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THE HIMALAYAN DISASTER: TRANSNATIONAL DISASTER MANAGEMENT MECHANISM A MUST

We talked with Palash Biswas, an editor for Indian Express in Kolkata today also. He urged that there must a transnational disaster management mechanism to avert such scale disaster in the Himalayas. http://youtu.be/7IzWUpRECJM

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS TALKS AGAINST CASTEIST HEGEMONY IN SOUTH ASIA

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Tuesday, March 6, 2012

बाजार संशय की स्थिति में है और इस संशय की रात के बाद कब सुबह होगी , इसीका इंतजार!

बाजार संशय की स्थिति में है और इस संशय की रात के बाद कब सुबह होगी , इसीका इंतजार!

पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजे कांग्रेस के खिलाफ जाने से आर्थिक सुधारों का परिदृश्य अब डांवाडोल है और पेट्रोल कीमतों में भढ़ोतरी के संकेत के बावजूद शेयर बाजार धड़ाम।

​​मुंबई से एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास

पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजे कांग्रेस के खिलाफ जाने से आर्थिक सुधारों का परिदृश्य अब डांवाडोल है और पेट्रोल कीमतों में भढ़ोतरी के संकेत के बावजूद शेयर भाजार धड़ाम।बाजार की मंशा पूरी नहीं हुई।अगर कांग्रेस यूपी में जीतती तो बाजार के लिए यह एक अच्छी खबर हो सकती थी क्योंकि इससे केन्द्र में सरकार द्वारा शुरू गए सुधार कार्यक्रमों के लिए आगे की राह और आसान हो सकती थी। कांग्रेस सपा गठबंधने के अब आसार नहीं है और मायावती की ताकत हारने के बावजूद खत्म नहीं हुई। मुलायम सिंह को बहुमत मिल जाने, उनकी समाजवादी पृष्ठभूमि और अखिलेश यादव की परिपक्वता से साफ जाहिर है कि सुधारों को लागू करने में अपेक्षित सहयोग मिलना मुश्किल है। नागपुर में गडकरी अंबानी की डिनर डिप्लोमेसी से नये समीकरण की दिशा खुली है और परिणाम आ जाने के बाद भाजपा के कांग्रेस के मुकाबले बेहतर नतीजे से विकल्प का अनुसंधान ते ज हो गया है क्योंकि विकलांग कांग्रेस पर गांधी परिवार का युवा नेतृत्व बोझ लगने लगा है। रायबरेली और अमेठी के चुनाव परिणामों से राहुल या प्रियंका पर अब बाजार कोई दांव लगाने को बमुश्किल ही तैयार होगा। कांग्रेस को सबसे बड़ा झटका यूपी में लगा है। कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी ने अपना और पार्टी का राजनैतिक भविष्य उत्तर प्रदेश चुनावों में लगा दिया था। देश की सत्ता पर सबसे अधिक राज करने वाले गांधी-नेहरू परिवार से आने वाले राहुल गांधी ने यूपी में पिछले कुछ महीनों में जबर्दस्त प्रचार किया था। उधर आर्थिक सुधारों का भविष्य ही अधर में लटक गया है। वित्तीय कानून पास कराने के लिए राज्य सभा में बहुमत जरुरी नहीं है, पर ये कानून पास करने के लिए २०१४ के लोकसबा चुनाव को नजर में रखते हुए कांग्रेस के लिए कोई राजनीतिक जोखिम उठाना कारपोरेट दबाव के बावजूद लगभग असंभव है। जिस ममता बनर्जी को मुलायम के सहारे​ ​ किनारे लगाने की रणनीति थी, उन्होंने अपना झनाधार बंगाल से बाहर बढ़ाने की शुरुआत कर दी है। मणिपुर में सात सीटें लेकर तृणमूल कांग्रेसदूसरे स्थान पर है ।कांग्रेस की पतली हालत देखकर ममता अब किसी भी मुद्दे पर कोई समझौता करेगी, उनके लड़ाकू तेवर को देखते हुए ऐसा सोचा नहीं जा​ ​ सकता। बहरहाल बाजार संशय की स्थिति में है और इस संशय की रात के बाद कब सुबह होगी , इसीका इंतजार है।

चुनाव खत्म होने के बाद तेल मार्केटिंग कंपनियों पर पॉलिटिकल प्रेशर खत्म हो गया है। अब चुनाव का परिणाम आने के बाद जनता को एक बार फिर महंगाई की मार झेलनी पड़ेगी। लंबी चुनावी प्रक्रिया से भले ही नेताओं और अधिकारियों को फजीहत झेलनी पड़ी हो, लेकिन पूरे देश की जनता ने भी इस दौरान सस्ते पेट्रोल का लुत्फ उठाया। यह दौर जल्द खत्म होने वाला है।  पेट्रोल के दाम एक बार फिर बढ़ेंगे। इस बार पांच रुपये प्रति लीटर तक पेट्रोल महंगा हो सकता है। पीटीआई के हवाले से खबर है कि तेल कंपनियों ने दाम बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार से इजाजत मांगी है।पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव संपन्न होने के साथ ही अब सार्वजनिक क्षेत्र की पेट्रोलियम कंपनियों ने पेट्रोल कीमतों में वृद्धि की अपनी मांग को आगे बढ़ाना शुरू कर दिया है। तेल कंपनियां पेट्रोल के दामों में 5 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी चाहती हैं, पर वास्तविक वृद्धि कितनी हो यह सरकार को तय करना है। पेट्रालियम मंत्रालय के सूत्रों की माने तो किसी भी वक्त तेल के दामों में 3 से 4 रुपये प्रति लीटर तक बढोतरी का आदेश जारी किया जा सकता है।अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल की कीमत 128 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचने का असर पेट्रोल के मूल्य पर बहुत जल्दी दिख सकता है। लागत से कम कीमत पर पेट्रोल बेचने की वजह से घाटा झेल रही पेट्रोलियम कंपनियों को उम्मीद है कि अब उसे सरकार से पेट्रोल की कीमतों में बढ़ोतरी के लिए हरी झंडी मिल जाएगी। निवेशक कच्चे तेल [क्रूड] की कीमतों के उतार-चढ़ाव पर भी नजर रखे हैं, क्योंकि इसकी कीमतों में अधिक तेजी के कारण आर्थिक सुधार की गति प्रभावित हो सकती है।  


कांग्रेस उत्तर प्रदेश में चौथे नंबर पर रही है। वहीं, पार्टी पंजाब में शिरोमणि अकाली दल-बीजेपी गठबंधन को हराने में नाकाम रही। यही हाल उत्तराखंड का भी है। गोवा में बीजेपी ने कांग्रेस से सत्ता छीन ली है। सिर्फ मणिपुर में ही कांग्रेस सत्ता में लौट रही है। कांग्रेस पार्टी के निराशाजनक प्रदर्शन से आर्थिक सुधार कार्यक्रमों की प्रगति को लेकर संशय बढ़ने से आज स्थानीय शेयर बाजारों में बिकवाली का जोर रहा और बंबई शेयर बाजार  का मुख्य सूचकांक सेंसेक्स 190 अंक टूट कर बंद हुआ।डीलरों ने कहा कि चुनावी नतीजों से संप्रग सरकार केन्द्र में विपक्षी दलों के विरोध के चलते सुधार कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने में असमर्थ होगी। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी को बड़ी जीत मिलने और केन्द्र में सत्ताधारी कांग्रेस की स्थिति कमजोर होने से बाजार चिंतित है। यूपी और पंजाब में कांग्रेस को मिली करारी हार ने डॉ. मनमोहन सिंह की कमजोर गठबंधन सरकार के लिए आर्थिक सुधार के एजेंडे को लागू करने को और मुश्किल बना दिया है। ऐसी हार सरकार के आत्मविश्वास को तोड़कर रख देती है।  महंगाई और भ्रष्टाचार से जूझती मनमोहन सिंह की सरकार एफडीआई को चाहकर भी पास नहीं करवा पाई।सरकार पर वे नेता हावी हैं जो लोक-लुभावन घोषणाओं को जारी रखना चाहते हैं। यह किसी से छिपा नहीं कि खाद्य सुरक्षा कानून एक तरह से सरकार पर थोपा जा रहा है। देश में आर्थिक सुधारों के जरिये एक नए युग की शुरुआत करने वाले मनमोहन सिंह अब आर्थिक चुनौतियों से पार क्यों नहीं पा रहे हैं,क्या यह समझना कठिन हो रहा है? क्या आर्थिक मामलों में उनकी नहीं चल पा रही है? अब जिस चीज पर पूरे देश की नजर है- वो है आम बजट, जो 16 मार्च को पेश किया जाएगा। विधानसभा चुनावों में हार के बाद अब केंद्र की मनमोहन सरकार फिर से लोगों का मन मोहने की कोशिश में लग जाएगी।सभी के लिए फूड सिक्योरिटी जैसे लोकलुभावन और खर्चीले वादों को पूरा करने की कोशिश होगी। बजट में ऐसे एलान किए जाएंगे, जिससे कांग्रेस ये दिखा सके कि उसका हाथ अभी भी आम आदमी के साथ है। ऐसे में वित्तीय घाटा और बढ़ता सब्सिडी बोझ जैसे मुद्दे पीछे छूट जाएंगे।

आर्थिक सुधारों की रुकी गाड़ी पर क्या पर्मानेंट ब्रेक लग जाएगा। इस सवाल के जवाब का भी बाजार को इंतजार होगा। बैंकिंग, इंश्योरेंस और रिटेल सेक्टर में विदेशी निवेश का मामला हो या टैक्स रिफॉर्म्स, सब पर काम बेहद धीमा हो जाने की आशंका है। आगामी 16 मार्च को 2012-13 का आम बजट पेश किया जाना है। केंद्र सरकार के सामने चुनौतियों का अंबार है। बड़े आर्थिक सुधार लंबित हैं। रिटेल से लेकर बैंकिंग और विनिवेश में सुधार ठप पड़े हैं। अर्थव्यवस्था अपेक्षा के विपरीत सुस्त हो चली है। सरकार और देश के लिए यह बड़े मौके का बजट साबित हो सकता है। सियासी मजबूरियों के चलते अब तक रुके आर्थिक सुधारों पर साहसिक निर्णय लेने के लिए सरकार का यह आखिरी बजट है। लोकसभा चुनाव से ठीक पहले आने वाले 2013-14 के आम बजट के नतीजे सबको पता हैं। उस लोकलुभावन बजट में चुनावी रेवड़ियां ही बंटेंगी। यही आखिरी बजट है, जिसमें कुछ ठोस करके सरकार इस बजट को यादगार बना सकती है।उद्योग  जगत की शिकायत है कि विकास की रफ्तार बढ़ाने के लिए जरूरी है कि वित्त मंत्री सुधारों की गाड़ी आगे बढ़ाएं। संप्रग-दो की यह सरकार जब से सत्ता में आई है आर्थिक सुधारों की गाड़ी थमी हुई है। पिछले तीन साल में सुधार टलते चले गए। लिहाजा अर्थव्यवस्था की मुसीबतें बढ़ती चली गईं।विकास दर बढ़ाने के लिए जरूरी है कि सरकार अर्थव्यवस्था का माहौल उद्योगों के अनुकूल करे ताकि आर्थिक गतिविधियां बढ़ सकें।बदले हुए राजनीतिक हालात में उद्योग जगत को यह अब असंभव लग रहा है। घरेलू उद्योग ही नहीं विदेशी निवेशक भी प्रणब मुखर्जी के बजट की तरफ निगाहें लगाए बैठे हैं। मल्टीब्रांड रिटेल में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पर जिस तरह से सरकार की फजीहत हुई है उसने वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी पर दबाव बढ़ा दिया है। उद्योग ही नहीं विदेशी निवेशकों में भी यह धारणा प्रबल होती जा रही है कि यह सरकार सुधारों के मामले में काफी धीमी चल रही है। यही वजह है कि हर तरफ से सरकार पर सुधारों की रफ्तार बढ़ाने का दबाव है।

कांग्रेस और यूपीए-2 के लिए अब बड़ी राजनीतिक चुनौती होगी- जुलाई में होने वाला राष्ट्रपति का चुनाव। अपने कैंडीडेट को राष्ट्रपति बनाने के लिए जितने लोगों का समर्थन केंद्र सरकार को चाहिए, फिलहाल उससे काफी दूर वो दिख रही है।

मौजूदा विधानसभा नतीजों के बाद अब केंद्र सरकार के लिए स्थिति और नाजुक हो गई है। उसे अब अपने सभी सहयोगियों और समाजवादी पार्टी जैसे नए दलों की सहमति से ही उम्मीदवार खड़ा करना होगा, और ऐसे में कांग्रेस और केंद्र सरकार की स्थिति और कमजोरी होगी, ये तय है।

जीएसटी और प्रत्यक्ष कर कानून को लेकर अभी भी अड़चनें बनी हुई हैं। जीएसटी पर राज्यों के साथ सहमति बनाने की चुनौती है तो डीटीसी पर वित्त मंत्रालय की स्थायी समिति की रिपोर्ट का इंतजार है। उसके बाद ही संसद में इस पर विचार होगा, लेकिन वित्त मंत्री पर दबाव रहेगा कि अगले वित्त वर्ष में इन दोनों पर अमल की तारीख सुनिश्चित हो। विनिवेश को लेकर भी सरकार की दिक्कतें कम नहीं हो रही हैं। चालू वित्त वर्ष में सरकार सिर्फ पॉवर फाइनेंस कारपोरेशन और ओएनजीसी में अपनी इक्विटी बेच सकी है। इसके लिए भी सरकार को बड़े पापड़ बेलने पड़े हैं।

बीमा क्षेत्र में एफडीआइ की सीमा को 26 प्रतिशत से बढ़ाकर 49 प्रतिशत करने, श्रम कानूनों को लचीला बनाने और वित्तीय नियामकों के कानूनों के पुनर्लेखन जैसे कई मुद्दों पर सरकार अभी तक कोई फैसला नहीं ले पाई है। इन्हें लेकर भी सरकार पर दबाव बना हुआ है। इसके अलावा सरकार के सामने राजकोषीय सुधारों का भी लंबा चौड़ा एजेंडा लंबित है। सब्सिडी में कटौती आज भी वित्त मंत्री के लिए चुनौती बनी हुई है, राजकोषीय घाटे को नियंत्रण में रखने के लिए सब्सिडी को कम करना ही होगा। आर्थिक सुधारों के अलावा उद्योग जगत की सबसे ज्यादा दिलच्स्पी श्रम सुधारों में है। अभी तो हाल यह है कि कंपनी बिल और जमीन अधिग्रहण बिल , पेंशन बिल का क्या हस्र होना है इन नतीजों के बाद, कहना मुश्किल है। फिर श्रम सुधारों के लिए क्या सरकार हिम्मत जुटा पायेगी। बाजार के विस्तार​ ​ और औद्योगीकरण के लिए उद्योग जगत श्रम शुधारों को सबसे अहम मालता है। िस वक्त ठेके पर नौकरी का चलन है और असंगछित क्षेत्र में मजदूर वर्ग का विस्तार हो रहा है, सश्रम सुधारों के जरिए कारपोरटे हित सधने की जो उम्मीद बाजार को थी, वह अब धूमिल हो गयी है। मालूम हो कि हाल ही में सभी विपक्षी दलों के मजदूर संगठनों ने मिलकर एक दिन की हड़ताल का आयोजन किया, जिससे देश को दस हजार करोड़ का नुकसान हुआ, लेकिन इस नुकसान की चिंता किसी को नहीं।उद्योग जगत की दलील है कि  भारतीय श्रमिकों की औसत उत्पादकता अंतरराष्ट्रीय स्तर से बहुत कम है और इसके दुष्परिणाम उद्योग जगत को भोगने पड़ रहे हैं।हालांकि प्रधानमंत्री और कुछ केंद्रीय मंत्री लगातार इस पर जोर दे रहे हैं कि पुराने श्रम कानूनों से काम चलने वाला नहीं है और उनमें आमूल-चूल परिवर्तन करना ही होगा, लेकिन कांग्रेस के साथ-साथ अन्य राजनीतिक दल इस मुद्दे पर श्रमिक संगठनों जैसा रवैया अपनाए हुए हैं।

बहरहाल चुनावों में कांग्रेस की दुर्गति के बाद यूपीए सरकार पर कारपोरेट दबाव बढ़ने लगा है। उद्योग मंडल एसोचैम ने कहा है कि दूरसंचार कंपनियों के पास मौजूद अतिरिक्त स्पेक्ट्रम को वापस लेने के मामले में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को हस्तक्षेप करना चाहिए। उद्योग मंडल का मानना है कि इस अतिरिक्त स्पेक्ट्रम का आवंटन सक्षम बोलीदाताओं को उचित बाजार मूल्य पर किया जा सकता है। एसोचैम ने इस बात पर जोर दिया कि सरकार को चार माह के अर्से में 2जी स्पेक्ट्रम की ताजा नीलामी करनी चाहिए। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने 700 मेगाहट्र्ज बैंड में स्पेक्ट्रम खाली किए जाने के लिए सहमति जता दी है जिसके लिए दूरसंचार विभाग (डीओटी) ने वायरलेस ब्रॉडबैंड सेवाएं (4जी) मुहैया कराने के लिए दूरसंचार कंपनियों के लिए नीलामी की योजना बनाई है।

दूसरी ओर देश के बैंकिंग सिस्टम में तरलता (लिक्विडिटी) बढऩे की उम्मीद है। रिजर्व बैंक द्वारा सोमवार को दिए गए ठोस संकेत से ही ऐसे आसार नजर आ रहे हैं। आरबीआई ने सीआरआर (नकद आरक्षित अनुपात) में अभी कुछ और कमी करने का संकेत दिया है। आरबीआई ने एसएलआर (वैधानिक तरलता अनुपात) में कटौती करने से साफ इनकार किया है। दरअसल, रिजर्व बैंक का कहना है कि इस कदम से फिलहाल बैंकिंग सिस्टम में नकदी का अतिरिक्त प्रवाह कतई संभव नहीं हो पाएगा।

रेल बजट से पहले कई सांसदों ने रेलवे में सुरक्षा से जुड़े कार्यों के लिए संसाधन जुटाने के वास्ते यात्री किराये में वृद्धि करने का आज सुझाव दिया। रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी की अध्यक्षता में हुई परामर्श समिति की बैठक में हिस्सा लेने वाले एक सांसद ने कहा, '' अब समय आ गया है कि रेलवे यात्री किराये को तर्कसंगत बनाए जिसे 2003 के बाद से नहीं बढ़ाया गया है।''

विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के उम्मीद से खराब प्रदर्शन से बाजार को भी झटका लगा और सेंसेक्स 190 अंक गिरकर 17173 तथा निफ्टी 58 अंक गिरकर 5222 पर बंद हुए।दिल्ली एवं इसके आसपास के क्षेत्रों, जम्मू कश्मीर, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और दक्षिण भारत में भी सोमवकर अपराह्र ४.९ तीव्रता के भूकंप के झटकों ने लोगों में जितनी दहशत पैदा कर दी, उससे ज्यादा दहशत अब बाजार की गतिविधियों में नजर आने लगा है।  मौद्रिक नीति की समीक्षा और इसके एक दिन बाद 16 मार्च को केंद्रीय बजट के पेश होने तक उतार-चढ़ाव का यह दौर बने रहने की संभावना है।आर्थिक विकास की दर लगातार गिरती जा रही है। अब वह 6.1 प्रतिशत पर आ टिकी है और अगली तिमाही में भी ऐसे ही नतीजे सामने आने के आसार हैं। इतनी कम विकास दर से देश का काम चलने वाला नहीं है। सभी क्षेत्रों और वर्गो के समुचित विकास और विशेष रूप से निर्धनता, कुपोषण और अशिक्षा से मुक्ति के लिए आर्थिक वृद्धि दर 8 प्रतिशत से ऊपर ही रहनी चाहिए। बढ़ते राजकोषीय घाटे और महंगाई से एक ओर उद्योग जगत खासा परेशान है और दूसरी ओर शिक्षा, स्वास्थ्य समेत आधारभूत ढांचे में कोई उल्लेखनीय सुधार होता नहीं दिखता।वित्ता मंत्री लगातार कह रहे हैं कि बढ़ती सब्सिडी और साथ ही उसके दुरुपयोग से उनकी नींद उड़ी हुई है, लेकिन सरकार वोट बैंक के फेर में सब्सिडी बढ़ाने वाली योजनाओं को आगे बढ़ाने पर तुली हुई है।

ब्रोकरों का कहना है कि मुलायम सिंह की पार्टी समाजवादी पार्टी की सत्ता में वापसी से अनिल अंबानी की कंपनियों के शेयरों में इसी हफ्ते 15 से 20 फीसदी की वृद्धि हो सकती है जिसकी शुरुआत सप्ताह के पहले ही दिन से दिख रही है।

मंगलवार को दोपहर बाद घरेलू शेयर बाजारों भारी उतार-चढ़ाव दर्ज किया गया।चुनावों के नतीजों से पहले बाजार में मुनाफावसूली का बोलबाला रहा। ऊपर से विदेशी बाजारों में कमजोरी ने निवेशकों का मिजाज और बिगाड़ा। कारोबार में चुनाव नतीजों के रुझानों ने बाजार की चाल सुस्त कर दी। अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में गिरावट की वजह से घरेलू बाजार कमजोरी पर खुले। उत्तरप्रदेश में समाजवादी पार्टी के आगे निकल जाने से बाजार में जोश दिखा। सेंसेक्स 300 अंक चढ़ा, वहीं निफ्टी भी 5300 के अहम स्तर के ऊपर चला गया।हालांकि, जैसे-जैसे समाजवादी पार्टी बहुमत के करीब पहुंचती गई, वैसे-वैसे बाजार की तेजी कम होती गई। यूरोपीय बाजारों में कमजोरी ने घरेलू बाजारों को लाल निशान में धकेल दिया। कारोबार के आखिरी घंटे में बाजार में बिकवाली का दबाव बढ़ा। दिन के ऊपरी स्तरों से सेंसेक्स 550 अंक और निफ्टी 170 अंक टूटे।

उत्तरप्रदेश में व्यापार कर रही या निवेश कर चुकी प्रमुख कंपनियों के शेयरों में आज मुनाफा बिकवाली के चलते गिरावट देखने को मिली। राज्य में विधानसभा चुनावों के परिणामों में समाजवादी पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिलने के संकेतों के बीच निवेशकों ने इन कंपनियों में बिकवाली की।
जिन कंपनियों के शेयरों ने राज्य की निवर्तमान बसपा सरकार के कार्यकाल में ऊंचाई छुई थी उनमें नरमी का रच्च्ख रहा क्योंकि सत्ता में परिवर्तन का असर उनके व्यापार पर भी पड़ने की आशंका है।

विशेषज्ञों का मानना है कि राज्य की सत्ता में बदलाव का फायदा अंतत: चीनी व बिजली क्षेत्र की कंपनियों को होगा। यह अलग बात है कि उतार चढाव वाले कारोबार के बीच मुनाफा बिकवाली से चीनी कंपनियों के शेयर टूटे।

जयप्रकाश समूह की कंपनी जयप्रकाश एसोसिएट्स, जयप्रकाश पावर वेंचर्स तथा जेपी इन्फ्राटेक के शेयर चार प्रतिशत तक टूटकर बंद हुए।
जयप्रकाश पावर वेंचर्स का शेयर 4.13 प्रतिशत तथा जयप्रकाश एसोसिएट्स का शेयर 1.07 प्रतिशत टूटा।

सेंसेक्स में शामिल कंपनियों में हिंडाल्को 5.75 प्रतिशत, जिंदल स्टील 4.28 प्रतिशत, टाटा पावर 4.11 प्रतिशत, भारती एयरटेल 3.66 प्रतिशत, भेल 3.23 प्रतिशत, टाटा मोटर्स 2.72 प्रतिशत, आरआईएल 2.68 प्रतिशत, एलएंडटी 2.44 प्रतिशत, सिप्ला 2.11 प्रतिशत, आईसीआईसीआई बैंक 1.98 प्रतिशत, हीरो मोटोकार्प 1.07 प्रतिशत और एसबीआई 1.06 प्रतिशत टूट गया।

हालांकि, डीएलएफ 2.73 प्रतिशत, आईटीसी 1.45 प्रतिशत, इनफोसिस 1.41 प्रतिशत और मारुति सुजुकी 1.01 प्रतिशत की बढ़त लेकर बंद हुआ।

अनिल अंबानी की अगुवाई वाले रिलायंस ग्रुप की कंपनी रिलायंस पावर व रिलायंस इन्फ्राटेक के शेयर में क्रमशः 7.09 प्रतिशत व 5.73 प्रतिशत टूटा।

पिछली बार जब राज्य में मुलायम सिंह मुख्यमंत्री थे, तब छोटे अंबानी के पावर प्रोजेक्ट सहित कई प्रोजेक्ट शुरु हुए थे। यही नहीं, उस समय गोदरेज समूह और आईसीआईसीआई बैंक सहित कई समूहों ने प्रोजेक्ट शुरू किया था। पर राज्य से मुलायम की सरकार की विदाई होते ही सभी प्रोजेक्ट रुक गए थे। लेकिन अब जिस तरह से मुलायम सिंह की सत्ता में वापसी की उम्मीद जताई जा रही है, उसका सबसे बड़ा फायदा अनिल अंबानी को होना है और यही कारण है कि सोमवार को उनकी कंपनियों के शेयरों में जमकर बढ़त देखी गई। जबकि बीएसई का संवेदी सूचकांक 274 अंक गिरकर बंद हुआ।अनिल अंबानी समूह की जिन कंपनियों में सोमवार को भारी बढ़त देखी गई उसमें रिलायंस मीडिया वक्र्स का शेयर 4.02 फीसदी बढ़कर 94.35 रुपये पर पहुंच गया तो रिलायंस पावर का शेयर 5 फीसदी बढ़कर 135 रुपये पर पहुंच गया। इसी तरह रिलायंस इंफ्रा का शेयर 5.52 फीसदी बढ़कर 656 रुपये पर पहुंचा तो रिलायंस कम्युनिकेशन का शेयर 1.58 फीसदी बढ़कर 96.85 रुपये पर पहुंच गया। साथ ही रिलायंस कैपिटल का शेयर भी 0.16 फीसदी बढ़त के साथ 427 रुपये पर पहुंच गया।

एक पेट्रोलियम कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि हमें पेट्रोल पर प्रति लीटर 5.10 रुपये का नुकसान हो रहा है। पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव संपन्न होने के बाद अब हम सरकार से कीमतों में संशोधन के लिए संपर्क करेंगे। पेट्रोलियम कंपनियों ने पिछले साल पहली दिसंबर को पेट्रोल कीमतों में संशोधन किया था। उसके बाद पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों के मद्देनजर पेट्रोल कीमतों में फिर संशोधन नहीं हुआ। इंडियन आयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम को कीमतों में अंतिम संशोधन के बाद से 900 करोड़ रुपये का नुकसान हो चुका है। उस समय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दाम 109 डालर प्रति बैरल थे। उसके बाद से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गैसोलीन के दाम बढ़कर 130.71 डालर प्रति बैरल हो गए हैं।

एक अधिकारी ने कहा कि पेट्रोल कीमतों में वृद्धि की पूरी संभावना है, लेकिन यह कितनी होगी, इस पर निर्णय सरकार को करना है। विधानसभा चुनावों में खराब प्रदर्शन के बाद अब यह देखने वाली बात होगी कि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार संसद के 12 मार्च से शुरू हो रहे बजट सत्र से पहले कीमत वृद्धि को मंजूरी देती है या नहीं। पेट्रोलियम कंपनियों को डीजल की प्रति लीटर की बिक्री पर 13.55 रुपये और मिट्टी के तेल पर 29.97 रुपये का नुकसान हो रहा है। इसी तरह 14.2 किलोग्राम के एलपीजी पर नुकसान 439 रुपये प्रति सिलेंडर का है।

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के साथ-साथ नोएडा, ग्रेटर नोएडा और गाजियाबाद में सोमवार की मध्यरात्रि से कंप्रेस्ड नेचुरल गैस (सीएनजी) महंगी हो गई है। इसकी कीमत दिल्ली में प्रति किलो 1.70 रुपये और नोएडा-गाजियाबाद में प्रति किलो 1.90 रुपये बढ़ाई गई है। सीएनजी की कीमत अब दिल्ली में प्रति किलो 35.45 रुपये और नोएडा-गाजियाबाद में 39.80 रुपये प्रति किलो हो गई है। घरों में पाइप के जरिए सप्लाई की जाने वाली रसोई गैस (पीएनजी) को इससे अलग रखा गया है।

सपा ने आज उप्र में जबर्दस्त जीत दर्ज करते हुए मायावती को सत्ता से बेदखल कर दिया। पंजाब में अकालीदल-भाजपा गठबंधन ने सत्ता बरकरार रखते हुए इतिहास रचा तो गोवा में सत्ताधारी कांग्रेस को भाजपा ने पराजित किया । मणिपुर में हालांकि कांग्रेस लगातार तीसरी बार जीतने में सफल रही ।उत्तराखंड में त्रिशंकु विधानसभा बनने के आसार हैं और कांग्रेस एवं भाजपा के बीच कांटे की टक्कर है । फिलहाल कांग्रेस 32 सीटों के साथ सबसे बडा दल बनकर उभरती दिख रही है जबकि भाजपा को 31 सीटें मिलने की उम्मीद है ।

यूपी में अपने अभियान के दौरान राहुल दलितों की झोपड़ी में सोए उनके साथ खाना खाया। इसे मीडिया और विशेषज्ञों ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से पार्टी की जिम्मेदारी लेने के लिए राहुल के इम्तिहान के तौर पर देखा। उत्तर प्रदेश चुनाव केंद्र सरकार की छाया से बाहर निकलकर 2014 में अपनी पार्टी की सहयोगियों के साथ सत्ता में वापसी कराने और मनमोहन सिंह की जगह खुद प्रधानमंत्री बनने की राहुल की क्षमता के इम्तिहान के तौर पर भी देखा जा रहा था।  राजनीतिक विश्लेषक अमूल्य गांगुली ने इस बारे में कहा, 'यह कांग्रेस के लिए तगड़ा झटका है। यह राहुल गांधी और गांधी परिवार के लिए उससे भी बड़ा झटका है। वे इन चुनावों में जीत की उम्मीद लगा रहे थे। उन्हें उम्मीद थी कि उन्हें पांच में से चार राज्यों में सत्ता मिलेगी। लेकिन जब वास्तविक नतीजे आए तो ठीक इसका उलटा हुआ। इससे साबित होता है कि अब गांधी परिवार में कोई करिश्मा नहीं है।'

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