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THE HIMALAYAN DISASTER: TRANSNATIONAL DISASTER MANAGEMENT MECHANISM A MUST

We talked with Palash Biswas, an editor for Indian Express in Kolkata today also. He urged that there must a transnational disaster management mechanism to avert such scale disaster in the Himalayas. http://youtu.be/7IzWUpRECJM

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS TALKS AGAINST CASTEIST HEGEMONY IN SOUTH ASIA

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Monday, February 13, 2012

लंगड़ी होती अवाम : ठहाके मार रहा है सेंसर का बिच्‍छू

लंगड़ी होती अवाम : ठहाके मार रहा है सेंसर का बिच्‍छू



 नज़रिया

लंगड़ी होती अवाम : ठहाके मार रहा है सेंसर का बिच्‍छू

12 FEBRUARY 2012 NO COMMENT

♦ गार्गी मिश्र

पिछले दिनों हमने गार्गी का सेंसरशिप से ही जुड़े मुद्दे पर एक राइटअप मोहल्‍ला लाइव पर पढ़ा था, आजादी बोलेगा तो… उसी शृंखला में पेश है, उनका यह दूसरा आलेख : मॉडरेटर

नींद में आना चाहते हो?
नशे में धुत होना चाहते हो?
अंधे और दुनिया से विरक्त होना चाहते हो?

तो शराब या अफीम की जरूरत नहीं है।
बस चुप हो जाओ, आवाज पे ताला लगा लो।

सेंसर के बिच्‍छू का एक डंक और फिर हो जाओगे अंधे… गूंगे… नशे में धुत, और कुछ भी नहीं दिखेगा… होंगी तो सिर्फ बेजुबान सोच और बेड़ियों में आजादी।


ये लंगड़ों का गांव

जी. हां, सही सुना आपने। अब वेब सेंसरशिप का बिच्‍छू ठहाके मार कर हंस रहा है और हंसे भी क्यूं नहीं, वजह भी है उसके पास। जनता गूंगी हो रही है, अपाहिज हो रही है और उसका जहर फैल रहा है आजादी के रगों में। भारत सरकार की आंख मिचौली अब खत्म हो गयी है। सरकार ने वेब सेंसरशिप के बिच्‍छुओं को खुले आम छोड़ दिया है और ये बिच्छू और भी ताकतवर हो गये हैं, अवाम के गिरते हौसले को देख कर। जो कंपनियां (जैसे गूगल, ट्विटर) कल तक वेब सेंसरशिप जैसे बेबुनियादी नियम के खिलाफ थी, वो भी आज हमारी लोमड़ी जैसी सरकार के सामने झुक गयी है। दिल्ली हाईकोर्ट ने, गूगल और फेसबुक जैसी कुछ 21 कंपनियों से इंटरनेट कंटेंट मोनिटरिंग का प्लान अगले 15 दिनों के अंदर मांगा है।

इनफॉर्मेशन टेकनोलाजी एक्ट 2008 के तहत भारत सरकार के पास ये अधिकार है कि सरकार का एक कर्मचारी वेब पोर्टल्स को वेब साइट्स ब्लाक करने का आदेश दे सकता है। मिनिस्टर फॉर स्टेट कम्युनिकेशन एंड आईटी सचिन पायलट जी का कहना है कि सरकार फ्री इंटरनेट या फ्री स्पीच के ऊपर कोई लगाम नहीं लगाना चाहती लेकिन सारी सोशल नेटवर्किंग साइट्स और दूसरी वेब साइट्स को देश में बनाये हुए कानून के तहत अपनी कार्य प्रणाली बनानी होगी। यह तो वही बात हो गयी कि "मैं तुम्‍हें सांस लेने से मना नहीं कर रहा हूं, पर तुम्‍हें एक बंद कमरे में ही सांसें लेनी हैं…" आखिर बंद कमरे में सांसें कब तक ले पाओगे?

गंदा है पर धंधा है ये

वेब सेंसरशिप का ये नियम हम सभी को अपाहिज कर रहा है। इस बात का खयाल उन सोशल नेटवर्किंग साइट्स को भी है, जो इसे स्वीकार करने को तैयार हैं। वे जानती हैं इसके दुष्परिणाम, पर क्या करें, कुछ ग्राहकों की कमी के कारण बनिया अपनी दुकान बंद तो कर नहीं देगा। दस ग्राहक कम होंगे, बनिया की दुकान तब भी चलती रहेगी। पर उन ग्राहकों की आवाज का क्या? यह कहां तक लाजमी है कि अपनी बात, विचार, और सोच को दुनिया के सामने प्रस्तुत करने के लिए एक आम इंसान को अपनी जेब ढीली करनी पड़े। जरा सोचिए कि ये कहां तक सही है कि फेसबुक या किसी ब्लॉग का इस्तेमाल करने के लिए आप को हजार या दो हजार रुपये चुकाने पड़ें?

सफेदपोशों का नकाब

बात सिर्फ जेब की नहीं, यहां वेब सेंसर शिप के नाम पर सरकार एक नकाब में रहना चाहती है। जब तक हमारी आवाजों पर ताला लगा हुआ है, तब तक ये सरकार नकाब में है। जहां जबान फिसली, नकाब उठा और रुपहले घूंघट से बाहर निकली एक झूठी, डरपोक और भ्रष्टाचारी सरकार जो अपने स्वार्थ, अपनी कुर्सी के लिए हमारी आवाजों को कुचल देना चाहती है। हमारी सरकार बात करती है फ्री इंटरनेट पर फैली अश्लीलता की, सरकार बात करती है, सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर आते सरकार और देश के संविधान के खिलाफ भड़काऊ कमेंट्स की, सरकार बात करती है उन आवाजों, आर्टिस्ट, टैलेंट्स को दबाने की जो देश का असली चेहरा अपनी कला के माध्यम से दुनिया के सामने लाना चाहते हैं… यदि हमारी सरकार भ्रष्टाचार के प्रति इतनी ही संवेदनशील है तो फिर ये असेंबली में बैठे नेताओं पर जो कि अश्लील वीडियो देखते पकड़े जाते हैं, उन पर कोई सख्त एक्शन क्यूं नहीं लेती? क्यूं उन्हें देशद्रोह जैसे इल्जामों में लपेटा नहीं जाता? क्या देशद्रोह का मुकदमा सिर्फ उसके लिए बना है, जो इस देश की जर्जर पार्लियामेंट को गुसलखाना बताता है, जो कि वाकई में एक कटु सत्य है।

इंटरनेट : हर प्यासे का कुआं

ज हमें किसी भी विषय पे कोई भी जानकारी चाहिए होती है, तो हम अपने कंप्यूटर, लैपटॉप, आई पैड या फिर मोबाइल पे एक क्लिक करते हैं और संसार का अथाह ज्ञान और जानकारी हमारे सामने होती है। मनुष्य से लेकर मशीन तक, ऐसी कोई भी जानकारी नहीं जो हमें इंटरनेट पर नहीं मिलती। चाहे मार्केटिंग की फील्ड हो या रिसर्च की, चाहे ऑनलाइन टेस्ट हों या कोई वोटिंग, इंटरनेट हर जगह विद्यमान है। भारत में इंटरनेट उपभोक्ताओं की संख्या लगभग 12 करोड़ तक पहुंच चुकी है। ये वही जनसंख्या है, जो कहीं न कहीं हमसे और आपसे किसी न किसी माध्यम से जुड़ी हुई है, जिसमें सबसे बड़ा माध्यम है सोशल नेटवर्किंग और ब्‍लॉगिंग। चाहे विकिलीक्स के खुलासे हों या भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे की लड़ाई, फ्री इंटरनेट इन सारे मुकाम को हासिल करने में बहुत बड़ा माध्यम रहा है। इंटरनेट ने न जाने कितने म्‍युजिकल बैंड्स, इंटरनेट गेम्स, राइटर्स, ब्‍लॉगर्स और आर्टिस्ट्स को चमकता हुआ सितारा बनाया है। इसका जीता जागता उदाहरण है यू ट्यूब की रानी श्रद्धा शर्मा, जो कि एक 15 साल की लड़की है, जिसने अपने मौसिकी के हुनर से और इंटरनेट के माध्यम से अपना नाम स्थापित किया है। इंटरनेट कब किस रूप में हमारी जीत का कारण बन जाता है, शायद इसका अंदाजा हम नहीं लगा सकते। सोचिए क्या होगा अगर आपको इन सारी सुविधाओं से वंचित कर दिया जाए और आप एक तरह से विकलांग हो जाएं, अपनी आवाज को संसार के सामने रखने के लिए?

लंगड़ों की आवाज

हरिए! आप समझ रहे हैं कि यहां बात अपाहिजों की हो रही है। सही समझ रहे हैं। पर इन अपाहिजों के हांथ, पांव, दृष्टि, अन्य शारीरिक अंग सही सलामत हैं। फिर सवाल यह उठता है कि ये अपाहिज कैसे हैं? जवाब सीधा सा है। ये कोई और नहीं, ये आप और हम हैं। हम अपाहिज हो गये हैं अपनी आवाजों से, अपनी आजादी से, अपने विचारों से, अधिकारों से। और इस विकलांगता के जिम्मेदार एक हद तक हम खुद हैं क्‍योंकि "चलता है" नाम का दीमक अब भी हमारे दिलो-दिमाग में बसा हुआ है। और हमारी इस विकलांगता पे सेंसर का बिच्‍छू भी अपनी दीदें गड़ाये हुए है। अभी हम सिर्फ विकलांग हुए हैं। हमारी आवाज को लकवा न मार दे, ये आवाज हमेशा के लिए बंद न हो जाए, इसलिए देश के कुछ जागरूक युवाओं ने अपनी आवाज को बचाने का बीड़ा उठाया है। Save Your Voice की मुहिम तले, कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी और अलोक दीक्षित (पत्रकार) ने सरकार के इस बेबुनियादी सेंसरशिप के नियम के खिलाफ आवाज उठायी है। जैसा कि देश में फैली जागरूकता के स्तर को हम देख पा रहे हैं, उससे ये एकदम साफ है कि अब भी हजारों इंटरनेट उपभोगकर्ता, सरकार के इस हथकंडे से बेखबर है। "सेव योर वोइस : अगेंस्ट वेब सेंसरशिप" कैंपेन के तहत "सेव योर वाइस" टीम, युवाओं के सहयोग से भारत भ्रमण पर निकल चुकी है। जागरूकता के इस आंदोलन को बढ़ावा देते हुए यह टीम हर छोटे-बड़े शहर में पहले ब्‍लॉगर्स और फेसबुक यूजर्स की एक मीटिंग कर रही है और फिर एक 'लंगड़ा मार्च' निकाल रही है, जिसमें इंटरनेट उपभोक्ता लंगड़ों और अपाहिजों के भेष में रैली निकाल कर समाज में ये संदेश फैला रहे हैं कि फ्री इंटरनेट के न होने पर एक आम आदमी किस तरह से अपनी आवाज और आजादी खो बैठेगा। इस नेशनल टूर का उद्देश्य युवाओं के बीच आईटी लॉ और सेंसरशिप के खिलाफ लड़ाई में एकजुट करना है।

इस अभियान की शुरुआत उज्‍जैन में ब्‍लॉगर्स मीट से शुरू हुई, जिसमें शहर के मशहूर ब्‍लॉगर्स ने अपने विचारों की अभिव्यक्ति की और फिर लंगड़ा मार्च का आयोजन किया गया। इसी प्रकार से ये टीम देश के हर कोने-कोने में अपनी आवाज को पहुंचाने की कोशिश कर रहा है। सेव योर वोइस के कैंपेन के तहत इंटरनेट यूजर्स 13 मई 2012 को दिल्ली के इंडिया गेट से एक विशाल लंगड़ा मार्च निकलेंगे और यह संदेश देंगे कि वेब सेंसरशिप के नियमों तहत हमारी सोशल मीडिया अपाहिज हो जाएगी। ये मुहिम है हम सब के लिए। अन्ना ने आवाज उठायी थी। आज फिर जोश बरपा है अपने अधिकारों के लिए लड़ने का। पीछे मत हटिए। यही वक्त है कि हम सब एक साथ एक जुट हो कर अपनी आवाज को मुर्दा होने से बचा लें। संभल जाओ, आगे आ जाओ… कहीं ऐसा न हो कि विकलांगता आदत बन जाए!

"सेव योर वोइस" मुहिम से जुड़ने के लिए संपर्क करें, असीम त्रिवेदी(09336505530) और अलोक दीक्षित (07499219770)।

(गार्गी मिश्र। पेशे से पत्रकार। मिजाज से कवयित्री। फिलहाल बेंगलुरु से निकलने वाली पत्रिका Bangaluredकी उपसंपादक और कंटेंट को-ऑर्डिनेटर। गार्गी से gargigautam07@gmail.com पर संपर्क करें।)

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