Total Pageviews

THE HIMALAYAN DISASTER: TRANSNATIONAL DISASTER MANAGEMENT MECHANISM A MUST

We talked with Palash Biswas, an editor for Indian Express in Kolkata today also. He urged that there must a transnational disaster management mechanism to avert such scale disaster in the Himalayas. http://youtu.be/7IzWUpRECJM

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS TALKS AGAINST CASTEIST HEGEMONY IN SOUTH ASIA

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS TALKS AGAINST CASTEIST HEGEMONY IN SOUTH ASIA

Twitter

Follow palashbiswaskl on Twitter

Monday, February 20, 2012

सभ्यतागत पहचान की जरूरत

सभ्यतागत पहचान की जरूरत


Sunday, 12 February 2012 14:30

पवन कुमार गुप्त 
जनसत्ता 12 फरवरी, 2012 : सत्ताईस जनवरी 1788 को अंग्रेज आस्ट्रेलिया में जबरन घुसे और उस पर कब्जा जमा लिया। वहां के मूल निवासी पिछली कई सदियों से अपनी ही जगह पर परायों की तरह रहते हैं। उन्हें अपने सम्मान और अधिकारों के लिए लड़ना पड़ता है। सम्मान के लिए तो खैर कोई कैसे लड़ सकता है, हां अधिकार की छोटी-मोटी लड़ाई वे लड़ते रहते हैं, जिसमें कोई बड़ी ताकत उनके साथ नहीं है। यही हाल न्यूजीलैंड, कनाडा और उत्तरी अमेरिका का है। इन देशों के मूल निवासी अब नहीं के बराबर रह गए हैं, अधिकतर तो बहुत पहले मार दिए गए। सारी दुनिया का लेखा-जोखा रखने और बताने वाले यह नहीं बताते कि अमेरिका में सोलहवीं से लेकर अठारहवीं शताब्दी के बीच और अन्य देशों में अठारहवीं और उन्नीसवीं शताब्दी के बीच उन्होंने कितनों को अलग-अलग तरीकों से बेरहमी से मार डाला। जो बच गए हैं वे अपने को उपेक्षित ही समझते हैं, या उनमें से जो ज्यादा पढ़-लिख गए हैं, वे अब अपनी पहचान खोकर, अपने को उन जैसा बनाने में जुट गए हैं जिन्होंने जबरन उनकी धरती पर कब्जा कर रखा है। 
दुनिया भर में इंसाफ और बराबरी का नारा देने वाली सरकारें और मुल्क (जिनमें सबसे ऊंचा झंडा उन्होंने ही उठाया हुआ है जिन्होंने दूसरों की धरती को अपना बना लिया है और जिनका इतिहास मासूमों के खून से लहूलुहान है) और गरीब मुल्कों के अंग्रेजीपरस्त प्रगतिशील समूह, जो अपने देश में अन्याय के विरुद्ध उसी प्रकार मुद्दे उठाते हैं, जैसे अमीर राष्ट्र के लोग उठाते हैं, इस बडेÞ अन्याय की चर्चा भी नहीं करते। 
सत्ताईस जनवरी को आस्ट्रेलिया दिवस का उत्सव मना रहीं प्रधानमंत्री के सामने जब वहां के बचे-खुचे (आबादी का दो फीसद) मूल निवासियों ने विरोध-प्रदर्शन किया तो हमारे मीडिया ने उसे उतनी बड़ी खबर नहीं बनाया जैसा कि वह अक्सर अन्याय के विरुद्ध, पर प्रचलित मानसिकता से मेल खाते विरोध-प्रदर्शनों को बनाता है और अमेरिका, यूरोपीय देशों का हवाला देकर हमें सीख लेने की नसीहत देता है। यह बात इसी तरफ संकेत करती है कि हम अब भी मानसिक रूप से गुलाम हैं। हमारा समर्थन और विरोध इसी मानसिकता से प्रभावित है। जिस देश ने हिम्मत दिखा कर एक जमाने में तिब्बतियों को शरण दी थी, उस देश को इन मूल निवासियों से हमदर्दी होनी चाहिए थी। आखिर हमने भी उन साम्राज्यवादी आक्रमणों को झेला है, उनके कू्रर प्रहार सहे हैं। फर्क यह है कि हम काफी हद तक बच गए, जबकि वे बेचारे बच नहीं पाए। 
हम संभवत: अपनी आबादी, हुनरमंद कारीगर जमात, उन जातियों की हिम्मत और विविधता के कारण बच गए। आखिर उन्हें हमसे व्यापार भी करना था और उत्पादन तो कारीगर समाज की जातियां ही करती थीं। याद रखना होगा कि 1750 में हिंदुस्तान पूरी दुनिया के कुल गैर-कृषि उत्पाद का तैंतीस फीसद हिस्सा उत्पादित करता था। और यह उत्पादन हमारी तथाकथित पिछड़ी जातियां और दलित वर्ग के कुशल कारीगर ही करते थे। उस समय कोई फैक्ट्री में उत्पादन नहीं होता था। हिंदुस्तान की आर्थिक समृद्धि इन्हीं जातियों की वजह से थी। उस समय के लड़ाकू सैनिक भी इन्हीं बहादुर जातियों से थे। यह आत्म-छवि पूरे देश ने खो दी है। इन जातियों के नेतृत्व को भी, इसका भान शायद नहीं है, क्योंकि हमने अंग्रेजों का लिखा इतिहास पढ़ा है। 
भारत अपनी अलग पहचान रखता था। आज भी जापान और कई अन्य एशियाई देश हमसे बड़ी उम्मीद रखते हैं, पर हम डरे हुए-से रहते हैं- पश्चिम के बनाए तथाकथित लिबरल या उदारवादी विचारों से, चीन से- और इस चक्कर में हम ढोंगी हो गए हैं। देश के अंदर भी कोई सच्ची बहस चलाने से डरते हैं, बाहर वालों से भी डरते हैं। चीन हर एक-दो महीने पर किसी न किसी बहाने हमें जांचता रहता है कि उसका डर बरकरार है या नहीं, और हम उसे भरोसा दिलाते रहते हैं कि घबराओ नहीं, हम तुमसे पहले जैसे ही भयभीत हैं। चीन का भारत से रिश्ता खुल्लमखुल्ला गैर-सम्मानजनक रहता है और हम इस अपमान को पीते रहते हैं। छोटा-सा ताइवान भी चीन से उतना भयभीत नहीं जितना हम रहते हैं। हाल ही में रूस के प्रधानमंत्री पुतिन ने चीन के संभावित प्रधानमंत्री से मिलने में अपनी व्यस्तता का बहाना करके असमर्थता जताई। ये तरीके होते हैं दूसरे को संकेत देने के। पर हम ऐसा कभी नहीं करेंगे। हां, चीन हमारे साथ ऐसा कर सकता है।    

हर देश का इतिहास, उसकी मूल संस्कृति, उसका स्वभाव, उसकी पहचान अलग होती है। आज जिसे हम अमेरिका कहते हैं, उसका इतिहास सिर्फ पांच सौ साल पुराना है। और वह भी दूसरों की धरती को हड़प कर, मूल निवासियों के खून और उनकी बद्दुआओं पर खड़ा- बाहर से आए आक्रमणकारी जो अब उसे अपना देश कहने की हिमाकत करते हैं, दुनिया को तमीज और मानवीय मूल्यों की सीख देने वाले बन गए हैं। हमारी संस्कृति में तो मूल स्रोत का बड़ा महत्त्व माना गया है। जो मूल में है उसे, जो दिखता है या लगता है उससे, ज्यादा ऊंचा माना गया है। 
अमेरिका से निकले विचारों का मूल स्रोत तो बर्बादी और हिंसा से भरा पड़ा है। क्या इन विचारों को बारीकी से जांचने की जरूरत नहीं? पुतिन अमेरिका और पश्चिम के इस तंत्र को समझते हैं। वे राष्ट्र-प्रेम और देश-प्रेम के फर्क को भी समझते हैं। वे विविधता का महत्त्व भी समझते हैं और साथ ही उसका सहारा लेकर पश्चिम जो षड्यंत्र रचता रहता है और दूसरे राष्ट्रों को तोड़ने का प्रयास करता है उससे   भी वाकिफ हैं। अमेरिका ने रूस को तोड़ा, पर अब भी चैन नहीं है उसे, और तोड़ने की कोशिश जारी है। ऐसा ही कुछ हमारे यहां भी होता है, चाहे वह हिंदू-मुसलमान का मसला हो, चाहे कश्मीर का हो, चाहे जातियों या खापों का हो। सारे मसलों को हम अपनी नजर से देखना ही जैसे भूल गए हैं, सभी मुद्दों पर बहस पश्चिमी या अमेरिकी तर्ज पर ही ज्यादा होती है। 
रूस में भी अनेक धर्मों, रंगों और विशेष जातीय पहचान के लोग रहते हैं और सदियों से रहते आए हैं। अमेरिका तो मूल निवासियों का रहा नहीं। जिन्होंने उसे अपना घोषित किया हुआ है वे तो सब बाहर से घुसे हुए विदेशी हैं, उन्हें विस्थापित कहना ज्यादा ठीक है। इसलिए वहां की जातिगत और रंग की विविधता के पैमाने और वे उस विविधता से कैसे जूझते हैं यह उन देशों के लिए मायने नहीं रखता जहां विविधता होते हुए भी वह उनकी अपनी है और वैसी ही हमेशा से रही है, जैसे भारत और रूस। विविधता और विविधता में भेद होता और यह भेद सभ्यतागत होता है। पुतिन रूसी सांस्कृतिक पहचान को अहमियत देते हैं और इसकी बिना पर सारी विविधता को स्वीकार करते हैं, परस्पर सम्मान के साथ। 
भारत की विविधता को भी यहां की सांस्कृतिक पहचान के साथ जोड़ कर देखा जाए तो यह देश जुड़ सकता है और इसमें शक्ति आ सकती है। पर अगर हम अमेरिका के विश्वविद्यालयों से निकले विचारों की जकड़न से अपने को नहीं छुड़ा पाते तो विविधता के मसले और जटिल होते जाएंगे। अमेरिका की सांस्कृतिक और सभ्यतागत बुनियादकमजोर है, इसलिए अगर वे स्रोत तक जाने की कोशिश करें तो राष्ट्रीयता के अलावा और कुछ वहां दिखाई नहीं पड़ता। पांच सौ वर्ष पहले दूसरे की जमीन को हड़पने के बाद इन घुसपैठियों को राष्ट्रीयता का ही सहारा लेना पड़ा अपने को खड़ा करने और जिन यूरोपीय मुल्कों से वे आए थे उनसे अलग अपनी पहचान बनाने के लिए। जबकि हमारे यहां वैसी बात नहीं है। राष्ट्रीयता से ऊंची, हमारी सभ्यतागत पहचान बहुत मजबूत और पुरानी है। हमारी राष्ट्रीयता नई है, जबकि हमारी सभ्यतागत पहचान बहुत पुरानी। इसलिए हमें उनके बनाए पैमानों से मुक्त होने की जरूरत है। उनके मसले अलग हैं, हमारे अलग। हम उनसे कुछ सीख नहीं सकते, तकनीक और कुछ ऊपर-ऊपर की छोटी-छोटी चीजों के अलावा। उनसे सीखने में हम और उलझते और टूटते चले जाएंगे। पुतिन इस बात से वाकिफ हैं। काश, हमारा नेतृत्व भी इतना विवेक रखता।

No comments:

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...

PalahBiswas On Unique Identity No1.mpg

Tweeter

Blog Archive

Welcome Friends

Election 2008

MoneyControl Watch List

Google Finance Market Summary

Einstein Quote of the Day

Phone Arena

Computor

News Reel

Cricket

CNN

Google News

Al Jazeera

BBC

France 24

Market News

NASA

National Geographic

Wild Life

NBC

Sky TV