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THE HIMALAYAN DISASTER: TRANSNATIONAL DISASTER MANAGEMENT MECHANISM A MUST

We talked with Palash Biswas, an editor for Indian Express in Kolkata today also. He urged that there must a transnational disaster management mechanism to avert such scale disaster in the Himalayas. http://youtu.be/7IzWUpRECJM

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS TALKS AGAINST CASTEIST HEGEMONY IN SOUTH ASIA

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Saturday, February 4, 2012

शरद पवार के पास हैं अनेक योजनाएं (09:29:46 PM) 04, Feb, 2012, Saturday

http://www.deshbandhu.co.in/newsdetail/2698/10/0

शरद पवार के पास हैं अनेक योजनाएं
(09:29:46 PM) 04, Feb, 2012, Saturday
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कल्याणी शंकर
2014 में ही करेंगे सार्वजनिक

शरद पवार ने जब यह कहा कि चुनावी राजनीति के वे 45 साल पूरे कर चुके हैं और अब वे अगला चुनाव नहीं लड़ेंगे, तो अनेक लोगों को लगा कि वे 2014 के बाद राजनीति से अपने रिटायरमेंट की घोषणा कर रहे हैं। ऐसा सोचने वाले पर शरद पवार जरूर हंस रहे होंगे, क्योकि उन्होंने ऐसा नहीं कहा है कि वे राजनीति को छोड़ने वाले हैं, बल्कि सिर्फ यही कहा कि वे अब चुनाव नहीं लड़ेंगे।
वे बिना चुनाव लड़े भी राजनीति में रह सकते हैं। एक बार उन्होंने और कहा था कि वे बहुत चुनाव लड़ चुके हैं और चाहेंगे कि युवा पीढी सामने आये। अपनी बेटी सुप्रिया सुले को पहले वे राय सभा के रास्ते संसद में लाये और उसके बाद अपने बारामती लोकसभा क्षेत्र से उन्हें लड़ा दिया। पवार ने खुद अपने लिए एक नया क्षेत्र चुन लिया। बारामती में उनकी बेटी सुप्रिया सुले ने बहुत बड़ी जीत हासिल कर ली।
सवाल उठता है कि आखिर शरद पवार ने इस तरह का बयान दिया ही क्यों? श्री पवार द्वारा दिया गया कोई भी बयान बेमतलब नहीं हो सकता। यदि उन्होंने इस समय का चुनाव करते हुए इस तरह का बयान दिया तो इसका कोई तार्किक कारण होना चाहिए। इसका एक तार्किक कारण यही हो सकता कि वे राहुल गांधी के नेतृत्व में बनी सरकार में मंत्री नहीं बनना चाहते और यदि ऐसा हुआ तो वे अपनी बेटी को अपनी जगह पर मंत्रालय में लाना पसंद करेंगे। यानी एक तरह से शरद पवार का यह बयान इस संभावना को देखते हुए आया है कि राहुल गांधी जल्द ही सत्ता की बागडोर संभाल सकते हैं। वैसे 2014 का समय राहुल गांधी के लिए सरकार में कांग्रेस की तरफ से सबसे बंडा पद पर बैठने का समय है। उस समय पर शरद पवार उनके तहत काम करना नहीं चाहेंगे, इसकी एक तरह से सार्वजनिक घोषणा श्री पवार ने कर दी है।
शरद पवार की उम्र अभी 71 साल की हुई है। इस लिहाज से उनकी उम्र बहुत ज्यादा नहीं मानी जा सकती। इसका कारण यह है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और प्रणब मुखर्जी उनसे उम्र में बहुत ही बड़े हैं। पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल तो 84 साल के हो चुके हैं और पंजाब की जनता को कह रहे हैं कि यदि उनके अकाली दल को सत्ता दी गई, तो वे आने वाले 5 सालों तक राय का मुख्यमंत्री बने रहेंगे।
जाहिर है शरद पवार अपनी उम्र के कारण इस तरह का बयान नहीं दे रहे हैं। उनके इस बयान के पीछे सिर्फ और सिर्फ राहुल गांधी के मातहत काम न करने की घोशणा है। आज अनेक नेता अपने बेटों को आगे बढा रहे हैं और अपनी पार्टी में अपनी सारी जिम्मेदारी उन्हें सौंपने की तैयारी कर रहे हैं। सोनिया गांधी राहुल गांधी को इसके लिए तैयार कर रही है। उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव अपने बेटे अखिलेश को अपनी जिम्मेदारी सौंप रहे हैं। जम्मू और कश्मीर में तो फारूक अब्दुल्ला ने अपने बेटे को मुख्यमंत्री के पद पर बैठा भी दिया है। दक्षिण भारत के तमिलनाडु में करुणानिधि अपने बेटे स्टालीन को अपनी जगह ला रहे हैं। उत्तर प्रदेश में अजित सिंह अपने बेटे जयंत चौधरी के हाथों में अपनी पार्टी की कमान सौंप रहे हैं। वैसे माहौल मे शरद पवार को भी लगता है अपनी दूसरी पीढ़ी के हाथों में वे राजनीति की बागडोर थमा दें।
शरद पवार किसे अपना वारिस चुनेंगे? इसके जवाब में वे कहते हैं कि वे परिवारवाद में विष्वास नहीं करते। सचाई यह है कि केन्द्र की राजनीति में उनकी बेटी सुप्रिया सुले उनकी जगह ले रही है, तो राय की राजनीति उनके भतीजे अजित पवार पार्टी में प्रबल होते जा रहे हैं। राय स्तर की राजनीति की बागडोर बहुत हद तक अजित पवार के हाथ में पहुंच भी चुकी है। वे महाराष्ट्र सरकार में उपमुख्यमंत्री के पद पर हैं और दल बदल करके पार्टी में नेताओं को लाने में वे ही महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
शरद पवार की एक इछा प्रधानमंत्री बनने की भी रही है। 1991 में राहुल गांधी की हत्या के बाद उन्होंने इसके लिए कोशिश भी की थी, लेकिन वे सफल नहीं हो सके थे। 1999 में जब सोनिया गांधी ने पार्टी की कमान अपने हाथ में ले ली थी, तो शरद पवार पार्टी से बाहर आ गए, क्योंकि उन्हें लगा कि कांग्रेस के अंदर रहकर उन्हें नीचे के पद पर रहना पंडेगा, जबकि वे समझते थे कि वे उस समय कांग्रेस के सबसे बड़े नेता हैं और सबसे बंडे पद पर उन्हें ही होना चाहिए। कांग्रेस से बाहर होने के बावजूद महाराष्ट्र में शिवसेना और भाजपा को सत्ता से बाहर रखने के लिए उन्होंने कांग्रेस के साथ हाथ मिला लिया। उसी मजबूरी के तहत वे 2004 में केन्द्र में भी कांग्रेस के साथ यूपीए में आ गए। लेकिन महाराष्ट्र में दोनों पार्टियों के बीच में सहयोग के बावजूद प्रतिस्पर्धा जारी है। कांग्रेस चाहती है कि शरद पवार की पार्टी वहां कमजोर हो जाए। शरद पवार चाहते हैं कि 2014 के चुनाव में उनकी पार्टी को राय में कुछ च्यादा सीटें मिलें, ताकि वे केन्द्र में सरकार के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएं। यह भूमिका वे राय सभा में रहकर भी निभा सकते हैं। यदि गैर कांग्रेस गैर भाजपा की सरकार बनने की नौबत आई तो वे प्रधानमंत्री बनने की भी कोशिश कर सकते हैं, क्योंकि अनेक पार्टियों के नेताओं से उनक अच्छे निजी ताल्लुकात रहे हैं।
जाहिर है शरद पवार अभी राजनीति से रिटायर नहीं होने जा रहे हैं। उनके पास अनेक योजनाएं हैं और उन योजनाओं का खुलासा वे 2014 में ही करेंगे।

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