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THE HIMALAYAN DISASTER: TRANSNATIONAL DISASTER MANAGEMENT MECHANISM A MUST

We talked with Palash Biswas, an editor for Indian Express in Kolkata today also. He urged that there must a transnational disaster management mechanism to avert such scale disaster in the Himalayas. http://youtu.be/7IzWUpRECJM

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS TALKS AGAINST CASTEIST HEGEMONY IN SOUTH ASIA

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Wednesday, February 8, 2012

कोशी की करजैनी

कोशी की करजैनी

Wednesday, 08 February 2012 10:28

रंजीत 
जनसत्ता 8 जनवरी, 2012 : हर साल एक जनवरी को करजैनी की याद आ जाती है। करजैनी से क्या कुछ नहीं करते थे हम! इसके लिए क्या नहीं सहते थे हम! सांप-बिच्छू की परवाह किए बगैर बांस, बेर, अमती, बबूल की सघन झाड़ियों में घुस जाते थे। हाथ-पांव झरबेर, जलेबी, अमती के कांटों से बुरी तरह घायल हो जाते थे। कपड़े फट जाते थे, लेकिन करजैनी पाने का जुनून कुछ ऐसा था कि सारा नुछाड़ (कांटों के घाव) ठेंगे पर! करजैनी के दाने हमारे लिए किसी रत्न से कम नहीं थे। गिल्ली-डंडे, कंचा से लेकर तमाम खेलों में हम करजैनी को ही दांव पर लगाते। जिसके पास करजैनी होती, उसे किसी बात की चिंता नहीं। करजैनी कोशी इलाके की एक जंगली और लत्तीनुमा घास थी। जंगली झाड़ियों में यह अपने-आप उग आती थी। बरसात के बाद इसमें फूल लगते थे। नवंबर में फूल फल में बदल जाते और इन्हीं फलों के बीच होता था करजैनी का मोतीनुमा बीज। इसी बीज के हम बच्चे दीवाने होते थे। मानो किसी सिद्ध कलाकार ने पत्थर की रंगीन मोती पर इत्मीनान से नक्काशी कर दिया हो। 
गहन छानबीन के बावजूद मैं आज तक नहीं जान सका कि वनस्पति विज्ञान में इसे किस नाम से जाना जाता है। मैं यह भी नहीं जानता कि हिंदी में इसे क्या कहते हैं और कोशी के अलावा कहीं और यह घास उगती है या नहीं। कोशी में भी शायद अब इसका अस्तित्व नहीं है। हालांकि अब करजैनी को खोजने का बाल-जुनून नहीं रहा, लेकिन मैं इसकी खोज करता रहा हूं। गांव के बच्चों का जवाब होता है, 'यह किसी खिलौने का नाम है क्या चचा जी? गांव के हाट-बाजार में तो नहीं मिलता! शहर में जरूर मिलता होगा।'
दरअसल, हाल के कुछ वर्षों से कोशी इलाके की जैव-विविधता तेजी से घटती जा रही है। कोशी द्वारा हिमालय के हजारों वर्ग किलोमीटर से लाकर लगाई गई वनस्पतियां अब इलाके से गायब हो चुकी हैं। यही हाल इलाके के


जीवों का भी है। चिड़िया, मेंढक, जंगली मछली, कीट-पतंगों की दर्जनों प्रजातियां इलाके से गुम हो चुकी हैं। बीस-पच्चीस साल पहले जब हम पुरानी मेड़ों को काटते-छांटते थे, तो बड़ी संख्या में मिट्टी में रहने वाले जीव मसलन, केंचुआ, केकड़ा, उचड़िन आदि देखने को मिलता था। लेकिन अब केकड़ों का दर्शन भी मुश्किल है। चिड़ियों की कई मनमोहक प्रजातियां गायब हो चुकी हैं। एक चिड़िया होती थी 'मछगिद्धी'। यह उद्बिलाव की तरह पानी में लंबे समय तक डुबकी लगाती थी और मछली पकड़ कर फुर्र से उड़ जाती थी। हम बच्चे इसका तब तक पीछा करते जब तक यह निगाह से ओझल नहीं हो जाती। नीले रंग की 'धोबिया' नाम की चिड़िया में सारे गुण पंछियों के ही थे, लेकिन इसका आवास और इसकी प्रजनन-प्रक्रिया अनूठी थी। यह मिट्टी के बड़े टीलों में बिल बना कर रहती और उसी में अंडे देती। बचपन में हमारे बीच इसकी प्रतियोगिता होती कि कौन कितने धोबिया बिल को खोज सकता है। खोजकर्ता हमारी नजरों में किसी कोलंबस और वास्को-डिगामा से कम नहीं होता। 
मुझे नहीं मालूम कि कोशी की जैव-विविधता को लेकर किसी सरकार, संस्था या एजेंसी ने कोई अनुसंधान किया है या नहीं। लेकिन इस बात में मुझे कोई संदेह नहीं कि हाल के वर्षों में इस इलाके की समृद्ध जैव-विविधता अप्रत्याशित रफ्तार से घटी है। ठीक उसी तरह, जैसे हाल के वर्षों में इस इलाके की बांस-मिट्टी-जूट आधारित शिल्प-कला गुम होती जा रही है। जिन लोक थातियों ने यहां हजारों-लाखों सालों में आकार लिया, उनमें से अधिकतर महज कुछ दशकों में ही लुप्त हो गए। आलम यह है कि अगर आप आल्हा-ऊदल या राजा सलहेस की पूरी कहानी जानना चाहें, तो आपको न तो इसके वाचक मिलेंगे और न ही कोई किताब मिलेगी जो सटीक जानकारी दे सके। एक जनवरी को बचपन के एक मित्र से जब करजैनी की चर्चा की तो उसने जवाब दिया- 'अरे भाई, हम अगर यही बात किसी से पूछेंगे तो वह हमें बताह (पागल) घोषित कर देगा।'

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