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THE HIMALAYAN DISASTER: TRANSNATIONAL DISASTER MANAGEMENT MECHANISM A MUST

We talked with Palash Biswas, an editor for Indian Express in Kolkata today also. He urged that there must a transnational disaster management mechanism to avert such scale disaster in the Himalayas. http://youtu.be/7IzWUpRECJM

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS TALKS AGAINST CASTEIST HEGEMONY IN SOUTH ASIA

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Tuesday, March 6, 2012

कांग्रेस की चुनौतियां बढ़ीं

कांग्रेस की चुनौतियां बढ़ीं


Wednesday, 07 March 2012 10:13

प्रदीप श्रीवास्तव 
नई दिल्ली, 7 मार्च। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजों ने केंद्र में कांग्रेस और यूपीए की दिक्कतें बढ़ा दी हैं। ये तात्कालिक और दीर्घकालिक दोनों ही तरह की हैं। पार्टी इन चुनाव नतीजों के झटके से अभी उबरी नहीं है। झटका केवल उत्तर प्रदेश के नतीजों ने ही नहीं दिया। पंजाब और गोवा विधानसभा के नतीजे पार्टी के लिए ज्यादा भारी साबित हुए। गोवा में उनकी  सरकार थी, जबकि पंजाब में कांग्रेस अपनी जीत निश्चित मान कर चल रही थी। गोवा में दिगबंर कामथ और पंजाब में कैप्टन अमिरिदंर सिंह को एक बार फिर से भावी मुख्यमंत्री के रूप में पेश करना पार्टी के लिए मुसीबत की मुख्य वजह बनी। मणिपुर विधानसभा चुनाव के नतीजे कांग्रेस जनों के आंसू पोछने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।  उत्तराखंड में कांग्रेस और भाजपा के बीच कांटे की टक्कर रही। अगर कांग्रेस सरकार बनाने में वहां सफल भी हुई तो शायद यह सरकार जोड़तोड़ की ही होगी। 
कांग्रेस और यूपीए की तात्कालिक दिक्कतें अगले हफ्ते संसद सत्र शूरू होने के साथ ही सामने आनी शुरू हो जाएंगी। जुलाई में राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव होने हैं। यूपीए के पास अभी तक इतनी गिनती नहीं है कि वह अपने बलबूते पर अपना उम्मीदवार जीता ले। उत्तर प्रदेश और पंजाब से इस मामले में काफी उम्मीद थी। कांग्रेस खेमे में यह आकलन  किया जा रहा था कि उत्तर प्रदेश में सपा को सरकार बनाने में समर्थन देने की बात आई तो इस मुद्दे पर भी सौदेबाजी की जा सकती है। इसके अलावा राष्ट्रीय आंतकरोधी केंद्र (एनसीटीसी),आरपीएफ एक्ट,लोकपाल विधेयक जैसे मुद्दों पर भी सपा पर दबाब बनता। पर,सपा को अब इस समर्थन की जरूरत नहीं है और न ही उस पर ऐसा कोई दबाब बनने वाला है। उलटे संभावना इस बात की है कि सपा अभी तक जो बगैर शर्त केंद्र यूपीए को समर्थन दिए चली आ रही थी वह कहीं नई शर्तों को थोपना न शुरू कर दे। कांग्रेस के एक नेता यह मानते हैं कि  कहां यह समझा जा रहा था कि इस चुनाव के जरिए ममता बनर्जी की धमकियों से छुटकारा मिलेगा वहीं अब लग रहा है कि ममता और मुखर हो जाएंगी। 
दीर्घकालिक चुनौतियों में राज्य सभा के होने वाले चुनाव और लोकसभा का 2014 में होने वाला आम चुनाव है। राज्यसभा में यूपीए बहुमत में नहीं है। इसलिए उसे लोकपाल सहित कई विधेयकों में दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। इन नतीजों के बाद राज्यसभा में बहुमत की गिनती पूरी करने को ले कर जो संभावनाए थीं वे फिलहाल क्षीण हो गई। 
उत्तर प्रदेश चुनाव को लोकसभा 2014 चुनाव का सेमी फाइनल माना जा रहा था। कांग्रेस और भाजपा दोनों ही इस रणनीति के तहत लोकसभा के चुनाव को ध्यान में ही रख कर उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव लड़ रही थी। उत्तर प्रदेश में लोकसभा की 80 सीटे हैं। कांग्रेस की पूरी कोशिश थी कि इस चुनाव के जरिए वहां वह पार्टी को मजबूती दे सके ताकि लोकसभा चुनाव में इसका फाएदा मिले। राहुल गांधी प्रदेश के कोने कोने में गए। पिछड़ों - मुसलिमों को जोड़ने के लिए कांग्रेस के कुछ नेताओं ने क्षेत्रीय पार्टियों को मात करने वाली अपीलें चुनाव के दौरान  कीं। बयानबाजी में कोई कोताही नहीं बरती गई न पार्टी की राष्ट्रीय छवि को ध्यान में रखा गया।  यहां तक केंद्र की सरकार में होने के बावजूद कांग्रेस के नेताओं पर ही चुनाव आचार संहिता को तोड़ने का बार-बार आरोप लगा। पार्टी के एक वरिष्ठ नेता  तो बटला हाउस कांड के मामले में खुद की यूपीए सरकार के ही खिलाफ बयानबाजी करने लगे। यहां तक कह दिया कि सोनिया गांधी इस मामले में रो दी थीं। इस नेता के बयान पर गृहमंत्री और सरकार को सफाई देनी पड़ी। चुनाव के दौरान ही इन बयानों को फालतू और खुद कांग्रेस के लिए शर्मनाक माना जा रहा था। यह माना जा रहा था कि इससे कोई फाएदा कांग्रेस को नहीं मिलने जा रहा है। चुनाव नतीजों ने इन आशंकाओं को सच साबित किया। पार्टी के ही एक कार्यकर्ता की टिप्पणी है-जाति गवाई भात भी नहीं मिला।  मुसलिम कितना कांग्रेस से जुड़े यह नतीजों से साबित हो गया। 

इसमें संदेह नहीं कि अमेठी और रायबरेली में कांग्रेस की बुरी पराजय ने राहुल गांधी और सोनिया गांधी दोनों को हिलाया होगा। उसी तरह जैसे बागपत और बड़ौत इलाके में रालोद के खिलाफ आए नतीजों से अजित सिंह खलबलाए होंगे। पर राहुल गांधी ने नतीजों के आने के बाद जो कहा वह कांग्रेस के लिए महत्त्वपूर्ण है। उन्होंने यह माना कि इन नतीजों से पता चलता है कि पार्टी में वहां कुछ आधारभूत गलतिया हैं। उनको सुधारने की जरूरत है।
1991 के बाद 20 सालों में यह दूसरा मौका है जहां प्रदेश के मतदाताओं ने पूर्ण बहुमत से किसी पार्टी को सत्ता सौंपी है। इसके पहले 2007 में जनता ने बसपा को दिया था। सपा का अभी तक प्रदेश में अधिकतम स्कोर 143 रहा है। इसलिए यह माना जा सकता है कि इस जीत के बाद मुलायम सिंह सपा पर लगे पुराने आरोपों को धोने के साथ प्रदेश में विकास के कामों के जरिए अपनी पार्टी को मजबूत करने की कोशिश करेंगे। सपा के लिए भी अब अगला मिशन दो साल बाद होने वाला लोकसभा चुनाव होगा। ऐसे में फिर से  हाशिए पर पहुंची कांग्रेस के लिए दो साल के भीतर पार्टी को एकाएक मजबूती देना और उसकी जड़ों को गांवों   तक पहुंचाना आसान नहीं होगा।

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