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THE HIMALAYAN DISASTER: TRANSNATIONAL DISASTER MANAGEMENT MECHANISM A MUST

We talked with Palash Biswas, an editor for Indian Express in Kolkata today also. He urged that there must a transnational disaster management mechanism to avert such scale disaster in the Himalayas. http://youtu.be/7IzWUpRECJM

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS TALKS AGAINST CASTEIST HEGEMONY IN SOUTH ASIA

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Thursday, February 23, 2012

सख्त मौद्रिक नीतियां प्रणव मुखर्जी के लिए सरदर्द, कर्मचारियों को न्यूनतम एक हजार रुपये के पेंशन देने की योजना पर सहमति नहीं!

सख्त मौद्रिक नीतियां प्रणव मुखर्जी के लिए सरदर्द, कर्मचारियों को न्यूनतम एक हजार रुपये के पेंशन देने की योजना पर सहमति नहीं!

राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा नीति से कम होंगी कीमतें: मोइली

मुंबई से एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास


कर्मचारियों को न्यूनतम एक हजार रुपये के पेंशन देने की योजना पर सहमति नहीं!बुधवार को इपीएफओ के केंद्रीय ट्रस्टी बोर्ड यानी सीबीटी की बैठक में कर्मचारी संगठनों और नियोक्ताओं के बीच आर्थिक योगदान के मुद्दे पर सहमति नहीं बन सकी। विवाद को सुलझाने के लिए सीबीटी ने एक समिति गठित कर दी है।

कंपनी मामलों के मंत्री वीरप्पा मोइली ने मुंबई में कहा कि राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा नीति 31 मार्च तक तैयार हो जाएगी और इससे देश की अर्थव्यवस्था कई तरह से लाभान्वित होगी जिसमें खाद्य कीमतों में कमी भी शामिल है।मोइली ने बुधवार को कारपोरेट इन्वेस्टर मीट के बाद कहा कि इसके कई लाभ हैं। इससे एकाधिकार और प्रतिस्पर्धा रोधी ताकतें खत्म हो जाएंगी। उन्होंने कहा कि सिर्फ मौद्रिक नीति से ही महंगाई दर काबू में नहीं आएगी।मोइली ने कहा कि एकाधिकार को लक्षित कर बनाई गई राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा नीति कीमतें कम करने में सहायक होगी और खासतौर पर खाद्यान्न कीमतें कम होंगी। राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा नीति द्वितीय चरण के आर्थिक सुधारों को लाएगी।उन्होंने कहा कि इस नीति से 1991 के बाद सुधारों के दूसरे दौर का सूत्रपात होगा।उन्होंने बताया कि   अब समय आ पहुंचा है, जब भारतीय अर्थव्यवस्था में सभी दावा धारकों को आगे बढ़कर भाग लेना चाहिए और प्रतिस्पर्धा की संस्कृति का निर्माण करने के लिए राष्ट्रीय आंदोलन करना चाहिए ताकि अभी नवीकरण को प्रोत्साहन मिले, और सुधारों की दूसरी पीढ़ी तैयार हो सके।उन्होंने बताया कि हाल के अध्ययनों अनुसार भारतीय सकल घरेलू उत्पाद अब बढ़कर 85 ट्रिलियम हो जाएगा और इस मामले में हमारा देश चीन और अमरीका से भी आगे हो जाएगा। उन्होंने बताया कि अब हमें उच्च उत्पादकता, और कुशलता अभिनवीकरण की जरूरत है। प्रतिस्पर्धात्मक सुधारों का मुख्य उद्देश्य यह है कि आर्थिक वृद्धि का उच्च स्तर बढ़ाते रहें, मुद्रास्फीति पर नियंत्रण रखें, उत्पादकता को बढ़ाएं, अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा बढ़ाएं और रोजगार के अधिक अवसर बढ़ाएं।मोइली का कहना था कि प्रतिस्पर्धा की नीति और कानून ऐसे माध्यम हैं जिनका सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। प्रतिस्पर्धात्मक सुधार उपायों का मुख्य उदेश्य है–आर्थिक वृद्धि के उच्च स्तर का टिकाऊ बनाना, मुद्रास्फीति पर नियंत्रण रखना, उत्पादकता बढ़ावा, अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धात्मकता हासिल करना और रोजगार के अवसरों को पैदा करना। प्रतिस्पर्धात्मक सुधार उपायों के प्रमुख उद्देश्य हैं- आर्थिक वृद्धि, मुद्रास्फीति नियंत्रण कानून, ऐसे माध्यम हैं जो पिरामिड की नींव को सकारात्मक रूप से प्रभावित करते हैं और सुधार कार्यसूची की नीति के अंदर पारिभाषित क्षण होंगे।

दूसरी ओर,सख्त मौद्रिक नीतियां वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी के लिए सरदर्द साबित हो रही हैं। उद्योग जगत को सख्त मौद्रिक नीतियों की वजह से नकदी संकट से जूझना पड़ रहा है तो वित्तमंत्री को वित्तीय घाटा और  विकास दर का संतुलन बनाये रखने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाना पड़ रहा है। सन 1970 के दशक में हुई वित्तीय ज्यादतियों के बाद विकास को स्थिर बनाने का दायित्व व्यापक तौर पर केंद्रीय बैंकरों के कंधे पर आ गया। इस तरह आर्थिक मंदी का मुकाबला करने की राह में राजनीतिक असर वाली राजकोषीय नीति के बजाय केंद्रीय बैंकों की स्वतंत्र मौद्रिक नीति वृहद आर्थिक सुरक्षा का प्रमुख माध्यम बनकर उभरी। प्रणब मुखर्जी ने भारतीय अर्थव्यवस्था की धीमी रफ्तार के लिए ग्लोबल वित्तीय संकट और रिजर्व बैंक [आरबीआइ] की सख्त मौद्रिक नीति को जिम्मेदार ठहराया है। प्रणब ने कहा कि चालू वित्त वर्ष 2011-12 में विकास दर के अनुमान को घटाकर 6.9 प्रतिशत किया गया है। एक साल पहले अर्थव्यवस्था की रफ्तार 8.4 प्रतिशत थी। रिजर्व बैंक ने महंगाई पर काबू पाने के लिए मार्च, 2010 के बाद से लगातार 13 बार ब्याज दरें बढ़ाईं। अब केंद्रीय बैंक ने ऐसे संकेत दिए हैं कि विकास दर को बढ़ावा देने के लिए वह ब्याज दरों में कमी लाएगा। आरबीआइ 15 मार्च को मौद्रिक नीति की मध्य तिमाही समीक्षा जारी करेगा।

इस बीच बैंकिंग तंत्र में नकदी की किल्लत को देखते हुए अगली मौद्रिक समीक्षा में रिजर्व बैंक नकद आरक्षित अनुपात (सीआरआर) में एक और कटौती कर सकता है। आरबीआइ के डिप्टी गवर्नर सुबीर गोकर्ण ने मंगलवार को यह संकेत दिए। संवाददाताओं से बातचीत में गोकर्ण ने कहा कि अगर नकदी की स्थिति तंग बनी रहती है तो एक सीमा तक सीआरआर में आगे और कटौती की संभावना बनी हुई है। हम इस पर विचार करेंगे। सीआरआर के तहत बैंकों को अपनी कुल जमा का एक निश्चित प्रतिशत केंद्रीय बैंक के पास रखना पड़ता है। हालांकि गोकर्ण ने इस दिशा में तत्काल किसी कदम से इंकार किया। उन्होंने कहा कि सीआरआर में कोई कटौती मौद्रिक नीति की समीक्षा में ही होगी। बीच में इसमें किसी प्रकार के बदलाव की संभावना नहीं है।

सालाना मौद्रिक नीति की तिमाही समीक्षा 15 मार्च को होनी है। रिजर्व बैंक ने 24 जनवरी को मौद्रिक नीति की तिमाही समीक्षा में सीआरआर में आधा फीसदी की कटौती कर इसे 5.50 फीसदी कर दिया है। गोकर्ण ने कहा कि नकदी की स्थिति में सुधार के लिए आरबीआइ खुले बाजार (ओएमओ) से बॉन्ड खरीदता रहेगा ताकि बैंकिंग तंत्र में धन आता रहे। बैंकों के पास नकदी की किल्लत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता पिछले हफ्ते तक बैंक रोजाना औसतन 167 लाख करोड़ रुपये का कर्ज आरबीआइ से ले रहे थे। यह रिजर्व बैंक के 60,000 करोड़ रुपये के संतोषजनक स्तर से कहीं अधिक है।

देश में वाहन और स्वास्थ्य बीमा उत्पाद अब और महंगे हो सकते हैं। बीमा उत्पादों में महंगाई की इस आशंका की वजह सरकार की ओर से दी गई वह सलाह है जिसमें बीमा कंपनियों को घाटा कम करने के लिए प्रीमियम बढ़ाने के लिए कहा गया है। वित्त मंत्रालय द्वारा इस महीने की शुरुआत में जारी किए गए पत्र में कहा गया कि जीआइसी घाटे वाले क्षेत्रों की पॉलिसियों के लिए पुनर्बीमा की सुविधा उपलब्ध नहीं कराए। ऐसे वर्ग की पॉलिसियों का घाटा बीमा कंपनियों को खुद उठाने दिया जाए या वे बीमा प्रीमियम की रकम बढ़ाएं। वाहन बीमा घाटे का क्षेत्र है। इस क्षेत्र में कंपनियों को यदि प्रीमियम से 100 रुपये की आय हो रही है तो उन्हें साल में औसतन 120 रुपये के दावों का भुगतान करना पड़ रहा है।

कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (इपीएफओ) में शामिल देश के लाखों कर्मचारियों को न्यूनतम एक हजार रुपये के पेंशन देने की योजना पर सहमति नहीं बन पा रही है। इस बारे में विचार करने के लिए बुधवार को इपीएफओ के केंद्रीय ट्रस्टी बोर्ड यानी सीबीटी की बैठक में कर्मचारी संगठनों और नियोक्ताओं के बीच आर्थिक योगदान के मुद्दे पर सहमति नहीं बन सकी। विवाद को सुलझाने के लिए सीबीटी ने एक समिति गठित कर दी है। बैठक के बाद श्रममंत्री व सीबीटी के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने बताया, न्यूनतम पेंशन देने के प्रस्ताव पर अब एक समिति सुझाव देगी। समिति की रिपोर्ट एक महीने के भीतर आएगी, उसके बाद इस पर फैसला किया जाएगा। समिति में श्रम संगठनों के प्रतिनिधि शामिल होंगे। एक हजार रुपये की न्यूतनम पेंशन पाने के लिए नियोक्ताओं और कर्मचारियों को संयुक्त तौर पर 600 करोड़ रुपये का अतिरिक्त योगदान भविष्य निधि फंड में सालाना करना होगा।

बुधवार की बैठक में दोनों पक्षों ने अतिरिक्त योगदान देने पर हाथ खड़े कर दिए। अगर यह फैसला लागू हो जाता है तो लाखों कर्मचारियों को फायदा होगा। इस समय ईपीएफओ के तहत 35 लाख कर्मचारियों को पेंशन मिलती है, लेकिन इसमें से 14 लाख रिटायर कर्मचारी ऐसे हैं, जिन्हें पांच सौ रुपये मासिक या इससे भी कम पेंशन मिलती है। कई रिटायर कर्मियों को तो 12 रुपये प्रति महीने ही मिलते हैं। सिर्फ सात लाख लोग ही एक हजार या इससे ज्यादा की पेंशन पाते हैं। नया फार्मूला लागू होने पर सभी कर्मियों को कम से हजार रुपये की पेंशन पक्की हो जाएगी।

मौजूदा नियम के मुताबिक मूल वेतन और महंगाई भत्त्‍‌ो के जोड़ का 12-12 फीसदी हिस्सा नियोक्ता और कर्मचारी भविष्य निधि में देते हैं। नियोक्ता के योगदान का 8.33 फीसदी पेंशन फंड में जाता है। केंद्र सरकार भी पेंशन फंड में कुछ योगदान देती है। अब अगर एक हजार रुपये की न्यूनतम मासिक पेंशन दी जाती है तो कर्मचारी के वेतन का 0.63 फीसदी हिस्सा और भविष्य निधि में डालना होगा। इसका बराबर भार कर्मचारियों और नियोक्ताओं पर जाएगा। कर्मचारियों का कहना है कि पेंशन देना सामाजिक दायित्व है, जिसका बोझ केंद्र को उठाना चाहिए। इस मुद्दे पर दोनो पक्षों में बहस खिंचने के बाद बोर्ड की बैठक में अन्य किसी मुद्दे पर चर्चा नहीं हो सकी।



मुखर्जी ने देश की धीमी आर्थिक वृद्धि के लिए वैश्विक वित्तीय संकट और रिजर्व बैंक की सख्त मौद्रिक नीति को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा है कि देश को वार्षिक 10 प्रतिशत की आर्थिक वृद्धि का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ना चाहिए।वित्त मंत्री ने मंगलवार को वाणिज्य एवं उद्योग मंडल एसोचैम की 91वीं वार्षिक आम बैठक का उद्घाटन करते हुए कहा, 'भारत को अगले कुछ सालों में ही 10 प्रतिशत के ईद-गिर्द आर्थिक वृद्धि लक्ष्य लेकर आगे बढ़ाना चाहिए। हमें लंबे समय तक लगातार उच्च आर्थिक वृद्धि बरकरार रखने के बारे में सीखना होगा।'उल्लेखनीय है कि वित्त वर्ष 2011-12 में आर्थिक वृद्धि दर घटकर 6.9 प्रतिशत रहने का अग्रिम अनुमान व्यक्त किया गया है। एक साल पहले यह 8.4 प्रतिशत रही थी। मुखर्जी ने उम्मीद जाहिर की कि आर्थिक वृद्धि की रफ्तार में आई यह सुस्ती अस्थायी होगी और देश एक बार फिर उच्च आर्थिक वृद्धि के रास्ते पर आगे बढ़ेगा।

बड़े पैमाने सीमापार होने वाले पूंजी प्रवाह ने अल्पावधि की दरों को प्रभावित करने की केंद्रीय बैंकों की क्षमता को सीमित कर दिया। भारतीय शेयर बाजार के प्रति भरोसा जताते हुए विदेशी निवेशकों ने इसमें इस महीने अब तक 14 हजार करोड़ रुपये का निवेश किया है। विशेषज्ञों को उम्मीद है कि यह सकारात्मक रुख जारी रहेगा। नई दूरसंचार नीति अप्रैल अंत तक नई दिल्ली: दूरसंचार विभाग ने नई दूरसंचार नीति लागू करने के लिए समयसारणी तैयार कर ली है। इसे इस साल अप्रैल के अंत तक मंजूरी मिल जाएगी। इस नीति के जरिए दूरसंचार क्षेत्र में पारदर्शिता लाने का प्रावधान है। अमेरिकी अर्थशास्त्री ऐलन ग्रीनस्पैन को काफी पहले इसका बोध हो गया था और बाद में इसे 'द ग्रीनस्पैन कन्ड्रॉम' का नाम दिया गया। महंगाई दर और अल्पावधि की नीतिगत दरों पर आधारित मौद्रिक नीति की असफलता को मोटे तौर पर परिसंपत्ति के बुलबुले के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि मौद्रिक नीति को अस्वाभाविक रूप से ढील दी गई। ऐसे में हालिया वैश्विक वित्तीय संकट के लिए भी केंद्रीय बैंकरों को जिम्मेदारी वहन करनी चाहिए। अमेरिकी फेडरल रिजर्व बोर्ड के सदस्य के रूप में बेन बर्नानके को भी इन नीतियों में साझेदार माना जाएगा।

माना जा रहा है कि 16 मार्च को संसद में पेश होने वाले आम बजट में वित्त मंत्री अर्थव्यवस्था का चक्का तेजी से घुमाने के लिए अनेक प्रोत्साहन उपायों की घोषणा करेंगे। वर्ष 2008 में वैश्विक वित्तीय संकट शुरु होने से पहले देश की आर्थिक वृद्धि 9 प्रतिशत से भी उपर चल रही थी लेकिन वैश्विक संकट के दौरान 2008-09 में यह घटकर 6.7 प्रतिशत रह गई।पर बजट पेश होने से पहले आर्थिक समीक्षा आनी है, जिसमें मौद्रिक नीतियों का असली रंग नजर आयेगा।

अगले वित्त वर्ष 2012-13 में भी सरकार को आर्थिक विकास दर नौ प्रतिशत रहने की उम्मीद नहीं है। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (पीएमईएसी) का मानना है कि अगले वित्त वर्ष में भी सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी की वृद्धि दर में तेज बढ़त की उम्मीद नहीं है। इसके 7.5 प्रतिशत से आठ प्रतिशत के बीच रहने की उम्मीद है। परिषद ने अर्थव्यवस्था की समीक्षा में सरकार को राजकोषीय स्थिति मजबूत बनाने के लिए पेट्रोलियम सब्सिडी पर अंकुश लगाने की सलाह दी है। परिषद ने चालू वित्त वर्ष के लिए सरकार के 6.9 प्रतिशत जीडीपी विकास दर के अनुमान में वृद्धि कर दी है। परिषद के मुताबिक चालू वित्त वर्ष 2011-12 विकास दर 7.1 प्रतिशत रहने का अनुमान है। परिषद ने इससे पहले जुलाई, 2011 में 8.2 प्रतिशत विकास दर का अनुमान लगाया था। बीते वित्त वर्ष में अर्थव्यवस्था की रफ्तार 8.4 प्रतिशत रही थी। जहां तक कृषि क्षेत्र का सवाल है, परिषद ने चालू वित्त वर्ष में तीन प्रतिशत विकास दर का अनुमान लगाया है। केंद्रीय सांख्यिकी संगठन के पूर्वानुमानों में कृषि विकास दर 2.5 प्रतिशत रहने की बात कही गई थी।

बुधवार को अर्थव्यवस्था की धीमी रफ्तार के आंकड़े देते हुए परिषद के चेयरमैन डॉ सी रंगराजन ने कहा कि अगले वित्त वर्ष में महंगाई की दर भी नीचे बनी रह सकती है। परिषद ने इसके पांच से छह प्रतिशत के दायरे में रहने का अनुमान लगाया है। इसके बावजूद पीएमईएसी ने सरकार को खाद्य पदार्थो के दाम पर सख्त निगरानी रखे जाने की सलाह दी है। परिषद ने कहा है कि कृषि उत्पादन बढ़ाने के साथ खाद्यान्नों, फल, सब्जियों और दुग्ध उत्पादों की आसान आपूर्ति के लिए मजबूत आधारभूत ढांचा खड़ा करने पर ध्यान दिया जाना चाहिए। रंगराजन ने उर्वरक और पेट्रोलियम पदार्थो की बढ़ती सब्सिडी पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा, हमें उर्वरक और पेट्रोलियम सब्सिडी के क्षेत्र में सुधारों पर आगे बढ़ना चाहिए। डीजल मूल्य को चरणबद्ध ढंग से नियंत्रणमुक्त करने और एलपीजी व केरोसीन के मामले में भी विभिन्न रिपोर्टो में जो सुझाव दिए गए हैं, उन पर बातचीत आगे बढ़नी चाहिए। रंगराजन ने यहां परिषद की वर्ष 2011-12 की आर्थिक समीक्षा जारी करते हुए कहा कि चालू वित्त वर्ष में राजकोषीय घाटा 4.6 प्रतिशत के बजट अनुमान से अधिक होगा।

सुस्त होती अर्थव्यवस्था की रफ्तार में सुधार के बारे में पूछे जाने पर रंगराजन ने सरकार को कर सुधारों के क्षेत्र में आगे बढ़ने की सलाह दी। कर प्रशासन को बेहतर बनाने के साथ साथ कर दरों को वापस वैश्विक संकट पूर्व की स्थिति में लाने की संभावनाएं हैं। समीक्षा में कहा गया है कि वर्ष के दौरान वैश्विक आर्थिक और वित्तीय स्थिति पर दबाव बना रहेगा। वर्ष 2011-12 में चावल, गेहूं, फल, सब्जियों और पशुपालन क्षेत्र में मजबूत वृद्धि को देखते हुए कृषि क्षेत्र की वृद्धि तीन प्रतिशत रहेगी। कोयला उत्पादन घटने, लौह अयस्क उत्पादन पर प्रतिबंध व प्राकृतिक गैस उत्पादन में कमी और कच्चे तेल का उत्पादन घटने से खान एवं उत्खनन क्षेत्र में वर्ष के दौरान गिरावट का रुख रहने का अनुमान है।


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Palash Biswas
Pl Read:
http://nandigramunited-banga.blogspot.com/

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