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THE HIMALAYAN DISASTER: TRANSNATIONAL DISASTER MANAGEMENT MECHANISM A MUST

We talked with Palash Biswas, an editor for Indian Express in Kolkata today also. He urged that there must a transnational disaster management mechanism to avert such scale disaster in the Himalayas. http://youtu.be/7IzWUpRECJM

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS TALKS AGAINST CASTEIST HEGEMONY IN SOUTH ASIA

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Thursday, May 3, 2012

काशीनाथ की कुकुर कथा का पुनर्पाठ

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काशीनाथ की कुकुर कथा का पुनर्पाठ

काशीनाथ की कुकुर कथा का पुनर्पाठ

By  | May 3, 2012 at 5:49 pm | No comments | शब्द

सुभाष राय 
पिछले दिनों लखनऊ में तद्भव के परिसंवाद में काशीनाथ सिंह ने कोई गलतबयानी नहीं की। साहित्यकार सीवान में भौंकता कुत्ता है, जिसकी बात कोई नहीं सुनता। इसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए। यह केवल विवाद पैदा करके खबरों में आने जैसी बात नहीं है, न ही किसी तरह की जल्दबाजी में कही गयी हल्की बात है। काशी हमेशा सहज परंतु गंभीर रहते हैं। उनका कोई एक वाक्य भी बगैर अनुभव के नहीं होता, परखे-जांचे बगैर वह कुछ कहते नहीं। तमाम लोग लगातार साहित्य और उसके प्रभाव संबंधी सवालों से जूझते रहते हैं। कुत्ते का भौंकना साहित्यकार के निजी व्यक्तित्व की ओर संकेत भर नहीं है, यह उसके लिखे हुए, उसकी रचनाओं की ओर भी इंगित करता है। यह बहुत स्पष्ट नहीं हुआ कि उन्होंने यह टिप्पणी केवल वर्तमान लेखन को लेकर की या फिर इसका अतीत की ओर भी विस्तार है लेकिन जिस संदर्भ में उन्होंने यह बात कही, उससे समझा जा सकता है कि उनकी इस बात का संबंध साहित्य की अद्यतन दुनिया से है। अगर ऐसा है तो सवाल यह भी खड़ा होता है कि यह हालत आखिर बनी क्यों? इन्हीं काशीनाथ सिंह ने कभी यह भी कहा था कि प्रेमचंद अब भी पाठकों की दुनिया केसरताज हैं। वे आज भी सबसे ज्यादा पढ़े जाते हैं, उनकी किताबें किसी भी नये लेखक से ज्यादा बिकती हैं। उनकी इस स्वीकारोक्ति में यह तथ्य भी निहित है कि प्रेमचंद प्रभावित करते हैं, उनकी शैली, उनकेबात कहने का अंदाज असर डालता है और जो असर डालता है, वही तोड़ता है, बदलता भी है। उन्हें पढ़ते हुए पाठक के भीतर कुछ पुराना नष्ट होता है, कुछ नया निर्मित होता है। नजरिया, विचार या जो कुछ नाम दें उसे।
काशीनाथ की बात यथावत स्वीकार कर ली गयी हो, ऐसा नहीं है। उसी मंच से उन्हें चुनौती भी मिली। कथाकार शिवमूर्ति ने उन्हें पोंकिया लिया। उनका कहना था कि साहित्य केवल संस्कारित करता है, वह एक कल्चर का निर्माण करता है। इसके बावजूद काशीनाथ सिंह की बात पर विचार करना  जरूरी है, उन सबके लिए जरूरी है, जो लिखते-पढ़ते हैं। शिवमूर्ति की बात सुनने में  अच्छी लगती है लेकिन व्यवहार में खरी नहीं दिखती। जो निरंतर साहित्य पढ़ते या लिखते हैं, क्या वे सब संस्कारित हो चुके हैं, क्या उनमें वह कल्चर दिखायी पड़ता है, जिसकी ओर शिवमूर्ति का संकेत है? अगर वही लोग अभी संस्कारित नहीं हुए तो शिवमूर्ति आखिर किसकेसंस्कार की बात कर रहे हैं? आम लोगों का तो सामान्य तौर पर इस दुनिया से साबका ही नहीं है, जो कुछ शौकिया पढऩे वाले हैं, उन तक आप पहुंच कहाँ पाते हैं? बेशक हिंदी में बहुत सारी पत्रिकाएं प्रकाशित हो रही हैं पर कितनी संख्या में, कितनी पहुंच केसाथ? और कितनी हैं, जिनके संपादकों में साहित्य की समझ है? उनके पढ़े जाने की संभावना कितनी है? जहाँ तक पुस्तकों का प्रश्न है, कहानी, कविताओं या अन्य विधाओं में प्रतिदिन आने वाली सैकड़ों पुस्तकों में से कितनी ऐसी हैं, जिनमें कल्चर बदलने या निर्मित करने वाला साहित्य आ रहा है।
ऐसे में शिवमूर्ति केअमोघखंडक शस्त्रों केबावजूद काशीनाथ सिंह की मिसाइल पर कोई असर पड़ता नहीं दिखायी पड़ता। अगर आज के रचनाकार ने अपनी हालत भौंकने वाले कुत्ते की बना ली है तो इसके  लिए उसके अलावा कौन जिम्मेदार हो सकता है? ऐसा क्या हो गया है कि वह कोई बड़ा प्रभाव नहीं छोड़ पा रहा है? ऐसा क्या हो गया है कि वह बड़े वर्ग में अनसुना, अनपढ़ा रह जाता है?  उसकी असरकारी शक्ति में कमी क्यों आ गयी है? कथाकार ममता कालिया या कई और लोग कह सकते हैं कि कविता, कहानी सत्ता को हिला सकती है, उसे बेचैन कर सकती है। वे गुंटर ग्रास का उदाहरण दे सकते हैं। पर हमारे उदाहरण हमेशा हमारी अपनी भौगोलिक या सांस्कृतिक सत्ता के बाहर से ही क्यों आते हैं? कोई गुंटर ग्रास हिंदुस्तान में क्यों नहीं दिखायी पड़ता? हम मिशेल फूको, काफ्का या इन जैसे तमाम लेखकों, रचनाकारों के नाम लेकर थोड़ी देर के लिए चमकने की कोशिश क्यों करते दिखायी पड़ते हैं? हमारे पास क्या कुछ अपना बचा नहीं रह गया है?
विभिन्न स्तरों पर अनेक तरह की समाजविरोधी प्रत्यक्ष, परोक्ष ताकतों की पहचान कर लेने भर से तो काम नहीं चलेगा। शब्दों में ताकत है, ठीक बात है लेकिन शब्दों केप्रभाव को लेकर ही जब हम दुविधा में हैं या यह समझते हैं कि शब्द न प्रतिरोध कर सकते हैं, न क्रांति कर सकते हैं तो रणभूमि में सामने उपस्थित खतरनाक शक्तियों को नाभि तक पहुंचने से कैसे रोक पायेंगे। शिवमूर्ति को कई बार हमने कहते सुना है कि लेखक तो कायर होता है, वह सुरक्षित दूरी से खतरों को देखता है, वह लड़ता नहीं है, लडऩा उसका काम नहीं है। यद्यपि लडऩे वाले लोग प्रथम श्रेणी केलोग हैं और वे किसी भी लेखक या साहित्यकार से ज्यादा महत्वपूर्ण काम कर रहे हैं पर यह काम लेखक का नहीं है। चलिये कोई बात नहीं, लेकिन लेखक जो काम कर रहा है, उसके परिणाम केप्रति वह कितना आश्वस्त है? आप कहते हैं कि राम चरित मानस श्रेष्ठï साहित्यिक रचना है, वाल्मीकि रामायण अद्वितीय साहित्यिक योगदान है पर धर्म उसका हिंसा केऔचित्य प्रतिपादन में सफलतापूर्वक इस्तेमाल कर रहा है। जब आप ऐसा कहते हैं तो उन धार्मिक शक्तियों के आगे आपका समर्पण भी दिखायी पड़ता है, क्योंकि आप केपास इतनी भी शक्ति नहीं कि अपने श्रेष्ठï साहित्य को इस्तेमाल होने से बचा सकें, धर्म के षडय़ंत्र को नाकाम कर सकें। आज अगर तुलसीदास इस्तेमाल हो गये, वाल्मीकि इस्तेमाल हो गये तो बाकियों की क्या गारंटी? क्या आप देख पा रहे हैं कि दुष्यंत कुमार इस्तेमाल हो रहे हैं, धूमिल इस्तेमाल हो रहे हैं? तमाम कायर, बेईमान और भ्रष्टï शक्तियाँ इन्हें भी अपनी काली छायाओं पर रोशनी का पर्दा डालने में इस्तेमाल कर रही हैं।
 जाने-अनजाने पुरस्कार, धन और अन्य सुख-सुविधाओं की चाह में अनेक लेखक और साहित्यकार भी सत्ता के परोक्ष या प्रत्यक्ष पायदानों पर घुटने टेकते दिखायी पड़ते हैं। नहीं कहता, सभी लेकिन कई और कई बड़े-बड़े भी। आप साहित्यकार हैं पर क्या आप मौका मिलते ही इस्तेमाल होने को तैयार नहीं हैं? क्या आप जानते हैं कि आप बिल्कुल इस्तेमाल नहीं हो रहे हैं? माना आज नहीं पर कौन जाने कल आप भी इस्तेमाल हो जायें। अगर साहित्य और साहित्यकार की शक्ति कम हुई है, असर कम हुआ है तो इसका कारण बिल्कुल यही है कि वह आम पाठक से दूर होता गया है, वह खास बनता गया है, वह अपने चमकीले आवरण तक साधारण लोगों को पहुंचने नहीं देना चाहता। तमाम लेखकों को रोग है महामंडलेश्वर बनने का। जो नहीं बन पाते, वे किसी ऐसे छद्म बीतरागी की शरण में चले जाते हैं। जो बन जाते हैं, वे अपनी उस  छवि से बाहर नहीं आना चाहते, कुर्सी से नीचे नहीं उतरना चाहते। फिर तो भौंकने की कला केअलावा बचेगा क्या?
सुभाष राय

सुभाष राय वरिष्ठ पत्रकार हैं, जन्म जनवरी १९५७ में मऊ नाथ भंजन के बड़ा गाँव में. प्रारंभ से ही लेखन में रूचि. छात्र जीवन से ही कविताओं, कहानियों तथा लेखों का प्रकाशन. शिक्षा-दीक्षा काशी, प्रयाग और आगरा में. भाषा और साहित्य में स्नातकोत्तर. संत कवि दादू दयाल के रचना संसार पर शोध के लिए आगरा विश्व विद्यालय से पीएच- डी की उपाधि. लोकगंगा, वर्तमान साहित्य, वसुधा, अभिनव कदम, शोध-दिशा, मधुमती, अभिनव प्रसंगवश, समन्वय जैसी श्रेष्ठ साहित्यिक पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन.फिलहाल डेली न्यूज एक्टिविस्ट के संपादक.

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