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THE HIMALAYAN DISASTER: TRANSNATIONAL DISASTER MANAGEMENT MECHANISM A MUST

We talked with Palash Biswas, an editor for Indian Express in Kolkata today also. He urged that there must a transnational disaster management mechanism to avert such scale disaster in the Himalayas. http://youtu.be/7IzWUpRECJM

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS TALKS AGAINST CASTEIST HEGEMONY IN SOUTH ASIA

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Sunday, March 11, 2012

अहंकार की भाषा

अहंकार की भाषा

Sunday, 11 March 2012 17:17

गोपाल प्रधान 
जनसत्ता 11 मार्च, 2012: अगर हम पिछले दिनों के राजनेताओं के बयानों की भाषा पर ध्यान दें तो अजीब किस्म की बेचैनी और असहायता का अहसास होता है। बेचैनी इस बात पर कि जिम्मेदार लोग ऐसी भाषा बोलने की हिम्मत कैसे कर लेते हैं और असहायता इस पर कि ऐसी ही भाषा में जवाब देने की हिम्मत छीन ली गई है। इस अहंकारी भाषा के प्रयोक्ता सिर्फ शासक दल के लोग नहीं रहे, बल्कि एक किस्म की सर्वसम्मति-सी बन गई लगती है। इसके पक्ष में समूचा राजनीतिक वर्ग है और माहौल ब्रेख्त की उस कविता जैसा है, जिसमें जनता ने सरकार का विश्वास खो दिया है और कवि ने सरकार को सलाह दी है कि क्यों न इस जनता को भंग कर वह अपने लिए दूसरी जनता चुन ले। 
इस आक्रामकता का कारण खोजना मुश्किल नहीं है। ऐसा किसी अपराधबोध के कारण नहीं हुआ कि राजनीतिक वर्ग अचानक बेहद संवेदनशील हो गया है, किसी छोटे से विरोध को भी पचा नहीं पा रहा है। खासकर विरोध में बोलने वाले बौद्धिकों पर उसका हमला अचानक तेज हो गया है। असल में यह एक तरह की मदांधता है, एक सत्ता सुख, जो निजी पूंजी के संरक्षण से पैदा हुआ है। यह संरक्षण चुनावों के संभावित खर्च की गारंटी देता है और जनता की चेतना को भ्रष्ट करने की कोशिश के कामयाब होने के भरोसे पर जिंदा है। 
राजनीतिक वर्ग ने मान-सा लिया है कि वोट खरीदा जा सकता है और सिद्धांत आधारित राजनीति को दरकिनार करके, लोगों की दरिद्रता बढ़ा कर, उन्हें भिखारी जैसी स्थिति में डाल कर इस मान्यता को मजबूत कर लिया गया है। जाहिर है कि जब आप मानने लगें कि जनता के सामने टुकड़े फेंकने से वह बिक जाएगी तो उसके गुस्से से डर काहे लगेगा। आजकल जो विभिन्न तथाकथित कल्याणकारी योजनाएं चल रही हैं और उन्हें जिस तरह नकद भुगतान आधारित बनाया जा रहा है उसके पीछे और कुछ नहीं, लोगों में नकदी पाने या लेने की लत लगाने का मकसद काम कर रहा है। 
यह मदांधता हाल के भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन से नहीं पैदा हुई, बल्कि इस सरकार के मुखिया के लोकसभा का चुनाव न लड़ने की निश्चिंतता और नंबर दो की हैसियत वाले पूर्व वित्तमंत्री और वर्तमान गृहमंत्री के पिछले दो चुनावों को धोखाधड़ी से जीतने से उपजी है। दोनों मामलों में पैसा बड़ी भूमिका निभाता है और वह तो जनता के बजाय थैलीशाहों से ही मिलेगा। यही माहौल सभी राजनेताओं को रास आने लगा है। कोढ़ में खाज यह कि कोई कहेगा तो उसे लोकतंत्र विरोधी बता दिया जाएगा। 
गौरतलब है कि चिदंबरम साहब ने राज्यसभा में आतंकवाद पर बोलते हुए अरुंधति राय के एक लंबे लेख से आहत होकर कहा था कि माओवादियों के शासन में तीस पृष्ठ का लेख लिखने की इजाजत नहीं मिलेगी। उनको मालूम था कि सदन में अनुपस्थित व्यक्ति के बारे में बोलने की मनाही है, इसलिए नाम तो नहीं लिया, लेकिन वित्तमंत्री पद की शपथ लेने से एक दिन पहले वेदांता के निदेशक मंडल से हटने की बात चुभी जरूर थी। अण्णा हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के दौरान तो यह अहंकार चरम पर पहुंच गया था। 
उस समय का मनीष तिवारी का वक्तव्य तो महज उस नफरत की अभिव्यक्ति थी, जो हमारे राजनीतिक वर्ग में आम जनता के प्रति जन्म ले चुकी है। यह वर्ग पिछले कुछ वर्षों में बड़े पूंजीपतियों का साथ पाकर उसी तरह की जीवन-शैली के ख्वाहिशमंद हो गया है। उदारीकरण के बाद से ही नवोदित कॉरपोरेट घरानों के साथ राजनीतिक वर्ग का जैसा अभूतपूर्व हेलमेल हुआ उसका नतीजा यही निकला कि तमाम पार्टियों की ओर से राज्यसभा में पूंजीपति चुने जाने लगे। फिर तो चुनावी खर्चों के लिए राजनेताओं की  निर्भरता थैलीशाहों पर इस कदर बढ़ती गई कि बड़ी-बड़ी परियोजनाओं का निर्माण ही इस मकसद से होने लगा कि इनसे होने वाली कमाई का एक हिस्सा राजनेताओं की जेब में भी आएगा। 

जब पूरा तंत्र ही इस तरह का बन गया तो रही-सही शर्म भी जाती रही। यहां तक कि पश्चिम बंगाल में वामपंथी पार्टी माकपा भी इससे नहीं बच सकी और तोडी, टाटा, सलेम जैसे पूंजीपति सरकार के दुलारे हो गए। राज्यसभा के लिए पूर्व सेनाध्यक्ष का चुनाव भी माकपा ने किया था। लोकपाल विधेयक पर संसद में चली बहस में ज्यादातर सांसद, चाहे वे किसी भी पार्टी के रहे हों, संसद की सर्वोच्चता को बचाने की ही फिक्र करते देखे गए। एक सांसद ने तो यहां तक कहा कि क्या अब हमें पुलिस का सिपाही पकड़ेगा? मानो सांसद बनते ही उन्हें सभी अपराधों की सजा से माफी मिल गई हो। सभी जानते हैं कि जब भी सांसदों के वेतन या भत्ते बढ़ाने का प्रस्ताव पेश होता है, तमाम वैचारिक मतभेद भुला कर पूरी संसद एकजुट हो जाती है। ऐसी ही दुर्लभ एकजुटता उस समय भी देखी गई थी। 
हाल में जब देवास एंट्रिक्स करार मामले में चार वैज्ञानिकों को भविष्य में कोई भी सरकारी पद नहीं सौंपने का फैसला आया तो वैज्ञानिकों ने इसे अन्याय माना। तब प्रधानमंत्री कार्यालय के मंत्री ने बयान दिया कि यह फैसला वैज्ञानिकों को सबक सिखाने के लिए किया गया है। थोड़े ही दिनों बाद बिहार के हड़ताली डॉक्टरों के बारे में एक मंत्री ने कहा की सरकार डॉक्टरों के हाथ काटना भी जानती है। इस भाषा का उत्स महज पूंजी के संरक्षण में नहीं, चुनाव जीतने के लिए पहले जिन अपराधियों की मदद ली जाती थी उनकी राजनीतिक जमात में शामिल होने में निहित है। यह ऐसा सच है, जिसे आज राजनीतिक वर्ग सुनना ही नहीं चाहता। सांसदों के विशेषाधिकार भी अपराधियों को राजनीति की ओर   आकर्षित कर रहे हैं। नहीं तो क्या कारण है कि इतने सारे अपराधी लोकतंत्र के प्रति आस्थावान होकर चुनाव लड़ने और जीत कर सांसद बनने को लालायित रहते हैं। जब राजनीति में इस समुदाय का धड़ल्ले से प्रवेश होगा तो उसकी भाषा राजनीति की भाषा बनेगी ही। 
देश के मुखिया का पद इस समय एक अर्थशास्त्री के पास है और अर्थशास्त्र में आम जनता के प्रति एक बेहद अपमानजनक सिद्धांत को मंत्र की तरह सभी नेता दोहराते हैं। उस सिद्धांत को अंग्रेजी में ट्रिकल डाउन इफेक्ट कहते हैं। इस सिद्धांत के मुताबिक अगर देश के मुट्ठी भर धनी लोगों के पास पैसा आएगा तो इसका असर कुल अर्थतंत्र पर स्वास्थ्यकर होगा। माने तब भीख भी अधिक मिलने लगेगी, घर के नौकर को भी ज्यादा पगार मिलेगी, बेयरा को टिप भी अधिक मिलेगी। आजकल हमारे देश के शासक अमेरिकी मालिकों की ऐसी ही समृद्धि के सहारे सुखकर जीवन की आशा में हैं। तभी तो खुद प्रधानमंत्री ने व्यक्तिगत रुचि लेकर अमेरिका के साथ न सिर्फ परमाणु समझौता किया, बल्कि अमेरिका के परमाणु विरोधियों को काबू में रखने के लिए अमेरिकी सरकार को उकसा भी रहे हैं। 
हमारे सामने एक ऐसा शासक समुदाय है, जो देश की हालत सुधारने के लिए नहीं, बल्कि निजी मान-सम्मान को लेकर बेहद संवेदनशील है। विरोध में बोलने वाले किसी भी आदमी को देशद्रोही और लोकतंत्र विरोधी कहने और साबित करने के लिए कमर कसे हुए हैं। एक समय अदालतें अचानक जिस तरह अवमानना को लेकर संवेदनशील हो उठी थीं, आज राजनीतिक वर्ग उससे भी अधिक अपने अधिकार और मान-अपमान को लेकर सजग दीख रहा है। काश ऐसी ही सजगता उसके भीतर देश की बेहतरी और सम्मान को लेकर होती! लेकिन जो है नहीं, उसका गम क्या! घाटे में चल रही देशी-विदेशी कंपनियों को फायदा पहुंचाने की जैसी बेकरारी नेताओं में है अगर वैसी ही बेचैनी आत्महत्या करने वाले किसानों को कर्ज से उबारने के लिए होती तो क्या कहना!

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