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Saturday, June 30, 2012
Grrr over GAAR and then purr Hint of course correction
CM takes Left on board in debt-relief fight Foe says it has no objection
CM takes Left on board in debt-relief fight | ||
| OUR SPECIAL CORRESPONDENT | ||
Calcutta, June 29: Mamata Banerjee today said she was planning to send an all-party delegation to Delhi to seek a three-year moratorium on principal and interest payment on Bengal's debts, the first time the chief minister spoke about taking the Left and the Congress on board in finding ways to fight the fiscal mess. Her parleys with the Centre and the Congress on the moratorium not yielding any results so far, the chief minister wants to send the message to Delhi that all of Bengal, cutting across party lines, was united behind the demand, Trinamul sources said. "That is why she has sought the support of the Left and the Congress," a source said. Replying to a question in the Assembly from Congress MLA Krishnendu Narayan Chowdhury, Mamata said an all-party delegation could be sent to Delhi to hold talks with the Centre. "I am not asking for any special funds from the Centre. I would request the House that let us all come together to appeal for a three-year moratorium. I want everybody's co-operation. I will ask Partha Chatterjee to see if an all-party delegation can be sent to Delhi," she said. The Left Front MLAs were not present when Mamata made the suggestion as they had staged a walkout on another issue. Later, the CPM said it was not averse to joining the all-party delegation. "We have no objection to going to Delhi but we have to be told what the charter of demands is," leader of the Opposition Surjya Kanta Mishra said. Mamata's call for co-operation came in response to a question by Chowdhury on steps the government planned to take to fill vacant doctor posts at Malda district hospital "I have certain limitations. I want to improve the existing conditions, but there are funds constraints," she said. Mamata's relationship with the Centre, the Congress and former Union finance minister Pranab Mukherjee soured after her requests for the moratorium were not accepted. Today, she reminded the Congress MLAs about her efforts to pull the state out of the financial crisis. Criticising the Left for the financial mess, she said: "Those who walked out of the House shouting slogans have left behind a debt of Rs 2 lakh crore. The interest has shot up to Rs 25,000 crore from Rs 22,000 crore. Despite the constraints, we are paying salaries, running hospitals, giving help to imams and the villagers of Singur." Congress legislature party leader Mohammad Sohrab pointed out that he had not received any answers to letters he had written to the chief minister for discussions on the debt situation. Mamata shot back: "This is a political question. You could have talked to me separately. I have met the Prime Minister and the former finance minister eight to 10 times. I had numerous meetings with your party president. I didn't know that I would have to speak to state-level leaders as well." |
हिन्दू फासीवाद का हिडेन एजेण्डा By राम पुनियानी 27/06/2012 10:22:00
हिन्दू फासीवाद का हिडेन एजेण्डा
हिन्दू धर्म और हिन्दुत्व के बीच अंतर हम कैसे समझें? एक मोटी सी बात तो यह है कि महात्मा गांधी हिन्दू थे परंतु हिन्दुत्ववादी नहीं। इसके विपरीत, नाथूराम गोड़से हिन्दुत्ववादी था। उसके जैसे व्यक्ति की राय में गांधी जैसे हिन्दू को जीने का अधिकार नहीं था। यद्यपि गांधी एक बहुत समर्पित व सच्चे हिन्दू थे तथापि चूंकि वे धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के हामी थे इसलिए गोडसे के लिए वे उतनी ही घृणा के पात्र थे जितना कि कोई मुसलमान या ईसाई। नीतीश कुमार के हालिया बयान को इसी संदर्भ में देखना चाहिए। हालांकि उनका बयान देश के राजनैतिक यथार्थ के केवल एक छोटे से पहलू तक सीमित है, फिर भी इस बहस को अधिक व्यापक बनाया जाना जरूरी है।
आने वाले लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में प्रस्तुत करने के भाजपा के संभावित इरादे के सदंर्भ में, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने हाल में कहा कि एनडीए को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार किसी ऐसे व्यक्ति को बनाना चाहिए जो धर्मनिरपेक्ष हो। इस बीच, भाजपा से कई अलग-अलग स्वर उभरे। एक नेता ने कहा कि वैचारिक दृष्टि से अटलबिहारी वाजपेयी, एल के आडवानी और मोदी में कोई अंतर नहीं है। एक अन्य नेता ने कहा कि चूंकि हिन्दुत्व, धर्मनिरपेक्ष और उदारवादी है इसलिए कोई कारण नहीं कि मोदी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नहीं हो सकते।
नीतीश कुमार दूध के धुले नहीं हैं और न ही धर्मनिरपेक्षता के प्रतिबद्ध सिपाही हैं। सन् 1996 में, जब भाजपा लोकसभा में सबसे बड़े दल के रूप में उभरी थी, तब किसी भी पार्टी की उससे गठबंधन करने की हिम्मत नहीं हुई क्योंकि बाबरी मस्जिद कांड और उसके बाद हुई हिंसा लोगों के दिमागों मे ताजा थी और भाजपा की छवि एक घोर साम्प्रदायिक पार्टी की थी। सन् 1998 में जब यही स्थिति एक बार फिर बनी तब कई पार्टियां-जिनमें नीतीश कुमार की जेडीयू शामिल थी - सत्ता का लोभ संवरण नहीं कर सकीं और भाजपा के साथ एक न्यूनतम साझा कार्यक्रम के आधार पर सत्ता में बैठने को राजी हो गईं।
मोदी के मामले में भाजपा नेताओं के बयानों में काफी सच्चाई है। यह कहना बिलकुल ठीक है कि विचारधारात्मक दृष्टि से वाजपेयी, आडवानी और मोदी में कोई अंतर नहीं है। ये सभी समर्पित स्वयंसेवक हैं जो आरएसएस के हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के एजेन्डे की पूर्ति के लिए काम कर रहे हैं। उनमें जो अंतर दिखलाई देते हैं वे मात्र इसलिए हैं क्योंकि उनकी मातृ संस्था ने उन्हें अलग-अलग काम सौंपे हुए हैं। चूंकि बीजेपी को निकट भविष्य में अपने बलबूते पर बहुमत में आने की उम्मीद नहीं थी इसलिए उसे एक उदारवादी चेहरे की जरूरत थी। इस रोल के लिए वाजपेयी को चुना गया और आडवानी, जो साम्प्रदायिकता के रथ को पूरे देश में घुमाकर राम मंदिर के नाम पर खून-खराबा करवाने के लिए जिम्मेदार थे, को वाजपेयी के अधीन काम करने पर मजबूर किया गया।
इस तरह, यद्यपि विचार और विचारधारा के स्तर पर तीनों में कोई अंतर नहीं है परंतु विभिन्न मौकों पर उन्हें विभिन्न भूमिकाएं अदा करनी होती हैं व मात्र इस कारण वे एक-दूसरे से अलग जान पड़ते हैं। जहां तक हिन्दुत्व के धर्मनिरपेक्ष और उदारवादी होने का तर्क है, वह पूर्णतः हास्यास्पद है। हिन्दुत्व, हिन्दू धर्म नहीं है। हिन्दू धर्म तो उन सभी धार्मिक धाराओं का संगम है जो दुनिया के विभिन्न भागों से भारत पहुंची और यहां पल्लिवत-पुष्पित हुईं। दूसरी ओर, हिन्दुत्व एक राजनैतिक विचारधारा और अवधारणा है जिसे यह स्वरूप देने में वीडी सावरकर का महत्ववपूर्ण योगदान था। उन्होंने हिन्दुत्व को उन सभी चीजों का संगम बताया जो कि हिन्दू थीं। उनके लिए हिन्दुत्व, आर्य नस्ल, एक संस्कृति विशेष और एक भाषा विशेष का संगम था। हिन्दुत्व, हिन्दू धर्म की ब्राहम्णवादी धारा पर आधारित है और जातिगत और लैंगिक ऊँचनीच का पोषक है।
जिस समय सारा देश स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के मूल्यों के झंडे तले एक हो रहा था उस समय हिन्दुत्ववादी, जिनमें से अधिकांश राजा, जमींदार और उच्च जातियों के हिन्दू थे, ने स्वयं को अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष से दूर रखा। उन्होंने मिलजुलकर हिन्दू महासभा और बाद में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। उनकी राजनीति, मुस्लिम लीग की राजनीति के समानांतर परंतु विपरीत थी। मुस्लिम लीग भी उन्हीं तर्कों के आधार पर इस्लामिक राष्ट्र की मांग कर रही थी जिन तर्कों का सहारा लेकर संघ, भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाना चाहता था। जहां हिन्दू महासभा और आरएसएस प्राचीन भारत का महिमामंडन करने में जुट गए और यह कहने लगे कि भारत तो हमेशा से हिन्दू राष्ट्र था वहीं मुस्लिम लीग ने मुस्लिम बादशाहों की विरासत पर कब्जा कर लिया। महात्मा गांधी के नेतृत्व में चले स्वाधीनता संघर्ष का उद्देश्य हमारे देश को साम्राज्यवादी चंगुल से मुक्त कराना तो था ही, यह आंदोलन देश के जातिगत और लैंगिक रिश्तों में आमूलचूल परिवर्तन का भी हामी था। गांधीजी की राजनीति का लक्ष्य था एक नए राष्ट्र का निर्माण।
उस समय का श्रेष्ठिवर्ग, अपने विशेषाधिकार बचाए रखने की खातिर धर्म का सहारा लेता था। उसे डर था कि समाज में आ रही परिवर्तन की आंधी उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा और विशेषाधिकारों को उड़ा ले जाएगी। हिन्दुत्व की राजनीति के सबसे बड़े विचारकों में से एक, एम. एस. गोलवलकर ने अपनी पुस्तक "वी अवर नेशनहुड डिफाइंड" में फासीवाद की जबरदस्त सराहना की है और यह तर्क दिया है कि स्वतंत्र भारत में मुसलमानों और ईसाईयों को दोयम दर्जे का नागरिक बनाकर रखा जाना चाहिए। आज न तो आरएसएस इस पुस्तक के अस्तित्व से इंकार कर पा रहा है और न ही गोलवलकर की निहायत गैर-प्रजातांत्रिक और अस्वीकार्य नीतियों से स्वयं को अलग।
दरअसल, आरएसएस और उसके सदस्यों का प्रजातांत्रिक मुखौटा केवल तब तक के लिए है जब तक वे सत्ता में नहीं आ जाते। एक बार सत्ता में आने के बाद, वे अपना यह मुखौटा नोंच फेंकेगे और अपने असली, भयावह, एजेन्डे को देश पर लादने का काम शुरू कर देंगे। इस समय सुप्रशिक्षित स्वयंसेवक राज्यतंत्र के विभिन्न हिस्सों में घुसपैठ कर रहे हैं। उनमें से कई को भाजपा में भी भेजा गया है। भाजपा बार-बार यह कहती है कि वह "सबके लिए न्याय और किसी के साथ तुष्टिकरण नहीं" के सिद्धांत में विश्वास रखती है। यह एक अत्यंत धूर्ततापूर्ण नारा है जिससे यह जाहिर है कि पार्टी उन लोगों के लिए कुछ नहीं करना चाहती जो वर्तमान में भेदभाव-जनित पिछड़ेपन के शिकार हैं।
(मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण: अमरीश हरदेनिया)
कलाम का सलाम सोनिया के नाम
कलाम का सलाम सोनिया के नाम

पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने एक ऐतिहासिक रहस्योद्घाटन किया है जिसका सम्बन्ध संविधान के मौन पक्षों और राष्ट्रपति के प्रमुख संवैधानिक दायित्वों से है. करीब आठ साल बाद कलाम ने, मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, जल्द ही प्रकाशित होने वाले अपने संस्मरण 'टर्निंग पॉइंट' में इस बात का रहस्योद्घाटन किया है कि वे सोनिया गाँधी के प्रधानमंत्री न बनने के लिए जिम्मेदार नहीं हैं.
सोनिया गाँधी मई २००४ में प्रधानमंत्री क्यों नहीं बन पायीं? उनके विरोधियों की मान्यता रही है कि सोनिया के विदेशी मूल के मुद्दे से जुड़ी किसी तकनीकी समस्या के कारण कलाम ने उन्हें प्रधानमंत्री का दावा न ठोंकने की सलाह दी थी. राष्ट्रपति भवन के इंकार या सुझाव को सोनिया ने अंतरात्मा की आवाज के नाटक में बदल दिया. जबकि सोनिया के समर्थक रह मानते रहे हैं, और सोनिया भी यह कहती रहीं कि, उन्होंने अंतरात्मा की आवाज पर प्रधानमंत्री बनने से इंकार कर दिया था. और सर्वथा के लिए अपना कद बहुत ऊपर उठा लिया था. उस समय इसके लिए सोनिया गाँधी की जो तारीफ हुई थी वह हाल में किसी नेता को मयस्सर नहीं हुई है. उन्हें त्याग की देवी बना दिया गया.
कलाम का नया खुलासा सोनिया की छवि को पुख्ता करता है और विरोधियों का मुंह बंद करता है जो यह मानते हैं कि सोनिया पद की लालची हैं और वे प्रधानमंत्री बनना चाहती थीं लेकिन 'राष्ट्रभक्त' कलाम ने उनके नापाक इरादों को पर नहीं लगाने दिए. कलाम ने लिखा है कि जब उन्होंने मनमोहन को नामित किया तब मुझे 'आश्चर्य ' हुआ था. उन्होंने लिखा है कि विभिन्न संगठनों और राजनीतिक धड़ों से उनके ऊपर सोनिया को प्रधानमंत्री बनने से रोकने के लिए दबाव था लेकिन ये मांगें 'संवैधानिक रूप से असमर्थनीय ' थीं और उन्होंने 'सरकार बनाने का दावा किया होता तो उनको नियुक्त करने के आलावा मेरे पास कोई और विकल्प नहीं था.'
इस तरह के संवैधानिक दायित्व से जुड़े मुद्दे पर आठ साल तक चुप रहने और अफवाहों को फ़ैलने देने के बाद संस्मरण के माध्यम से इस रहस्य से पर्दा उठाने के काम का क्या समर्थन किया जा सकता है? क्या कलाम के इस रहस्योद्घाटन और स्पष्टीकरण को आँख बंद करके सच मान लिया जाए? सोनिया गांधी को जब कलाम ने राष्ट्रपति भवन बुलाया था तो दोनों में अकेले में क्या बातचीत हुई थी यह सिर्फ कलाम जानते हैं और सोनिया गांधी जानती हैं. लेकिन इस बातचीत के बाद जब दोबारा सोनिया गांधी राष्ट्रपति कलाम से मिलने गयीं थीं तो उनके साथ मनमोहन सिंह थे. वही मनमोहन सिंह जो बाद में प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी घोषित किये गये. अगर कलाम ने सोनिया गांधी को नहीं रोका तो पहली बार पीएम की दावेदारी करने गईं सोनिया गांधी को दूसरी बार मनमोहन सिंह के साथ राष्ट्रपति भवन जाने की नौबत क्यों आई?
लेकिन लगता है कि कलाम अब सोनिया गांधी से अपना संबंध ठीक रखने में ही भलाई समझ रहे हैं इसलिए सोनिया मैडम को सलाम भरा पैगाम भेज रहे हैं. वैसे भी कलाम के जीवन की पूरी राजनीतिक उचाईंयां ऐसी ही चापलूसियों के कारण संभव हो पाई है. कल तक राष्ट्रवादियों के प्रतिनिधि अब अगर सोनिया गांधी को सलाम करने लगें तो भला आश्चर्य कैसा?
गोली मारने के बाद यहां स्कूली बच्चे भी माओवादी बना दिये जाते हैं
गोली मारने के बाद यहां स्कूली बच्चे भी माओवादी बना दिये जाते हैं

शुक्रवार को छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में सीआरपीएफ की कोबरा बटालियन द्वारा एक कथित मुटभेड़ को माओवादियों से मुटभेड़ करार देना अब छत्तीसगढ़ सरकार का मंहगा पड़ सकता है. आज छत्तीसगढ़ के एक अखबार में छपी तस्वीरें और बयान इस मुटभेड़ पर उठाये जा रहे सवालों को सही साबित करती हैं. क्या इस मुटभेड़ में सुरक्षा बलों ने असहाय बच्चों, औरतों और ग्रामीणों को मारकर उन्हें माओवादी घोषित कर दिया? कहानी कुछ ऐसी ही नजर आ रही है.
छत्तीसगढ़ से प्रकाशित होनेवाले पत्रिका अखबार ने प्रत्यक्षदर्शियों के हवाले से इस मुटभेड़ पर सवाल खड़ा किया है. मुटभेड़ में घायल एक 14 वर्षीय बच्चे इरपा छोटू का बयान अखबार ने पहले पन्ने पर प्रकाशित किया है. इरपा छोटू का कहना है कि "हम लोग जानवर चरा रहे थे, उसी वक्त वहां नक्सली आ गये. वे लोग हमको जबर्दस्ती उस बैठक में ले गया जहां जमीन का एक विवाद सुलझाया जाना था. इतने में पुलिसवाले वहां आ गये और इसी के बाद मुटभेड़ हुई." छोटू का कहना है कि सुरक्षाबलों ने गोलीबारी शुरू की तो सारे नक्सली वहां से भाग गये. अगर छोटू की बात सही है तो फिर वहां जो लोग मारे गये वे कौन थे?
प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और सरकार की गतिविधियों से इतना तो स्पष्ट होता जा रहा है कि सुरक्षा बलों ने सीधे सादे गांववालों का शिकार कर लिया और अब उन्हें नक्सली बताकर अपनी नाकामी छिपा रहे हैं. जो तस्वीरें प्रकाशित हुई हैं उसमें सिर्फ एक व्यक्ति के कपड़े उसके नक्सली होने का संकेत कर रहा है अन्यथा ग्रामीण महिलाएं और बच्चों ही हैं. मारे गये दो बच्चों के शरीर पर तो स्कूल का यूनिफार्म है. क्या अब नक्सली स्कूल यूनिफार्म में आतंकी गतिविधियां फैला रहे हैं. ये दोनों भाई हैं जिनमें से एक का नाम मरकाम सुरेश और दूसरे का नाम मरकाम नागेश है.
इस मुटभेड़ पर संदेह तब और बढ़ जाता है जब प्रशासन यह दावा करता है कि मारे गये लोगों में 19 लोगों में 13 हार्डकोर नक्सली थे. प्रशासन इनमें से कुछ का नाम भी बता रहा है और कह रहा है कि इन मारे गये लोगों में दंतेवाड़ा जेल ब्रोकर का मास्टरमाइंड मरकम सुरेश भी शामिल है. इसके अलावा जो लोग मारे गये वे जनमीलिशिया के सदस्य थे. अब अगर यह कहानी सच है तो फिर उस सच्चाई का क्या जिसमें पत्रिका अखबार ही दावा कर रहा है कि मारे गये ज्यादातर लोग स्थानीय कोरसेगुड़ा गांव के सदस्य थे. ये सब यहां जमीन का एक विवाद सुलझाने के लिए इकट्ठा हुए थे. हो सकता है यहां नक्सली आये हों लेकिन वे सुरक्षाबलों की गोलियां चलने से पहले ही भाग खड़े हुए. जिन्हें मारकर प्रशासन अपनी बहादुरी पर पीठ थपथपा रही है असल में वे सामान्य ग्रामीण थे जिसमें औरतें और बच्चे भी शामिल थे.
छत्तीसगढ़ में नक्सल मुटभेड़ का जो ढिंढोरा पीटा गया और रमन प्रशासन ने वाहवाही बटोरी उससे उनको भले ही कोई राजनीतिक फायदा मिले या न मिले लेकिन इतना तो तय है कि नक्सलवाद के नाम पर सरकारें कुछ भी करने के लिए स्वतंत्र हैं. और संकट देखिए कि कोई सवाल उठाने की हिम्मत भी नहीं जुटा पाता है.
बाजार तो उठा पर, आम आदमी को मिलेगा क्या?
अब सत्तावर्ग के सर्वाधिनायक विश्वपुत्र प्रणवमुखर्जी को राष्ट्रपति बनाने के खेल के पीछे कारपोरेट इंडिया और राजनीति का साझा खेल खुल्ला होने लगा है। इस खेल में भाजपा और कांग्रेस की शानदार साझेदारी है जिससे नवउदारवाद के मसीहा डा मनमोहन सिंह की वित्तमंत्रालय में वापसी संभव हो चुकी है। मनमोहन के वित्तमंत्रालय संभालने पर अर्थ व्यवस्था के ढांचे में कोई फर्क नहीं पड़ने वाला और देश पर लगातार बढ़ रहे विदेशी कर्ज और भुगतान संतुलन, राजस्व घाटे की स्थिति में कोई अंतर नहीं आने वाला। उत्पादन प्रणाली में भी फेरबदल नहीं होने वाला। कृषि और देहात की बदहाली आलम और घनघोर होने के आसार हैं। असल में अर्थ व्यवस्था में इस बदहाली से सत्तावर्ग का कोई सरोकार कभी रहा ही नहीं वरना पिछले साढ़े छह दशक तक अर्थव्यवस्था मौद्रिक कवायदों के भरोसे चलाया नहीं जा रहा होता। करों का बोझ आम आदमी पर बढ़ने के बजाय घटने वाला नहीं है।प्रणव ने सत्तावर्ग के हितों की रक्षा करने में अपने राजनीतिक जीवन में सोवियत माडल के इंदिरा जमाने से लेकर इमर्जिंग मार्केट के कारपोरेट वर्चस्व और विश्व बैंक आईएमएफ निर्देशन के युग तक कभी कोई कोताही नहीं की। इसलिए अपने गृहराज्य के लिए कभी कुछ नहीं करने के बावजूद , अपना कोई जनाधार नहीं होने के बावजूद वे सत्तावर्ग की आंखों का तारा बने हुए हैं।अपने हिसाब से जनविरोधी बजट पेश करने और आर्थिक सुधार लागू करने में उन्होंने कोई कोताही नहीं की।एक के बाद एक जनविरोधी कानून बनाने और जनता के विरुद्ध युद्ध घोषणा के तहत नीति निर्धारण में उनकी महती भूमिका रही है। वित्तीय तमाम कानून बदल डालने का उन्होंने चाकचौबंद इंतजाम भी कर लिया। डीटीसी और जीएसटी का रास्ता भी साफ कर दिया। खेती बंधुआ हो गयी। किसान आत्महत्या के सिवाय कुछ सोच ही नहीं सकता। बहिष्कृत समाज की जल जंगल जमीनसे बेदखली का सिलसिला तेज हो गया। प्रोमोटर बिल्डर राज कायम करने में उनका योगदान सबसे ज्यादा है। पर मौद्रिक कवायद के खेल में उन्होंने सीधे सांप के बिल में हाथ डाल दिया। कालाधन भारतीय राजनीति का शरीर है तो अर्थ व्यवस्था की आत्मा। पूंजी प्रवाह दरअसल सत्तावर्ग के काले धन को ही घूमाने का खेल है। वोडापोन मामले में वित्तसचिव गुजराल की अतिसक्रियता काखामियाजा उन्हें भुगतना पड़ रहा है।गार लागू करके जो पंगा उन्होंने विदेशी निवेशकों के पीछ मजबूती से खड़े कारपोरेट इंडिया और वैश्विक पूंजी से लिया, उसकी सजा तो उन्हें मिलनी ही थी। उनकी सेवाओं के पुरस्कार बतौर उनके रायसिना हिल्स में आराम परमाने का इंतजाम कर दिया गया और बिना हो हल्ले अर्थ व्यवस्था फिर मनमोहन की आड़ में मंटेक सिहं आहलूवालिया, सी रंगराजल और सुदीप बोस जैसे असंवैधानिक त्तवों के हवाले हो गयी। वित्तमंत्रालय में लैंड करते ही मनमोहन ने मनमोहनी जादुई छड़ी से पेट्रोल की कीमतें घटाकर जनमत को अपने हक में करके बाजार के हित साधने और उद्योग जगत को स्टिमुलस देने का पक्का इंतजाम कर दिया और तुरत फुरत गार का फसाना खत्म कर दिया।गिरता हुआ बाजार और रसातल जा रहा रुपया फिर उठने लगा है। पर आम आदमी को मिलेगा क्या?
गौर करें कि अंगूर कैसे खट्टे हो जाते हैं! वरिष्ठ कांग्रेसी नेता प्रणव मुखर्जी ने शुक्रवार को कहा कि उन्हें प्रधानमंत्री नहीं बन पाने का कोई दुख नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि मनमोहन सिंह बेहतरीन व्यक्तियों में से एक हैं और इस पद को संभालने में सक्षम हैं। मुखर्जी ने कहा कि मुझे इसका पछतावा नहीं है कि मैं प्रधानमंत्री नहीं बन सका। उन्होंने कहा कि मैं इस बात को दोहरा रहा हूं कि मनमोहन सिंह बेहतरीन व्यक्तियों में से एक हैं और प्रधानमंत्री पद के काबिल व्यक्ति हैं।शुक्रवार को अर्थव्यवस्था की स्थिति कुछ सुधरी दिखी। जहां शेयर बाजार में जोरदार तेजी दर्ज की गयी, वहीं रुपये के मूल्य में भी सुधार हुआ। सरकार ने उद्योग के साथ विश्वास की समस्या के समधान का भी आश्वासन दिया है।वैश्विक ब्रोकरेज कंपनी मोर्गन एंड स्टेनले द्वारा घरेलू शेयर बाजार के बारे में सकारात्मक रुख से भी बाजार धारणा पर असर पड़ा। कंपनी मामलों के मंत्री वीररप्पा मोइली ने बेंगलूर में कहा कि मुझे उम्मीद है कि वित्त मंत्रालय का अतिरिक्त कार्यभार संभालने के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अब आर्थिक नीतियों में बड़े सुधार के कदम उठा सकते हैं।सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु ने उम्मीद जताई है कि देश की अर्थव्यवस्था आगामी अक्टूबर से फिर पटरी पर लौटने लगेगी।
केंद्र सरकार ने शुक्रवार को सामान्य कर परिवर्जन नियम (गार) का मसौदा दिशानिर्देश जारी कर विभिन्न पक्षों से इस पर राय आमंत्रित की। इसके साथ ही सरकार ने कहा कि विभिन्न पक्षों की राय मिलने के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इस पर फैसला लेंगे। केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) ने मसौदा दिशानिर्देश जारी किया।जनरल एंटी एवॉयडेंस रूल्स (गार) के बारे में दिशानिर्देशों का मसौदा निवेशकों और शेयर बाजार की काफी चिंताओं को दूर करता है और इस बात का सीधा असर हमें आज कारोबार में बाजार में आयी उछाल के रूप में दिख रहा है। गार के नियम इस साल बजट में जब घोषित किये गये, तब से भारतीय शेयर बाजार विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) की उदासीनता की मार झेलता रहा है। वित्त मंत्रालय के विवादास्पद गार (जनरल एंटी टैक्स अवॉयडेंस रूल) पर दिशानिर्देशों का मसौदा जारी करने के 24 घंटे के भीतर ही प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) ने खुद को इस मामले से दूर कर लिया है। पीएमओ ने कहा है कि इन मसौदे को प्रधानमंत्री ने नहीं देखा है। इन्हें अंतिम रूप उनकी मंजूरी के बाद ही दिया जाएगा।पीएमओ के बयान में कहा गया है, 'प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इस मसौदे को नहीं देखा है। इन्हें प्रधानमंत्री ही अंतिम रूप और मंजूरी देंगे।' प्रणव मुखर्जी के बाद वित्त मंत्रालय का प्रभार प्रधानमंत्री के पास ही है। पीएमओ ने कहा कि प्रधानमंत्री इस प्रस्ताव पर मिली टिप्पणियों के बाद ही इसे अंतिम रूप देंगे।गौरतलब है कि वित्त मंत्रलाय ने गुरुवार रात गार की गाइडलाइंस जारी की थीं। टैक्स पर निवेशकों की चिंता खत्म करने के लिए वित्त मंत्रालय ने विवादास्पद गार पर रकम की सीमा रखी थी। गाइडलाइंस के मसौदे में रकम की सीमा नहीं बताई गई थी। गार के प्रावधान वहीं लागू होंगे, जहां एफआईआई डबल टैक्स अवॉयडेंस संधियों का लाभ लेंगे। अनिवासी निवेशक के मामले में यह नहीं लागू होगा। 1 अप्रैल 2013 के बाद हुई कमाई पर यह प्रावधान लागू होगा।
योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेकसिंह अहलूवालिया ने संकेत दिया कि निवेशकों का विश्वास बहाल करने के लिए नीतिगत मोर्चे पर उन्हें जल्दी ही कुछ कदम देखने को मिलेगा। जटिल कर मुद्दों को स्पष्ट करने को लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय तथा वित्त मंत्रालय में गतिविधियों में आई तेजी के बीच उन्होंने नीतिगत कदम उठाए जाने का संकेत दिया है।जबकि केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) ने जनरल एंटी एवॉयडेंस रूल्स या गार (GAAR) के बारे में दिशानिर्देशों का मसौदा पेश कर दिया है, जिसमें विदेशी निवेशकों की कई चिंताओं को दूर करने का प्रयास किया गया है। सीबीडीटी के इन दिशानिर्देशों के मुताबिक एक तय सीमा से अधिक रकम के सौदों में गार के प्रावधान लागू होंगे। हालाँकि इस मसौदे में यह नहीं लिखा है कि इसकी सीमा कितनी रखी जायेगी। साथ ही पिछली तारीख से नियमों को बदलने के चलते चौतरफा आलोचना के मद्देनजर इन दिशानिर्देशों में कहा गया है कि ये नियम 1 अप्रैल 2013 को या इसके बाद से होने वाली आमदनी पर लागू होंगे। अगर इन दिशानिर्देशों को अंतिम मंजूरी मिलती है तो वोडाफोन और हचिसन के सौदे समेत ऐसे तमाम पुराने सौदे गार के दायरे से बाहर आ जायेंगे, जिनको लेकर विवाद चलता रहा है। सीबीडीटी ने यह भी कहा है कि गार के प्रावधान तभी लागू किये जा सकेंगे, जब किसी विदेशी संस्थागत निवेशक (FII) ने दोहरे कर से बचाव की किसी संधि (DATT) का लाभ उठाया हो। लेकिन किसी एफआईआई के अनिवासी निवेशकों के मामले में गार के प्रावधान लागू नहीं किये जायेंगे। इस तरह पार्टिसिपेटरी नोट्स (P-Notes) को गार के दायरे से बाहर रखने का इंतजाम किया गया है। इसके अलावा, शेयर बाजार में होने वाले सौदों को गार के दायरे से पूरी तरह बाहर रखने का प्रस्ताव है। इन दिशानिर्देशों में एक समिति बनाने की भी बात कही गयी है, जिसमें कम-से-कम तीन सदस्य होंगे। इस समिति से मंजूरी लेने के बाद ही किसी मामले में गार को लागू किया जा सकेगा।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के वित्त मंत्रालय की जिम्मेदारी संभालने और अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिये उनके सलाहकारों तथा अधिकारियों की गतिविधियों से कारोबारी धारणा में सुधार हुआ है।कारोबारी सप्ताह के आखिरी दिन बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज के सूचकांक सेंसेक्स बीएसई ने 439 अंकों की छलांग लगाई और यह बाजार बंद होते समय 17430 पर जा पहुंचा।यह इस साल एक दिन की सबसे ज्यादा बढ़त है। नैशनल स्टॉक एक्सचेंज इंडेक्स निफ्टी में भी धूम मची नज़र आई। यह 130 अंकों की बढ़त लिए 5279 पर बंद हुआ। बाजार में यह मजबूती रुपए के 56 के स्तर तक पहुंचने और यूरोपीय हालात सुधरने की उम्मीद के कारण नज़र आई है।सेंसेक्स में पूरे दिन भर के कारोबार पर एक नज़र डालें तो उसने अधिकतम 17,033.85 और न्यूनतम 16,918.87 के स्तर को छुआ है। वहीं निफ्टी की बात करें तो यह अधिकतम 5,159.05 पर और न्यूनतम 5,125.30 के स्तर को छुआ है। मिडकैप शेयर्स 1.5 फीसदी और स्मॉलकैप शेयर्स 1.25 फीसदी मजबूत हुए।बीएसई एफएमसीजी इंडेक्स 0.82% ऊपर रहा, बीएसई पावर इंडेक्स में 0.38% की तेजी नज़र आई। वहीं बीएसई आईटी इंडेक्स में 0.22% की बढ़त और बीएसई ऑयल ऐंड गैस इंडेक्स 0.37% की गिरावट नज़र आई। बीएसई बैंक इंडेक्स 0.32% नीचे रहे, जबकि बीएसई कैपिटल गुड्स इंडेक्स 0.17% नीचे रहे।
प्रणब मुखर्जी के जाने के बाद पीएम ने भले ही वित्त मंत्रालय का कामकाज संभाल लिया है लेकिन फिलहाल महंगाई से निजात मिलने की कोई उम्मीद नहीं हैं। प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकारों का कहना है कि कमरतोड़ महंगाई से उबरने में कम से कम और तीन महीने इंतजार करना होगा।राष्ट्रपति चुनाव लड़ रहे प्रणब मुखर्जी के वित्त मंत्री पद छोड़ने के बाद अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने वित्त मंत्रालय की कमान संभाल ली है। कई बड़ी चुनौतियों के साथ-साथ पीएम के सामने सबसे बड़ी चुनौती बढ़ती महंगाई पर काबू कर लोगों को राहत दिलाना है और गिरती अर्थव्यवस्था को मजबूती देकर देश को विकास के रास्ते पर ले जाना। नई पहल के तहत वित्त मंत्रालय को सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय से जोड़ दिया गया है। अब वित्त मंत्रालय प्रधानमंत्री कार्यालय को रोजाना रिपोर्ट भेजेगा। जिसकी समीक्षा मुख्य आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु करेंगे। हालांकि सरकार ने अर्थव्यवस्था को काबू में रखने की कवायद शुरू कर दी है, लेकिन बसु का मानना है कि हालात संभलने में अभी कुछ महीने और लगेंगे।
सांख्यिकी दिवस 2012 के मौके पर आयोजित समारोह के दौरान शुक्रवार को कोलकाता में संवाददाताओं से बातचीत में बसु ने कहा कि उद्योग में जो विश्वास का माहौल गड़बड़ाया है, सरकार उसे भी दूर करने पर काम कर रही है। उन्होंने कहा कि अर्थव्यवस्था के फिर से जल्द ही पटरी पर लौटने की उम्मीद है। उन्होंने कहा कि अगले चार-पांच माह अर्थात अक्टूबर से विकास की गति फिर से अपने टाप गियर में वापस आ सकती है।सरकार की सबसे बड़ी चिंता महंगाई के बारे में भी शाजनक नजर आए बसु ने कहा कि यह भी सितम्बर से नीचे आने लगेगी। फिलहाल महंगाई साढ़े सात प्रतिशत से ऊपर है।
उद्योग में विश्वास की समस्या के बारे में बसु ने कहा कि उद्योग से साथ मिलकर इसे दूर करने की शिक्षा में कदम उठाए जा रहे हैं। पिछले कई महीने से सरकार इस पर कदम उठा रही है और हमारा प्रयास है कि जितना जल्दी हो सके इसे हासिल किया जाए।
कौशिक बसु का साफतौर पर कहना है कि फिलहाल 3 महीने तक महंगाई कम होने की कोई संभावना नहीं है, क्योंकि सुधार की रफ्तार काफी धीमी है। उनका कहना है कि आर्थिक विकास दर में सितंबर तक कमजोर रहेगी लोकिन उन्होंने उम्मीद जताई कि अक्टूबर से विकास दर रफ्तार पकड़ेगी। बसु का ये भी कहना है कि सितंबर से महंगाई दर सात फीसदी के नीचे आने की उम्मीद है लेकिन मंदी का खतरा सामने है। बसु रुपये की गिरती कीमत से ज्यादा चिंतित नहीं हैं और उनका कहना है कि रुपया गिरने से नुकसान तो है लेकिन निर्यातकों को फायदा होगा।
उधर प्रधानमंत्री इकॉनोमिक एडवाइजरी कमेटी के अध्यक्ष सी रंगराजन का कहना है कि अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए कुछ कड़े कदम उठाने जरुरी हैं। मुख्य आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु की राय है कि तीन महीने में महंगाई कम होने की संभावना नहीं है। सितंबर तक आर्थिक विकास दर कमजोर रहेगा। अक्टूबर से आर्थिक विकास दर में सुधार की उम्मीद है। सितंबर में महंगाई दर सात फीसदी से नीचे आने की उम्मीद है। मंदी का खतरा बरकार है। रुपये की कमजोरी से निर्यातकों को फायदा है।
अध्यक्ष प्रधानमंत्री इकॉनोमिक एडवाइजरी कमेटी सी रंगराजन के मुताबिक अर्थ व्वयवस्था कठिन दौर में हैं। विकास ठप है। महंगाई दर काफी ऊंची है। इस पर नियंत्रण जरूरी है। सूत्रों की मानें तो सरकार ने बीमा और पेंशन सेक्टर में 49 फीसदी विदेशी निवेश को मंजूरी देने का फैसला कर लिया है। मनमोहन के आर्थिक सलाहकार अर्थव्यस्था को पटरी पर लाने के लिए भले ही नए सिरे से जुड़ गए हैं और तीन महीने में हालात सुधरने की बात भी कर रहे हैं, लेकिन विपक्षी पार्टियों को नहीं लगता कि मनमोहन भी इस दिशा में कुछ खास कर पाएंगे। बीजेपी नेता मुरली मनोहर जोशी के मुताबिक उनके तीन महीने आज से नहीं सन् 2005 से सुन रहे हैं। पिछले सात सालों से यही कह रहे हैं, ऐसी बातों से सरकार से भरोसा उठ गया है।
बिजनेस स्टैंडर्ड में एक दिलचस्प कथा आयी है, उस पर जरूर गौर फरमायें। टीएन नाइनन ने लिखा हैः
अधिकांश लोग शायद यह भूल गए होंगे कि वर्ष 2004 में मनमोहन सिंह जब पहली बार प्रधानमंत्री बने थे तब उन्होंने इस बात को सार्वजनिक हो जाने दिया था कि वह वित्त मंत्रालय अपने पास रखेंगे। उनसे कहा गया कि यह ठीक नहीं होगा। इस संदर्भ में जो तर्क दोहराया गया वह यह था कि उनको अपने नये काम पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए न कि पिछले पर। इस तरह पी चिदंबरम को वित्त मंत्रालय का मनचाहा काम मिल गया। वर्ष 2009 में उनके दूसरे कार्यकाल की शुरुआत तो और भी अधिक नाटकीय रही। अंदरूनी जानकारी के मुताबिक प्रधानमंत्री वित्त मंत्री के पद पर अपनी पहली पसंद के रूप में सी रंगराजन को नियुक्त करना चाहते थे जिन्होंने कुछ ही महीने पहले प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद का अध्यक्ष पद छोड़ा था और उसकेे बाद वह राज्य सभा के लिए मनोनीत किये गए थे। दरअसल, रंगराजन को चेन्नई से दिल्ली आने के लिए भी कह दिया गया था। संभवत: शपथ लेने के लिए। लेकिन अंतिम क्षणों में उनसे अपनी यात्रा रद्द करने को कहा गया। तीन महीने बाद उन्होंने राज्य सभा की अपनी सीट से इस्तीफा दे दिया और वह दोबारा अपने पुराने काम पर लौट गए यानी उन्होंने प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद का अध्यक्ष पद एक बार फिर संभाल लिया। इस दरमियान यह पद सुरेश तेंडुलकर के पास था। उन्हें पद से हटा दिया गया, बावजूद इसके कि वह प्रधानमंत्री के दोस्त थे। इन घटनाओं से यह स्पष्ट होता है कि डॉ. सिंह हमेशा से वित्त मंत्रालय का काम खुद संभालना चाहते थे या फिर वह इस पद पर एक ऐसा अर्थशास्त्री चाहते थे जिस पर उन्हें भरोसा हो। एक और बात अब साफ हो चुकी है कि जिन लोगों ने भी सोनिया गांधी की लोक कल्याणकारी योजनाओं को प्राथमिकता देने और डॉ. सिंह के विकास आधारित दर्शन के अंतर पर ध्यान केंद्रित किया उन्होंने एक और महत्त्वपूर्ण अंतर को नजरअंदाज कर दिया। यह खाई डॉ. सिंह और प्रणव मुखर्जी के बीच मौजूद थी। जिस असामान्य तत्परता के साथ डॉ. सिंह ने अंतरिम वित्त मंत्री का पद संभाला है और जिस तेजी से उन्होंने अपने पूर्ववर्ती मुखर्जी के कुछ विवादास्पद कदमों को बदलने की भूमिका तैयार की है, उससे यही संकेत मिलता है कि उनमें इस बात को लेकर झुंझलाहट थी कि वह मुखर्जी के पद पर रहते वित्त मंत्रालय को सीधे निर्देश नहीं दे पा रहे थे। शायद ऐसा इसलिए था क्योंकि सन 1980 के दशक में वित्त मंत्री के रूप में मुखर्जी डॉ. सिंह के बॉस थे और उन्होंने 1982 में उनको भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) का गवर्नर नियुक्त किया गया था। यह देखते हुए कि डॉ. सिंह आमतौर पर दबाव नहींं बनाते (याद कीजिए कैसे उन्होंने ए राजा को नियमों से खेलने दिया), जाहिर सी बात है कि मुखर्जी को भी पूरी स्वायत्तता प्राप्त थी। 1980 के दशक से अब तक भूमिकाओं में भारी बदलाव आ जाने के बावजूद सिंह अपनी इच्छा उन पर थोप नहीं सकते थे। आखिर, उन्होंने ब्रिटिश प्रधानमंत्री को लिखकर वादा किया था कि वोडाफोन पर पुरानी तारीख से कोई कर नहीं लगाया जाएगा लेकिन उनके वित्त मंत्री ने ठीक ऐसा ही किया! इससे पहले भी तीन मौकों पर प्रधानमंत्री वित्त मंत्री की भूमिका निभा चुके हैं और पहले कभी इसके लिए कोई राजकोषीय वजह नहीं रही। 1958 में एक घोटाले के बाद जब टी टी कृष्णमाचारी ने इस्तीफा दे दिया था तब नेहरू ने कुछ समय के लिए पद संभाला था। इंदिरा गांधी ने राजनैतिक लाभ हासिल करने के क्रम में मोरारजी देसाई को वित्त मंत्रालय से हटाने के बाद यह पद संभाला था। आखिरी बार 1987 में राजीव गांधी ने वी पी सिंह को हटाने के बाद 'छापे के युग' का खात्मा किया था जो सिंह ने कारोबारी घरानों के खिलाफ छेड़ रखा था। अब प्रश्न यह है कि क्या मनमोहन सिंह खुद को वास्तव में एक अंतरिम वित्त मंत्री के रूप में देखते हैं या फिर वह 2014 तक पद पर बने रहने की मंशा रखते हैं और आर्थिक प्रबंधन में सीधे तौर पर ऐसे परिवर्तन लाना चाहते हैं जो वह 2004 और 2009 में नहीं ला सके। अगर बाद वाली बात सही है तो पहेलीनुमा सवाल यह है कि क्या श्रीमती गांधी ने अर्थव्यवस्था में व्याप्त गड़बडिय़ों के मद्देनजर प्रधानमंत्री को इतनी छूट प्रदान कर दी है?
Nitish-Modi Spat: Debating Secularism
Nitish Kumar in an obvious reference to opposition to Modi's possible projection as the Prime-ministerial candidate of NDA, in the next parliamentary elections said that NDA's Prime Ministerial candidate should be one with secular credentials. His aide went on to say that Vajpayee had the intention of sacking in the wake of Gujarat carnage and the NDA lost 2004 Parliamentary elections due to the Gujarat carnage and role of Modi in the same (June 19, 2012). In response Lalu Yadav questioned Nitish as to how he Nitish continued to be part of NDA after Gujarat happened? The BJP spokesmen talked at various levels. One of them said that ideologically Vajpayee, Advani and Modi are all the same. Another one said that Hindutva is truly secular and liberal so why Modi cannot be the PM candidate. RSS Supremo Bhagwat buttressed the point by saying as to why the nation cannot have a Hindutvawadi prime minister?
With this the ever continuing debate about secularism and the nature of Hindutva is in the social space once again. One concedes that Kumar is no secular angel. When BJP came to become the largest single party in Lok Sabha in 1996, no one dared to ally with it that time as it's communal face was starkly obvious due to its role in Babri demolition and consequent violence, which was too fresh in people's memory. By 1998 in a similar situation many parities including Kumar's JD (U) could not resist the temptation of power and struck some minimum common program to share power with the BJP. Though his JD (U) had a common minimum understanding with BJP, right under Kumar's nose BJP during NDA regime communalized the polity to no end. Saffronization of text books was done and introduction of courses like Paurihitya and Hindu Rituals in the Universities being just few examples of the Hindutva agenda, were starkly visible. When the carnage broke out in 2002, Kumar was the minister for railways and in that capacity he ignored the investigation of Godhra train burning, which was mandatory as per the rules. Due to this Modi's concoction that train burning was a preplanned act by Muslims went unchallenged for a long time. Kumar could have called Modi's bluff that the train burning was a planned act by Muslims.
Nitish was part of the cabinet. What did he tell Vajpayee at that time one does not know, but as a secular person, his threat of pulling out from the Government would have set the house in order to a great extent. Even today, right under his nose his ally; the BJP of Bihar, is communalizing the polity. Communalism is not just communal violence. Communal violence is just the superficially visible part of the process of communalization, which aims to abolish secular space and liberal values.
Some of the statements of BJP spoke-persons are partly true also. The claim that Vajpayee, Advani, and Modi (one can add even people like Praveen Togadia, Promod Mutallik, Vinay Katiyar and the likes) are similar, is true to a great extent. They are all ideologically committed swaymsevaks, (RSS trained Cadres) working for the agenda of Hindu Rashta, the goal of RSS politics. There are dissimilarities amongst them also; there is a division of labor amongst them also. Since BJP is not hoping for coming to majority on its own strength, it has to keep a liberal façade. Precisely for this reason Vajpayee was the prime Minister, while prime mover of the chariot of communalism through Ram Temple campaign, Advani, was forced to play the second fiddle. When Vajpayee withdrew from the scene, Advani decided for the image change over and he suddenly realized the secular worth of Jinnah. It is another matter that he overplayed the game and their patriarch, RSS, decided to clip his wings and demote him. All the top brass of BJP, VHP, Bajrang Dal, Vanvasi Kalyan Ashram and many other RSS outfits are primarily the RSS swayamasevaks, which is too well known by now.
When the previous avatar of BJP, Jan Sangh, merged in Janata Party in the wake of lifting of emergency, the other components of Janata party, socialists in particular, demanded that the Jan Sangh members should give up their membership-affiliation with RSS. For Jan Sanghis breaking link with RSS was unthinkable and they decided to pull out from Janata Party and then they regrouped as Bharatiya Janata Party, as it is known at present. Vajpayee, in his famous address to NRI Indians in Staten Island, US, asserted that he is Swayamsevak first and anything else, PM, later.
In that sense they are on the same ideological wavelength but playing different roles at any point of time. They are communal to the core, with the agenda to work for religion based nationalism. To say that Hindutva is secular and liberal is like putting the reality on its head. Hindutva is not Hinduism. Hinduism is an umbrella of various religious streams, which flowered and existed in this part of the world. Hindutva as a concept and political ideology started emerging during colonial period and was later popularized by Savarkar. He defined it as 'Whole of Hinduness', a combination of Aryan race, culture and language. In particular Hindutva is based on the Brahmanical stream of Hinduism, subtly promoting caste and gender hierarchy, reviving the feudal hierarchical system in the modern idioms.
When the whole nation was coming together on the principles of Liberty, Equality and Fraternity, the upholders of Hindutva, coming from the sections of Rajas, Jamindars and section of upper caste Hindus kept aloof from the struggle against British. They came together as Hindu Mahasabha and later founded and supported RSS. Their politics was parallel and opposite of the politics of Muslim League, which was arguing on the similar line for an Islamic state, Pakistan. Muslim League also had base amongst the landed aristocracy, Nawabas, Jagirdars and later joined by educated elite. Hindutva stream, Hindu Mahasabha-RSS projected the glorious Hindu past and asserted we are a Hindu Nation from times immemorial. Muslim League identified with the rule of Muslim kings and traced their lineage to the first invasion of Muslim King in this part of the world. The National movement under Gandhi was for throwing away the yoke of colonial rule and for social change of caste and gender relations. It articulated that we are a Nation in the making.
Here one can see the instrumentalist use of religion by a section of society, elite, who wanted to preserve their privileges in the changing social dynamics. The sharpest articulation of Hindutva politics came from M.S. Golwalkar, who in his 'We or our Nationhood Defined', eulogized fascism and asked for a second class citizenship for Muslims and Christians. Today the RSS cadres unable to swallow the blunt formulation of their politics by Golwalkar deny the existence of this book. The dilemma of RSS and its progeny is to keep the democratic face till they come to a majority when they can unleash their full scale agenda. Currently also their trained swayamsevaks are infiltrating in different wings of the state, media and education apart from forming the organizations like BJP etc. So who is secular in BJP? They claim that they believe in justice for all and appeasement of none. This is a very cleverly worded sentence to hide their intention of continuing the discrimination of those suffering in the present scheme of things.
How does one understand the difference between Hinduism and Hindutva? One has to take recourse to the example of the 'father of the nation' to avoid the heavy academic debates. Gandhi was a Hindu but not a follower of Hindutva. Godse and the RSS tribe are the practitioners of 'Hindutva politics'. For this politics a Hindu like Gandhi is unacceptable ideologically as he could reach the zenith of secular ethos while being the best of the Hindus! We do realize that while the statement by Nitish Kumar is a symbol of shadow boxing it also presents one of the aspects of the political reality being witnessed by the nation.
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