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THE HIMALAYAN DISASTER: TRANSNATIONAL DISASTER MANAGEMENT MECHANISM A MUST

We talked with Palash Biswas, an editor for Indian Express in Kolkata today also. He urged that there must a transnational disaster management mechanism to avert such scale disaster in the Himalayas. http://youtu.be/7IzWUpRECJM

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS TALKS AGAINST CASTEIST HEGEMONY IN SOUTH ASIA

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Monday, March 12, 2012

राहुल गांधी की हार

राहुल गांधी की हार 


Monday, 12 March 2012 10:31

कुमार प्रशांत 
जनसत्ता 12 मार्च, 2012: पांच राज्यों में हुए चुनावों को कोई महाभारत कह रहा था तो कोई दिल्ली का मिनी मुकाबला।

अब जब परिणाम आ गए हैं और बहुत सारे विश्लेषण औंधे मुंह गिरे हैं, तो सबसे सरल और जमीनी विश्लेषण हमारे सामने आया है समाजवादी पार्टी के नए नेता अखिलेश यादव का। उन्होंने कहा,यह लोकतंत्र का खेल है! कल वे जीते थे, आज हम, कल वे जीतेंगे और हम हारेंगे। यह खेल चलता रहेगा। 
अगर उत्तर प्रदेश में हुई अखिलेश की जीत कुछ मतलब रखती है तो उनका विश्लेषण भी कुछ मतलब रखता होगा! उसका मतलब यह है कि कौन जीता और कौन हारा इसका सत्ता के हिसाब से चाहे जितना मतलब हो- जनता के हिसाब से, लोकतंत्र के हिसाब से इन सबका कितना मतलब है, विश्लेषण इसका होना चाहिए। भारतीय लोकतंत्र हर चुनाव के साथ ज्यादा परिपक्व होता जा रहा है, क्या इसका कोई प्रमाण राजनीतिक दलों की मानसिकता में दिखाई देता है? जीत के बाद समाजवादी पार्टी के सिपाहियों का रवैया देख ही रहे हैं हम, और वह विश्लेषण भी सुन रहे हैं जो अपनी पराजय के बाद मायावती कर रही हैं। क्या इनमें कोई परिपक्वता दिखाई देती है? वे जिस तरह चुनाव की तैयारी करते हैं, जिस तरह अपने उम्मीदवार चुनते हैं, जिस तरह चुनाव प्रचार करते हैं, क्या उन सब में हमें कोई नयापन दिखाई देता है? हमारे राजनीतिक दलों के नेता लोकतंत्र को कुछ ज्यादा समझने लगे हैं और इसका ज्यादा सम्मान करने लगे हैं, क्या इसका कोई संकेत इन चुनावों में और इनके परिणामों में दिखाई देता है? 
यह सवाल भी पैदा होता है कि क्या कांग्रेस और राहुल गांधी इस परिणाम में से अपने लिए कुछ चुन सकते हैं? इस चुनाव में जो राहुल गांधी की पराजय देख रहे हैं वे वह नहीं देख पा रहे हैं जो ज्यादा महत्त्वपूर्ण है और शायद ज्यादा टिकाऊ भी। इस चुनाव के केंद्र में एक ही व्यक्ति था और वे थे राहुल गांधी। राहुल गांधी नहीं होते तो यह चुनाव ऐसा नहीं होता, जैसा यह बन गया। इसकी कई वजहें हैं। बहुत वर्षों बाद भारतीय राजनीति में कोई आदमी यह कहता और करता हुआ दिखाई दिया कि लोकतंत्र में चुनाव, प्रबंधन की चातुरी नहीं है, जनता के बीच उतरने और सवालों को उभारने की कला है। यह बात 1977 के बाद सिरे से भुला दी गई थी। 
उत्तर प्रदेश के चुनाव को राहुल गांधी ने जमीन से जोड़ कर रखा। पिछले कोई साल भर से वे लगातार जिस तरह उत्तर प्रदेश में घूमते-भटकते रहे, विकास का, भ्रष्टाचार का, दलितों-आदिवासियों का, सांप्रदायिकता का और भूमि अधिग्रहण आदि का सवाल उठाते रहे, वह सब हमारी हाल की राजनीति के लिए सर्वथा नई बात थी। अगर राहुल में थोड़ी अधिक राजनीतिक परिपक्वता होती और उनके पास दिग्विजय सिंह से ज्यादा मंजा हुआ सलाहकार होता, तो हम इस चुनाव के कुछ दूसरे रंग भी देख पाते। राहुल के पास ये दोनों ही नहीं थे। जब चापलूसी का बाजार गर्म हो तो अनुभवी सलाहें पीछे के दरवाजे से बाहर का रास्ता नाप लेती हैं। तब राजनीतिक परिपक्वता कैसे आ सकती है!   
उत्तर प्रदेश में घूम-घूम कर राहुल जो कह और कर रहे थे, उससे लगता था कि वे कुछ अलग और नया करना चाहते हैं। इसके साथ ही, यह भी साफ था कि वह क्या है जो वे करना चाहते हैं और वह कैसे होगा, यह उनकी समझ में नहीं आ रहा है। इसलिए वे कई-कई बार अपनी जगह से फिसलते रहे। दूसरी तरफ जातीय-सांप्रदायिक राजनीति और चुनाव मैनेज करने वाली प्रमोद महाजन-अरुण जेटली-अमर सिंह मार्का शैली के उनके सलाहकार भी उन पर हावी होते रहे। इसलिए अजित सिंह को साथ लेने का फैसला हुआ, मुसलमानों के लिए आरक्षण को इतना बड़ा हौवा बनाया गया, बटला हाउस जैसी बातें उछाली गर्इं, सैम पित्रोदा की जाति की खोज की गई। यह सारा घटाटोप राहुल गांधी की चमक को खा गया। 
राहुल गांधी के पास आदमी भी नहीं थे और संगठन भी नहीं था। उत्तर प्रदेश में क्या, सारे देश में ही कांग्रेस खोखली हालत में है। उसमें लड़ने का संकल्प और उत्साह नहीं है। इसलिए राहुल गांधी से ही कांग्रेस की कहानी शुरू होती थी और उन्हीं पर खत्म भी। बहुत हुआ तो प्रियंका समेत परिवार कभी-कभार दिखाई देता था। सिपाही भी नहीं, और जो नाम लेने के लिए थे भी वे लड़ने के लिए तैयार नहीं, ऐसी फौज के साथ राहुल गांधी ने चुनाव लड़ने का जो माहौल पैदा किया, उसकी प्रशंसा करनी होगी। उन्हें इस तरह लोगों के बीच जाते देख कर दूसरे भी अपने-अपने गढ़ों से बाहर आने पर मजबूर हुए और सड़कों पर धूल उड़ने लगी। 
चुनाव की तैयारी को राहुल गांधी ने जिस तरह जनता के बीच जाने की कवायद में बदल दिया, वैसा किसी दूसरे ने इधर के वर्षों में नहीं किया था। दिल्ली की उनकी गद्दी का उत्तर प्रदेश की जीत या हार से सीधा रिश्ता है, यह कठिन समीकरण उन्होंने ही खड़ा किया, वरना यह जरूरी नहीं था। अपने अभियान के साथ जैसे मुद्दे उन्होंने जोड़े वे भी हमारी राजनीति में आम नहीं हैं।
आम ढर्रा तो वही है जो श्रीप्रकाश जायसवाल ने कहा कि राहुल गांधी चाहें तो रात के बारह बजे भी प्रधानमंत्री बन सकते हैं। चापलूसी सबसे पहले उस आदमी की गरिमा गिराती है जिसकी चापलूसी की जाती है। और ऐसे लोगों की कांग्रेस में कमी नहीं थी- कभी सलमान खुर्शीद तो कभी दिग्विजय सिंह, कभी बेनी प्रसाद वर्मा तो कभी इस या उस कांग्रेसी ने यह काम बखूबी किया।

राहुल गांधी में राजनीतिक समझदारी और सावधानी होती तो वे तुरंत, वहीं के वहीं इन   आवाजों को खामोश कर सकते थे या कि फिर प्रियंका ही इन्हें खारिज करने वाले बयान दे सकती थीं। लेकिन प्रियंका तो इस अभियान में किसी आत्ममुग्ध स्कूली बच्ची-सा व्यवहार कर निकल जाना चाहती थीं। राज परिवार वाला मुलम्मा राहुल, प्रियंका, वढेरा पर ऐसा चढ़ा हुआ है कि आम बनने के उनके सारे प्रयास अब भी नकली लगते हैं। ऐसा लगता था कि यह जो राहुल है वह चुनाव का कांग्रेसी पोस्टर भर है, असली तो दिल्ली में कहीं जींस पहन कर बैठा है। सारे चापलूस कांग्रेसी राहुल के इस नकलीपन को हवा देते रहे।
एक बात और थी, जो राहुल गांधी और कांग्रेस ने एकदम भुला दी। केंद्र में दोबारा काबिज होने के बाद से मनमोहन सरकार का जैसा हाल रहा है, उससे उत्तर प्रदेश की कांग्रेस को अलग करके मतदाता कैसे देखता? उत्तर प्रदेश का मतदाता देख रहा था कि एक ऐसी पार्टी उसके सूबे में सरकार बनाने की मांग कर रही है जिसे दिल्ली में सरकार चलाना नहीं आ रहा। राहुल गांधी जितनी शिद्दत से बसपा के भ्रष्टाचार की बात उठाते थे, लोग सुनना यह भी चाहते थे कि वे केंद्र के भ्रष्टाचार के बारे में क्या कहते हैं! राहुल गांधी इसे किनारे करते रहे और बेअसर होते रहे। 
लोगों ने यह भी देखा था कि यही राहुल गांधी और दिल्ली के उनके सारे मंत्रीगण जन लोकपाल आंदोलन के दौरान क्या कर रहे थे! उन दिनों कांग्रेस का रवैया किसी मदहोश राज दरबार जैसा था। राहुल गांधी उस दौर में एकदम मुंह बंद कर पडेÞ रहे। जब लोकसभा में वे बमुश्किल बोलने आए तब एक मौका था कि वे अपने लोगों की सारी गलतियों को पीछे छोड़, गाड़ी को पटरी पर लाते। लेकिन उस दिन लोकसभा में गुस्से में कही दो-एक असंबद्ध बातों से अधिक वे सरकार और पार्टी के लिए कोई रास्ता नहीं बना सके। फिर यह उम्मीद थी कि अमेरिका से अपना इलाज करा कर लौटीं सोनिया गांधी पहला काम यही करेंगी कि जन लोकपाल आंदोलन को अपने करीब लाएंगी। लेकिन वह भी नहीं हुआ और वे कुछ अर्थहीन चुनौतियां उछाल कर शांत हो गर्इं। रामदेवजी का आंदोलन जितना दिशाहीन और गैर-ईमानदार था और जैसी अपरिपक्वता से वे उसे चला रहे थे, वह अपनी मौत आप ही मर जाता। लेकिन अगर कपिल सिब्बल और चिदंबरम जैसे रणनीतिकार हों आपके पास, तो दूसरों की जरूरत ही क्या! 
कांग्रेस ने तमाम लोकतांत्रिक संस्थाओं को आंखें दिखाने का मानो अभियान ही चला रखा था। न्यायपालिका को उसने आंखें दिखार्इं, चुनाव आयोग को रास्ते का रोड़ा साबित करने की कोशिश की। खुदरा व्यापार को बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हाथों सौंपने की बात हो या फिर आतंकवाद से निबटने के लिए एक अलग-सी व्यवस्था खड़ी करने का सवाल हो, सभी मामलों में केंद्र सरकार बहुत असावधान नजर आई। इन सभी में उसे अपने ही समर्थकों की घुड़की खाकर पीछे हटना पड़ा। जब इतना बड़ा चुनाव सिर पर हो तब ऐसे सवालों को सरकार आमतौर पर आगे के लिए छोड़ देती है। यहां तो ऐसा लग रहा था मानो कांग्रेस ने यह मिनी महाभारत जीत लिया तो वह लोकतंत्र को ही बदल देगी। कांग्रेस का अतीत ऐसी आशंकाओं को बल देता है।
यह सब था जिनका सम्मिलित नतीजा कांग्रेस की ऐसी पराजय में सामने आया। लेकिन राहुल गांधी को इस बात का श्रेय देना ही पड़ेगा कि इस युवक ने अपनी तमाम कमियों-कमजोरियों के बाद भी, सारे राजनीतिक दलों को मजबूर कर दिया कि वे जमीन पर उतर कर चुनाव लड़ें। इसलिए मैंने कहा कि राहुल गांधी की पार्टी बुरी तरह हारी है, राहुल गांधी नहीं! विश्लेषक गिना रहे हैं कि राहुल की हर पहल चुनाव में पिटी है। पहले बिहार में और अब उत्तर प्रदेश में। वे कहते हैं कि तमिलनाडु और केरल में भी उम्मीदवारों का चयन राहुल ने किया था और वहां भी पार्टी बुरी तरह पिटी। यह सब सही है, लेकिन यह भी देखना होगा कि इन सभी जगहों पर कांग्रेस थी किस हाल में? इनमें से कहीं भी कांग्रेस राजनीतिक ताकत के रूप में थी ही नहीं। बिहार या उत्तर प्रदेश में कांग्रेस जो कुछ भी थी, लोगों की निजी स्थिति और चुनाव प्रबंधन की उनकी क्षमता के कारण थी। आज राहुल गांधी ने कांग्रेस को फिर से सामने ला खड़ा किया है। लेकिन इन सभी जगहों पर पार्टी के रूप में कांग्रेस का कायाकल्प करना जरूरी है। कांग्रेस में राहुल के अलावा दूसरा कोई है नहीं जो ऐसा कर सके।
कांग्रेस के सामने अगली बड़ी चुनौती गुजरात की है। यहां पार्टी में नेताओं की भीड़ है, नेतृत्व जैसा कुछ भी नहीं है। गुजरात का जैसा सांप्रदायीकरण नरेंद्र मोदी ने कर रखा है, उसमें चुनाव की छौंक जब आप डालते हैं तब बहुत ही जहरीला माहौल खड़ा होता है। इन सबका मुकाबला करने की चुनौती है गुजरात में। राहुल गांधी की कोई भी कसौटी इन सबको ध्यान में रख कर ही करनी होगी। अगर राहुल अपना काम, अपनी ही शैली में लेकिन ज्यादा प्रौढ़ता के साथ जारी रखेंगे तो 2014 में हम उनकी पहुंच का सही जायजा ले पाएंगे।       (जारी)

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