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THE HIMALAYAN DISASTER: TRANSNATIONAL DISASTER MANAGEMENT MECHANISM A MUST

We talked with Palash Biswas, an editor for Indian Express in Kolkata today also. He urged that there must a transnational disaster management mechanism to avert such scale disaster in the Himalayas. http://youtu.be/7IzWUpRECJM

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS TALKS AGAINST CASTEIST HEGEMONY IN SOUTH ASIA

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Sunday, April 22, 2012

जमीन बेचने को वे हजारों पेड़ काट सकते हैं लेखक : विनीता यशस्वी :: अंक: 15 || 15 मार्च से 31 मार्च 2012:: वर्ष :: 35 :April 11, 2012 पर प्रकाशित

http://www.nainitalsamachar.in/they-can-cut-thousand-trees-for-land-sale/

जमीन बेचने को वे हजारों पेड़ काट सकते हैं

tree-cuttingपिछले दिनों नैनीताल के नजदीक के गाँवों में घूमते हुए यह समझ में आया कि बाहर से ही लोग यहाँ आकर जमीनें नहीं खरीद रहे हैं, बल्कि गाँवों में भी दलालों की एक फौज तैयार हो गई है, जो बाहर से आने वालों को पकड़ कर जमीनें बेच रही है। यह भी उल्लेखनीय है कि एक इलाके के दलाल के तार दूसरी जगह के दलाल से जुड़े हुए हैं और वे एक दूसरे के पास ग्राहकों को भेजते रहते हैं।

हम मोतियापाथर पहुँचे ही थे कि एक ब्रोकर (दलाल) हमारे पीछे लग गया। हमने भी मजाक-मजाक में उस से कह दिया कि हमें 100 नाली जमीन चाहिये। उसने हमें कई तरह के भूखण्ड दिखा दिये। ऐसी जमीनें, जिन्हें देखकर मुँह में पानी आ जाये। जमीनों के दामों में भी फर्क था। ढाई-तीन लाख रुपया प्रति नाली से लेकर पाँच-छः लाख रु. नाली तक।

नथुवाखान की बाजार में तो काफी दलाल मिले, जिन्होंने हमें हरतोला की तीन-चार जमीनें दिर्खाइं। दो जमीनों के मालिक बाहर जा चुके थे और इसलिये जमीन बेचना चाहते थे। पर दो जमीनों के मालिक अब भी गाँवों में ही थे। उनमें से एक का इरादा था कि जमीन बेच कर कुछ और काम शुरू करेगा। दूसरी जमीन का मालिक हल्द्वानी में जमीन खरीदने के लिये यहाँ की जमीन बेच रहा था। हमने हरतोला की एक जमीन, जिसके मालिक बाहर थे, को लेकर पसंदगी जाहिर की तो अचानक ही जमीन का दाम, जो तीन लाख रु. के आसपास था, बढ़ कर छः लाख रुपये नाली हो गया। वजह थी कि जमीन का सड़क के एकदम पास प्राइम लोकेशन पर होना और वहाँ से हिमालय दिखना। हरतोला में ज्यादातर जमीनें बिक चुकी हैं और उन पर होटल, भवन आदि बन चुके हैं। यहाँ की जमीनों में बगीचे थे। अब बाकी भूपतियों की भी पूरी कोशिश है कि उनकी जमीनें बिक जायें। एक व्यक्ति तो हमारी किसी भी शर्तं पर जमीन बेचने को तैयार था। एक अन्य व्यक्ति हमें जमीन बेचने के लिये कच्ची सड़क को पक्की करवा के देने को भी तैयार था। नथुवाखान में हमने एक दलाल से पूछा कि हमें पानी कैसे मिलेगा ? यदि हम गाँव का पानी लेते हैं तो ग्रामीण आपत्ति करेंगे। इस पर खुद न सिर्फ ब्रोकर का, बल्कि वहाँ मौजूद अन्य जमीन मालिकों का कहना था कि नहीं ! हम आपको पानी का कनेक्शन लगा कर देंगे। कोई आपत्ति करेगा भी तो उसे कुछ रुपये दे कर मना लेंगे! हम हैरान रह गये।

लेटीबुंगा पहुँचने तक हम जमीन के खरीददार की भूमिका में पूरी तरह ढल गये थे। वहाँ हमने एक शानदार जमीन देखी। मगर सड़क की परेशानी थी। ब्रोकर से पूछा तो उसने बताया कि सड़क के लिये कुछ जमीन दूसरे गाँव से लेनी होगी। उसने बात की है। थोड़ा पैसा देकर जमीन मिल जायेगी। इससे उसे भी फायदा होगा, क्योंकि सड़क आने से उसकी जमीन के दाम भी बढ़ जायेंगे। गुनियालेक में एक अन्य ब्रोकर, जिसके पास हमें लेटीबुंगा के ब्रोकर ने भेजा था, ने हमें एक बंजर पड़ा बिल्कुल खड़ा भीड़ा दिखलाया। एक कच्ची बटिया जमीन तक जाती थी। मगर इसके भी दाम दो-ढाई लाख तक जा रहे थे। ब्रोकर ने गारंटी दी कि वह हमें इस कच्ची बटिया को पक्का करके देगा। इसकी पूरी सरदर्दी वो खुद ही उठायेगा।

पदमपुरी से आगे अभी सड़क का काम चल रहा है, जिसे मार्च में पूरा हो जाना है। यहाँ की जमीनों के दाम अभी से बढ़ गये हैं। जिनकी जमीनों को सड़क छू रही है, वे अभी से अपने को करोड़पति मान रहे हैं। जिनकी जमीनें सड़क से थोड़ा दूर पड़ रही हैं, वे अपनी जमीन तक सड़क लाने की जुगत में हैं। यहाँ हम क्वीरा गाँव की एक जमीन पसंद कर रहे थे तो बात यहाँ पर आकर अटकी कि जमीन तक सड़क जाने का जुगाड़ नहीं था। बीच में बहुत सारे पेड़ पड़ते थे। हमने कहा कि इन पेड़ों को काटना तो हमारे लिये संभव नहीं होगा। हमें जमीन दिखाने आये सज्जन, जो अपने को पंचायत का निर्वाचित जन प्रतिनिधि बता रहे थे, ने आश्वस्त किया कि वे खुद जमीन तक सड़क बना कर देंगे। हमने शंका जाहिर की कि कानूनन तो एक भी हरा पेड़ नहीं काटा जा सकता तो वे साहब जोश में आ गये, ''अरे मैडम, इसके लिये आपको परेशान होने की जरूरत नहीं है। वो सब मैं देख लूँगा। अपने गाँव तक सड़क लाने के लिये मैंने आठ हजार पेड़ जेवीसी से उखाड़ कर नदी में बहा दिये। बारिश का मौसम था। सब बह गये। फॉरेस्ट वालों को पैसे दे दिये।'' हो सकता है, वह हम पर रौब जमाने के लिये यह सब कह रहा हो, लेकिन हमारे तो होश उड़ गये। हम कल्पना भी नहीं कर सकते थे कि इतनी बड़ी तादाद में पेड़ काटे जा सकते हैं। यहाँ ऐसे लोग भी मिले जो हमें किसी अन्य की जमीन बेच कर लपेटने के चक्कर में थे। जमीनों को लेकर हर कोई बहती गंगा में हाथ धोना चाह रहा था।

गरमपानी, खैरना की ओर के सिल्टोना, जजूला, जजूली, धौड़ा, धौड़ी, बजेड़ी, बजेड़ी-ल्यूटा जैसे कई गाँव थे, जहाँ जमीनें बिक रही हैं। ये गाँव सड़कों से मिल गये हैं, इसलिये जमीनें बिकती जा रही हैं। मल्ला धनियाकोट, तल्ला धनियाकोट में जमीनें बेचने वाले लोग तो कम मिले, पर मालूम पड़ा कि यहाँ शराब का प्रकोप बहुत अधिक है। हली-हरतप्पा, पिछल्टाना होते हुए हमने तल्ला रामगढ़ के इलाके में भी बहुत जमीनें देखीं और फिर खबराड़ वाले रास्ते से वापस लौट आये। इन जगहों पर बेतहाशा होटल और भवन बन रहे हैं। जमीनें धड़ाधड़ बिक रही हैं।

इन 5-6 दिनों की घुमक्कड़ी में मैंने जाना कि भूमाफिया बाहर से नहीं आता। असली भूमाफिया तो यहाँ के लोग हैं। अनेक युवाओं के लिये यह पेशा है। वे पार्टियों को घेरते हैं। उन्हें तरीके बताते हैं कि कानून से किनाराकशी कर सवा नाली से ज्यादा की जमीन कैसे ली जा सकती है या अनुसूचित जाति के व्यक्ति की जमीन कैसे खरीदी जा सकती है ? कैसे पानी का जुगाड़ हो सकता है ? कैसे सड़क बन सकती है ? कैसे पैसों का लेन-देन हो सकता है ?

जमीन बिकने के बहुत से कारण है। खेती से गुजारे लायक पैसा नहीं निकल पाता। साल भर हाड़-तोड़ मेहनत करने के बाद भी लोग कर्ज में ही डूबे रहते हैं। खुद अपनी जरूरत के अनाज तक के लिये वे बाजार पर निर्भर हैं। सिंचाई की व्यवस्था नहीं है। फसल ठीक-ठाक भी हो गई तो सही कीमत नहीं मिल पाती। जमीनें जब भाइयों के बीच बँटने लगती हैं तो छोटी जोत और अधिक अलाभकारी हो जाती है। सुअर आदि जंगली जानवरों ने खेती को चैपट कर दिया है। इन्हें मारने की भी इजाजत नहीं है। रोजगार का और कोई जरिया नहीं है। इस कारण लोग अब जमीन को बेच कर कोई आराम वाला काम करना चाहते हैं। इस दौरान हम जितने भी ब्रोकरों से मिले, वे सभी 17 से 30 साल के बीच के ही थे और उनके पास अन्य किसी तरह का रोजगार नहीं था। नौकरी के लिये बाहर चले गये लोगों को भी जमीनों को बेच देना अच्छा सौदा लगता है। औरतें चोरी-चुपके जंगलों से चारा-पत्ती लाती हैं। हमने सड़क के किनारे के बाँज के ठूँठ पड़े पेड़ों को देखा। मगर उन औरतों की भी मजबूरी है। उनके पास और कोई साधन ही नहीं है अपने जानवरों को पालने का। एक बात और दिखाई दी कि गाँवों में दवाइयों की या जरूरत की दूसरी चीजों की दुकानें चाहे न हों, शराब की दुकानें सर्वत्र हैं। लोग अपनी पूरी मेहनत को इन शराब की दुकानों में उडेल रहे हैं।

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