| Monday, 19 March 2012 10:05 |
अरविंद मोहन मंडल-मंदिर और इन सब पर भारी बाजारवाद ने सारी राजनीति में ऐसा घोर-मट्ठा कर दिया है कि मुद्दों की, सिद्धांतों की, संगठन और विचारों की बात करना मूर्खता का काम लगने लगा है। कौन किस दल में है, किसे कहां से महंगी राजनीति करने-चुनाव लड़ने का खर्च आ रहा है, किस नेता का खर्च कौन उठा रहा है, कितने अपराधी संसद और विधानमंडलों में हैं इसका कोई हिसाब नहीं है या चुनाव आयोग और एडीआर जैसे स्वयंसेवी संगठन हिसाब लगाते भी हैं तो सारी चिंताएं कागजी होकर रह जाती हैं। हर चुनाव में अपराधियों और करोड़पतियों का जीतना एक सूचना भर नहीं है। लेकिन एनजीओ संस्कृति में रचे-बसे लोग इस मुद्दे पर तथ्य सार्वजनिक जानकारी में लाने से अधिक कुछ नहीं कर पा रहे हैं। इससे उनकी सीमा जाहिर हो जाती है। जब से चुनाव आयोग ज्यादा प्रभावी होने का दावा कर रहा है तब से चीजों का और बिगड़ना बताता है कि आयोग की भी सीमा को दर्शाता है। राजनीति की असल बीमारी इस कवायद से दूर नहीं होगी। लेकिन दिखावटी राजनीति चल जा रही है। स्वदेशी वाली भाजपा इंडिया शाइनिंग का नारा लगाती है। दंगाइयों का बचाव करने वाले नरेंद्र मोदी विकास पुरुष बन जाते हैं। अगड़ों को खुलेआम जूते मारने की वकालत करने वाली नेता ब्राह्मण-बनिया सम्मेलन से सर्वसमाज की नेता बन जाती हैं। विकास की बात करने वाली कांग्रेस पार्टी ही सबसे तेज स्लर में पहचान की राजनीति का राग अलापने लगती है। जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र की राजनीति न करने वालों का जमा-जमाया खेमा उखड़ जाता है। पर सारा कुछ नकारात्मक ही नहीं हुआ है। आज क्षेत्रवाद का मतलब अलगाववाद नहीं रह गया है तो क्षेत्रीय नेता के केंद्रीय मंत्री बनने का मतलब अयोग्यता को बढ़ाने की मजबूरी नहीं है। मनमोहन सिंह भले गठबंधन की मजबूरी का रोना रोएं, पर सही कार्यसूची और खुली चर्चा में सहयोगियों से बात करके शासन चलाने का काम भी होने लगा है। करुणानिधि और प्रकाश सिंह बादल को केंद्र में आना चाहे न सुहाए, पर रामदॉस, रामविलास पासवान जैसे क्षेत्रीय नेताओं को दिल्ली की सत्ता में हिस्सेदारी करना अच्छा लगता है। अभी तक कथित राष्ट्रीय पार्टियों के सहारे ही गठबंधन बनते थे, अब नीतीश कुमार या मुलायम सिंह की अगुआई में नया गठबंधन बनने की अटकलें शुरू हो गई हैं। यह जरूर है कि अब भी हमारी शासन व्यवस्था केंद्र की तरफ झुकी हुई है और बहुत सारे मामलों में केंद्र अपनी मनमर्जी चलाता रहा है। उन विषयों में भी जो समवर्ती सूची में आते हैं या जिनमें राज्यों की भूमिका कहीं अधिक मानी जाती है। इसलिए केंद्र को यह भय सताता है कि क्षेत्रीय नेता आए और राज्यों का जोर बढ़ा तो जाने क्या हो जाएगा। यह पिंजड़े में रहने वाले पंछी जैसा मामला है। दूसरी ओर, क्षेत्रीय नेताओं के साथ दिक्कत यह है कि बड़ी राजनीति की तैयारी उनकी नहीं है, उन्हें सिर्फ एक-दो मुद््दों या अपने फौरी सियासी गुणा-भाग से मतलब रहता है। शिबू सोरेन केंद्र में मंत्री बन कर भी झरखंडी ही रहते हैं और ममता बनर्जी बंगाल की रेलमंत्री थीं या भारत की, यह भेद मुश्किल हो गया था। विषयों का घालमेल भी है। आंतरिक सुरक्षा के मामलों में केंद्र की चिंता वाजिब लगती है, जबकि राज्य अपने अधिकारों और संघीय ढांचे की दुहाई दे रहे हैं। नए चुनाव के बाद नई राजनीति हो। क्योंकि राष्ट्रीय दल पूरे मुल्क की आकांक्षाओं को समेट नहीं पा रहे हैं। बेहतर होगा कि अब तक की गठबंधन राजनीति के अनुभव को ध्यान में रख कर साफ संवाद और स्पष्ट घोषित साझा कार्यक्रम को आधार बना कर नए गठबंधन की राजनीति शुरू की जाए। मुलायम हों या ममता, नीतीश हों या जयललिता, सबको इसी दिशा में सोचना चाहिए। |
Sunday, March 18, 2012
नई राजनीति की जरूरत
नई राजनीति की जरूरत
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