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THE HIMALAYAN DISASTER: TRANSNATIONAL DISASTER MANAGEMENT MECHANISM A MUST

We talked with Palash Biswas, an editor for Indian Express in Kolkata today also. He urged that there must a transnational disaster management mechanism to avert such scale disaster in the Himalayas. http://youtu.be/7IzWUpRECJM

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS TALKS AGAINST CASTEIST HEGEMONY IN SOUTH ASIA

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Sunday, July 1, 2012

Fwd: [New post] पश्चिम एशिया : फिलिस्तीन के यहूदीकरण की दास्तान



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From: Samyantar <donotreply@wordpress.com>
Date: 2012/7/1
Subject: [New post] पश्चिम एशिया : फिलिस्तीन के यहूदीकरण की दास्तान
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पश्चिम एशिया : फिलिस्तीन के यहूदीकरण की दास्तान

by समयांतर डैस्क

विशेष : पुस्तकों पर केंद्रित छमाही आयोजन : परिच्छेद :समीक्षा ' साक्षात्कार ' लेख ' कविता: जून, 2012

प्रेम पुनेठा

फिलस्तीन और अरब इजरायल संघर्ष: महेंद्र मिश्र; पृ.: 286; मूल्य :रु. 450 ; वाणी प्रकाशन

ISBN 9789350007839

philiistin-aur-arab-israel-sangharshदूसरे विश्वयुद्ध के बाद दो बड़ी साम्राज्यवादी ताकतें ब्रिटेन और फ्रांस कमजोर हो गईं और वे अपने उपनिवेशों को संभालने की स्थिति में भी नहीं थीं। इसलिए लीग ऑफ नेशन के तहत उनको मिले मध्यपूर्व के मैंडेट से भी उन्होंने हाथ झाडऩे शुरू कर दिए। लेकिन इन ताकतों को अपने व्यापारिक हितों की चिंता थी और उपनिवेश की कड़वाहट के कारण वे अरब देशों पर विश्वास को तैयार नहीं थे। इसका परिणाम यह हुआ कि अरब देशों के बीच एक ऐसे राष्ट्र की कल्पना की गई जो उनके हितों को सुरक्षित रखे। इसी कल्पना को यहूदी धर्म पर आधारित इजरायल ने पूरा किया। 1948 में संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रस्ताव के बाद फिलिस्तीन का बंटवारा किया गया। इजरायल की स्थापना को साथ ही फिलिस्तीनियों की समस्याओं का आगाज हो गया जो लगातार बढ़ते रहे और आज भी ये संकट जारी हैं। पूरा अरब समाज और देश फिलिस्तीन के साथ एकजुट है लेकिन फिर भी 64 साल बाद फिलिस्तीन की समस्या ज्यों की त्यों है। इसके नागरिक अभी भी शरणार्थी ही हैं और अरब देशों में भटक रहे हैं। इन्हीं सब सवालों और कारणों को किताब में समझाने का प्रयास किया गया है।

इजरायल के अस्तित्व को अरब देशों ने कभी स्वीकार नहीं किया क्योंकि उनका मानना था कि यहूदियों ने उनकी जमीन पर कब्जा कर अरबों को बेदखल किया है। किताब में ही डॉक्टर कमाल अबू जब्बार के हवाले से कहा गया है कि अरब पूर्व में इजरायल की मौजूदगी एक खंजर की तरह है, जिसने अरब जगत को काटकर टुकड़ों में बांट दिया है। इस खंजर को हटाने का प्रयास इजरायल के जन्म के साथ ही अरब देशों ने शुरू कर दिया था और 1948 में ही पहला युद्ध हो गया और उसके बाद तीन और युद्ध हुए, लेकिन यह खंजर हर युद्ध के बाद और तीखा और गहरा धंसता चला गया। अरब देश इस खंजर से बचने के लिए समझौतापरस्त होते चले गए।

किताब पश्चिमी देशों की कई स्थापित मान्यताओं को खत्म करती है और फिलिस्तीनियों की त्रासदी को सामने लाती है। पश्चिमी देशों और इजरायल के बुद्धिजीवियों ने यह मिथक स्थापित किया कि ऐतिहासिक रूप से यहूदियों का मूल स्थान कनान देश है, जो आज का फिलिस्तीन है। लेकिन यहूदियों के आदि पुरुष अब्राहम का मूल निवास कलाडिया है। यह आज का इराक है। वर्तमान यहूदियों को हिब्रू नाम ही उनके आदि निवास के आधार पर मिला, जिसका अर्थ है जार्डन पार के लोग। इस आधार पर यहूदियों का यह दावा कि फिलिस्तीन उनका आदि स्थान था, गलत साबित होता है। यह भूमि तो उन्होंने अन्य कबीलों से जीती थी और इसे प्रोमिज्ड लैंड कहा था। इस प्रोमिज्ड लैंड पर काबिज होने के लिए हिब्रू कबीले ने आतंक और अत्याचार का सहारा लेकर इस क्षेत्र से भगा दिया था। लेकिन यहूदी राज्य लंबे समय तक नहीं रहा और असीरिया और रोमन का उस पर कब्जा रहा। रोमन ने तो पहली ईसा में ही इनको देश निकाला दे दिया और उसके बाद वे पूरी दुनिया में फैल गए। आज लगभग दो हजार साल बाद भी हिब्रू इस कबीलाई संस्कृति से बाहर नहीं आ पाए हैं। अरब और फिलिस्तीनियों की जमीन हथियाने के लिए वह इसी आतंक का सहारा लेता है।

यहूदियों की राज्य स्थापना में योरोप ने किस तरह से मदद की और फिलिस्तीनी जनता को धोखा दिया, इसको किताब में विस्तार से समझाया गया है। युद्ध और विस्थापन ने यहूदियों को मानसिक रूप से परेशान रखा। योरोप में यहूदियों ने संपन्नता हासिल की लेकिन वे हमेशा स्थानीय समुदाय की घृणा के पात्र बने रहे। स्थानीय समुदाय उनको अपने देश में बाहरी तत्त्व मानते थे। इस घृणा और भेदभाव ने योरोप के यहूदियों को एक राज्य की आवश्यकता महसूस कराई और इसके लिए उन्होंने साम्राज्यवादी ताकतों से सांठगांठ की। इधर, योरोपीय देशों की इच्छा थी कि यहूदी उनके इलाकों से चले जाएं। उन्नीसवीं सदी के आखिर तक यहूदियों के संगठन बनने लगे और वे ऐसी जगह तलाश रहे थे जहां वे बस सकें। योरोप के इस अवांछित तत्व को अमेरिका, आस्ट्रेलिया जैसे देश अपने यहां जगह देने को तैयार नहीं थे। इनसे निराश यहूदी संगठनों ने फिलिस्तीन को चुना जिसके बारे में उनका दावा था कि यह उनका आदि स्थान है। उन्होंने सियोनवादी संगठन की स्थापना की और येरूसलम चलो का नारा दिया। इसके लिए खूब जोर शोर से यहूदियों की दुर्दशा और जाति शुद्धता का नारा उछाला गया। फिलिस्तीन भेजने के लिए बकायदा ऑफिस खोले गए जहां से लोगों का चयन किया जाता था लेकिन इसमें भी ख्याल रखा गया कि कमजोर और बूढ़े लोगों को न भेजकर नौजवान ही वहां जाएं। प्रथम विश्वयुद्ध में ओटोमन साम्राज्य की हार और अरब इलाके का फ्रांस और ब्रिटेन के अंतर्गत मैनडेट व्यवस्था आने से यह सुनहरा अवसर सियोनवादियों को मिला। यहूदियों ने चालाकी के साथ बड़े फंड एकत्रित करने शुरू किए और इसकी मदद से फिलिस्तीन में जमीनें खरीदनी शुरू कर दी। यहूदी राज्य की स्थापना में संपन्न अरबवासिंदों ने अनचाहे में ही सहायता की। वे धनिक अरब जो शहरों में रहते थे और खुद खेती नहीं करते थे, उन्हें जमीनों से यहूदियों ने हटा दिया। इससे अरब लोगों की आर्थिक स्थिति खराब होती चली गई। मैनडेट के दौर में जब भी अरब के लोगों के साथ यहूदियों का संघर्ष हुआ तो ब्रिटेन पूरी तरह से यहूदियों के साथ ही दिखा। उसने यहूदियों के आतंकवादी दस्तों को भी पूरी तरह से खत्म नहीं किया। इसके विपरीत जब अरब लोगों की ओर से हिंसा हुई तो ब्रिटेन ने क्रूरता से दमन किया। लेकिन 1946 में यहूदियों के आतंकी संगठनों ने ब्रिटिश सेनाओं पर हमले किए तो उनका विरोध भी नहीं किया गया। इसका एक कारण मध्यपूर्व में ब्रिटेन की दिलचस्पी खत्म होना भी थी। यहां तक कि 1936-39 में अरब हिंसा के बाद ब्रिटेन ने उनके सारे हथियार जब्त कर लिए। इसका परिणाम यह हुआ कि जब फिलिस्तीन का विभाजन 1948 में हुआ और अरब-इजरायल के बीच पहला युद्ध हुआ तो फिलिस्तीनियों के पास हथियार ही नहीं थे। जबकि इजरायली सैन्य दस्तों के पास काफी हथियार थे। इसके अलावा नए साम्राज्यवादी की भूमिका अब अमेरिका के पास आ गई थी और उससे भी इजरायल को हथियार और सैन्य सहायता मिली। दूसरे अमेरिका में बसी यहूदियों की बड़ी संख्या ने भी अमेरिकी राष्ट्रपति को इजरायल के पक्ष में झुका दिया। अमेरिका की नजर अरब देशों में मिलने वाले तेल पर थी और अरबों को भयभीत करने और इस बहाने उन्हें नियंत्रित करने के लिए एक गैर मुस्लिम आक्रामक राष्ट्र की जरूरत भी थी, जिसे इजरायल ही पूरी कर सकता था, जो सांस्कृतिक तौर पर योरोप और अमेरिका के करीब था।

योरोप के अंदर यहूदियों के साथ हुए अन्याय के प्रति एक अपराध बोध भी था और वह इसे दूर करना चाहता था। इसलिए वे इसकी पूरी मदद करते थे। खासतौर पर सैन्य सहायता देकर। इसीलिए जब 1967 के युद्ध में इजरायल ने अरब देशों को बुरी तरह से पराजित किया तो वे योरोप वाले खुश नजर आए कि यहूदियों ने अपना प्रतिशोध ले लिया लेकिन ये प्रतिशोध उनसे लिया गया, जिन अरबों ने कभी यहूदियों को परेशान नहीं किया और अपने देश में उनको रहने के लिए जगह दी। सामान्य नागरिकों की तरह ही रहते थे और वे इजरायल के समर्थक नहीं थे। किताब बताती है कि किस तरह सियोनवादियों ने अरब देशों में यहूदियों को वहां से निकालने के लिए आतंक का सहारा लिया। इसके दो बड़े कारण थे एक धर्म के आधार पर मुस्लिम और यहूदियों में पूर्ण विभाजन करना और दूसरा योरोपीय यहूदियों के लिए सस्ता अरब यहूदी श्रम उपलब्ध कराना। योरोप से आए यहूदी खेतिहर नहीं थे और रोजगार करने वाले मध्यम वर्गीय थे। साथ ही योरोप से आने वाली अप्रवासियों की लहर खत्म हो चुकी थी। तब ऐसे लोगों की जरूरत थी जो श्रम आधारित कार्य कर सकें। इसके लिए अरब देशों के यहूदियों को निशाना बनाया गया। इराक और अन्य जगहों पर सियोनवादियों के एजेंटों ने आतंक बरपा कर उनको विवश कर दिया कि वे वर्तमान देश से बाहर जाए। इन लोगों के आने के बाद इजरायल ने फिलिस्तीन का यहूदीकरण कर लिया।

फिलिस्तीन के यहूदीकरण की प्रक्रिया के साथ ही यहां के अरब निवासियों की समस्या बढ़ती चली गई। शुरू में अरब देशों ने फिलिस्तीन की ओर से लड़ाई लड़ी लेकिन मिस्र, जार्डन और सीरिया के अपने हित थे। ये देश इजरायल से तो लड़ रहे थे लेकिन इन्हें निर्वासित फिलिस्तीनी अरबों की चिंता ज्यादा नहीं थी। इसलिए 1965 तक फिलिस्तीनी अपनी लड़ाई खुद लडऩे को मजबूर हो गए। पीएलओ के गठन के बाद यासर अराफात के नेतृत्व में अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर फिलिस्तीनियों की हालत को एक राजनीतिक विषय बना दिया गया। 1973 के युद्ध और तेल संकट के बाद अमेरिका ने भी दिखावे के लिए ही सही वार्ताओं और अरबों की समस्याओं की सुध लेनी शुरू की। अमेरिका ने वार्ताओं में मध्यस्थ की भूमिका निभानी शुरू की लेकिन अमेरिका किसी भी हालत में इजरायल को कमजोर होते नहीं देख सकता था। इसलिए न तो अमेरिका निष्पक्ष था और न उसकी फिलिस्तीनियों के प्रति सहानुभूति ही थी। अमेरिका ने इजरायल और मिस्र के बीच 1978 में कैंप डेविड समझौता करवाकर अरब देशों की एकता को तोड़ दिया। इस समझौते से फिलिस्तीनी ठगे से रह गए। अमेरिका की शह पर इजरायल की हठधर्मिता और दमन की कार्रवाई लगातार जारी रही। इसलिए जो भी वार्ताएं ओस्लो या कैंप डेविड में हुईं उनमें फिलिस्तीन और अरब हमेशा कमजोर स्थिति में रहे। फिलिस्तीनियों के उनके मूल निवास लौटने के अधिकार के बारे में इजरायल कुछ भी सुनने को तैयार नहीं है, जबकि संयुक्त राष्ट्र का पहला प्रस्ताव ही इस अधिकार को मान्यता देता है। 1993 समझौते के बाद गाजा और वेस्ट बैंक में फिलिस्तीनी अथारिटी की स्थापना का मार्ग खुला लेकिन इसमें भी कई किंतु-परंतु शामिल रहे। न येरूसलम का मसला हल हुआ, न फिलिस्तीन पूरा राष्ट्र बना और न इजरायल ने इन इलाकों से बस्तियां कम कीं। सबसे दुखद यह है कि इजरायल ने इस समझौते को भी पूरी तरह से लागू नहीं किया है। इधर, साठ साल बाद भी इस समस्या का कोई समाधान होता नजर नहीं आ रहा है। अराफात के मौत के बाद कमजोर होते पीएलओ और इजरायली दमन ने फिलिस्तीनी आंदोलन के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को भी खत्म कर दिया। आंदोलन की शुरुआत में मुस्लिम और ईसाई फिलिस्तीनी एकजुट होकर अपनी लड़ाई लड़ रहे थे लेकिन बाद में हमास के उदय ने इसे धार्मिक रंग दे दिया। 2006 में फिलिस्तीनी अथारिटी के चुनावों में हमास की जीत ने इजरायल और अमेरिका दोनों को परेशानी में डाल दिया। इसने समस्या को पहले से भी जटिल बना दिया है। एक हमास इजरायल के अस्तित्व को स्वीकार ही नहीं करता और उसको खत्म करना ही उसका उद्देश्य है तो इजरायल और अमेरिका ने हमास को आतंकवादी संगठन घोषित कर रखा है। इस बीच हमास और पीएलओ में मतभेद इतने बढ़ गए कि एक फिलीस्तीनी अथॉरिटी गाजा और वेस्ट बैंक में बंट कर रह गई। इजरायल ने मौके का लाभ उठाकर गाजा को नाकाबंदी और चेकपोस्ट लगाकर उसे बड़ी जेल में तब्दील कर दिया है। तमाम अंतर्राष्ट्रीय दबावों के बाद भी इजरायल अपनी दमनात्मक कार्रवाई खत्म नहीं कर रहा।

यह किताब अरब देशों में एक साल पूर्व हुए व्यापक आंदोलन से पहले लिखी है, जिसका जिक्र लेखक ने भूमिका से पहले ही कर दिया है। इसलिए यह अभी आंकलन नहीं किया जा सकता कि इसका फिलिस्तीन मामलों पर क्या, कितना और कैसा प्रभाव पड़ेगा। लेकिन फिलिस्तीन का मामला अब भी बेहद पेचीदा बना हुआ है, जिसमें लगातार नई गांठें पड़ती जा रही हैं।

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Fwd: कविता में व्याधि या कविता की व्याधि



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From: reyaz-ul-haque <beingred@gmail.com>
Date: 2012/7/1
Subject: कविता में व्याधि या कविता की व्याधि
To: abhinav.upadhyaya@gmail.com


एक विषय. दो कवि. दो अलग अलग तरह की कविताएं. लेकिन संवेदना की जमीन पर दोनों कैसे एक ही जगह पहुंचती हैं जहां वे समान रूप से अमानवीय और स्त्रीविरोधी हैं, जबकि एक कविता एक महिला द्वारा लिखी गई है और दूसरी एक पुरुष द्वारा. अपनी अब तक चर्चित हो चुकी इस आलोचना में शालिनी माथुर एक तरह से दोनों कविताओं का और उनके रचनाकारों के अंतर्मन का, उनकी वास्तविक राजनीति का उत्खनन करती हैं और दिखाती हैं कि कैसे खुद के नारीवादी होने का दावा करने वाली कविता या कवि-रचनाकार भी भीतर से कितने स्त्रीविरोधी, पितृसत्तात्मक हैं. घोषित रूप से स्त्रियों के पक्ष में लिखी गई इन कविताओं की यह आलोचना इसे भी दिखाती है कि किस तरह ये दोनों रचनाकार पूंजीवादी बाजारपरस्ती के नमूने के बतौर सामने आते हैं, जो अपने बुनियादी चरित्र में ही स्त्रीविरोधी और पितृसत्तात्मक है.

कविता में व्याधि या कविता की व्याधि



Fwd: [BeyondHeadlines] यशवंत के प्रकरण में अभी पूरी जानकारी मिलना बाकी...



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From: Amalendu Upadhyaya <notification+kr4marbae4mn@facebookmail.com>
Date: 2012/7/1
Subject: [BeyondHeadlines] यशवंत के प्रकरण में अभी पूरी जानकारी मिलना बाकी...
To: BeyondHeadlines <beyondheadlines@groups.facebook.com>


यशवंत के प्रकरण में अभी पूरी जानकारी मिलना...
Amalendu Upadhyaya 1:39pm Jul 1
यशवंत के प्रकरण में अभी पूरी जानकारी मिलना बाकी है. लेकिन इस अन्याय के खिलाफ वेब मीडिया के लोगों को एकजुट होकर खडा होने का वक़्त है. हो सकता है यशवंत से हम लोगों का मन मुटाव भी हो, उनकी बहुत सी हरकतों से हम सहमत न भी हों और बहुत सी कमियां भी उनमें हों, लेकिन ये वक़्त अपने व्यक्तिगत मतभेदों को किनारे रखकर एक साथ खड़े होने का ह
http://hastakshep.com/?p=21573
वेब मीडिया के पाठकों के लिए एक बुरी खबर है. 'भड़ास4मीडिया' के मालिक, संपादक यशवंत सिंह को पुलिस ने ग...

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Fwd: तुम्हारा अंजाम यही हो सकता था, यशवंत!



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From: Journalist Community <admin@journalistcommunity.com>
Date: 2012/7/1
Subject: तुम्हारा अंजाम यही हो सकता था, यशवंत!
To: admin@journalistcommunity.com


अपने अनुभव से मैं ये मान के चल रहा हूँ कि विनोद कापड़ी और उनकी पत्नी के साथ वे किसी भी हद तक गए होंगे. क्या कसूर है उनका? क्या ये कि उन ने प्रेम किया और शादी कर ली? पत्रकार के रूप में दोनों का गुनाह क्या है और उनके निजी जीवन में झाँकने का आपको हक़ क्या? आपको उनके किसी लिखे, कहे पे कोई आपत्ति नहीं है तो फिर आप उनको फोन, एस.एम.एस. कर ही क्यों रहे हो? कर रहे तो कैसे न मान लें कि उसके पीछे आपका कोई दुर्भाव नहीं रहा होगा. मार देने का न सही, पैसे मांगने का. पैसे जो आप को किसी भी कीमत पर चाहिए. सिर्फ अपनी साईट चलाने नहीं, खुद आपके मुताबिक़ दारू पीने, पिलाने और उस के अलावा अपने रिश्तेदारों के खिलाफ पुलिस कारवाई में मदद के लिए भी. http://journalistcommunity.com/index.php?option=com_content&view=article&id=1653:2012-07-01-08-49-16&catid=34:articles&Itemid=54

Fwd: Devon DB: Economic Austerity or Debt Default - Choose Your Poison



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From: Global Research E-Newsletter <crgeditor@yahoo.com>
Date: Sun, Jul 1, 2012 at 4:33 PM
Subject: Devon DB: Economic Austerity or Debt Default - Choose Your Poison
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Economic Austerity or Debt Default: Choose Your Poison

By Devon DB

Global Research, June 27, 2012

URL of this article: www.globalresearch.ca/index.php?context=va&aid=31617

Currently the US is now over $15 trillion in debt. [1] The national debt has now gotten to the point where it is larger than US GDP and is now unpayable. In response to this crisis, many in government have been arguing for austerity measures, yet they have not been using that actual term, rather there has been an argument for deep cuts in social spending, with one example being Paul Ryan's budget proposal which targets mainly the poor and elderly. The debt crisis may very well lead the US to being forced to choose from two poisons, austerity on one hand and default on the other.

Austerity measures are currently being pushed by the intellectual elite. Niall Ferguson argues that the main problem in Western democracies "is the huge debts we have managed to accumulate in recent decades, which - unlike in the past - cannot largely be blamed on wars" and poses the question "[W]ould young people be wise to encourage politicians to pay-off national debts now to avoid an even more miserable financial future?" [2]

In the US, Pacific Investment Management Co.'s Neel Kashkari, states that the US should "stop kicking 'the can down the road' and implement fiscal austerity measures so the economy can fully recover from the financial crisis." [3] While Ferguson states that the debt "cannot be blamed on large wars," the facts prove him to be incorrect as during the Clinton Administration there began a decrease in the national debt and ended with the US being in the black. [4] When President Bush came in, the US went back deeply into debt and this debt increase can be blamed mainly on the Afghanistan and Iraq wars.

The arguments for austerity, while they may be many, are nullified by the fact that the International Monetary Fund, the biggest advocate of austerity for so-called third world countries (and increasingly for many first-world European countries), has admitted that austerity only hurts income and worsens long-term unemployment. [5] In other words, austerity only makes a bad economic situation worse. Yet, this begs the question, if austerity doesn't work, then why are people arguing in favor of it? This question can be understood by examining the situation from the perspective of the banks. Austerity measures result in large amounts of privatization and thus allow for banks to buy up essential services such as water and electricity systems for dirt-cheap prices and then the banks can make large amounts of money from the perpetuity of state assets. Thus, the banks that gave the loans will then be able to recoup the amount of the loan and then make much more money.

Yet, austerity has more effects than just those the IMF listed. Austerity also produces "falling wages and a broadly recessionary environment that can last for decades," [6] and can result in the near or total economic destruction of a nation. In addition to this, one only need to look at Greece which used austerity measures to see just how ineffective they are. "[T]hose massive cuts in spending have caused the Greek economy to contract, reducing its ability to pay off its debt." [7] Thus, there is no hope that austerity will work to aid America's current debt woes as it will only create an even worse situation where it is that much harder to lower the debt.

Concerning default, that would be even more catastrophic than austerity measures. While one may scoff at such a notion, the reality of the situation is not unrealistic as just last year the US almost defaulted while the House of Representatives battled over whether or not to raise the debt ceiling. [8] A default on US debt would have multiple, interlocking effects. Firstly, a default would trigger a high degree of risk among US treasury which would result in the disruption of many different types of contracts and all types of transactions as well as the destruction of private credit. [9] Such a crisis would force the Federal Reserve to either "step in and provide an enormous amount of credit directly to households and firms" or "stand by idly while GDP fell 20 to 30 percent." On top of all of this, the US economy would be hit even harder by the fact that

With the private sector in free fall, consumption and investment would decline sharply. America's ability to export would also be undermined, because foreign markets would likely be affected, and because, in any case, if export firms cannot get credit, they most likely cannot produce. [10]

Thus, default will only bring about a near or total collapse of the economy.

The US, if it wants to get its economy back on track, will have to reject both default and austerity. The first step it could take is by making the bankers pay for the economic crisis that they created rather than forcing the burden upon the populace.

notes

1: US Debt Clock, http://www.usdebtclock.org/

2: Niall Ferguson, "Viewpoint: why the younger generation should embrace austerity," BBC, June 16, 2012
(http://www.bbc.co.uk/news/world-18456131)

3: Tom Keene, Catarina Saraiva, "U.S. Needs Austerity to Reset Economy, Pimco Official Says: Tom Keene," Bloomberg News, June 8, 2012
(http://www.bloomberg.com/news/2011-06-08/u-s-requires-austerity-to-reset-economy-pimco-s-kashkari-says-tom-keene.html)

4: US National Debt by Presidential Term: Per Capita and as Percentage of Gross Domestic Product,
http://www.skymachines.com/US-National-Debt-Per-Capita-Percent-of-GDP-and-by-Presidental-Term.htm

5: Alexander Eichler, "IMF Report: Austerity Measures Hurt Income, Make Long-Term Unemployment Worse," Huffington Post, September 13, 2011
(http://www.huffingtonpost.com/2011/09/13/imf-austerity_n_960199.html)

6: Rob Urie, "Who Benefits From Austerity Politics?," Counterpunch, November 18, 2011
 (http://www.counterpunch.org/2011/11/18/who-benefits-from-austerity-politics)

7: "End of the line: What a Greek default means," CNN Money, June 17, 2012
(http://finance.fortune.cnn.com/2011/06/17/end-of-the-line-what-a-greek-default-means)

8: "US 'almost out of time' for debt deal: Obama," Dawn, July 30, 2011
 (http://dawn.com/2011/07/30/us-almost-out-of-time-for-debt-deal-obama)
9: Simon Johnson, "What if the Government Defaults?," Slate, July, 18, 2011
 (http://www.slate.com/articles/business/project_syndicate/2011/07/what_if_the_government_defaults.html)
10: Slate, July, 18, 2011


Devon DB is a 20 year old independent writer and researcher. He is currently majoring in political science at Fairleigh Dickinson University. He can be contacted at ddbthewriter[at]gmail[dot]com.


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Fwd: Communal and targeted violence bill 2011.



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From: Rashtriya Sainik Sanstha <info@sainiksanstha.com>
Date: Sun, Jul 1, 2012 at 5:28 PM
Subject: Communal and targeted violence bill 2011.
To: Rashtriya Sainik Sanstha <info@sainiksanstha.com>


Virat Hindu Sammelan

 

Crying opposition to the Prevention of communal and targeted violence bill 2011

 

30th Jun and 01st Jul 2012, Hotel Sree Ji Palace, Pandav Nagar, Ghaziabad : In a two days seminar on the prevention of communal and targeted violence bill 2011, concluded here today, speakers from different hues and groups vied with each other in condemning the said bill. Rerspectable  Swami Narendra Nand Saraswati from Varanasi said that the said bill is one sided and aims at isolating the Hindus in their own country. He went to the extent of saying that people should rise in arms, if the need arise, to nip this bill in the bud.Shri Satya Prakash Gupta, an ex Ambassador to a number of countries, said that the drafters of the referred bill be brought to the books in the court and in the public for violating the secular character of this country. Shri R N P Singh, an ex officer of the intelligence bureau, proved with documented statements that communal violence has as a matter of rule rather than exception, has always been perpetrated by the minority in the past. Why the majority be made responsible for it, "he quipped."

 

Yati Narsingha Nand Ji, Shri Mahesh Ahuja, Shri Har Vilas Gupta, Shri Maya Prakash Tyagi, Shri Dinesh Chandra Tyagi and other dignitaries express their views. This event was organised by Manu Sanskriti Sansthan.

 

An exclusive session was given to the Rashtriya Sainik Sanstha whose National President Col Tejandra Pal Tyagi while conducting the session blew the conch to mark the era of awakening and said in crystal clear terms that the National Advisory Committee of Mrs Sonia Gandhi is communal and unconstitutional and should be disbanded sooner than later in the interest of the Nation. This committee has no right to draft any such bill. Leave aside the passing of the bill, we will not allow even the bill to be presented in the Parliament, " said Col Tyagi". Col R L Goel, Sh V P Sharma, Sh Alok Kumar, Sh Sarvesh Mittal, Col H Thakur, Brig V S Chaudhri, Cdr H S Sharma and many other senior Officers from the Military were of the opinion that the word SECULAR has become the fast food of the opportunistic politics. This word was not there in our Constitution abinitio but it was introduced in the 42nd amendment  brought out during the emergency in 1976.

 

Advocate Sheetla Shanker Vijay Mishra brought out that even the bureaucrats are being coerced to be partisan with the minorities via this bill since they can be charged for dereliction of duty either when they act or when they do not act. He gave the example of Kashmir regarding "action" and the example of Gujrat regarding "inaction."

 

Finally a pledge was taken by the great audience to resist  the said bill tooth and nail. In the first phase, awareness campaign will be launched to bring out the provisions of sexual assault, hate propaganda, Targeted Violence, Torture, Dereliction of Duty and abetment which are one sided to issue non bailable warrant against the members of the majority group i.e Hindus.

 

A few photos of the Seminar and Sammelan are attached.

 

 

 

(Fauji Rajendra Baggasi)

Secretary

Rashtriya Sainik Sanstha

9210728801

 


Fwd: [New post] मानवजाति की सामूहिक अवचेतन का एक सफर



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From: Samyantar <donotreply@wordpress.com>
Date: 2012/7/1
Subject: [New post] मानवजाति की सामूहिक अवचेतन का एक सफर
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मानवजाति की सामूहिक अवचेतन का एक सफर

by समयांतर डैस्क

विशेष : पुस्तकों पर केंद्रित छमाही आयोजन : परिच्छेद :समीक्षा ' साक्षात्कार ' लेख ' कविता: जून, 2012

विनोद शाही

द मॉस्क ऑफ अफ्रीका: वी.एस. नायपॉल; अनु.: नवेद अकबर ; मूल्य:210 ; पृ.: 269; पेंगुइन

ISBN 9780143414711

the-masque-of-africa-coverवर्ष 2011 की क्रिसमस। नाइजीरिया में चर्च और ईसाई निशाने पर हैं। इस्लामिक कट्टरपंथियों के एक दल के द्वारा किए गए सिलसिलेवार बम विस्फोटों में चालीस से ज्यादा लोग मारे जाते हैं। मौजूदा उत्तर-औपनिवेशिक दौर में अफ्रीका जिस संक्रमण और संकट से होकर गुजर रहा है, उसकी एक झलक इस घटना से मिल जाती है। यह बात भी समझ में आने लगती है कि आखिर वह क्या है कि वी.एस. नायपाल अपनी हाल ही में प्रकाशित किताब 'द मास्क ऑफ अफ्रीका' में धर्म से ताल्लुक रखने वाले परिदृश्य पर इतना तवज्जो देते हैं? अफ्रीका के अनेक देशों के सफर पर निकली यह किताब हमें एक ऐसी दुनिया के बीचों-बीच ले जाकर खड़ा कर देती है जो अनेक तरह की निरंकुशताओं से घिरी मालूम पड़ती है। धर्म की मार्फत जीवन और समाज में प्रवेश करती दैवी शक्तियों की निरंकुशताएं उनमें सब से ऊपर हैं। उनमें—यानी शासकों की, राजतांत्रिक व्यवस्थाओं और जंगल के सर्वस्पर्शी यथार्थ और इतिहास की जातीय स्मृतियों की मार्फत पूरे अफ्रीका को घेरती दूसरी निरंकुशताओं के मुकाबले इस किताब के नाम से ही अंदाजा हो जाता है कि नायपाल का ध्यान अफ्रीकी लोगों के द्वारा अक्सर-अमूमन लगाए जाने वाले चेहरों या 'मस्कस' पर अटका है। परंतु यहां एक बात ध्यान देने लायक है कि ये बेशुमार नकली अफ्रीकी चेहरे, असली चेहरे को छिपाने के काम नहीं आते—जैसा कि सभ्य और चालाक होती चली गई बाकी दुनिया में आमतौर पर दिखाई देता है, इसके उलट ये अफ्रीकी चेहरे, उनकी असलियत को, उनके भीतरी व्यक्तित्व को और यहां तक कि उनकी आत्मा के अनेक रंगों-रूपों का अक्स है इसलिए वे इन्हें न सिर्फ अक्सर पहनते हैं, जरा से उलट व्यवहार की भनक मिलते ही वे इनसे बेहतर डरने भी लग जाते हैं। यहां कोई गहरा सत्य छिपा लगता है जो अफ्रीकी लोगों से जुदा होकर भी उनका, उनकी देह और आत्मा का, हिस्सा है; यहां तक कि उनकी धर्म संबंधी अवधारणा और चेतना का एक आईना भी।

इन बेशुमार चेहरों की तरह ही अफ्रीकी लोगों के पास कोई एक व्यवस्थित धर्म नहीं, अपितु न जाने कितने परंपरागत और जमीनी-धर्म जैसे व्यवहार, अनुष्ठान, रीतियां और प्रथाएं हैं इन धर्मों का स्रोत वह जंगल है जो इस अफ्रीकी समाज को घेरे हुए है और इनकी परिस्थितियों की तरह प्रकट होते हैं—ईश्वर की तरह सर्वशक्तिमान होने निकले शासक—जिनका साम्राज्य इस जमीन पर ही नहीं है, अपितु इससे बाहर और परे भी उस दुनिया तक भी फैला है, जो मृत्यु के बाद के जीवन के लिए स्थापित है। इसी संदर्भ में नायपाल की यह टिप्पणी विचारणीय हो जाती है कि अफ्रीका के, सत्रहवीं से ले लेकर उन्नीसवीं सदी तक के औपनिवेशीकरण के इतिहास में, वहां वही विदेशी धर्म अपनी जड़ें जमाने में ज्यादा कामयाब हुए, जो किसी न किसी रूप में 'मृत्यु के बाद के जीवन' की बात स्वीकारते थे यानी अफ्रीकी औपनिवेशीकरण में अहम भूमिका निभाने वाले विदेशी धर्मों में से जिस ईसाई और इस्लाम धर्म ने वहां खास जगह बनाई थी, वह इन धर्मों के 'विकसित या व्यवस्थित' धर्म होने का नतीजा नहीं थी, अपितु वह अफ्रीकी मानसिकता थी, जो इन धर्मों के फैल सकने के लिए माकूल जमीन और आबोहवा मुहैया करती थी।

इन विदेशी धर्मों के अंग-संग अफ्रीका का जो उपनिवेशन हुआ, उससे आजाद होने और होते जाने की उत्तर-औपनिवेशिक प्रक्रियाओं वाले अफ्रीका के वर्तमान में नायपाल की यह किताब जैसे-जैसे गहराई में उतरती है, तो इस विदेशियत की अजनबियत भी हमारे सामने बेनकाब होने लगती है इस संदर्भ में नायपाल द्वारा की गई कुछ टिप्पणियां उद्धरणीय लगती है:

- 'विदेश धर्म यहां एक संक्रामक रोग की तरह फैले'

- यहां धर्म और धर्मसंस्थाएं कुछ इस तरह काम करती हैं, ''जैसे कि वे वहां के उपभोक्ताओं की हर एक मांग पूरी करना चाहती हैं। ''

- युगांडा के सफर के दौरान सूजन नाम की कवयित्री से हुई बातचीत से यह बात निकलती है कि वहां के हालात और शासनतंत्र की निरंकुशताओं के चलते, 'बेहतर भविष्य के लिए ईश्वर में विश्वास जरूरी लगता है। ' परंतु उसे यह भी लगता है कि 'दूसरे या विदेशी धर्म अपनाकर उन्होंने ईश्वर का अपमान किया है। ' वह कहती है कि 'मैं एक जूड़ो-क्रिश्चियन हूं पर ईसाई धर्म में मेरा यकीन नहीं है। ''

- परंतु परंपरागत अफ्रीकी धर्मों की स्थिति भी अंतर्विरोधों से भरी है मोंटेसा के द्वारा स्थापित बहुत से पूजास्थलों को वहां इसलिए जला दिया गया, क्योंकि उनमें मानव बलि बहुतायत में होने लगी थी।

- वहां के शासक के एक नए उत्तराधिकारी कासिम को नए और आधुनिक विदेशी धर्म इसलिए आलोचना के लायक लगते हैं, क्योंकि 'उन्होंने वहां के लोगों को अवज्ञाकारी बना दिया है। ''

- आधुनिकता और आधुनिक धर्म सूजन को भी 'अपनी जड़ों से लोगों को काटने वाली चीजों की तरह' लगते हैं। वह मानती हैं कि 'आधुनिकता हमें हमारी जमीन से काटती है, पर उसे छोडऩे से अराजकता फैलती है। ''

- बहुत से अफ्रीकी लोगों का यह मानना है कि औपनिवेशीकरण के साथ आए ईसाई और इस्लाम धर्म का इस्तेमाल, सत्ता की ताकतों के द्वारा इसलिए किया गया, ''ताकि अफ्रीकी दिमाग को नियंत्रित किया जा सके।''

युगांडा, कीनिया, घाना, नाईजीरिया या दक्षिण अफ्रीका जैसे विविध मुल्कों के सफर के दौरान नायपाल अफ्रीका के उस पारंपरिक सांस्कृतिक व्यक्तित्व को भी छूने की कोशिश करते हैं, जो इतना विविध और बहुल है कि इन 'व्यवस्थित विदेशी धर्मों' की तुलना में अब वहां के लोगों को भी 'अराजक' लगने लगा है फिर भी वही उनका जमीनी यथार्थ है, जिससे वे कभी अलग नहीं हो सकते इसे हम समझना चाहें तो यह कबीलाई अतीत से ताल्लुक रखने वाला 'जंगल का धर्म' है। नायपाल तीन-बीन में इस ओर इशारे जरूर करते है, परंतु इस के असल रचनात्मक और विधायक पहलुओं को संभवत: हम 'अफ्रीकी' हुए बिना कभी ठीक से आत्मसात नहीं कर सकते। इसलिए नायपाल के विवरण भी ज्यादातर उसके अराजक या पिछड़ेपन का पर्याय मालूम पडऩे वाले पहलुओं पर ही आ अटकते हैं। वे पुरोहितों और शासक-वर्ग के द्वारा दी गई नरबलियों का खासा विस्तार और ब्यौरे वाला जायजा लेते हैं। मृत्यु के बाद शासक के साथ उसके परिचरों को भी उसकी देखभाल के लिए 'दूसरी दुनिया' में जबरन भेज दिया जाता है। मोंटेसा के संदर्भ में 23 परिवारों के जिंदा जलाए जाने का जिक्र आता है। इनके 'ईसाई' होने की बात यहां खास रेखांकित की गई है। आधुनिक होने की प्रक्रिया में पारंपरिक पूजास्थलों को जलाने और नष्ट करने के लिए इस 'इतिहास' की मदद खासतौर पर ली जाती है। इसके, मंत्र-तंत्र की अतार्किक और अविश्वसनीय दुनिया है। मलेरिया जैसी बीमारी के लिए भी 'पड़ोसी' के जिम्मेवार होने की बात सामान्य है। बकरी के कटे सिर को किसी के घर के पास फेंक देने से तांत्रिक टोने-टोटके की सिद्धि जैसी मेल खाती है—जो भारतीय अंधविश्वासों से भी खासी मेल खाती है। परंतु शासक इसका इस्तेमाल अपनी सत्ता के लिए करते हैं। हुफ्फट जैसे शासक के बारे में कथा फैला दी जाती है कि उसकी देह के टुकड़े करके एक तांत्रिक ने उन्हें फिर से जोड़ दिया है। इस तरह वह 'अमर' हो गया है। परंतु शासक के सर्वशक्तिमान होने का असल स्रोत 'कवाका' है, जो जंगल से आता है। और शासक के सत्ताकाल के खत्म होने पर, उसे छोड़ फिर जंगल में लौट जाता है। वह जंगल की शक्ति का सार है, जिसे उपलब्ध होने वाला 'असल शासक' होने का अधिकारी बनता है।

ऐसे ही स्त्रियों को वश में करने वाला मम्बो-जम्बो है, जो जंगल से आता है, परंतु इस्लाम के असर से और खासतौर पर नाइजीरिया जैसे मुल्क में बहुपत्नीत्व के आम होने से वह 'हैट लगाकर आने वाला एक नृशंस दंडनायक' हो जाता है। आधुनिकता वहां की परंपरागत धारणाओं को विकृत बनाने में भी मदद करती है। इस ओर नायपाल इशारा तो करते हैं, परंतु उनका नजरिया 'आधुनिकता समर्थक पश्चिमी नजरिया' ही बना रहता है। फिर भी 'जंगल के धर्म' के उस रचनात्मक पहलू को भी थोड़ा-बहुत उभरने का वहां अवकाश मिल ही गया है।

शहरों में आ बसे कवि-हृदय वाले एक व्यक्ति को लगता है कि 'जंगल हम सबके भीतर होता है। '' वह जो बाहर है, वह शहर में आने के बावजूद साथ ही चलता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि घाना के जंगल के 'पिग्मी' लोग बताते हैं कि 'जंगल की आवाज, ईश्वर की आवाज होती है। '

परंतु औपनिवेशिक दौर के आरंभ होते ही अफ्रीका के ये जंगल लगातार कटते जा रहे हैं। विदेशी धर्म ही नहीं, गोरे शासकों के आने के बाद से, नस्ल और रंगभेद का इतिहास भी वहां के आधुनिक अभिशापों का पर्याय होता चला गया है। नायपाल अपनी इस किताब के अंत में दक्षिण अफ्रीका के सफर के दौरान गांधी से मंडेला तक भी आते हैं। वहां ऐसे लोगों के बयान दर्ज करते हैं, जिनके नजर में 'मंडेला जेल जाने से पहले इंकलाबी थे, परंतु जब वे छूट कर आए तो समझौतावादी होकर निकले'। इसे हम वहां के आधुनिक इतिहास और विकास के अंतर्विरोधी की तरह देख सकते हैं। भारत के औपनिवेशिक दौर से बाहर आने की प्रक्रिया के तहत यहां भी गांधी और कांग्रेस के समझौतावादी और दलाल तक हो जाने की बातें एक तबके द्वारा—खासतौर पर यहां के वामपंथियों द्वारा—की जाती रही है। सवाल यह है कि यात्रा-वृतांत कुछ पहलुओं पर ही निगाह रखने का काम करते हैं और उन्हें किसी मुल्क या उपमहाद्वीप के यथार्थ के अछूते और यथार्थ—या प्रतिनिधि पक्ष—का चितेरा नहीं माना जा सकता है। तथापि इससे इतनी बात तो समझी ही जा सकती है कि आखिर क्यों नायपाल पश्चिमी दुनिया के पढ़े जाने लायक अहम लेखकों की सूची में शुमार होते हैं?

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