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THE HIMALAYAN DISASTER: TRANSNATIONAL DISASTER MANAGEMENT MECHANISM A MUST

We talked with Palash Biswas, an editor for Indian Express in Kolkata today also. He urged that there must a transnational disaster management mechanism to avert such scale disaster in the Himalayas. http://youtu.be/7IzWUpRECJM

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS TALKS AGAINST CASTEIST HEGEMONY IN SOUTH ASIA

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Saturday, August 20, 2011

अनशन की सीमायें By नैनीताल समाचार on July 28, 2011

अनशन की सीमायें

इंदिरा राही

anna-hazare-fastभारत में पुरातन काल से ही उपवास की एक धार्मिक परम्परा रही है। मुस्लिम समुदाय में भी उपवास, रोजा के रूप में प्रचलित है। धार्मिक उपवासों के कारण और उद्देश्य भी धार्मिक ही रहते आये हैं। व्यक्ति की आंतरिक शुद्धि के लिये, धर्म पालन के लिये, ईश्वर को प्रसन्न करने के लिये व तप रूप में अनेक प्रकार से उपवास किये जाते हैं। परन्तु आजादी के आंदोलन में बापू ने उपवास का प्रयोग एक अहिंसक साधन के रूप में किया। स्वयं को कष्ट देकर सामने वाले का हृदय परिवर्तन, विचार परिवर्तन व व्यवहार परिवर्तन की मानवीय अपीलें करना उनके उपवास के उद्देश्य होते थे।

ज्यादातर प्रसंगों में तो उन्होंने दूसरों की एवं समाज की गलतियों की जिम्मेदारी स्वयं अपने ऊपर लेते हुए अपनी गहरी पीड़ा को व्यक्त करने के लिये प्रायश्चितभाव से उपवास किये। समाज को जागृत करने, गलत कामों से लोगों को विमुख करने के लिये भी जननांदोलन का पर्याय उपवास को बनाया। उन्होंने कभी यह नहीं कहा कि जब तक अंग्रेज भारत छोड़कर नहीं चले जायेंगे, तब तक मैं अन्न ग्रहण नहीं करूँगा या अंग्रेज जब तक नमक कर मुक्ति का कानून नहीं बनायेंगे,तब तक मैं अन्न ग्रहण नहीं करूँगा।

भ्रष्टाचारी व्यवस्था में बदलाव लाने के लिये जन-जागृति व जनसंगठन की आवश्यकता है। अपने अधिकार की लड़ाई लड़ने के लिये उठ खड़े होने की जरूरत है और यह सब जन-शिक्षण, जन-जागरण, जन-असहयोग द्वारा ही संभव हो सकता है। अधिकांश समाज अपने-अपने हित साधने के लिये जिस भ्रष्टाचार में सहयोगी या मूकदर्शक की भूमिका निभा रहा हो, उसे इस भ्रष्टाचार से असहयोग करने की भूमिका में लाने के लिये उपवास कारगर उपाय कैसे बनेगा ? कानूनी व्यवस्थायें बनी हुई हैं और कोई एक भी कानून भ्रष्टाचार की छूट देने वाला नहीं है, पर कानून की परवाह कौन करता है ? हर पहुँच वाला व्यक्ति तो कानून तोड़ने में लगा हुआ है। भ्रष्टाचारी व्यवस्था-तंत्र से जन असहयोग कहाँ शुरू हुआ है? भ्रष्टाचार का विरोध हो रहा है, लेकिन भ्रष्टाचार की समस्या मात्र नारे लगाने या मोमबत्तियां जलाकर प्रदर्शन करने से हल नही हो पायेगी।

हमारे जिन तपस्वी साधकों ने आजादी के बाद उपवास किये, उनमें स्व. गोकुल भाई भट्ट ने राजस्थान में शराबबंदी के लिये, आचार्य विनोबा ने गोहत्या बंदी के लिये, सुन्दर लाल बहुगुणा ने टिहरी बांध के विरोध में, मेधा पाटकर ने नर्मदा नदी और विस्थापितों को बचाने के लिये और मणिपुर में इरोम शर्मिला का उदाहरण हमारे सामने हैं। और भी उपवास विभिन्न मांगों को पूरा कराने के लिये होते रहे हैं लेकिन अभी तक कोई मांग उपवास के परिणामस्वरूप पूरी होती तो दिखी नहीं। प्रायः सभी उपवास अंततः उपवास करने वाले की प्राण रक्षा तक जाकर ठहर जाते हैं। अधिक से अधिक कोई मौखिक या कागजी आश्वासन प्राप्त हो जाता है। उपवास की अवधि में किसी मांग को पूरी करने तक की क्रियायें
या व्यवस्थायें कर पाने की स्थिति नहीं आ पातीं।

आज की व्यवस्था में कोई उपवास करके मर नहीं सकता क्योंकि कानूनी दृष्टि से वह आत्महत्या का प्रयास माना जाता है। अतः सरकार हर हाल में यानी कानून की रक्षा के नाम पर उपवास करने वाले को जबरदस्ती उठाकर अस्पताल में डाल देती है और जान बचाने की कवायद शुरू हो जाती है। इसलिये किसी सामाजिक लक्ष्य को हासिल करने या राजनैतिक परिवर्तन के लिये पहली आवश्यकता, वर्तमान संसदीय व्यवस्था में व्यापक विचार विमर्श की होती है। समाज के लिये संकट बनती जा रही किसी समस्या के समाधान की दृष्टि से व्यापक सामाजिक मंथन का शुरू होना जरूरी है।

गलत व्यवस्था को बदलने के लिये उस व्यवस्था से असहयोग की व्यापक तैयार और दृढ़ जन संकल्प होना चाहिये। यदि दस करोड़ लोग बाबा रामदेव की घोषणा के अनुसार भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ने को तैयार हैं, तब तो इस देश का माहौल ही बदल जाना चाहिये था। देश के 10 करोड़ लोग यदि अपना हित साधने के लिये भ्रष्टाचार में शामिल न होने का दृढ़ संकल्प लें ओर भ्रष्टाचारियों और भ्रष्टाचारी व्यवस्था से असहयोग करना शुरू कर दें तो शायद भ्रष्टाचार मुक्त भारत के लिये किसी के उपवास पर बैठने की नौबत नहीं आये। अनशन से, कानून बनाने की मांग से और विपक्ष द्वारा इसे चुनावी मुद्दा बनाने से भ्रष्टाचार मुक्त भारत नहीं बनेगा।

जो काला धन देश से बाहर चला गया है, उससे कम काला धन देश के भीतर नहीं बह रहा है। कालेधन की पहचान अपने भीतर भी करनी होगी। हमारे घर में, बाजार में, मठ-मंदिर और फिल्मी दुनिया में, बाजार व उद्योग के हर क्षेत्र में काले धन की हेरा-फेरी हो रही है। क्या राजनैतिक दलों द्वारा चुनावों में कालेधन का उपयोग नहीं होता ? इतना धन खर्च करने के लिये उनके पास धन आता कहाँ से है ? इसलिये हमें विदेशों में जमा काले धन को वापस लाने के साथ ही देश के अंदर बढ़ रहे कालेधन के प्रवाह को भी रोकने का आंदोलन करना होगा और वह आंदोलन दिल्ली में भीड़ जुटाकर अनशन पर बैठने का नहीं, पूरे देश में गाँव-गाँव में भ्रष्टाचार, कालेधन उस पर आधारित गंदी राजनीति और व्यवस्था के मूल कारणों को जन-जन तक पहुँचाने और समझाने का होगा। वर्तमान भ्रष्ट व्यवस्था से असहयोग के लिये जनता को संगठित रूप से तैयार करना होगा और इसका नेतृत्व करने वाले को सबसे पहले स्वयं को और अपने संगठन को, आम जनता की नजरों में भ्रष्टाचार मुक्त एवं पाक-साफ साबित करना होगा।

(सर्वोदय प्रेस सर्विस के अंक 17 जून 2011 से साभार)

एक चिन्तित नागरिक द्वारा जनहित में जारी

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