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THE HIMALAYAN DISASTER: TRANSNATIONAL DISASTER MANAGEMENT MECHANISM A MUST

We talked with Palash Biswas, an editor for Indian Express in Kolkata today also. He urged that there must a transnational disaster management mechanism to avert such scale disaster in the Himalayas. http://youtu.be/7IzWUpRECJM

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS TALKS AGAINST CASTEIST HEGEMONY IN SOUTH ASIA

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Monday, February 20, 2012

उत्तर प्रदेश की बाजी

उत्तर प्रदेश की बाजी


Monday, 20 February 2012 09:56

अरुण कुमार 'पानीबाबा' सुरेंद्र सिंघल जनसत्ता 20 फरवरी, 2012: पांच प्रांतों- उत्तर प्रदेश, मणिपुर, पंजाब, उत्तराखंड और गोवा- के विधानसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश का विशेष महत्त्व है, क्योंकि अस्सी लोकसभा सीटों वाले इस राज्य में कांग्रेस महामंत्री राहुल गांधी ने अपनी राजनीतिक साख और भविष्य को दांव पर लगा दिया है। 
राहुल गांधी के बयानों और कार्य-शैली से ऐसा कतई नहीं लगता कि वे पिछले डेढ़ सौ बरस के देशज इतिहास या राजनीतिक विकास-क्रम से परिचित हैं। राजनीति में सक्रिय होने के बाद उन्हें यह अहसास तो अवश्य है कि वे नेहरू 'राजवंश' के उत्तराधिकारी हैं और उत्तर प्रदेश नेहरू वंश की मूल जागीर हुआ करता था। यह तथ्य उन्हें सालता होगा कि कि पिछले बाईस बरसों से नेहरू वंश अपनी इस जागीर से उसी तरह बेदखल है जैसे अकबर के काल में महाराणा प्रताप चित्तौड़ से निष्कासित थे। अगर उत्तर प्रदेश फतह किए बिना राहुल गांधी ने ताज पहन लिया तो वह न केवल अस्थायी, बल्कि अटपटा भी होगा। 
एक-दो प्रांत ही बचे हैं, जहां सत्ता-संघर्ष द्विपक्षीय न होकर त्रिपक्षीय है। उत्तर प्रदेश का परिदृश्य बाकी देश से अलग है। यहां सत्ता-संघर्ष चतुष्कोणीय है। इससे अधिक ध्रुवीकरण की फिलहाल कोई संभावना नहीं है। यों प्रदेश में 'खामखां' पार्टियों की सूची बनाएंगे तो रायता खिंडाने जैसा होगा, जिसका हमारे विश्लेषण से कोई विशेष संबंध नहीं। मुस्तकिल हैसियत वाले चार दल मैदान में हैं- सत्तासीन बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी,भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस (राष्ट्रीय लोकदल से गठबंधन के साथ)। पिछली विधानसभा में चारों की भागीदारी में लंबा अंतर दिखाई पड़ता है, लेकिन 2009 में हुए लोकसभा चुनाव के नतीजे देखें तो स्पष्ट हो जाता है कि चारों धड़े लगभग बराबर की हैसियत के हैं।
चारों पक्षों के सामने चुनौती का आकार लगभग एक जैसा है। बेशक, स्वरूप और प्रकार में फर्क है। बसपा को सत्ता बचानी है, सपा को सत्ता पानी है। ये दोनों प्रादेशिक दल हैं। भाजपा और कांग्रेस का संघर्ष राष्ट्रीय स्तर पर वर्चस्व बनाए रखने का है। दोनों पार्टियों का स्थानीय बल लगातार क्षीण हो रहा है। इस चुनाव में सपा सत्ता में नहीं लौटी तो उसके अस्तित्व को खतरा है।
सबसे ज्यादा आबादी वाले इस प्रांत में 1937 से 1967 तक, फिर 1969 से 1977 तक और 1980 से 1990 तक कांग्रेस का वर्चस्व था। 1990 से कांग्रेस प्रदेश की सत्ता में बाहर है। उससे पहले सिर्फ दो बार दो बरस (1967-69 और 1977-80) के लिए ऐसा हुआ कि कांग्रेस सत्ताच्युत हो गई थी।
भाजपा के संदर्भ में अक्सर यह तथ्य दृष्टि से ओझल हो जाता है कि संघ परिवार की राजनीति उत्तर प्रदेश में जड़ें जमा कर ही बाकी देश में फैल सकी थी। अब बारह बरस से वहीं कमल मुरझा रहा है तो यह दल बाकी देश में क्या कमाल कर सकेगा?
सपा और बसपा क्षेत्रीय दल हैं। दोनों के जातीय आधार और वोट बैंक हैं। बस उसी आसरे एक-एक सीट पर जातीय-सांप्रदायिक समीकरण का ध्यान रख कर टिकट बांटना होता है। याद नहीं पड़ता कि बसपा ने कभी कोई नीति-वक्तव्य या घोषणापत्र जारी किया हो। बहनजी (मायावती) बसपा सुप्रीमो कहलाती हैं। उनके मुखारविंद से जो कुछ उच्चारित होता है वही नीति-वक्तव्य है।
सपा, पुराने समाजवादी आंदोलन की स्वयंभू वारिस है। इसलिए कर्मकांड की तरह चुनाव के मौके पर घोषणापत्र वगैरह जारी कर देती है। पुराने नारों में एकाध नया भी जुड़ जाता है। नेताजी (मुलायम सिंह यादव) पार्टी के 'बॉस' हैं। मूल सत्ता में छिटपुट भागीदारी सिर्फ परिवार के सदस्यों की हो सकती है। कुछ बरसों तक कारोबारी अमर सिंह से साझेदारी हो गई थी। वे खुद को मालिक समझने लगे तो बड़ा आर्थिक नुकसान सह कर भी उन्हें अलग करना पड़ा। इसलिए इस चुनाव में अभियान की कमान पूरी तरह से अखिलेश यादव के हाथ में आ गई, जिससे पार्टी की राजनीतिक हैसियत में अनपेक्षित विस्तार हो सका। अमर सिंह के निष्कासन और अखिलेश यादव के उत्तराधिकार निर्धारण से पार्टी की छवि में बड़ा सुधार हुआ है।
पिछले दो दशक से प्रदेश की जनता ने कांग्रेस को गंभीर खिलाड़ी मानना छोड़ दिया था। जो द्रष्टा मैदान से दंगल की कमेंटरी कर रहे हैं, लगभग सभी एकमत हैं कि इस बार राहुल गांधी ने जी-जान लगा कर उस मान्यता को काफी हद तक बदला है। चुनाव प्रक्रिया शुरू होने से पहले एकाध रायशुमारी-एजेंसी ने तो कांग्रेस-रालोद मोर्चे को चौथाई भागीदारी तक आंकना शुरू कर दिया था। यह प्रचार भी बड़े जोर-शोर से होने लगा था कि भाजपा इस बार के मुकाबले में चौथे नंबर की फिसड्डी रह जाएगी। तीन चक्र मतदान के बाद समझदार पर्यवेक्षक कह रहे हैं कि भाजपा कांग्रेस से पीछे नहीं रहेगी, कांग्रेस-रालोद के संयुक्त आंकड़े से भले कुछ कम रह जाए।
अभी तक हुए मतदान की आंखों-देखी रपट के मुताबिक शहरी मध्यवर्ग, व्यवसायी और अगड़े (ब्राह्मण-बनिया) यानी भाजपा के परंपरागत समर्थक उसके साथ अब भी बने हुए हैं। लेकिन कांग्रेस ने इस आधार में जो दरार डाली है, उसके चलते भाजपा की पिछली बार की इक्यावन सीटों पर आधे का नुकसान हो जाने की संभावना है। भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी को इसका आभास ठीक समय पर हो गया था। समय रहते वे जो कर सकते थे, उन्होंने किया। कुशल संगठनकर्ता, संघ प्रचारक संजय जोशी की पार्टी में बहाली करवाई, उन्हें महामंत्री नियुक्त किया   और उत्तर प्रदेश की बागडोर सौंप दी।

संजय जोशी ने विधिवत हिसाब जोड़ कर यह प्रयास किया कि लोध नेता, पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को पार्टी में वापस लाकर 'सुशासन की वापसी' के नारे पर चुनाव लड़ा जाए। उमा भारती को प्रमुख प्रचारक की तरह जोड़ कर जो भी पिछड़ा और अति पिछड़ा नेतृत्व उभारा जा सकता है, उसे आगे करके चुनाव अभियान चलाया जाए। बाकी पुराना नेतृत्व यानी राजनाथ सिंह, कलराज मिश्र, लालजी टंडन जैसे नेता चुक गए हैं, उन्हें अवकाश ग्रहण कर लेना चाहिए। लेकिन जोशी की सलाह पर अमल करने से केंद्रीय नेतृत्व कतरा गया। फिर भी जोशी ने लोध नेता उमा भारती को प्रमुख चेहरे के रूप में प्रस्तुत कर दिया।
चुनाव प्रक्रिया शुरू होने से पहले अण्णा हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का हल्ला और हौवा मौजूद था। उससे विचलित मायावती ने एक-एक कर बीस-बाईस मंत्रियों को बर्खास्त कर पार्टी से भी निकाल दिया। निष्कासित मंत्रियों में एक नाम बाबूसिंह कुशवाहा का था। संजय जोशी चुनावी इतिहास और कथित 'सोशल इंजीनियरिंग' के अच्छे जानकार दिखाई पड़ते हैं, क्योंकि उन्होंने समय गंवाए बिना इस मोहरे को लपक लिया। अगर यह काम पार्टी के भीतर सहज भाव से हो जाता तो यह सुनिश्चित था कि भाजपा इस चुनाव में बड़ी जीत दर्ज कराती और हिंदुत्व की लहर उस स्तर पर भी चल जाती जहां दिखाई भी न पड़ती और गहरा असर भी कर पाती। अन्य पार्टियों के चीखने-चिल्लाने का कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि यह जगजाहिर है कि बसपा-राज में भ्रष्टाचार का स्रोत कहां था। 
विंध्याचल से उत्तर के हिंदुस्तान में राजसूय यज्ञ की दो कुंजियां हैं। एक कुंजी अति पिछड़े हैं और दूसरी कुंजी मुसलमान हैं। कम से कम 1990 के बाद से उत्तर प्रदेश में यह सूत्र काफी मजबूती से लागू होता है। अति पिछड़े हिंदू और पसमांदा मुसलमानों में वर्ग-चरित्र के अनुरूप गठबंधन विकसित हो गया है। हालांकि अति पिछड़ा हिंदू स्वभाव से हिंदुत्ववादी है। यह वस्तुस्थिति उत्तर भारतीय राजनीति का अत्यंत रोचक तथ्य  है, जिस पर तथाकथित समाजशास्त्रियों, रायशुमारी विशेषज्ञों ने ध्यान नहीं दिया है।
2007 में बसपा को मिला स्पष्ट बहुमत इसी तबके के समर्थन का नतीजा था। कुछ पर्यवेक्षकों का कहना है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सफलता और ईमानदार छवि का सूत्र यही है कि वे एक बार इस दांव को ठीक से खेल गए। फिर याद दिला दें कि इसी सूत्र के भरोसे 1992 से 2004 तक भाजपा के पक्ष में हिंदुत्व की लहर चल रही थी।
इस बार भी उत्तर प्रदेश में उमा भारती (लोध) का चेहरा और बाबूसिंह कुशवाहा का अथक प्रयास भाजपा को घोर संकट से बचा लेगा। वरना केवल स्थापित नेतृत्व यानी लालकृष्ण आडवाणी, सुषमा स्वराज, अरुण जेटली, वेंकैया नायडू आदि के ही भरोसे भाजपा चलती तो शायद कहीं की न रहती। आकलन के मुताबिक भाजपा में अंतर्कलह और भितरघात का कोई सहज समाधान नहीं है। बुनियादी अंतर्विरोध वर्ग-चरित्र का है। पार्टी का हाईकमान-नेतृत्व शहरी मध्यवर्गीय और अगड़ी जाति वालों का है। सत्ता में भागीदारी दिला सके, ऐसा वोट पिछड़ों और अति पिछड़ों के नेतृत्व और कार्य-कौशल के बलबूते मिलता है। उत्तर भारत में कल्याण सिंह और उमा भारती पार्टी के राष्ट्रीय चेहरे बने रहते तो देश और उत्तर प्रदेश में भाजपा आज भी सत्ताधारी पार्टी होती।
पिछले सात-आठ बरसों में राहुल गांधी ने इस अति पिछड़े वर्ग में पैठ बनाने का प्रयास किया है। जो सलाहकार-सहयोगी उन्होंने अपने टीम में जुटाए हैं, वे भी जानते हैं कि अति पिछड़े वर्ग का भारतीय राजनीति की चौसर में क्या महत्त्व है। मिशन-85 (सुरक्षित चुनाव क्षेत्रों में बसपा के प्रभाव में सेंध लगाने का प्रयास) इसी रणनीति का विस्तार है। राहुल गांधी अति पिछड़े वर्ग को किसी तरह कांग्रेस से जोड़ने में सफल साबित हुए तो अगले दो दशक तक कांग्रेस मुख्य सत्ताधारी पार्टी बनी रहेगी। पर यह अति पिछड़ों के घर कुछ देर बैठने या वहां भोजन करने जैसे चोचलों से संभव नहीं होगा। इस तबके के साथ भावनात्मक स्तर पर जुड़ना होगा, जैसे 1960 के दशक में समाजवादी चिंतक राममनोहर लोहिया पिछड़ों के साथ एकाकार हो गए थे। सिर्फ सत्ता में वाजिब हिस्सा नहीं, विकास की रणनीति में भी उनके संदर्भ को विधिवत संश्लिष्ट कर आमूलचूल दिशा-परिवर्तन अनिवार्य होगा।
इस बार उत्तर प्रदेश की चुनाव चर्चा का प्रमुख मुद्दा मायावती का भविष्य है। यह बात सभी तरह के व्याख्याकारों, आलोचकों-समीक्षकों की दृष्टि से ओझल है कि 2007 में चुनी गई विधानसभा, जो पूरे पांच बरस चली, भारतीय इतिहास की विलक्षण घटना है। एक सर्वाधिक पिछड़े प्रदेश की जनता ने स्वेच्छा से एक दलित महिला का राजतिलक किया था। 2007 में मायावती की जीत एक युग परिवर्तनकारी जैसी घटना थी। पच्चीस से अट्ठाईस प्रतिशत दलित तो अनेक प्रदेशों में हैं। पर दलित वर्चस्व की बात छोड़ दीजिए, किसी और प्रदेश में दलित वर्ग की मामूली राजनीतिक हैसियत भी दिखाई नहीं पड़ती। लेकिन मायावती ने अपनी कार्यशैली से सिर्फ आमजन की अपेक्षाओं की अनदेखी नहीं की, दलित वर्ग के साथ भी वैसा ही किया। उत्तर प्रदेश की जनता ने पिछले पांच बरस जो परिताप-संताप जिया है, उसकी मतदान की वेला में क्या अभिव्यक्ति होगी, उसका अनुमान सहज नहीं। मशीनों में बंद नतीजों के प्रकट होने पर ही पता चलेगा कि   मतदाता निज व्यथा-कथा को किस भाषा में कहता है।

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