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THE HIMALAYAN DISASTER: TRANSNATIONAL DISASTER MANAGEMENT MECHANISM A MUST

We talked with Palash Biswas, an editor for Indian Express in Kolkata today also. He urged that there must a transnational disaster management mechanism to avert such scale disaster in the Himalayas. http://youtu.be/7IzWUpRECJM

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS TALKS AGAINST CASTEIST HEGEMONY IN SOUTH ASIA

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Saturday, March 10, 2012

कारपोरेट लाबिइंग अब सीधे सीधे कारपोरेट सौदेबाजी में तब्दील!



कारपोरेट लाबिइंग अब सीधे सीधे कारपोरेट सौदेबाजी में तब्दील!

डीटीसी और जीएसटी लागू करना और मल्टी ब्रांड रीटेल एफडी आई को हरी झंडी दादा प्रणव की मुख्य चुनौतियां हैं,बिना लब्बोलुआब इंड्स्ट्री को अब नतीजे चाहिए!

मुंबई से एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास

​बजट की उलटी गिनती शुरू हो गयी है।वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी 16 मार्च को साल 2012-13 के लिए देश का आम बजट पेश करेंगे। यूपी चुनाव में मुंह की खाने और उससे बी ज्यादा भावी प्रधानमंत्री राहुल गांधी और उनकी बहन प्रियंका के फ्लाप शो,ममता, मुलायम और क्षेत्रीय क्षत्रपों की नई तीसरी शक्ति बनने की नई मुहिम और हाथ में भाजपा का पुराना विकल्प, उद्योग जगत के पास ताश के पत्ते कुछ ज्यादा ही हैं। इस पर तुर्रा यह कि राजकोषीय घाटा कम करने की फिक्र में दिन का चैन, रात की नींद खराब करने वाले प्रणव मुखर्जी न तो वित्तीय नीत और न मौद्रिक नीति की दिशा तय कर पा रहे हैं। तमाम वित्तीय कानून खटाई में हैं। विनिवेश डांवाडोल है। सुधारों का भविष्य अधर में है। सरकार और पार्टी डरी डरी सी है। ऐसे में फौरी तौर पर इस बजट में डीटीसी और जीएसटी लागू करना और मल्टी ब्रांड रीटेल एफडी आई को हरी झंडी दादा प्रणव की मुख्य चुनौतियां हैं। उन्हें देश की व्यापक पहुंच वाली लेकिन चरमराती और लीकेज वाली सब्सिडी व्यवस्था में व्यापक सुधार को अंजाम देना होगा, उन्हें विभिन्न क्षेत्रों में जबरदस्त सुधारों  के लिए पहल करनी होगी। उनको कर का दायरा बढ़ाना होगा और साथ ही वर्ष 2008 के वित्तीय संकट के बाद अपनाए गए कर कटौती के राहत उपायों को भी वापस लेना होगा। यह कोई चुनाव प्रचार का मामला तो है नहीं कि वायदा करके मुकर जाये और किसी की बला किसी और के मत्थे टाल दिया जाये। बिना लब्बोलुआब इंड्स्ट्री को अब नतीजे चाहिए।

तेल संकट, यूरोजोन और इरान परिदृश्य मुश्किल कुछ कम नहीं थे। अमेरिका में नये रोजगार की खबर से बाजार में थोड़ा जोश का माहौल भी बना था। पर अब नया अशनिसंकेत भारतीय अर्थ व्यवस्था की चूलें हिलाने के लिए काफी हैं।अब मंदी की आहटें बहुत तेज हो गयी हैं। चीन भी मंदी की चपेट में ह। बकरी की अम्मा कब तक खैर मनाती रहेगी जबकि उत्पादन प्रणाली ध्वस्त है और खुले बाजार के चक्कर में परंपरागत उद्योग धंधों, आजीविका को टौपट कर दिया गया है। चीनी रक्षा बजट ही नहीं, चीन में मंदी बी वित्तमंत्री के लिए अग्नि परीक्षा साबित होने जा रही है।चीन में फरवरी माह में व्यापार घाटा पिछले दशक में सबसे ऊंचे स्तर तक पहुंच गया. फरवरी महीने में व्यापार घाटा साढ़े इकत्तीस अरब डॉलर था, यानी, वहां जो आयात हुआ वो निर्यात के मुकाबले साढ़े इकत्तीस अरब डॉलर अधिक था। उधर एक और एशियाई देश ईधन का आयात बढ़ने से जापान का व्यापार घाटा रिकार्ड स्तर पर पहुंच गया है। पिछले साल जापान में परमाणु दुर्घटना हुई थी, जिसके कारण वहां के अधिकांश परमाणु बिजली घरों को बंद करना पड़ा था। अधिकांश परमाणु बिजली घरों के बंद होने की वजह से बिजली जरुरतों को पूरा करने के लिए ईधन आयात बढ़ाना पड़ा था।विडंबना है कि भारत ने भी परमाणु बिजली का विकल्प चुना है जिस भारत अमेरिका परमाणु संधि के बाद अब किसी भी हाल में बदला नहीं जा सकता। भोपाल गैस त्रासदी के अनुभव के बावजूद।

दूसरी तरफ भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) की ओर से जो बजट पूर्व ज्ञापन जारी किया गया है उसमें यह तो माना गया है कि राजकोषीय गुंजाइश सीमित है लेकिन इसके बावजूद उसने उद्योग जगत के लिए छूट की मांग की है। सीआईआई के ज्ञापन में कहा गया है, 'निवेश को बढ़ावा देने के लिए उत्पाद शुल्क और सेवा कर को मौजूदा स्तर पर बरकरार रखना बेहद जरूरी है।' वास्तव में तो सीआईआई का तर्क यह है कि सेवा कर में छूट की सीमा को ढाई गुना तक बढ़ाया जाना चाहिए।

इस बीच पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी उत्तर प्रदेश के भावी मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल हो सकती हैं। ममता ने कहा है कि वो इन दोनों शपथ ग्रहण समारोहों में जाने की पूरी कोशिश करेंगी।गौरतलब है कि बादल 14 मार्च को शपथ लेने वाले हैं, जबकि अखिलेश यादव 15 मार्च को लखनऊ में शपथ लेंगे। वहीं, ममता के इस कदम को यूपीए के लिए एक बड़े झटके के तौर पर देखा जा रहा है। बीते कई महीनों से ममता और यूपीए के बीच कई मुद्दों पर तनातनी दिखी है। रिटेल में एफडीआई का मुद्दा हो या एनसीटीसी का ममता ने दोनों मुद्दे पर यूपीए सरकार को घेरा है। अब अखिलेश यादव और प्रकाश सिंह बादल के शपथ ग्रहण समारोह में जाकर वो यूपीए को एक और झटका देने की तैयारी कर रही है।सूत्रों की मानें तो ममता दोनों शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होंगी। पंजाब में एनडीए के बड़े नेताओं के साथ दिखेंगी तो यूपी में समाजवादी पार्टी के नेताओं के साथ दिखेंगी। दूसरी तरफ राजनीतिक जानकारों का कहना है कि देश की राजनीति एक मोड़ ले रही है। जाहिर है कि कारपोरेट इंडिया इन परिस्थितियों और बदलते समीकरणों पर नजर रखे हुए हैं और वक्त बेवक्त रणनीति बदल रही है। कारपोरेट लाबिइंग अब सीधे सीधे कारपोरेट सौदेबाजी में तब्दील है।पांच राज्यों की विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को पटखनी क्या मिली चारों ओर सुगबुगाहट फैल गयी कि अब दिल्ली की सत्ता को खतरा पैदा हो सकता है, हालांकि यूपीए सुप्रीमो सोनिया गांधी ने इस बात से इंकार कर दिया है।

सब्सिडी में होने वाली भारी बढ़ोतरी का भार कम करने के लिए सरकार ने कीमत सुरक्षा कोष का प्रस्ताव तैयार किया है। खाद्य व उपभोक्ता मामलों का मंत्रालय इस पर विचार कर रहा है और 2012-13 के बजट में यह सामने आ सकता है। इस कोष का ढांचा अभी शुरुआती अवस्था में है और इस पर विस्तार से काम होना बाकी है। हालांकि वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने कहा कि खाद्य सुरक्षा कानून लागू करने की दिशा में पहल करके सरकार ने बहुत बड़ी जवाबदेही अपने हाथ में ली है। लेकिन इस दौरान उन्होंने बढ़ती जनसंख्या, पानी की घटती उपलब्धता और बढ़ती सब्सिडी को लेकर अपनी चिंता भी जाहिर की।

उद्योग जगत ने भारतीय रिजर्व बैंक से आगामी मौद्रिक नीति की मध्य तिमाही समीक्षा में रेपो दरों में एक प्रतिशत कटौती की मांग की है। बाजार को सीआरआर में 50 आधार अंक की कटौती की उम्मीद थी। आम बजट से पहले रिजर्व बैंक ने सीआरआर (नकद आरक्षित अनुपात) में 0.75 फीसदी की कटौती कर दी है। यह कटौती शनिवार से प्रभावी हो गई है।बाजार को हैरान करते हुए भारतीय रिजर्व बैंक ने नकद आरक्षी अनुपात (सीआरआर) 75 आधार अंक घटाकर 4.75 फीसदी कर दिया है। इससे बैंकिंग तंत्र में अतिरिक्त 48,000 करोड़ रुपये की नकदी आएगी। ​मौद्रिक नीतियों में यह उदारता उद्योग जगत को तदर्थ तौर पर जरूर खुश कर सकती है, पर डीटीएस, जीएसटी, विनिवेश, वित्तीय और श्रम कानूनों में संशोधन उसके एजंडे पर टाप पर है। लालीपाप थमाकर सरकार इस मुश्किल से निकल जायेगी, ऐसा नहीं लगता। बहरहाल इससे जहां महंगाई और ऊंची ब्याज दर से परेशान आम आदमी को राहत मिली है, वहीं उद्यमियों का मानना है कि इससे उद्योगों को मजबूती मिलेगी।  सीआरआर बैंकों की जमा राशि का वह हिस्सा होता है, जिसे बैंकों को रिजर्व बैंक के पास सुरक्षित रखना होता है। इस हिस्से में पहले भी आरबीआई ने जनवरी माह में आधे फीसदी की कटौती की थी। तब बैंकिंग तंत्र को 315 अरब रुपये का इजाफा हुआ था। अब यह कटौती और बढ़ने से आम आदमी के लिए ऋण लेना आसान होगा तो उद्योगों की मंदी भी दूर होगी और उद्योग तरक्की करेंगे। बैंकरों ने कहा कि सीआरआर में कटौती से छोटी अवधि की दरों में गिरावट आएगी, जो पिछले एक हफ्ते से ऊंचे स्तर पर बनी हुई थी। केनरा बैंक के चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक एस रामन ने कहा, 'हम रिजर्व बैंक द्वारा सीआरआर में कटौती किए जाने से बेहद खुश हैं। यह कदम तंत्र में नकदी बढ़ाने के लिए उठाया गया है। सीआरआर में कटौती के बाद सर्टिफिकेट ऑफ डिपॉजिट और बल्क डिपॉजिट की दरें 25 आधार अंक कम हो सकती हैं।'तीन महीने के डिपॉजिट सर्टिफिकेट की दरें पिछले एक हफ्ते में 75-100 आधार अंक बढ़कर 11 फीसदी से ज्यादा हो गई थी। सोमवार को बाजार में नकदी बढऩे से सरकारी बॉन्ड पर प्रतिफल भी घट सकता है।सीआरआर में कटौती की वजह पर रिजर्व बैंक ने कहा, 'अग्रिम कर भुगतान और बैंकों द्वारा केंद्रीय बैंक में नकदी जमा कराने के कारण मार्च के दूसरे सप्ताह में तंत्र में नकदी प्रवाह का संकट बढऩे की आशंका थी।' केंद्रीय बैंक ने कहा कि वह अर्थव्यवस्था के प्रमुख क्षेत्रों तक पूंजी का निर्बाध प्रवाह सुनिश्चित करना चाहता है।

फरवरी में निर्यात 4.3 की रफ्तार से बढ़ा है और ये 2,460 करोड़ डॉलर पर पहुंच गया है। हालांकि निर्यात के मुकाबले आयात की ग्रोथ ज्यादा रही है।

फरवरी में आयात 20.6 फीसदी की तेजी के साथ बढ़ा है और ये 3,980 करोड़ डॉलर पर पहुंच गया है। निर्यात और आयात के बीच इस खाई की वजह से देश का व्यापार घाटा 1,520 करोड़ डॉलर से ज्यादा का रहा है।

वहीं अप्रैल-फरवरी के दौरान निर्यात 21.4 फीसदी बढ़कर 26,740 करोड़ डॉलर पर पहुंच गया है। अप्रैल-फरवरी के दौरान आयात 29.4 फीसदी बढ़कर 44,320 करोड़ रुपये पर पहुंच गया है। अप्रैल-फरवरी के दौरान व्यापार घाटा 16,680 करोड़ रुपये रहा है।

फिलहाल वित्त मंत्रालय की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक चालू वित्त वर्ष 2011-12 में सरकार का कुल अनुमानित ऋण 32,81,464.94 करोड़ रुपए है। इसमें से आंतरिक ऋण 31,10,617.97 करोड़ रुपए का है, जबकि विदेशी ऋण की मात्रा 1,70,846.97 करोड़ रुपए है। चालू वित्त वर्ष 2011-12 में जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) का त्वरित अनुमान 52,22,027 करोड़ रुपए का है। इस तरह इस समय भारत सरकार का कुल ऋण जीडीपी का 62.84 फीसदी है।केंद्र सरकार सार्वजनिक ऋण के प्रबंधन के लिए रिजर्व बैक से अलग व्यवस्था करेगी। इसके लिए ऋण प्रबंधन कार्यालय (डीएमओ) बनाया जाएगा जिसके लिए एक विधेयक संसद के बजट सत्र में पेश किया जाएगा। बजट सत्र अगले हफ्ते सोमवार, 12 मार्च से शुरू हो रहा है।

वित्त मंत्रालय ने मंगलवार को सरकारी ऋण की ताजा स्थिति पर जारी रिपोर्ट में कहा है, "सार्वजनिक ऋण प्रबंधन के बारे में सबसे अहम सुधार है वित्त मंत्रालय में अलग से डीएमओ की स्थापना। आनेवाले बजट सत्र 2012-13 में इस सिलसिले में आवश्यक विधेयक पेश करने का प्रस्ताव है।"

अभी तक भारतीय रिजर्व बैंक देश के मुद्रा प्रबंधन और बैंकों के नियमन के साथ ही सरकार के ऋण प्रबंधन का काम भी करता है। इसलिए उसके काम व फैसलों में अनावश्यक उलझन होती है। सरकार चाहती है कि ऋण प्रबंधन का काम उससे अलग कर दिया जाए ताकि वह मौद्रिक नीति संबंधी फैसले निष्पक्षता और बिना किसी दबाव के ले सके।

वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने दो साल पहले 2010-11 का आम बजट पेश करते हुए कहा था कि सरकार सार्वजनिक ऋण प्रबंधन एजेंसी विधेयक पेश करेगी। लेकिन इस मसले पर रिजर्व बैंक और केंद्र सरकार के बीच बराबर मतभेद बने रहे। रिजर्व बैंक का कहना है कि सरकार के ऋण का प्रबंधन वित्त मंत्रालय के अधीन बनी किसी अलग संस्था के बजाय रिजर्व बैंक के नियंत्रण में चलनेवाली किसी संस्था से कराया जाना चाहिए।

रिजर्व बैंक के गवर्नर डी सुब्बाराव ने इस संदर्भ में पहले कहा था, "सरकार के ऋण प्रबंधन के काम को रिजर्व बैंक से अलग करने के पीछे कई तर्क दिए जा रहे हैं। मसलन, इससे हितों का टकराव सुलझ जाएगा, ऋण की लागत घट जाएगी, ऋण का सुदृढीकरण होगा और पारदर्शिता आएगी। लेकिन वास्तव में ये सारे फायदे अतिरंजित हैं।" उनका कहना था कि उचित मौद्रिक नीति और वित्तीय स्थायित्व के लिए सरकार के ऋण प्रबंधन और केंद्रीय बैंक के बीच नजदीकी संबंध होना जरूरी है।


रिटेल सेक्टर को उम्मीद है कि इस बजट में मल्टीब्रैंड विदेशी निवेश पर सरकारी नीतियों में कुछ सफाई आ सकती है। उधर, सिंगल ब्रैंड रिटेल में 100 फीसदी एफडीआई की मंजूरी के बावजूद अभी भी इंडस्ट्री में एसएमई से 30 फीसदी सोर्सिंग को लेकर दुविधा है, जिसे दूर करने की उम्मीद इंडस्ट्री को है। लेकिन रिटेल इंडस्ट्री की सबसे बड़ी मांग है जीएसटी जल्द लागू किया जाए।करीब 2,700 करोड़ डॉलर का संगठित रिटेल सेक्टर सरकार से इंडस्ट्री स्टेटस मिलने की उम्मीद भी कर रहा है। रिटेल सेक्टर सरकार से एसईजेड की तर्ज पर आरईजेड यानी रिटेल एंटरटेनमेंट जोन बनाने की मांग कर रहा है जिनमें निवेश करने वाले रिटेलर्स को ऑट्रॉय, स्टैम्प ड्यूटी में छूट और सस्ती बिजली मिले। रिटेलर्स की ये भी मांग है कि सप्लाई चेन बनाने के लिए आयात किए जाने वाले उपकरणों पर ड्यूटी में छूट मिले। साथ ही, सरकार सेविंग के बजाए खपत बढ़ाने वाली पॉलिसी बनाए।

रिटेलर्स एपीएमसी एक्ट में बदलाव की मांग भी कर रहे हैं, ताकि सीधे किसानों से खरीद आसान हो। इसके अलावा इसेंशियल कमोडिटी एक्ट के तहत स्टॉक लिमिट की सीमा बढ़ाने की मांग भी रिटेलर्स कर रहे हैं। अब देखना है कि वित्त मंत्री 16 मार्च को रिटेलर्स की कितनी उम्मीदों पर खरा उतरते हैं।

रेल बजट आम बजट से अलग होने के नाते इसका हमेशा राजनीतिक इस्तेमाल होता रहा है। हर रेलमंत्री अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने के लिए बाकी देश को तिलांजलि देकर अपने वोट बैंक को खुश करने पर आमादा होते रहे हैं। रेल बजट का वित्तीय या मौद्रिक नीतियां तो रही दूर , रेलवे के​ ​ अपने अर्थशास्त्र मसलन राजस्व . आय और परिचालन व्यय से दूर दूर का नाता नहीं होता। परियोजनाए गोषित कर दी जाती हैं और पैसे का इंतजाम नहीं होता। यात्री सहूलियतों, सुरक्षा और आधारभूत संरचना जैसी मूल जरुरतों की अनदेखी करके थोक तालियां बटोर ली जाती है। इस बार भी दिनेश त्रिवेदी इससे अलग कुछ करेंगे , ऐसी उम्मीद नहीं की जा सकती। सात पूर्वोत्तर राज्यों को आगामी रेल बजट में बड़ा तोहफा मिल सकता है। एक राष्ट्रीय पार्टी के तौर पर उभरने में यह पूर्वोत्तर राज्य तृणमूल काग्रेस के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं।

भारतीय रेलवे ने शनिवार से 120 दिन पहले टिकट आरक्षण की सुविधा लागू कर दी है। टिकटों की कालाबाजारी रोकने के लिए उठाए गए इस कदम से रेलवे को भी फायदा होगा। चार महीने पहले आरक्षण से टिकट कैंसिलेशन की संभावना भी बढ़ जाएगी। रिफंड टिकट से भी रेलवे को अतिरिक्त आय होगी। महीनेभर पहले रेलवे ने इसकी घोषणा की थी।

रेल मंत्रालय तृणमूल काग्रेस के नेता दिनेश त्रिवेदी के पास है और इसका इस्तेमाल इन राज्यों में रेल परियोजनाओं के लिए किया जा सकता है। तृणमूल काग्रेस ने अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर विधानसभा चुनावों में अपना खाता खोल लिया है और अब उसकी नजर त्रिपुरा विधानसभा चुनावों पर है।उल्लेखनीय है कि रेल मंत्री बनने के बाद त्रिवेदी ने सबसे पहला दौरा नागालैंड का किया था। रेल मंत्री आगामी बजट में पूर्वोत्तर में कनेक्टिविटी यानी संपर्क सुधारने की जरूरत पर खास ध्यान दे सकते हैं और कुछ नई ट्रेनों और रेल लाइनों की घोषणा कर सकते हैं।

पिछले साल रेल बजट पेश करते समय तत्कालीन रेल मंत्री ममता बनर्जी ने पूर्वोत्तर क्षेत्र के राज्यों की राजधानियों को आपस में जोड़ने के उपायों की घोषणा की थी। उम्मीद की जा रही है कि त्रिवेदी इस मिशन में तेजी लाने की दिशा में काम करेंगे।

हाल ही में मणिपुर में संपन्न हुए विधानसभा चुनावों में तृणमूल काग्रेस ने सात सीटें जीतीं और अब उसका लक्ष्य क्षेत्रीय पार्टी से एक राष्ट्रीय पार्टी बनने का है। इससे पहले, तृणमूल काग्रेस अरुणाचल प्रदेश में पाच सीटें जीती थी। मणिपुर विधानसभा चुनाव में अच्छे प्रदर्शन को लेकर उत्साहित तृणमूल काग्रेस ने कहा है कि जल्द ही इसे राष्ट्रीय पार्टी के तौर पर मान्यता मिल जाएगी।

देश के प्रमुख उद्योग संगठनों ने चालू वित्त वर्ष की तीसरी तिमाही में आर्थिक विकास दर के घटकर 6.1 प्रतिशत पर आने और बीते सप्ताह में बैंकों द्वारा रिवर्स रेपो के तहत एक दिन में रिकॉर्ड 1.90 लाख करोड़ रूपये से अधिक की पूजीं लेने पर गहरी चिंता जताते हुये भारतीय रिजर्व बैंक से तरलता बढ़ाने के उपाय करने और नकद आरक्षी अनुपात 'सीआरआर' में एक प्रतिशत तक की कटौती करने का आग्रह किया है।

भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग महासंघ (फ्क्किी) के अध्यक्ष आर वी कनोरिया के मुताबिक चालू वित्त वर्ष में लगातार विकास दर में गिरावट जारी है। पहली तिमाही में यह 7.7 प्रतिशत पर रही जो दूसरी तिमाही में घटकर 6.9 प्रतिशत और अब तीसरी तिमाही में 6.1 प्रतिशत पर आ गयी है जो चालू वित्त वर्ष में विकास दर के अनुमानित लक्ष्य को भी हासिल कर पाने पर सवालिया निशान लगा दिया है।

उन्होंने कहा कि इसके मद्देनजर गिरावट को थामने और इसमें तेजी लाने के लिए नीतिगत उपाय किये जाने की तात्कालिक आवश्यकता है और भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा इसमें विलंब किया जाना खतरनाक साबित हो सकता है। उन्होंने कहा कि रिजर्व बैंक को आगामी 15 मार्च को रिण एवं मौद्रिक नीति की तिमाही मध्य समीक्षा में विकास पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। केन्द्रीय बैंक को सीआरआर में कम से कम 0.50 प्रतिशत और इसी तरह से अल्पकालिक ऋण दरों, रेपो और रिवर्स रेपा, में भी आधी फीसदी की कटौती करनी चाहिए।

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