं। इसीलिए हमारे यहां ऐसे शासन प्रमुख हो जाते हैं, जो बार-बार कह सकते हैं कि उन्हें निर्णयों के बारे में 'मालूम नहीं' है। जबकि ऐसे स्वच्छंद राज्याधिकारी और आलाकमान भी होते रहते हैं जो सारे निर्णय लेकर भी उत्तरदायित्व और दंड से बचे रहते हैं। 
यह सभी स्तरों पर हो रहा है। इसीलिए हो रहा है, क्योंकि लगभग सौ वर्ष से यही दोहरेपन का मॉडल चल रहा है। यह कहने में अतिशयोक्ति नहीं कि सोनिया गांधी और महात्मा गांधी की शासन शैली में समानताएं हैं, जिसमें संसदीय और अध्यक्षीय प्रणाली का अघोषित घाल-मेल है।
इस कारण वर्तमान भारतीय संसदीय तंत्र एक अकार्यकुशल, पर अत्यंत खर्चीला बोझ हो गया है। अधिकतर सांसद, विधायक सुसंगत नीति और कानून-निर्माण के अलावा सारे काम करते रहते हैं। कई प्रधानमंत्री सालों भर अपनी खैर ही मनाते रहे हैं, क्योंकि उनका पदस्थापन किसी अदृश्य आला या दलीय समीकरणों का मोहताज रहता है। इस प्रकार, महंगी चुनाव प्रक्रिया के बाद देश को एक समर्थ शासक के बजाय प्राय: एक उच्च वेतन-सुविधा भोगी साधारण व्यक्ति मिलता है। दलीय उठापटक और मोर्चेबंदी के दौर में सांसदों, मंत्रियों और नेताओं का पूरा ध्यान इसी पर रहता है और शासन-कार्य उपेक्षित, बाधित रहता है। 
इस बीच, राजकीय नौकरशाही का विशाल तंत्र मानो स्वायत्त रहा है। वह स्वयं अपनी इच्छा से चलता है, और अपना पूरा खयाल रखना ही उसका प्रमुख कार्य है। आईएएस और आईएफएस कॉडरों का अपना शक्ति-क्षेत्र है जिन्हें किसी अकर्मण्यता, कमी या गलती का दोषी नहीं ठहराया जा सकता। इससे उनकी दक्षता पर भी असर पड़ता है। 
सांसदों की अयोग्यता और अनिच्छा के कारण नीति-निर्माण प्राय: उच्च नौकरशाह ही करते रहते हैं। कई नीतियों के प्रारूप वही जैसे-तैसे बनवाते हैं, और संसद में बिना गहरी, वास्तविक छानबीन के वही निर्णय बन जाते हैं। शिक्षा, संस्कृति आदि मामले इसके सर्वाधिक दुर्भाग्यपूर्ण उदाहरण हैं, जब उसी लापरवाह प्रक्रिया से मामूली एक्टिविस्टों की हानिकारक, राजनीति-प्रेरित बकवास भी 'नीति-दस्तावेज' बनती रहती है। यह भी एक तरह से स्वतंत्र भारत में आरंभ से ही हुआ। 
मगर इस खिचड़ी, उत्तरदायित्वहीन व्यवस्था से कई विषयों में अराजक स्थिति पैदा हो गई है, जिसका लाभ धूर्त और देशी-विदेशी शत्रु उठा रहे हैं। कोई नहीं जानता कि किस काम के लिए, किस नीति या निर्णय के लिए कौन उत्तरदायी है। आंतरिक सुरक्षा, वैदेशिक संबंध, शिक्षा आदि क्षेत्र इससे बहुत प्रभावित होते रहे हैं। एनजीओ तंत्र का एक नया विशाल तानाबाना बना है जिनके माध्यम से अदृश्य शक्तियां नीति-निर्माण, महत्त्वपूर्ण नियुक्तियों तक को अपने हाथ में ले रही हैं। सजायाफ्ता और संदिग्ध लोग सर्वोच्च नीति-निर्मात्री संस्थाओं के सदस्य बन जाते हैं, जबकि उन पर बड़ी अदालतों में कार्रवाइयां चल रही हैं। 
यह सब उसी उत्तरदायित्वहीन प्रणाली में संभव हो रहा है, जिसमें सत्ता की सुख-सुविधा का भोग करने वाले हजारों बन गए हैं, लेकिन किसी दोषपूर्ण निर्णय के लिए दंडित होने वाला कोई नहीं मिलता। मिल नहीं सकता। यहां पुन: स्मरण करें कि ऐसा परिदृश्य यूरोपीय लोकतंत्र में नहीं मिल सकता, जिसका कोट हमने पहन लिया है। 
भारत में अपने ही बनाए, स्वीकार किए कानूनों का मजाक बनाना इसी बात का परिणाम है कि हमने केवल उधार का कोट पहना था, अपने स्वभाव के अनुकूल शासन-विधान नहीं बनाया। यूरोपीय तंत्र में इस तरह अपने ही कानून, संविधान का मजाक नहीं बनाया जाता, क्योंकि वह उनका अपना है, उधार का नहीं।  
अभी जैसी संसदीय प्रणाली यहां चल रही है, इसकी तुलना में घोषित अध्यक्षीय प्रणाली अधिक पारदर्शी, उत्तरदायित्वपूर्ण और कम खर्चीली रहती। आशय यह नहीं कि अध्यक्षीय प्रणाली होते ही सब ठीक हो जाएगा। पर बहुतेरे छद््म तरीके, दोहराव और उत्तरदायित्व-विहीनता समाप्त हो जाएगी। उस प्रणाली में अध्यक्ष को सभी निर्णय लेने और उनका पालन करवाने के लिए सीधे ही चुना जाता है। उसी के हाथ अधिकार भी रहते हैं। 
वह अपने सभी सहायक और पूरा अधिकारी तंत्र स्वयं नियुक्त करता है। कार्यकाल नियत रहने, उसकी संख्या भी सीमित रहने से वह अनावश्यक दबावों से नितांत मुक्त रहता है। साथ ही उसे अपने उत्तरदायित्व का सीधा भान रहता है। क्योंकि संसद ही नहीं, देश के सामने भी वही हर सही-गलत का उत्तरदायी होता है। अध्यक्षीय प्रणाली में सांसदों की भूमिका सुनिश्चित, सीमित होने से राज्यतंत्र में बिखराव और भ्रष्टाचार की संभावना बहुत घट जाती है। 
इन बिंदुओं को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में लाने की आवश्यकता है। ये सभी आपस में संबंधित हैं। इसलिए निदान भी परस्पर संबंधित है। हालांकि समय के साथ ऊपर से नीचे तक निहित स्वार्थों का बड़ा सशक्त जमावड़ा बन गया है। वह ऐसे किसी परिवर्तन की बात भी नहीं करने देगा, जो उनके सुखद, पर उत्तरदायित्वहीन राजनीतिक प्रभाव को आंच पहुंचाए। मगर रोग की पहचान तो रखनी चाहिए।

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