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THE HIMALAYAN DISASTER: TRANSNATIONAL DISASTER MANAGEMENT MECHANISM A MUST

We talked with Palash Biswas, an editor for Indian Express in Kolkata today also. He urged that there must a transnational disaster management mechanism to avert such scale disaster in the Himalayas. http://youtu.be/7IzWUpRECJM

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS TALKS AGAINST CASTEIST HEGEMONY IN SOUTH ASIA

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Tuesday, February 14, 2012

दस फीसदी भी नहीं महिला प्रत्याशी

http://www.janjwar.com/2011-05-27-09-00-20

राजनीति
दस फीसदी भी नहीं महिला प्रत्याशी

11 February 2012

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प्रदेश की आधी आबादी को जिस तरह विधानसभा के प्रतिनिधित्व से दूर रखा गया
है उससे साफ़ है कि 33 फीसदी महिला आरक्षण का विरोध और समर्थन करने वाली
सभी पार्टियाँ एक ही हैं. प्रदेश की किसी पार्टी ने 9 फीसदी से अधिक
महिलाओं को प्रत्याशी नहीं घोषित किया है...

सुषमा

देश की सबसे बड़ी आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश में 11 फरवरी को
विधानसभा के दूसरे चरण के हो चुके चुनावों के बाद यह साफ हो गया है कि
प्रदेश में अबकी वोट प्रतिशत में भारी इजाफे की बड़ी वजह महिलाओं की बढ़ी
भागीदारी है. चुनाव आयोग समेत पार्टियाँ और चुनावी विश्लेषक भी महिलाओं
की बढ़ी भागीदारी को स्वीकार कर रहे हैं और बदलते व बढ़ते भारत का गुणगान
कर रहे हैं.
women-voter
लेकिन सवाल है कि क्या वोट प्रतिशत में महिलाओं की बढ़ी भागीदारी के
मुकाबले चुनावी पार्टियों ने विधानसभा चुनावों में उस मुताबिक स्थान दिया
है या फिर सिर्फ महिला सशक्तिकरण का झुनझुना ही बजा रहे हैं. उत्तर
प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों के लिए हो रहे चुनावों के मद्देनजर देखें
तो झुनझुना वाली बात ही अधिक सही लगती है. 8 और 11 फरवरी को दो चरणों में
हो चुके चुनावों में करीब दो हजार प्रत्याशियों ने अपने भाग्य आजमाए,
जिसमें महिलाएं मात्र 141 थीं.

प्रदेश की आधी आबादी को जिस तरह विधानसभा के प्रतिनिधित्व से दूर रखा गया
है उससे साफ़ है कि 33 फीसदी महिला आरक्षण का विरोध और समर्थन करने वाली
सभी पार्टियाँ एक ही हैं. प्रदेश की किसी पार्टी ने 9 फीसदी से अधिक
महिलाओं को प्रत्याशी नहीं घोषित किया है. पार्टियों से ज्यादा महिलाएं
स्वतंत्र तौर निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर खड़ी हैं.

इन परिणामों से साफ़ है कि महिला सशक्तिकरण आज भी एक दूर की कौड़ी है.
महिला अपनी पहचान के लिये प्रयत्नशील है, लेकिन उसकी आजादी के लिए अभी भी
परिवर्तन की जरूरत है. नारी सशक्तिकरण के नाम पर झूठा खेल हर जगह खेला जा
रहा है, फिर चाहे महिला आरक्षण ही क्यों न हो.

सर्वप्रथम 1926 में विधानसभा में एक महिला का मनोनयन कर सदस्य बनाया गया
परन्तु उसे मत देने के अधिकार से वंचित रखा गया. इसके बाद 1937 में
महिलाओ के लिए सीट आरक्षित कर दी गई और 41 महिला उम्मीदवार चुनाव में
उतरी .1938 में श्रीमती आर. बी.सुब्बाराव राज्य परिषद् में चुनी गई उसके
बाद 1953 में श्री मति रेणुका राय केंद्रीय व्यवस्थापिका में प्रथम महिला
सदस्य के रूप में चुनी गई .

आजादी के बाद महिला आरक्षण के माध्यम से महिला सशक्तिकरण की शुरुआत सबसे
पहले 1996 में संयुक्त मोर्चे की सरकार के दौरान तब हुआ जब सरकार ने इस
आशय का बिल पारित करने के संकेत दिए .यह संकेत इस मुद्दे पर आम विचार
-विमर्श के उद्देश्य से दिया गया . लेकिन उस समय से आज तक इस मुद्दे पर
आम राय नहीं बन पा रही हैं .

महिला सशक्तिकरण की शुरुआत संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 8 मार्च 1975 को
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस से मानी जाती हैं .फिर महिला सशक्तिकरण की पहल
1985 में महिला अंतर्राष्ट्रीय सम्मलेन नैरोबी में की गई. भारत सरकार ने
समाज में लिंग आधारित भिन्नताओ को दूर करने के लिए एक महान निति 'महिला
कल्याण नीति'1953 में अपनाई . महिला सशक्तिकरण का राष्ट्रीय उद्देश्य
महिलाओ की प्रगति और उनमे आत्मविश्वास का संचार करना हैं परन्तु क्या यह
सम्भव हो पाया आज भी पुरुष प्रधान समाज में परिवार का मुखिया एक पुरुष ही
हो सकता है चाहे महिला कितनी भी सशक्त क्यों ना हो.

आज महिला सशक्तिकरण कि बात या महिला उत्थान की बात सभी पार्टियाँ अपने
भाषण में करती है, लेकिन प्रत्यक्ष रूप में कितना करती हैं ये 2012
विधानसभा चुनाव में देखा जा सकता है. लगभग सभी पार्टियों ने अपने
प्रत्याशीयों की सूची दी उसमें हम देख सकते है की महिलाओं को कितनी
तवज्जो दी गयी है. लगभग 9 फीसदी ही महिलाओं की सीटें है और यही हाल 2007
के चुनाव में भी था. 2007 में 6086 उम्मीदवारों में से महिला
प्रत्याशीयों की संख्या 370 यानि 6 फीसदी थी.

नारी सशक्तिकरण से जो अपेक्षा और उम्मीद थी वो अभी तक पूरी नहीं हो सकी
है. महिलाओं के राजनीतिक और सामाजिक हकों को प्राप्त करने कि लड़ाई जारी
है . आने वाले चुनावों में महिला सशक्तिकरण अहम् मुदा बन कर उभरेगा.
अफ़सोस इस बार ऐसा नहीं हो पाया पर महिलाओं का संघर्ष अपनी राजनीतिक और
सामाजिक पहचान पाकर ही रहेगा.

sushma-lucknow

बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर केंद्रीय विश्वविद्यालय लखनऊ में पत्रकारिता
एवं जनसंचार विभाग से परास्नातक.

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