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THE HIMALAYAN DISASTER: TRANSNATIONAL DISASTER MANAGEMENT MECHANISM A MUST

We talked with Palash Biswas, an editor for Indian Express in Kolkata today also. He urged that there must a transnational disaster management mechanism to avert such scale disaster in the Himalayas. http://youtu.be/7IzWUpRECJM

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS TALKS AGAINST CASTEIST HEGEMONY IN SOUTH ASIA

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Friday, February 1, 2013

सभी किस्म के भ्रष्टाचरण की धुरी है आर्थिक भ्रष्टाचार

सभी किस्म के भ्रष्टाचरण की धुरी है आर्थिक भ्रष्टाचार


प्रतिवाद को खत्म करता है आर्थिक भ्रष्टाचार

'आधुनिकीकरण की छलयोजना' है आर्थिक भ्रष्टाचार

नव्य आर्थिक उदारीकरण और भ्रष्टाचार

जगदीश्वर चतुर्वेदी

राजनीति में भ्रष्टाचार एक बड़ा मुद्दा है लेकिन साहित्य में यह कभी मुद्दा ही नहीं रहा। यहां तक संपूर्ण क्रांति आंदोलन के समय नागार्जुन ने भ्रष्टाचार पर नहीं संपूर्ण क्रांति पर लिखा, इन्दिरा गांधी पर लिखा। जबकि यह आंदोलन भ्रष्टाचार के खिलाफ था। क्या वजह है लेखकों को भ्रष्टाचार विषय नहीं लगता। जबकि हास्य-व्यंग्य के मंचीय कवियों ने भ्रष्टाचार पर जमकर लिखा है। साहित्य में भ्रष्टाचार की अनुपस्थिति इस बात का संकेत है कि लेखक इसे मसला नहीं मानते। दूसरा बड़ा कारण साहित्य का मासकल्चर के सामने आत्म समर्पण और उसके साथ सामंजस्य बिठाने की कोशिश करना है। साहित्य में मूल्य, नैतिकता, परिवार और राजनीतिक भ्रष्टाचार पर खूब लिखा गया है लेकिन आर्थिक भ्रष्टाचार पर नहीं लिखा गया है। आर्थिक भ्रष्टाचार सभी किस्म के भ्रष्टाचरण की धुरी है। यह प्रतिवाद को खत्म करता है। यह उत्तर आधुनिक अवस्था का यह प्रधान लक्षण है।    इसकी धुरी है व्यवस्थागत भ्रष्टाचार। इसके साथ नेताओं में संपदा संचय की प्रवृत्ति बढ़ी है। अबाधित पूंजीवादी विकास हुआ है। उपभोक्तावाद की लम्बी छलांग लगी है और संचार क्रांति हुई है। इन लक्षणों के कारण सोवियत अर्थव्यवस्था धराशायी हो गयी। सोवियत संघ और उसके अनुयायी समाजवादी गुट का पराभव हुआ। फ्रेडरिक जेम्सन के शब्दों में यह 'आधुनिकीकरण की छलयोजना'  है। अस्सी के दशक से सारी दुनिया में सत्ताधारी वर्गों और उनसे जुड़े शासकों में पूंजी एकत्रित करने,येन-केन प्रकारेण दौलत जमा करने की लालसा देखी गयी। इसे सारी दुनिया में व्यवस्थागत भ्रष्टाचार कहा जाता है और देखते ही देखते सारी दुनिया उसकी चपेट में आ गयी। आज व्यवस्थागत भ्रष्टाचार सारी दुनिया में सबसे बड़ी समस्या है। पश्चिम वाले जिसे रीगनवाद, थैचरवाद आदि के नाम से सुशोभित करते हैं यह मूलतः 'आधुनिकीकरण की छलयोजना' है, इसकी धुरी है व्यवस्थागत भ्रष्टाचार।रीगनवाद- थैचरवाद को हम नव्य आर्थिक उदारतावाद के नाम से जानते हैं। भारत में इसके जनक हैं नरसिंहाराव – मनमोहन। यह मनमोहन अर्थशास्त्र है। भ्रष्टाचार को राजनीतिक मसला बनाने से हमेशा फासीवादी ताकतों को लाभ मिला है। यही वजह है लेखकों ने आर्थिक भ्रष्टाचार को कभी साहित्य में नहीं उठाया। भ्रष्टाचार वस्तुतः नव्य उदार आर्थिक नीतियों से जुड़ा है। आप भ्रष्टाचार को परास्त तब तक नहीं कर सकते जब तक नव्य उदार नीतियों का कोई विकल्प सामने नहीं आता।

डा जगदीश्वर चतुर्वेदी, जाने माने मार्क्सवादी साहित्यकार और विचारक हैं. इस समय कोलकाता विश्व विद्यालय में प्रोफ़ेसर

    भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन प्रतीकात्मक प्रतिवादी आंदोलन रहे हैं। इन आंदोलनों को सैलीब्रिटी प्रतीक पुरूष चलाते रहे हैं। ये मूलतःमीडिया इवेंट हैं। ये जनांदोलन नहीं हैं। प्रतीक पुरूष इसमें प्रमुख होता है। जयप्रकाश नारायण के सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन से लेकर अन्ना हजारे के जन लोकपाल बिल आंदोलन तक इसे साफ तौर पर देख सकते हैं। ये मीडिया पुरूष हैं। इवेंट पुरूष हैं। इनकी अपनी वर्गीय सीमाएं हैं और वर्गीय भूमिकाएं हैं। प्रतीक पुरूषों के संघर्ष सत्ता सम्बोधित होते हैं जनता उनमें दर्शक होती है। टेलीविजन क्रांति के बाद पैदा हुई मीडिया आंदोलनकारियों की इस विशाल पीढ़ी का योगदान है कि इसने जन समस्याओं को मीडिया टॉक शो की समस्याएं बनाया है। अब जनता की समस्याएं जनता में कम टीवी टॉक शो में ज्यादा देखी -सुनी जाती हैं। इनमें जनता दर्शक होती है। इन प्रतीक पुरूषों के पीछे कॉरपोरेट मीडिया का पूरा नैतिक समर्थन है।

उल्लेखनीय है भारत को महमूद गजनवी ने जितना लूटा था उससे सैंकड़ों गुना ज्यादा की लूट नेताओं की मिलीभगत से हुई है। नव्य उदार नीतियों का इस लूट से गहरा सम्बंध है। चीन और रूस में इसका असर हुआ है चीन में अरबपतियों में ज्यादातर वे हैं जो पार्टी मेम्बर हैं या हमदर्द हैं, इनके रिश्तेदार सत्ता में सर्वोच्च पदों पर बैठे हैं। यही हाल सोवियत संघ का हुआ।

भारत में नव्य उदारतावादी नीतियां लागू किए जाने के बाद नेताओं की सकल संपत्ति में तेजी से वृद्धि हुई है। सोवियत संघ में सीधे पार्टी नेताओं ने सरकारी संपत्ति की लूट की और रातों-रात अरबपति बन गए। सरकारी संसाधनों को अपने नाम करा लिया। यही फिनोमिना चीन में भी देखा गया। उत्तर आधुनिकतावाद पर जो फिदा हैं वे नहीं जानते कि वे व्यवस्थागत भ्रष्टाचार और नेताओं के द्वारा मचायी जा रही लूट में वे मददगार बन रहे हैं। मसलन गोर्बाचोव के नाम से जो संस्थान चलता है उसे अरबों-खरबों के फंड देकर गोर्बाचोव को रातों-रात अरबपति बना दिया गया ये जनाब पैरेस्त्रोइका के कर्णधार थे। रीगन से लेकर क्लिंटन तक और गोर्बाचोब से लेकर चीनी राष्ट्रपति के दामाद तक पैदा हुई अरबपतियों की पीढ़ी की तुलना जरा हमारे देश के सांसदों-विधायकों की संपदा से करें। भारत में सांसदों – विधायकों के पास नव्य आर्थिक उदारतावाद के जमाने में जितनी तेजगति से व्यक्तिगत संपत्ति जमा हुई है वैसी पहले कभी जमा नहीं हुई थी। अरबपतियों-करोड़पतियों का बिहार की विधानसभा से लेकर लोकसभा तक जमघट लगा हुआ है। केन्द्रीयमंत्रियों से लेकर मुख्यमंत्रियों तक सबकी दौलत दिन- दूनी रात चौगुनी बढ़ी है। नेताओं के पास यह दौलत किसी कारोबार के जरिए कमाकर जमा नहीं हुई है बल्कि यह अनुत्पादक संपदा है जो विभिन्न किस्म के व्यवस्थागत भ्रष्टाचार के जरिए जमा हुई है। कॉमनवेल्थ भ्रष्टाचार, 2जी स्पैक्ट्रम घोटाला आदि तो उसकी सिर्फ झांकियां हैं। अमेरिका मे भयानक आर्थिक मंदी के बाबजूद नेताओं की परिसंपत्तियों में कोई गिरावट नहीं आयी है। कॉरपोरेट मुनाफों में गिरावट नहीं आयी है। भारत में भी यही हाल है।

इसी संदर्भ में फ्रेडरिक जेम्सन ने मौजूदा दौर में मार्क्सवाद की चौथी थीसिस में लिखा है इस संरचनात्मक भ्रष्टाचार का नैतिक मूल्यों के संदर्भ में कार्य-कारण संबंध के रूप में व्याख्या करना भ्रामक होगा क्योंकि यह समाज के शीर्ष वर्गों में अनुत्पादक ढंग से धन संग्रह की बिलकुल भौतिक सामाजिक प्रक्रिया में उत्पन्न होता है। 

भ्रष्टाचार में जाति ? जाति के आधार पर जनगणना भी हो जाये!!!

भ्रष्टाचार में जाति ? जाति के आधार पर जनगणना भी हो जाये!!!



सोनी सोरी पर उत्पीड़न करने वाले अधिकारी वीरता के लिए राष्ट्रपति पदक पाते हैं तो निश्चित ही इस देश का हर आदिवासी भ्रष्ट होगा।

पलाश विश्वास

 

कॉरपोरेट आयोजित वैश्विक अर्थव्यवस्था का आयोजन जयपुर साहित्य उत्सव आखिर अपने एजंडे पर खुलेआम अमल करने लगा है कि इस वर्चस्ववादी मंच को आरक्षण विरोधी आंदोलन के सिविल सोसाइटी के भष्टाचार विरोधी मुखड़े के साथ नत्थी कर दिया। बंगाली वर्चस्ववाद जो अब राष्ट्रीय धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद के राष्ट्रीय सर्वोच्च धर्माधिकारी प्रणव मुखर्जी की अगुवाई में सर्वव्यापी है, आशीष नंदी ने महज उसका प्रतिनिधित्व किया है। प्रसिद्ध समाजशास्त्री आशीष नंदी ने कहा है कि एससी, एसटी और ओबीसी समाज के सबसे भ्रष्ट तबके हैं। इन तबको से सबसे ज्यादा भ्रष्ट लोग आते हैं।

बाकी देश भारत विभाजन के कारण गांधी, जिन्ना और नेहरु को गरियाता रहता है क्योंकि उसे बंगाली वर्चस्ववाद की भारत विभाजन में निर्णायक भूमिका के बारे में पता ही नहीं है। बंगाली सवर्ण वर्चस्ववाद ने अस्पृश्यताविरोधी क्रांति के जनक बंगाल के अनुसूचितों को बंगाल के बाहर खदेड़ने के लिए ही भारत का विभाजन हो या नहीं, बंगाल का विभाजन होकर रहेगा, नीति अपनाकर बंगाल में सत्ता पर कब्जा कर लिया। अब बंगाल में जीवन के हर क्षेत्र में न केवल ब्राह्मण वर्चस्व है, बल्कि ब्राह्मणमोर्चा के वाम शासन के 35 साल के राजकाज के बाद फिर ममता बनर्जी के नेतृत्व में ब्राह्मणतंत्र सत्ता में काबिज है। बंगाल में बाकी देश की तुलना में अनुसूचित जातियों और जनजातियों की संख्या कम है। 17 प्रतिशत और सात प्रतिशत। तीन फीसद ब्राह्मणों, २७ फीसद मुसलमानों और पांच प्रतिशत बैद्य कायस्थ के अलावा बाकी ओबीसी हैं, जिनकी न गिनती हुई है और न जिन्हें हाल में घोषित आरक्षण के तहत नौकरियां मिलती हैं और न सत्ता वर्ग के साथ नत्थी हो जाने के बावजूद सत्ता में भागेदारी। गौरतलब है कि 27 फीसद मुसलमान आबादी में भी नब्वे फीसद मुसलमान हैं। वाम शासन में उनके साथ क्या सलूक हुआ, यह तो सच्चर कमिटी की रपट से उजागर हो गया, पर परिवर्तन राज में उनको मौखिक विकास का मोहताज बना दिया गया है। मजे कि बात यह है कि इन्हीं ओबीसी मुसलमानों के दम पर बंगाल में 35 साल तक वामराज रहा और दीदी का परिवर्तन राज भी उन्हीं के कन्धे पर! भारत विभाजन के शिकार दूसरे राज्यों असम, पंजाब और कश्मीर में जनसंख्या में अब भी भारी तादाद में अनुसूचित हैं। ममता बनर्जी जिन एक करोड़ बेरोजरार युवाओं की बात करती हैं, उनमें से अस्सी फीसद इन्हीं ओबीसी और अनुसूचितों में हैं जिनमें से ज्यादातर ने समय-समय पर नौकरियों के लिए आयोजित होने वाली परीक्षाएं पास कर ली हैं, किंतु इंटरव्यू में बैठे ब्राह्मण चयनकर्ताओं ने उन्हें अयोग्य घोषित करके आरक्षित पदों को सामान्य वर्ग में तब्दील करके उन्हें नौकरियों से वंचित कर रखा है। बंगाल में आरक्षित पदों पर नियुक्तियां कभी बीस फीसद का आंकड़ा पार नहीं कर पायीं। इसलिए बंगाल में आरक्षण विरोधी आंदोलन का कोई इतिहास नहीं है। यहां जनसंख्या का वैज्ञानिक समावेश हुआ है।

पलाश विश्वास। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं। आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के पॉपुलर ब्लॉगर हैं। "अमेरिका से सावधान "उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए अब जनसत्ता कोलकाता में ठिकाना।

बहुजन समाज के प्रति अर्थशास्त्रियों के सुतीव्र घृणा अभियान तो कॉरपोरेट नीति निर्धारण से जगजाहिर हैसमाजशास्त्रियों के घृणा अभियान पर अभी तक कोई खास चर्चा नहीं हो सकी है। कम से कम इस मायने में यह बहस शुरू करने में आशीष नंदी का शुक्रगुजार होना चाहिए हमें। नन्दी ने अनुसूचित जनजातियों को लपेटकर अच्छा ही किया। संविधान के पांचवीं और छठीं अनुसूचियों के खुला उल्लंघन के साथ जल जंगल बहुल समूचे पूर्वोत्तर और कश्मीर में सशस्त्रबल विशेषाधिकार कानून और मध्य भारत में सलवा जुड़ुम व दूसरे रंग-बिरंगे अभियानों के बहाने आदिवासियों का दमन जारी है। सोनी सोरी पर उत्पीड़न करने वाले अधिकारी वीरता के लिए राष्ट्रपति पदक पाते हैं तो निश्चित ही इस देश का हर आदिवासी भ्रष्ट होगा। इसी सिलसिले में आसन्न बजट सत्र की चर्चा करना भी जरूरी है, जिसमें शीतकालीन सत्र में पास न हुए पदोन्नति में आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट के निषेध को खत्म करने के लिए प्रस्तावित विधायक को पिर पेश किये जाने की संभावना है। इसलिए आरक्षण विरोधी आंदोलन के नजरिये से आशीष नंदी ने बेहतरीन काम कर दिया है। अब कॉरपोरेट मीडिया और सोशल मीडिया दोनों का फोकस आरक्षणविरोध पर ही होगा, जाहिर है। संसदीय सत्र शुरु होते न होते शुरु होने वाले सिविल सोसाइटी के आंदोलन के लिए तो यह सुर्खाव के पर हैं! इसी सिलसिले में पुण्य प्रसून वाजपेयी की रपट और उदितराज का लेख पढ़ लिया जाये तो नंदी के बयान के घनघोर रणकौशल को समझने में मदद मिलेगी। हालांकि बायोमेट्रिक डिजिटल नागरिकता के जरिये बहुजन समाज के नागरिक और मानवाधिकार हनन से अविचलित लोगों के लिए इसे समझने की जरुरत भी खास नहीं है।

उत्तरी बंगाल में आज भी असुरों के उत्तराधिकारी हैं। जो दुर्गोत्सवके दौरान अशौच पालन करते हैं। उनकी मौजूदगी साबित करती है कि महिषमर्दिनी दुर्गा का मिथक बहुत पुरातन नहीं है। राम कथा में दुर्गा के अकाल बोधन की चर्चा जरूर है, पर वहां वे महिषासुर का वध करती नजर नहीं आतीं। जिस तरह सम्राट बृहद्रथ की हत्या के बाद पुष्यमित्र के राज काल में तमाम महाकाव्य और स्मृतियों की रचनी हुई प्रतिक्रांति की जमीन तैयार करने के लिए। और जिस तरह इसे हजारों साल पुराने इतिहास की मान्यता दी गयी, कोई शक नहीं कि अनार्य प्रभाव वाले आर्यावर्त की सीमाओं से बाहर के तमाम शासकों के हिंदूकरण की प्रक्रिया को ही महिषासुरमर्दिनी का मिथक छीन उसी तरह बनाया गया, जैसे शक्तिपीठों के जरिये सभी लोकदेवियों को सती के अंश और सभी लोक देवताओं को भैरव बना दिया गया। वैसे भी बंगाल का नामकरण बंगासुर के नाम पर हुआ। बंगाल में दुर्गापूजा का प्रचलन सेन वंश के दौरान भी नहीं था। भारत माता के प्रतीक की तरह अनार्य भारत के आर्यकरण का यह मिथक निःसंदेह तेरहवीं सदी के बाद ही रचा गया होगा। जिसे बंगाल के सत्तावर्ग के लोगों ने बंगाली ब्राहमण राष्ट्रीयता का प्रतीक बना दिया। विडंबना है कि बंगाल की गैरब्राह्मण अनार्य मूल के या फिर बौद्ध मूल के बहुसंख्यक लोगों ने अपने पूर्वजों के नरसंहार को अपना धर्म मान लिया। बुद्धमत में कोई ईश्वर नहीं है, बाकी धर्ममतों की तरह। बौद्ध विरासत वाले बंगाल में ईश्वर और अवतारों की पांत अंग्रेजी हुकूमत के दौरान बनी, जो विभाजन के बाद जनसंख्या स्थानांतरण के बहाने अछूतों के बंगाल से निर्वासन के जरिये हुए ब्राह्मण वर्चस्व को सुनिश्चित करने वाले जनसंख्या समायोजन के जरिये सत्ता वर्ग के द्वारा लगातार मजबूत की जाती रही। माननीय दीदी इस मामले में वामपंथियों के चरण चिन्ह पर ही चल रही हैं।

इस बीच नंदी के बचाव में सोशल मीडिया में सवर्ण हरकतें शुरु हो गयीं। भूतपूर्व माकपाई कोलकाता के प्राध्यापक जगदीश्वर चतुर्वेदी ने दलील दी है कि जब जनगणना में जाति के आधार पर गणना होती है, तो भ्रष्टाचार में गणना जाति के आधार पर क्यों नहीं होनी चाहिए। मीडिया विशेषज्ञ चारों वेदों के अध्येता यह बता रहे हैं कि जाति के आधार पर जनगणना हो रही है। जबकि हकीकत यह है कि संसद में सर्वदलीय सहमति के बावजूद जाति के आधार पर जनगणना अभी शुरू नहीं हुई है। चतुर्वेदी जी के वक्तव्य के आधार पर जाति के आधार पर पहले गिनती हो जाये तो फिर भ्रष्टाचार की गिनती भी हो जाये। पूना पैक्ट के मुताबिक अंबेडकर की विचारधारा, समता और सामाजिक न्याय के प्रतीक महात्मा गौतम बुद्ध और तमाम महापुरुषों, संतों के नाम सत्ता की भागेदारी में मलाई लूटने वाले चेहरे सचमुच बेनकाब होने चाहिए। इसी मलाईदार तबके के कारण ही भारत में अभी बहुजन समाज का निर्माण स्थगित है। उसके बाद देखा जाये कि उनके अलावा क्या भ्रष्टाचार की काली कोठरी की कमाई खाने वालों में ब्राह्मणों और दूसरी ऊंची जातियों की अनुपस्थिति कितनी प्रबल है। चतुर्वेदी जी के बयान पर अभी बवाल शुरु नहीं हुआ है।

यह संयोग भर नहीं है कि बंगाल में सत्ता प्रतिष्टान से वर्षों जुड़े रहे जगदीश्वर चतुर्वेदी और बंगाली सत्तावर्ग के प्रतिनिधि आशीष नंदी एक ही सुर ताल में बहुजन समाज के खिलाफ बोल रहे हैं, जबकि बंगाल में बहुजन समाज का कोई वजूद ही नहीं है, जो था उसे मटियामेट कर दिया गया है। यह आकस्मिक भी नहीं है। ठीक से कहना मुश्किल है कि जैसे चतुर्वेदी ब्राह्मण हैं तो आशीष नंदी जाति से क्या हैं। वैसे बंगाल में नंदी या तो कायस्थ होते हैं या फिर बैद्य। भारत में अन्यत्र कहीं ये जातियां सत्ता में नहीं हैं। एकमात्र बंगाल में वर्णव्यवस्था बौद्धमय बंगाल के अवसान के बाद ही सेन वंश के शासन काल में ग्यारहवीं सदी के बाद लागू होने की वजह से राजपूतों की अनुपस्थिति की वजह से कुछ और खास तौर पर अंग्रेजी हुकूमत के दरम्यान स्थाई बंदोबस्त के तहत मिली जमींदारियों के कारण कायस्थ और बैद्य तीन फीसद से कम ब्राह्मणों के साथ सत्तावर्ग में है। बाकी देश के उलट बंगाल में ओबीसी अपनी पहचान नहीं बताता और सत्तावर्ग के साथ नत्थी होकर अपने को सवर्ण बताता है, जबकि ओबीसी में माहिष्य और सद्गोप जैसी बड़ी किसान जातियां हैं, नाममात्र के बनिया संप्रदाय के अलावा बंगाल की बाकी ओबीसी जातियां किसान ही हैं। बंगाली ब्राह्मण नेताजी और विवेकानंद जैसे शीर्षस्थ कायस्थों को शूद्र बताते रहे हैं। जबकि बाकी देश में भी कायस्थ. खासकर उत्तरप्रदेश के कायस्थ मुगल काल से सत्ता में जुड़े होने कारण अपने को सवर्ण ही मानते हैं। इसके उलट असम में कायस्थ को बाकायदा ओबीसी श्रेणी में आरक्षण मिला हुआ है। भारत में छह हजार जातियां हैं। तमाम भारत में किसान बहुजन बहुसंख्य आम जनता को ओबीसी, अनुसूचित जातियों और जनजातियों में विभाजित कर रखा गया है। यहां तक कि कुछ किसान जातियों मसलन भूमिहार और त्यागी तो बाकायदा ब्राहमण हैं। अगर पेशा और श्रम विभाजन ही वर्ण व्यवस्था और जातियों के निर्माण का आधार है तो सभी किसान जातियों को एक ही जाति चाहे ब्राह्मण हो या ओबीसी या अनुसूचित, होना चाहिए था। बैद्य बंगाल में ब्राह्मणों से भी मजबूत जाति है। ब्राह्मणों में भी पिछड़ेअशिक्षित और गरीब मिल जाएंगे। पर बैद्य शत प्रतिशत शिक्षित है और शत प्रतिशत फारवर्ड। देश के अर्थशास्त्र पर डॉ. अमर्त्य सेन की अगुवाई में इसी जाति का कब्जा है। बंगाल के सत्ता प्रतिष्ठान में अनुपात के हिसाब से बैद्य को सबसे ज्यादा प्रतिनिधित्व मिला हुआ है। ब्राह्मणों के बाद।

बताया जाता है कि पत्रकार से फिल्मकार बने प्रीतीश नंदी के भाई हैं आशीष नंदी। होंगे या नहीं भी होंगे। इससे फर्क नहीं पड़ता।असल बात यह है कि आशीष नंदी ने जो कुछ कहा हैवह ब्राह्मणेतर सवर्णों और तथाकथित सवर्णों की संस्कारबद्ध श्रेष्ठत्व की वर्चस्ववादी मानसिकता की ही अभिव्यक्ति है। मालूम हो कि अनुसूचितों और पिछड़ों पर अत्याचार इन्हीं जातियों के खाते में हैं। ब्राह्मण तो बस मस्तिष्क नियंत्रण करते हैं। 

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नवरुणा अपहरण कांड को दबाना क्यों चाहती है बिहार सरकार

नवरुणा अपहरण कांड को दबाना क्यों चाहती है बिहार सरकार


लोगों को डीएनए टेस्ट के नाम पर बरगलाने में लगी है पुलिस

अभिषेक रंजन

18 सितम्बर, 2012 को मुजफ्फरपुर शहर से नवरुणा का अपहरण हुए 135 दिन हो गए, लेकिन अब तक उसका पता नही चल पाया है। 7वीं कक्षा में पढ़ने वाली बंगाली मूल की 12 वर्षीय नवरुणा की सुरक्षित घर वापसी हेतु राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री से लेकर मानवाधिकार आयोग, राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग सहित सुप्रीम कोर्ट तक में गुहार लगाई जा चुकी है। तमाम पुलिसिया आश्वासनों के बावजूद नतीजा शून्य है। दुर्भाग्य तो यह है कि सुशासन की पुलिस एक सुराग तक ढूंढ नहीं पाई है। इसी बीच तक़रीबन 67 दिन बीतने के बाद 26 नवंबर, 2012 को अचानक इस अपहरण कांड में एक नया मोड़ आ जाता है और नाटकीय अंदाज में नवरुणा के घर के समीप एक कंकाल बरामद हो जाता है। पहले प्रेम प्रसंग, फिर दबाब बढ़ने पर अपहरण की बात करने वाली पुलिस एकाएक नवरुणा के घर के समीप मिले कंकाल को नवरुणा का होने की बात को लेकर इतना ज्यादा सक्रिय हो जाती है कि अनुसन्धान का मतलब सिर्फ मेडिकल टेस्ट हो जाता है। प्रतिदिन बेटी की बरामदगी के वादे करने वाले पुलिस अधिकारी इस कंकाल के मिलने के बाद चुप्पी साध लेते हैं। आज स्थिति यह है कि हर तरफ नवरुणा केस का जिक्र आते ही "डीएनए टेस्ट परिजन क्यों नहीं दे रहे हैं" के सवाल गूंज रहे है। मर्यादित रूप से सवाल उठाना, लोकतांत्रिक विचारों की अभिव्यक्ति का ही एक रूप है जो न्यायसंगत भी है और जरूरी भी। लेकिन सवाल उठाने के नाम पर पूरे प्रकरण को एक गलत दिशा देना सर्वथा अनुचित है। शायद नवरुणा का अपहरण करने वाले व अपहरण के षड्यंत्रकर्ता भी यही चाहते हैं कि अपहरण की बात भूलकर लोग इधर उधर की बातों में उलझे रहें।

इससे पहले कि और कुछ कहा जाए पूरे मसले को समझना बहुत जरुरी है। हुआ यूँ कि जवाहरलाल रोड स्थित नवरुणा के घर के पास की नाली की सफाई के दौरान 26 नवंबर को एक कंकाल दो थैलियों में बरामद हुआ। बहुत कम चौड़ी नाली में मिले इस कंकाल ने अचानक पूरे अनुसन्धान की दिशा मोड़ दी। कंकाल के प्रत्यक्षदर्शियों ने इसे किसी वयस्क का माना। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, एसएसपी ने भी इस बात को स्वीकार किया था कि कंकाल किसी बड़े व्यक्ति का है। इसी नाली से दो दिनों बाद एक कटी हुई हाथ के टुकड़े, खून के धब्बे मिले। अज्ञात के विरुद्ध दफा 302 के तहत मुकदमा ( न. 640/12, दिनांक-26.11.2012) दर्ज हुआ। नवरुणा के पिता को एसएसपी ने कंकाल की जब तस्वीरें दिखाई तब उन्होंने इसे अपनी बेटी का होने से पूरी तरह इंकार किया और इसे साजिश के तहत की गई करतूत बतलाया। कंकाल मिलने के समय कुछ लोगों ने यह भी कहा कि यह शहर में मधुबनी कांड की तरह आग लगाने के लिए रचे गए षडयंत्र का हिस्सा था लेकिन मुजफ्फरपुर के लोगो ने धैर्य का परिचय दिया और शहर में शांति बनी रही।

कंकाल के मिलने के बाद अचानक नवरुणा को ढूंढ निकालने के वादे करने वाले पुलिस अधिकारियों का रुख ही बदल गया। सब कंकाल के पीछे पड़ गए। हद तो तब हो गयी जब कंकाल मिलते ही अप्रत्यक्ष तरीके से यह मान लिया गया कि यह नवरुणा का ही है। यहाँ तक कि भारत का यह पहला मामला होगा जहाँ कंकाल घर के समीप बरामद होते ही पुलिस डीएनए टेस्ट के लिए सैम्पल लेने के लिए दबाब बनाना शुरू कर दी। सवाल उठता है कि कंकाल के सम्बन्ध में कुछ जानकारी, जैसे उम्र, लिंग, हत्या की अनुमानित तिथि आदि की जानकारी बगैर कैसे पुलिस टेस्ट के लिए कह सकती थी जबकि अभी तक फोरेंसिक जाँच की रिपोर्ट भी नहीं आई थी। इस बात की पुष्टि एसएसपी द्वारा प्रभात खबर को 30 नवंबर को दिए इस इंटरव्यू से भी होती है, जिसमें टेस्ट लेने के लिए कोर्ट का आदेश लेने की बात एसएसपी राजेश कुमार ने कही थी।

इसके अलावा यह भी सुनने में आया है कि कंकाल के साथ बरामद खोपड़ी देखने से लगभग एक वर्ष पुराना लगता था। अगर उसमें से मिट्टी निकाली जाती तो तक़रीबन आधा किलो मिट्टी के अंश पाए जाते।

कंकाल मामले में एक नया मोड़ तब आया जब प्रभात खबर में छपी रिपोर्ट ने इस बात पर मुहर लगाने का काम किया कि कंकाल नवरुणा का नहीं है बल्कि 30-40 साल के किसी व्यस्क का है। सूत्रों के हवाले से 2 दिसंबर, 2012 को छपी अख़बार के पहले पृष्ठ की इस पहली खबर में यह दावा किया गया था कि कंकाल 30 से 40 साल के किसी व्यक्ति का है। यह खबर दो बार छपी।

अभिषेक रंजन, लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में विधि छात्र और सामाजिक कार्यकर्ता हैं।स्वयं के विषय में उनका कहना है- "एकला चलों के नारों के साथ अपने जीवन को भगत सिंह के इन शब्दों के सहारे जीता हूँ. 'जिन्दगी तो अपने ही सहारे जी जाती है, लोग तो जनाज़े उठाने के काम आते हैं', जीवन ने बहुत कुछ दिया है, इसलिए हमेशा खुश दिखने की कोशिश करता हूँ। ख़ुशी और गम अपने दो साथी हैं जो हमेशा किसी न किसी बहाने अपनी उपस्थति दर्ज करवाते रहते हैं। ज़माने से कोई शिकायत भी नहीं हैए लेकिन अफ़सोस है कि मैंने अपने आप को कभी ज़माने के अनुसार नहीं ढाला, मस्ती जैसे चीज़ अपने शब्दकोश में नहीं हैं लेकिन दूसरों की ख़ुशी में अपना योगदान देने की पुरजोर कोशिश रहती है, व्यक्तिगत जीवन के संघर्षो ने इतना झकझोर रखा है कि जीवन को हमेशा संघर्ष के सायें में ही जीता हूँ। लिखने पढ़ने के शौक ने हमेशा तरोताजगी बनाई रखी है और निजी जिंदगी बाढ़ग्रस्त जगह की तरह अपनी खुशगवार यादों के साथ हमेशा मेरे साथ रहती है। समाज सेवा, दिखावे के लिए नहीं आत्मसंतुष्टि के लिए करता हूँ ,[ भोजन और भाषण] अपना प्रिय चीज़ है, तो ये दोनों भी अपने रूचि के विषय है, छात्र राजनीति में सक्रिय रहा हूँ, तो उच्च शिक्षा मे हो रहे तमाम चीजों पर नज़र रखता हूँ, जीवन ने इतने तरह तरह के खेल दिखाए कि खेल से रूचि ही समाप्त हो गई है, फिर भी कबड्डी और क्रिकेट अच्छे लगते है 'ईश्वर' मे आस्था है परन्तु फालतू के आडम्बर का घोर विरोधी हूँ"

ऐसे में यह सवाल उठाना क्या गलत होगा कि जो तथाकथित फोरेंसिक जाँच की रिपोर्ट गोपनीय तरीके से ही सही सार्वजनिक हुई है, वह गलत है, झूठी है ? अगर प्रभात खबर में छपी खबर झूठी थी तो दो सवाल उठते हैं; पहला, क्या ऐसे संवेदनशील मामलों में कोई अख़बार अपनी लीडिंग स्टोरी बिना किसी तथ्य के छाप सकता है ?दूसरापुलिस ने इसका खंडन क्यों नहीं किया

इस प्रकार देखा जाए तो लगता है कि सुनुयोजित तरीके से इस अपहरण कांड की पूरी स्क्रिप्ट पहले ही रची जा चुकी थी जिसका एकमात्र मकसद महज ज़मीन के लिए इंसानियत को गिरवी रखना था।

पूरे प्रकरण को लेकर मन में कुछ सवाल बार बार उठता है कि –

(1) नवरुणा के घर के समीप मिले कंकाल और फोरेंसिक जाँच को भेजी गयी कंकाल क्या एक थे या अलग अलग ? क्योंकि कंकाल के प्रत्यक्षदर्शी कंकाल के किसी बड़े व्यक्ति का होने की बात कह रहे थे, जिसकी पुष्टि स्थानीय अखबारों ने भी की है।

(2) निदान, जिसके जिम्मे शहर की सफाई है, के कर्मचारी इतने सुबह किसके कहने पर उसके घर के पास सफाई करने पहुंचे थे ? सफाई करना वहीं से क्यों प्रारंभ किया जहाँ से कंकाल मिला ?

(3) नाली से बरामद खून के धब्बे, कटी हुई हाथ आखिर किसका था?

(4) कंकाल मिलने के साथ ही पुलिस तत्काल जाँच के लिए परिजन पर क्यों दबाब बनाना शुरू कर दिया जबकि फोरेंसिक रिपोर्ट आई भी नहीं थी?

(5) अभी तक कंकाल घर के समीप डालने वालों तक पुलिस क्यों नहीं पहुँच पाई है ?

(6) जब से कंकाल मिला है तबसे नवरुणा के सुरक्षित घर लौटने के आश्वासन देने की बजाए इस प्रकार का माहौल क्यों बनाया जा रहा है कि कंकाल नवरुणा का ही है ?

(7) अभी तक नवरुणा के घर लौट आने के दावें करने वाला प्रशासन अचानक कंकाल तक ही अपनी जाँच को क्यों सीमित कर दिया है ?

(8) फोरेंसिक जाँच रिपोर्ट आने में एक महीने का समय क्यों लगा, जबकि यह महज चंद घंटों या दिनों में हो सकता था ?

(9) फोरेंसिक जाँच रिपोर्ट परिजनों या मीडिया को क्यों नहीं दिखायी गयी ? (10) जब CID को जाँच का जिम्मा सौंपा गया तो वह लड़की को खोजने की बजाए टेस्ट की बात क्यों कर रही है ?

(11) जब नवरुणा के परिजन स्थानीय अदालत के आदेश को ऊपरी अदालत में चुनौती देने की बात लगातार कर रहे हैं, फिर पुलिस लगातार दबाब क्यों बना रही है ? अगर उसे फोरेंसिक रिपोर्ट पर भरोसा है तो वह ऊपरी अदालत से समान आदेश के लिए निश्चिंत रहें।

इसके अलावा भी कुछ सवाल है जिनका उत्तर नवरुणा के शुभचिंतक जानना चाहते है :-

(अ) 12 वर्षीया नवरुणा के अपहरण की शिकायत दर्ज करवाने के बाद मामले में तुरंत करवाई क्यों नहीं की गई? कार्रवाई में हुए देरी के लिए किसी को दंडित क्यों नहीं किया गया या उससे अभी तक पूछताछ क्यों नहीं की गयी देरी होने के सम्बन्ध में? हो सकता है जाँच में देरी किसी ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके करवाया हो! अगर यह पता चल जाए तो अपहरणकर्ताओ तक आसानी से पहुंचा जा सकता है।

(आ) क्या प्रेम प्रसंग का मामला बताकर पुलिस मामले को दबाना चाहती थी?

(इ) फोरेंसिक जाँच अपहरण के तुरंत बाद क्यों नहीं की गयी जबकि पूरा मामला शुरुआत से ही भूमि विवाद से बताया जा रहा था ?

(ई) दिल्ली में सेव नवरुणा कैम्पेन चला रहे छात्रों को धमकाने पुलिस क्यों आई थी और किसके कहने पर आई थी ?

(उ) मामले की जाँच कर रहे अधिकारी को बार बार क्यों बदला गया ?

(ऊ) बिहार सरकार का कोई प्रतिनिधि अभी तक पीड़ित परिवार से क्यों नहीं मिला ?

(ए) कुछ औपचारिकाताओ को छोड़ दें तो सभी राजनीतिक दल अभी तक क्यों चुप्पी साधे हुए हैं? क्या उनपर दबाब है ?

(ऐ) बार-बार परिजनों द्वारा सहयोग न करने की बात क्यों कही जा रही है जबकि जो जानकारी हमें मिली है, उसके मुताबिक वे लगातार पुलिस के संपर्क में है और हर छोटी-बड़ी जानकारी तुरंत पुलिस से शेयर करते हैं। आज भी सबसे ज्यादा यकीन उनका मीठी मीठी बातें करके अब तक झूठी दिलासा देने वाले एसएसपी पर ही है।

(ङ) मुजफ्फरपुर से लेकर दिल्ली तक के छात्रों को, जो लोकतान्त्रिक तरीके से नवरुणा के लिए आवाज उठा रहे थे, उनके मुँह बंद करने की कोशिश क्यों की गई पुलिस द्वारा?

(ऋ) परिजनों ने अपहरण के तुरंत बाद ही भूमि माफियाओं का इसमें हाथ होने की बात कही और इस अपहरण के मूल को शुरुआत से ही ज़मीन को माना, फिर पुलिस यह सवाल क्यों उठाती रहती है कि परिजनों ने ज़मीन विवाद की बात छिपाई।

जब से इस इस केस पर हमने काम करना शुरू किया तबसे लगातार यह सुनने में आता था कि नवरुणा को खोजने के लिए दर्जन भर अधिकारियों को लगाया गया है। पुलिस की टीम ने शहर व आस-पास के जिलों के अलावा दिल्ली, कोलकाता व हावड़ा जाकर जांच की है। नवरुणा व उसके परिवार के हर कनेक्शन को खंगाला गया। कुछ लोग शक के आधार पर पकड़े भी गए। जेल भेजे गए। रिमांड पर लेकर पूछताछ भी की गई। लेकिन अंत में हुआ अभी तक क्या?  जबाब है कुछ नहीं।

इन परिस्थितियों में, पुलिस और राज्य सरकार के नुमायन्दों को डीएनए टेस्ट न देने सम्बन्धी परिजनों का फैसला बिलकुल उचित है। पुलिस को टेस्ट देने के लिए दबाब बिल्कुल नहीं बनाना चाहिए। दबाब की स्थिति में परेशान करने की शिकायत कोर्ट में दर्ज करवाई जा सकती है। परिजन हमेशा टेस्ट देने की बात करते हैं लेकिन वे टेस्ट सिर्फ सीबीआई को ही देंगे, इस बात में दम है। लोगो को चाहिए कि नवरुणा के बहादुर परिजनों का साथ दें।

पूरी उम्मीद है कि आगामी 25 फ़रवरी को जब सुप्रीम कोर्ट में नवरुणा मामले की सुनवाई होगी तो कोर्ट नवरुणा को तुरंत कहीं से भी ढूंढकर लाने का आदेश देगा। नवरुणा के शुभचिंतक के नाते हम फिर से बिहार सरकार से विनम्र आग्रह करते है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से पहले वह बिना देरी किए तुरंत अपहरण के इस मामले को सीबीआई को सौंपे। विश्वास है, नवरुणा के साथ न्याय होगा। हम अंतिम दम तक नवरुणा के न्याय के लिए लड़ते रहेंगे। 

<a href="http://hastakshep.com/?p=29050">नवरुणा अपहरण कांड को दबाना क्यों चाहती है बिहार सरकार</a>

जहां वे सेतु बनते हैं

जहां वे सेतु बनते हैं

Friday, 01 February 2013 10:58

मिहिर पंड्या 
जनसत्ता 1 फरवरी, 2013: गणतंत्र दिवस की सुबह। जयपुर साहित्य उत्सव के उस सत्र का शीर्षक था 'विचारों का गणतंत्र'। आशीष नंदी ने पहले उदाहरण देकर विस्तार से समझाया कि क्यों एक सवर्ण अभिजात का भ्रष्टाचार हमारी बनाई 'भ्रष्टाचार' की मानक परिभाषाओं में फिट नहीं होता और क्यों सिर्फ दलित का भ्रष्टाचार नजर आता है। इसलिए जब उन्होंने यह कहा कि भ्रष्टाचारियों का बहुमत वंचित जातियों से आता है तो उन्होंने अपनी पुरानी बात को दोहराना जरूरी नहीं समझा कि यहां दोष उनका नहीं, 'भ्रष्टाचार' की उस भ्रामक परिभाषा का है, जिसमें अभिजात का भ्रष्टाचार फिट ही नहीं होता। इसे वे अंत में जवाब देने के लिए मिले दो मिनट के समय भी दोहराते रहे कि उनके उक्त कथन को दो मिनट पहले कही बात के संदर्भ में देखा जाए। 
जैसा नंदी ने बाद में भी कहा, और उनकी अध्ययन शैली से परिचित लोग यह जानते भी हैं, उन्होंने कभी यह नहीं कहा कि भ्रष्टाचार की कोई जाति होती है, बल्कि वे भ्रष्टाचार को पहचानने और निर्धारित करने की जो प्रचलित समाजदृष्टि है, उसके पीछे छिपी जातिवादी मानसिकता को पहचानने की ओर इशारा कर रहे थे। यह तर्क प्रणाली समझने में थोड़ी जटिल हो सकती है, लेकिन इसकी कोई वजह नजर नहीं आती कि ठहर कर, जरा-सा समय देने पर भी यह बात समझ न आए। 
फिर उनका कहना कि हमारे नितांत गैर-बराबर समाज में भ्रष्टाचार कई बार उसे कुछ मानवीय बनाने का काम करता है, एक विचारोत्तेजक अवधारणा है, जिससे आप असहमत हो सकते हैं, बहस कर सकते हैं। लेकिन यही नंदी की खूबी भी है, जिसे पहचाना जाना चाहिए। वे समाज में 'मान्य' और 'प्रचलित' तर्क-शृंखलाओं को उनके सिर के बल खड़ा कर देते हैं और कितनी ही बार इस प्रक्रिया में विचार के अपने समय और समाज को समझने के नए, अनछुए रास्ते हमारे सामने खुलते हैं। इसी सत्र में एक अत्यंत विचारोत्तेजक बात उन्होंने कही कि हमारे गणतंत्र में बराबरी का मैदान सिर्फ खेल, मनोरंजन, अपराध और राजनीति में बचा है। इसके समर्थन में उन्होंने कुछ और हंगामाखेज उदाहरण पेश किए। 
उन्होंने आशुतोष के भारतीय राजनीति में वंशवाद को सबसे बड़ा खतरा बताए जाने पर पलट कर याद दिलाया कि नेहरू वंशावली की बात करते हुए हमें यह ऐतिहासिक तथ्य कभी नहीं भूलना चाहिए कि इंदिरा गांधी, नेहरू के रहते मौजूद थीं, लेकिन तब भी उन्हें नेहरू का उत्तराधिकारी नहीं बनाया गया था। नेहरू के जाने और इंदिरा के आने में समय का बड़ा और साफ दिखाई देने वाला अंतर था। और वे तो उन्हें 'भोला' समझ कर सिंडिकेट वाले अपने इस्तेमाल के लिए बाद में सत्ता में ले आए थे। बाकी अन्य की तरह इंदिरा ने भी अपनी सत्ता लड़ कर जीती थी। वैसे ही जैसे मुलायम और लालू प्रसाद ने। 
आप उनसे बहस करना चाहें तो जरूर करें, जैसे पैट्रिक फ्रेंच ने उनकी बात को काटते हुए एक वाजिब तर्क रखा कि उनके 2004 और 2009 की लोकसभाओं के अध्ययन में यह बात उभर कर सामने आई है कि राजनीति में वंशवाद एक हालिया प्रक्रिया है, जो सबसे ज्यादा पैंतालीस साल से कम उम्र के सांसदों के समूह में दिखाई दे रहा है, और इसीलिए उसे सत्तर या नब्बे के दशक का उदाहरण देकर काटा नहीं जा सकता। लेकिन उसी अध्ययन को पढ़ने पर मैं यह भी जानता हूं कि भारत की संसद आज भी हिंदुस्तान का सबसे विविधता भरा व्यक्ति समूह है, जिसमें हर तरह का वर्ग, जाति, लिंग, इलाकाई, भाषाई वैविध्य मिलता है, जो अपने देश में अन्य कहीं देखना आज भी दुर्लभ है। लेकिन इस सत्र से बाहर निकल कर देखें तो आशीष नंदी के विचार सदा से कई असुविधाजनक सवाल हमारे अभिजन समूह के सामने रखते आए हैं और हुआ बस इतना है कि उस सत्र ने उन्हें अचानक रास्ते के बीचोंबीच लाकर खड़ा कर दिया है। 
क्या 'भागीदारी वाला लोकतंत्र', जिसमें सबका सत्ता में हिस्सा हो, अपने आप में कोई ऐसा लक्ष्य है, जिसे पाने के लिए लड़ा जाए? या फिर मेरे बहुत से दोस्तों की तरह आप भी इसे समतामूलक समाज की स्थापना में सहायक एक माध्यम भर, रास्ता भर मान सकते हैं। 
यह एक अनंतिम बहस है, जो हमें आशीष नंदी से ही नहीं, आपस में और खुद से भी निरंतर करनी चाहिए। बेशक यहां नंदी से सहमत होने वाले कम हैं, लेकिन जैसे ही हम उनके विचारों को बिना सुने खारिज करते हैं, हम अपने देश की नब्बे के बाद की राजनीति और समाज में हो रहे परिवर्तन को जानने-समझने का एक महत्त्वपूर्ण प्रिज्म खो देते हैं। 'तरक्की' और 'ह्रास' जैसी विषम जोड़ियों में बंटे मूल्य-निर्णय देती इतिहास-दृष्टियों से बाहर निकल कर अपने समय को समझने का प्रिज्म। 
'लोकतंत्र के सात अध्याय' पुस्तक के 'नई राजनीतिक संस्कृति' लेख में उन्होंने लिखा है: 'भारतीय जनता का आधुनिक हिस्सा समझता है कि अंतत: इस देश को उदारतावादी लोकतंत्र के पश्चिम यूरोपीय अनुभव की प्रतिकृति ही बन जाना है, तभी वह सत्रहवीं सदी के ज्ञानोदय से इक्कीसवीं सदी के शुरुआती दौर के प्रौद्योगिकीय पूंजीवाद तक का रास्ता तय कर सकेगा। लेकिन आधुनिकतावादियों के दायरे से बाहर के लोग देश का भविष्य इस तरह पूर्वनिर्धारित नहीं मानते। उनके लिए विज्ञान के बढ़ते कदम या विकास के दर्शनीय सोपान ज्यादा महत्त्वपूर्ण नहीं हैं, बल्कि वे अपने लोकतांत्रिक भविष्य की गारंटी को भागीदारी वाले लोकतंत्र से जोड़ते हैं। 
'भारत में विकास और आधुनिक विज्ञान-संबंधी विचारों के खिलाफ बढ़ता हुआ प्रतिरोध असल में इन विचारों और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के बीच अंतर्विरोधों की ही देन है। आजादी के विचार को वैज्ञानिक तर्कबुद्धि और सफल विकास में पूरी तरह अंतर्निहित मानने वालों को यह अंतर्विरोध विनाशकारी लगता है। लेकिन जो लोग इस घिसी-पिटी धारणा की भित्ति को अपने चारों ओर दरकते हुए देख रहे हैं, उनके लिए यह स्वागतयोग्य है, क्योंकि इससे ज्ञान-प्रणालियों और सामाजिक हस्तक्षेप के तरीकों का विविधीकरण और राजनीतिकरण हो रहा है।' तो वे यहां अपने समय को समझने के प्रचलित मुहावरों से आगे जाकर एक नई प्रस्तावना हमारे सामने रखते हैं। 

यह प्रस्तावना समय के साथ हमारे लोकतंत्र में आए बदलावों को पहले से निर्धारित 'सही' या 'गलत' के वायदों में देखने का निषेध करती है, लेकिन उससे भी महत्त्वपूर्ण यह कि यह अपने समय और समाज की सिर्फ आलोचना करने के बजाय उससे एक संवाद कायम करने का रास्ता खोलती है। लेकिन ठीक प्रकृति की तरह, विचार की दुनिया में भी दुर्लभ होने के अपने खतरे हैं। 
अगर आप नंदी के अतार्किक विरोध को कुछ समय के लिए अलग रख देंं तो नजर आता है कि आज उनकी विचार पद्धति के विरोध में एक ओर दलित अस्मिता से जुड़ा वैचारिक समुदाय खड़ा है और दूसरी ओर उनके विचार प्रगट करने के अधिकार का समर्थन करते हुए भी कई साथी विद्वान, जिन्हें हम मोटे तौर पर आधुनिक-प्रगतिशील-वाम खेमे से जुड़ा कह सकते हैं, भी उनकी विचारसरणि से असहमति जताते हैं। योगेंद्र यादव ने इंडियन एक्सप्रेस में अपने लेख में लिखा है कि नंदी की तर्कपद्धति उनका तरीका नहीं है और वे उस तर्कपद्धति को समझने में मुश्किल महसूस करते हैं। 
अपूर्वानंद ने भी 'जनसत्ता' में अपने लेख के अंतिम हिस्से में 'बहु-निंदित' और 'तिरस्कृत' आधुनिकता के महत्त्व का उल्लेख करते हुए लिखा है कि 'शायद समय आ गया है कि हम सब, नंदी समेत, सामुदायिक अस्मिताओं के प्रतिपक्ष को भी देखें और उनके बरक्स बौद्धिक रूप से कुछ दशकों से फैशन से बाहर चली गई (पाश्चात्य आधुनिकता की संतान) व्यक्ति की बुद्धि और विवेक को फिर से बहाल करने का प्रयत्न करें।' 
लेकिन यहां इन दो खेमों का एक साथ नंदी के विचार से असहमति जताना महज संयोग नहीं है। और यही उनके विचार को समझने का सबसे महत्त्वपूर्ण सूत्र है। नंदी उस 'आधुनिकता' के विचार की आलोचना अपने लेखन और विचारों में निरंतर प्रस्तुत करते रहे हैं, जिससे ये दोनों खेमे कहीं न कहीं उम्मीद और जुड़ाव महसूस करते हैं। 
जहां आज का दलित अस्मिता विमर्श के लिए तैयार नहीं है कि उसे आधुनिकता के दायरे से बाहर रख कर देखा जाए, वहीं प्रगतिशील-वाम शायद आज भी हमारी आधुनिकता की ध्वस्त परियोजना को ही वर्तमान 'ह्रास' का कारण देखता है और उपाय के रूप में आज भी उस आधुनिकता की किसी रूप में वापसी की उम्मीद करता है। 
निस्संदेह नंदी इन दोनों से अलग हैं। उन्होंने इन विपरीत लगते विचारों में आधुनिकता के प्रति जो समान ललक दिखाई देती है उसे इतिहास में बहुत पहले पहचान लिया था। उनके उल्लिखित लेख की एक पूर्ववर्ती पंक्ति है, 'जवाहरलाल नेहरू, वल्लभभाई पटेल, बाबा साहब आंबेडकर में कितने ही विचारधारात्मक मतभेद रहे हों, लेकिन वे तीनों एक ऐसे राज्य की स्थापना पर एकमत थे, जो सत्रहवीं शताब्दी के बाद यूरोप में पनपी राष्ट्र-राज्य की अवधारणा से थोड़ा ही अलग था। स्वाधीनता के बाद उभरे अभिजात वर्ग की राज्य संबंधी अवधारणा राजनीतिक रूप से 'विकसित' समाजों में प्रचलित अवधारणा से उधार ली गई थी।' यहां आंबेडकर और नेहरू का उल्लेख है। लेकिन जो नाम यहां नहीं है, और जो उस वक्त भी इस सर्वस्वीकार्य लगते राज्य की अवधारणा संबंधी विचार के विरोध में अकेला ही खड़ा था, उसे कभी भूलना नहीं चाहिए। 
तर्कवादी आधुनिक जवाहरलाल नेहरू और बाबासाहेब आंबेडकर के होते भी अपनी नितांत अतार्किक लगती धारणाओं और अविश्वसनीयता, अव्यावहारिकता या सनक की हद तक जाते लगते अद्वितीय विचारों और निदानों के साथ जैसे गांधी का होना अत्यंत जरूरी था, ठीक वैसे ही हमारे समय और समाज को समझने के लिए प्रगतिशील वाम और दलित अस्मिता के बीच आशीष नंदी का होना भी बेहद जरूरी है। क्या है जो नंदी को खुद अपने अकादमिक विचारक समाज में नायाब बनाता है? विचार की दुनिया में अपने विश्वास के अनुरूप उछाल लेने (लीप आॅफ फेद) का उनका अनोखा साहस। 
जैसे वीरेंद्र सहवाग खेल में जोखिम उठा कर अपनी टीम को असंभव लगती जीतों तक पहुंचाते रहे हैं, वैसे ही नंदी वह वैचारिक 'रिस्क' लेते हैं, जिसे धारण करने की हिम्मत और कुव्वत शायद और किसी में नहीं, लेकिन इसी वजह से उनके पाठक उस असंभव लगते समझ के बिंदु तक पहुंच पाते हैं, जहां से अपने समय और समाज को देखने का एक नितांत भिन्न, लेकिन बहुत साफ नजरिया मिलता है। वे अपनी दुर्लभ कल्पनाशीलता से विचार की नई जमीन तोड़ते हैं। वे अपने अध्ययनों में तथ्यों के साथ मान्यताओं, लोक विश्वासों, सामुदायिक प्रतीकों और लोकप्रिय अफवाहों तक को शामिल करते हैं और हम आधुनिक शिक्षा पाए शोधकर्ताओं को अपनी असहमति में खड़ा कर लेते हैं। लेकिन मानना होगा कि इसी वजह से वे कई बार समाज की उन बंद गिरहों को खोल पाते हैं जिन तक अकादमिक अध्ययन के सख्त अनुशासन में बंध कर पहुंच पाना शायद संभव नहीं होता। डीआर नागराज ने उनके बारे में कभी कहा था, 'नंदी के बारे में अंतिम रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता। वे अनुमान से पूरी तरह परे हैं।'
निश्चितताओं के काल में एक अनिश्चित विचार का होना जरूरी है। उनका होना, उनसे कहीं ज्यादा हमारे इस 'सर्वज्ञाता' समय के लिए, हमारे लिए जरूरी है।

विवाह घटा सकता है हृदयाघात का खतरा : अध्ययन

विवाह घटा सकता है हृदयाघात का खतरा : अध्ययन

Friday, 01 February 2013 15:05

लंदन। अविवाहित लोगों की तुलना में विवाहित लोगों को हृदयाघात का खतरा कम होता है और दिल का दौरा पड़ने पर उनके ठीक होने की संभावना भी अविवाहितों की तुलना में ज्यादा होती है।
फिनलैंड के एक नए अध्ययन में यह दावा किया गया है। इसमें यह बताया गया है कि अविवाहित महिला या अविवाहित पुरूष को किसी भी उम्र में हृदयाघात होने का खतरा अधिक होता है।
अनुसंधानकर्ताओं ने कहा कि प्रौढ़ विवाहित जोड़े में से अगर किसी को दिल का दौरा पड़े तो अस्पताल ले जाने से पहले और अस्पताल ले जाने के बाद उसकी हालत उतनी खराब नहीं होती जितनी अविवाहितों की होती है।

अध्ययन के नतीजे 'यूरोपियन जर्नल आॅफ प्रीवेन्टिव कार्डियोलॉजी' में प्रकाशित हुए हैं। यह अध्ययन 'एफआईएनएएमआई' मायोकार्डियल इन्फर्मेशन रजिस्टर के वर्ष 1993 से 2002 के बीच के आंकड़ों पर आधारित है।
यह अध्ययन फिनलैंड के चार अलग अलग भौगोलिक क्षेत्रों में रह रहे 35 साल से अधिक उम्र के लोगों के आंकड़ों पर आधारित है। (भाषा)


डीजल के दाम हर महीने 40-50 पैसे प्रति लीटर बढेंगे : मोइली

डीजल के दाम हर महीने 40-50 पैसे प्रति लीटर बढेंगे : 

मोइली

Friday, 01 February 2013 15:53

नयी दिल्ली। डीजल की बिक्री पर सरकारी तेल कंपनियों को हो रहे घाटे की भरपाई के लिए इसकी कीमतें हर माह 40 से 50 पैसे प्रति लीटर बढायी जाएंगी। देश में पेट्रोलियम र्इंधनों में सबसे ज्यादा खपत डीजल की ही होती है। 
पेट्रोलियम मंत्री एम वीरप्पता मोइली ने आज यहां पत्रकारों से कहा, ''आगे किसी अन्य आदेश तक तेल विपणन कंपनियां डीजल के दामों में हर माह 40-50 पैसे प्रति लीटर की बढ़ोतरी कर सकती हैं। ''
उल्लेखनीय है कि सरकार ने डीजल की कीमतों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने का निर्णय 17 जनवरी को ही ले लिया था। इस निर्णय के तहत सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों डीजल की कीमतों में तब तक प्रतिमाह थोड़ी थोड़ी वृद्धि करने की छूट दी गयी है जब तक कि उनका घाटा पूरा न हो जाए।  
फिलहाल डीजल पर उन्हें आयात मूल्य के हिसाब से 10.80 रुपए प्रति लीटर का घाटा हो रहा है।  
तेल कंपनियों ने 17 जनवरी को प्रति लीटर डीलर में 45 पैसे की बढ़ोतरी की थी। दिल्ली में इस समय डीजल का भाव 47.65 रुपये प्रति लीटर हो गयी थीं। इसके साथ ही थोक ग्राहकों के लिए मूल्य वृद्धि दस रुपए प्रति लीटर की वृद्धि हो गयी है।

मोइली ने बताया कि डीजल की कीमतों में प्रति माह मामूली बढ़ोतरी करने का निर्णय अगला आदेश जारी होने तक लागू रहेगा। हालांकि उन्होंने यह नहीं बताया कि तेल कंपनियां दोबारा कब डीजल की कीमतें बढ़ाएंगी।  
डीजल का दाम बढाने से इस कदम से सरकार द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी की करीब 12,907 करोड़ रुपये सालाना की बचत होगी।  पर कुछ थोक ग्राहकों ने पेट्रोल पंपों से खुदरा ग्रहाकों की तरह डीजल खरीदने का निर्णय लिया है।
मोइली ने कहा, कि उन्होंने सुना है कि गुजरात और तमिलनाडु जैसे राज्यों ने कहा है कि उनके राज्य सड़क परिवहन निगम अब डीजल थोक में खरीदने के बजाय अपनी बसों के लिए तेल स्थानीय पेट्रोलपंपों से खरीदेंगे। फिलहाल ये निगम अपने निजी उपयोग के लिए सीधे तेल कंपनियों से ईंधन खरीदते हैं। 
मोइली ने कहा, ''हमें इस मसले पर फिर से विचार करने की आवश्यकता है। हमने भी यह बात सुनी है। हम इस पर गौर कर रहे हैं। 
उन्होंने ने बसों को पेट्रोलपंप से डीजल भरवाने के निर्देश देने के बजाय राज्य सरकारों को डीजल पर वैट और सेल्स टैक्स कम करना चाहिए ताकि वह सस्ता हो सके। (भाषा)

ममता की धमकी के चलते मैंने रद्द की कोलकाता यात्रा : रुश्दी

riday, 01 February 2013 14:24

कोलकाता। विवादास्पद लेखक सलमान रुश्दी ने आज आरोप लगाया कि उन्हें अपनी कोलकाता यात्रा इन धमकियों के चलते रद्द करनी पड़ी कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के आदेश पर पुलिस उन्हें पहली ही उड़ान से वापस भेज देगी।


देश से उड़ान भरने से पहले 65 वर्षीय लेखक ने एक पृष्ठ का बयान जारी किया। उन्होंने यह भी ट्वीट किया कि कोलकाता पुलिस ने शहर की उनकी यात्रा को ''असंभव'' बना दिया था और आरोप लगाया कि इसने प्रेस तथा मुस्लिम नेताओं के समक्ष उनके यात्रा कार्यक्रम का खुलासा कर  ''स्पष्ट तौर पर प्रदर्शन भड़काने का काम किया ।'' 


रुश्दी ने बयान में कहा, ''...मेरी कोलकाता यात्रा से एक दिन पहले हमें सूचना मिली कि कोलकाता पुलिस मुझे शहर में नहीं घुसने देगी । मुझे बताया गया कि यदि मैं वहां जाऊंगा तो मुझे अगली ही उड़ान से वापस भेज दिया जाएगा । मुझे यह भी बताया गया कि यह मुख्यमंत्री के आदेश पर होगा ।''

रुश्दी को कोलकाता साहित्य महोत्सव में 30 जनवरी को अपने उपन्यास 'मिडनाइट्स चिल्ड्रन' पर बनी फिल्म के प्रचार के लिए अचानक से अतिथि के रूप में शामिल होना था, लेकिन बाद में आयोजकों ने उन्हें बुलाने से इनकार कर दिया ।

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