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THE HIMALAYAN DISASTER: TRANSNATIONAL DISASTER MANAGEMENT MECHANISM A MUST

We talked with Palash Biswas, an editor for Indian Express in Kolkata today also. He urged that there must a transnational disaster management mechanism to avert such scale disaster in the Himalayas. http://youtu.be/7IzWUpRECJM

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS TALKS AGAINST CASTEIST HEGEMONY IN SOUTH ASIA

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Sunday, April 22, 2012

भाषाई सेतु की दरकार

भाषाई सेतु की दरकार


Sunday, 22 April 2012 13:27

प्रभाकर श्रोत्रिय 
जनसत्ता 22 अप्रैल, 2012: जनतंत्र का अर्थ शायद हम केवल 'अभिव्यक्ति की स्वाधीनता' लेते हैं, पर इस अर्थ में भी वह अधूरी है, अगर उसके साथ 'संयम' नहीं है। असंयत अभिव्यक्ति से हमारा राजनीतिक और सामाजिक जीवन भरा पड़ा है। इसका एक नतीजा यह होता है कि हमारी सार्थक विचार और शब्द-संपदा अभिव्यक्तियों की भीड़ में खोकर व्यर्थ हो गई है और राजनीतिक दुरभिसंधियां, शिथिल और भ्रष्ट नौकरशाही, सामाजिक और व्यक्तिगत स्तर की अनैतिकता हमारी सारी सदिच्छाओं, सद्प्रयत्नों, कर्मठता, बौद्धिकता, प्रतिभा और तमाम ऐसी चीजों को आच्छादित किए हुए है, जो हमारे समय, समाज और चेतना को आगे ले जाती हैं। हमारे पिछड़ेपन का यह भी एक संचालन-केंद्र है। 
अपने संयत और सार्थक रूप में भी अकेली 'अभिव्यक्ति की स्वाधीनता' तब निष्फल हो जाती है जब उसे क्रियान्वयन का बल नहीं मिलता। बहरी और भ्रष्ट सत्ता ने ऐसे सारे उपाय खोज और आजमा लिए हैं, जो उसकी निष्क्रियता के रक्षा-कवच हैं। ऐसी स्थिति में अभिव्यक्ति की स्वाधीनता जंजीरों में जकड़े कैदी की, न सुनी जाने वाली चीख के मानिन्द है। यही हमारी नैतिक विडंबना का केंद्र है। 
विचारों के निष्फल होने से हमारे आसपास भ्रांत आशावाद और थोथी कल्पना के हिमालय जैसे पहाड़ खड़े हो गए हैं; वहां से गंगाएं नहीं फूटतीं, बल्कि सिर्फ ऐसे ग्लेशियर स्खलित होते हैं, जो बस्तियों को चौपट करते और जो कुछ है; उसे भी मिटा देते हैं। 
लोहिया ने जब कहा था कि संसद, रचनात्मक कार्य और सत्याग्रह के बिना जनतंत्र का कोई मायने नहीं निकल पाएगा, तब वे कहना चाहते थे कि राजनीतिक इच्छाशक्ति, सामाजिक कार्यशक्ति और संघर्ष की अडिगता के बिना प्रजातंत्र का वह चक्र पूरा नहीं होगा, जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से शुरू होता है। 
हमारे समय में, खासकर आजादी के बाद से ही किसी न किसी अर्थ में हमारा यह चक्र अधूरा रहा है। इसी से हमारी गाड़ी सही नहीं चल पा रही है। इस चक्र के अधूरेपन की एक हानि हमारी राष्ट्रीय विविधता और भावात्मक एकता को हो रही है, जिसका गुणगान करते और जिस पर गर्व करते हम नहीं अघाते। क्या इन शब्दों की अर्थवत्ता इन्हें तकियाकलाम की तरह बार-बार इस्तेमाल करने में ही है? 
प्रश्न है कि इस दिशा में हमने कौन-से रचनात्मक काम किए हैं? सही बात यह है कि इस पर हमने सोचा ही नहीं है, करना तो दूर। भाषाओं तक को हम पास-पास नहीं ला पाए और उनका संश्लेषण तो हमारे सपने में भी दस्तक नहीं देता। शिक्षा-नीति के प्रारंभिक दौर में ऐसी सुविचारित योजना बनी अवश्य थी, पर हमारे क्षेत्रीय स्वार्थ, अदूरदर्शिता, राजनीतिक घमासान और हर चीज को प्रारूपिकता में ढाल कर बेजान बनाने की कीमियागरी ने उसे सार्थक नहीं होने दिया। 'भावात्मक एकता' पर यह हमारा आत्मघाती आघात था। 
यह नए सिरे से सोचने का वक्त है। क्योंकि तेजी से हमारा वैविध्य और विशिष्टता नष्ट हो रही है। भूमंडलीकरण अपना रोड-रोलर घुमा कर सब कुछ चपटा और सपाट करने पर तुला है। चंद पूंजीपति देशों का इरादा है कि बाजार-केंद्रित नए सत्तावाद के लिए विश्व के खान-पान, रहन-सहन, आचार-विचार, कला-कौशल और सोच-संस्कृति ही नहीं, उसकी भाषाओं पर भी अपनी भाषा की प्रभुसत्ता स्थापित कर लें; यह सब विश्व को एक करने, उसे ग्लोबल विलेज में तब्दील करने के नाम पर हो रहा है। इस 'ग्लोबल' में 'लोकल' की कोई जगह नहीं है, 'विविधता' और 'स्वत्व' के लिए कोई ठिकाना नहीं है। शिकारी जिस जंगल में घुसा है, वह है- तीसरे देशों का समूह। 
असम की साहित्य सभा के अभी संपन्न हुए सम्मेलन का नारा था- 'चिर चेनेही मोर भाषा जननी'- 'मेरी भाषा-मां चिर स्नेही है'। मां के अलावा चिर स्नेह किसका होता है? इसका उद्घोष करने और सार्थक करने के लिए एक छोटी-सी सीमांत बस्ती 'लिडू' में दो लाख से अधिक लोग अपनी विपन्नता के बावजूद, पूरे संपन्न वैविध्य में एकत्र थे। दृश्य रोमांचित और आह्लादित करने वाला था। 
खैर, यह अगाध, अकलुष प्रेम ही भाषाओं को बचाएगा। 
प्रेम की इस अगाधता को अपनी जगह सुरक्षित और संवर्द्धित रखते हुए इतनी समृद्ध भाषाओं के इस देश में उन्हें पास-पास लाना, स्नेहिल बनाना क्या संभव हो पा रहा है? शायद इसलिए नहीं कि भाषाओं के बीच संवाद का हमारा उपक्रम नितांत औपचारिक, अधूरा और अविश्वसनीय है। 
भौतिक एकता तो भौगोलिक, राजनीतिक या परिस्थितिजन्य भी हो सकती है। क्या भौगोलिक कारण से सैकड़ों, हजारों वर्ष से एक रहा यह देश विभाजन के बाद दो नहीं हो गया? और हमारी एकता दो इकाइयों में नहीं बदल गई? युद्ध-काल में देश कितना संगठित हो जाता है? जबकि उसके खत्म होते ही बिखराव आना शुरू हो जाता है। 

>पर भावात्मक एकता बाहरी संरचनाओं से उतनी प्रभावित नहीं होती। तभी देशों के विभाजन के बाद भी नागरिकों के भीतर कहीं न कहीं एकात्मता का संचार होता रहता है। भारत, बर्लिन या सोवियत संघ के राजनीतिक और भौगोलिक विभाजन के बाद भी सीमा के आरपार के लोगों के भीतर भावात्मकता का अदृश्य संचार क्या कोई रोक सका है? 
भाषा और संस्कृति हमारे भावात्मक मिलन की पवित्र भूमियां हैं। 'भाषा' अनेकरूपा होते हुए भी हमारी राष्ट्रीय एकता की प्रतीक है। हम अक्सर कहते हैं कि भारत की अनेक भाषाओं में 'एक' साहित्य लिखा जाता है। पर इस दिशा में हमने क्या रचनात्मक पहल की? 'भाषा' कोई मूर्ति नहीं है कि पास-पास बिठा कर पूजा जाए; 'संप्रेषण' है, 'संचार' है। उस तक पहुंचने के लिए हमें उसके   भावजगत और बौद्धिक जगत से गुजरना होता है। यह काम परस्पर अनुवाद के जरिए ही किया जा सकता है। 
हिंदी की लगभग सभी पत्र-पत्रिकाएं और प्रकाशन बड़े पैमाने पर आग्रह पूर्वक अन्य भाषाओं के अनुवाद छापते हैं। भारतेंदु से लेकर अब तक के अनेक महत्त्वपूर्ण लेखकों ने अनुवाद को अपने रचनात्मक कर्तव्य में शामिल किया है। बांग्ला की महाश्वेता देवी स्वीकार करती हैं कि मैं पहले केवल बांग्ला भाषा की लेखिका थी, हिंदी में प्रकाशित होने के बाद मैं राष्ट्रीय लेखिका बन गई हूं। हिंदी में अनूदित प्राय: हर बड़े लेखक की यही स्थिति है। 
पर इस विषय में हिंदी की ओर से कुछ शिकायत है। यह देख कर कुछ अस्वाभाविक-सा लगता है कि न केवल हिंदी का भारतीय भाषाओं में अनुवाद बहुत कम होता है, बल्कि भारतीय भाषाओं का परस्पर अनुवाद भी बहुत कम हो रहा है- यहां तक कि पड़ोस की भाषाओं का भी। तमिल-मलयालम, कन्नड़-मराठी, बांग्ला-उड़िया या पूर्वोत्तर की भाषाओं का भी परस्पर बहुत कम अनुवाद होना उनके बीच के अबोले की तरह है। इसका अर्थ है कि जिस भावात्मक एकता का हम ढिंढोरा पीटते हैं उसकी कड़ी न केवल राष्ट्रीय स्तर पर, बल्कि निकट पड़ोस में भी ढीली है। हमारे अपने देश में- यहां तक कि निकट पड़ोस में, अगर दो भाषा के लोगों को एक विदेशी भाषा में संवाद करना पड़े तो इससे ज्यादा दुर्भाग्य क्या होगा? पर शिकायतों से कुछ नहीं होगा, कोई सक्रिय कदम उठाना होगा। 
यानी भारतीय भाषाओं को पास लाने के लिए बहुत से उपाय करने होंगे। उनमें प्रमुख मुझे यह लगता है कि देश में अनुवाद का एक विश्वविद्यालय यथाशीघ्र खोला जाना चाहिए। विश्वविद्यालय एक ऐसा संस्थान होता है, जो प्रशिक्षण के अलावा उपाधियां भी देता है, जो अनुवादकर्मियों के लिए अनेक अवसर खोलने के प्रामाणिक दस्तावेज का काम देंगी और अकुशल लोगों की भीड़ पर अंकुश लगेगा।
ऐसे संस्थानों से आशा की जाती है कि वे साधन संपन्न होंगे और अनुवाद संबंधी सारे उपकरण और प्रविधियां उपलब्ध करा सकेंगे। इसका उपोत्पाद यह होगा कि विभिन्न भाषाओं के प्रकाशक सुंदर अनुवाद प्रकाशित करने में रुचि लेंगे और अनुवादकों की योग्यता के प्रति आश्वस्त भी होंगे। 
दुर्भाग्य है कि हमारे संस्थान, खासकर सरकारी और सरकार समर्पित संस्थान, व्यक्ति-केंद्रित हो जाते हैं। हम उन्हें संस्था के रूप में विकसित नहीं कर पाते। इससे अच्छा व्यक्ति आता है, तो उसकी प्रगति होती है और अयोग्य आदमी आता है तो न केवल उसे नष्ट करता, बल्कि आगे का रास्ता भी बंद कर देता है। और सब जानते हैं कि चारों ओर किस स्तर के चयन होते हैं। पर ऐसे तमाम संस्थानों में उचित, व्यापक, विश्वसनीय और सर्वांगीण कार्य क्या सही अवधारणा तक मूल में ही गायब हैं। इसका अर्थ यह है कि यह दिशा भी है, जिसमें काम होना है।
अनुवाद का अर्थ केवल साहित्य का नहीं, ज्ञान के सभी क्षेत्रों में भाषाई अवदान का है। बहुभाषी कोश-निर्माण, उनका संवर्धन, विश्वकोश के निर्माण आदि के साथ देश भर की चुनी हुई रचनाओं के प्रामाणिक अनुवाद भी वहां जारी रह सकें तो विश्वविद्यालय के कार्य का प्रमाण भी देश के सामने आ सकेगा। यह शैक्षिक संस्थान अगर एक स्वतंत्र 'गांव' की तरह विकसित हो, जो तमाम शोरगुल से अलग एक शांत वातावरण एकाग्रता और समर्पण से अपना कार्य कर सके तो शायद अधिक सार्थक होगा- जैसा शिमला का उच्च अध्ययन संस्थान है या शांति निकेतन का पुराना रूप था।
यह संस्थान भावात्मक एकता की एक पवित्र भूमि हो सके और विभिन्न भाषाओं के लिए अनेक रचनात्मक काम कर सके तो इसमें जीवंतता और प्रगाढ़ता बन सकती है। हां, जोड़ने वाली भाषा के रूप में हमारी अपनी देश-भाषा हिंदी हो न कि कोई विदेशी भाषा। यह विदेशी भाषाओं का विरोध नहीं है उन्हें अध्ययन के उपकरण के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है, संवाद की केंद्रीय आसंदी नहीं दी जा सकती।

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