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THE HIMALAYAN DISASTER: TRANSNATIONAL DISASTER MANAGEMENT MECHANISM A MUST

We talked with Palash Biswas, an editor for Indian Express in Kolkata today also. He urged that there must a transnational disaster management mechanism to avert such scale disaster in the Himalayas. http://youtu.be/7IzWUpRECJM

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS TALKS AGAINST CASTEIST HEGEMONY IN SOUTH ASIA

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Wednesday, July 18, 2012

Fwd: [New post] बिहार : तीन मुखियाओं की कहानी और 2014 का चुनाव अभियान



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From: Samyantar <donotreply@wordpress.com>
Date: 2012/7/18
Subject: [New post] बिहार : तीन मुखियाओं की कहानी और 2014 का चुनाव अभियान
To: palashbiswaskl@gmail.com


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बिहार : तीन मुखियाओं की कहानी और 2014 का चुनाव अभियान

by समयांतर डैस्क

anti-asbestos-movementपहले मुजफ्फरपुर जिले के मारवन ब्लॉक के अंतर्गत झाखरा शेख पंचायत के पूर्व मुखिया तारकेश्वर गिरी को फर्जी केस में फंसा कर दो महीने चार दिन के लिए जेल में बंद रखा गया। वह 2001-5 के दौरान मुखिया थे। इसके बाद उनकी सीट आरक्षित श्रेणी में आ गई। उन पर लगा फर्जी केस आज भी मुजफ्फरपुर के अतिरिक्त सेशन जज की अदालत में चल रहा है। अगली सुनवाई 27 जून 2012 को थी। उनका गुनाह यह था कि वह 'खेत बचाओ, जीवन बचाओ संघर्ष समिति' के झंडे तले गांव के खेतों में लगाई जाने वाली सफेद एस्बेस्टॉस की फैक्ट्री के निर्माण का विरोध कर रहे थे। सफेद एस्बेस्टॉस 55 देशों में प्रतिबंधित है और भारत में भी तकनीकी तौर पर इसकी खुदाई प्रतिबंधित है, इसके व्यापार, उत्पादन और इस्तेमाल पर फैसला केंद्र सरकार के पास विचाराधीन है। स्वास्थ्य का मामला राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है।

यदि राज्य सरकार यह मानती है कि उसके नागरिकों के स्वास्थ्य पर यथासंभव ध्यान दिया जाना चाहिए तो वह एस्बेस्टॉस से जुड़े काम/कारोबार को उसी तरह से प्रतिबंधित कर सकती थी जिस प्रकार खतरनाक कीटनाशक एंडोसल्फान को केरल की सरकार ने प्रतिबंधित किया है। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। जबर्दस्त जनप्रतिरोध और पुलिस की गोलीबारी से बिगड़े हालातों के मद्देनजर इस डर से कि कहीं सिंगूर और नंदीग्राम जैसी स्थिति न बन जाए सरकार ने कारखाने के निर्माण के फैसले से अपना समर्थन वापस ले लिया। प्रभावशाली समाजवादी सच्चिदानंद सिन्हा की अगुआई में सोशलिस्ट यूनिटी सेंटर ऑफ इंडिया (कम्युनिस्ट) की पहल पर सभी प्रतिपक्षी पार्टियों, मुख्यतौर पर वाम पार्टियां, ने एक आवाज में सरकार के फैसले का विरोध किया। इस मुहीम में मुजफ्फरपुर और पटना के सिटीजन फोरम ने भी सक्रिय भूमिका निभाई। इस तरह यह सुनिश्चित हो सका कि जनता दल (यू)-भारतीय जनता पार्टी की सरकार सात साल में पहली बार गांव वालों की मांगों के सामने झुक गई। यह पंचायत जद (यू) विधायक के निर्वाचन क्षेत्र के अंतर्गत आती है।

भोजपुर के निवासी, जहां बीहिया और गिधा में एस्बेस्टॉस, जिससे फेफड़ों का असाध्य कैंसर होता है, के तीन कारखाने लगाए गए हैं, उतने भाग्यशाली नहीं रहे, हालांकि वहां भी भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (लिबरेशन) ने इसका विरोध किया था लेकिन वह संयंत्र के निर्माण को रोकने में सफल नहीं हो सकी थी। बीहिया भाजपा के विधायक का निर्वाचन क्षेत्र है। गिधा राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के विधायक का। आरजेडी के विधायक ने राज्य की विधानसभा में इस मामले को उठाया था लेकिन इसका कोई परिणाम नहीं निकला। इस कहानी का सबक यह है कि तारकेश्वर मुखिया को वहां सफलता मिली जहां अन्य असफल हो गए थे। उन्हें भारतीय चिकित्सकों, एस्बेस्टॉस प्रतिबंधित करो आंदोलन, जनआंदोलन का राष्ट्रीय गठबंधन (एनएपीएम)और पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल)का समर्थन मिला और साथ ही पत्रों द्वारा अंतरराष्ट्रीय ख्याति के विज्ञानिकों, चिकित्सकों और अन्य देशों के एस्बेस्टॉस पीडि़त लोगों का भी समर्थन प्राप्त हुआ। जहां तारकेश्वर गिरी को संघर्ष में सफलता मिली वहीं वैशाली, मधुबनी और चंपारण में प्रस्तावित एस्बेस्टॉस संयंत्र के खिलाफ संघर्ष जारी है। यह संघर्ष उस सरकार के खिलाफ है जो जन विरोधी, पर्यावरण विरोधी और जन स्वास्थ विरोधी है।

दूसरे मुखिया औरंगाबाद जिले के हासपुरा ब्लॉक के सनहाथुआ पंचायत के देवेंद्र सिंह (उर्फ छोटे मुखिया)। देवेंद्र सिंह की 29 मार्च, 2012 को हत्या कर दी गई। हत्या में एक सरकारी अफसर का हाथ होने का शक है। अक्टूबर, 2012 को ओब्रा पंचायत के मुखिया आरिफ खान का कत्ल हो गया पर पुलिस उनके कातिल की तलाश नहीं कर पाई है। जब पुलिस कातिल को पकडऩे में नाकाम रही तो 'हत्या विरोधी संघर्ष मोर्चा' के तत्वाधान में 2 मई 2012 को प्रशासन के खिलाफ एक संयुक्त विरोध प्रदर्शन का आयोजन किया गया। पीयूसीएल के एक फैक्ट फाइंडिंग दल ने 13 मई, 2012 को क्षेत्र का दौरा कर मामले को समझने का प्रयास किया। उस रिपोर्ट में बिहार पुलिस की अलोचना है। इस में पुलिस द्वारा भाकपा माले (लिबरेशन) के पूर्व विधायक राजा राम सिंह की पुलिस द्वारा बेरहमी से की गई पिटाई का उल्लेख है। राजा राम सिंह और बिहार के वर्तमान मुख्य मंत्री नीतीश कुमार बिहार कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग (अब इस कॉलेज का नाम नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी कर दिया गया है) में साथ पढ़े हैं । इस घटना के विरोध में भाकपा माले ने अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल का आयोजन किया था जिसे रणवीर सेना के मुखिया ब्रह्मेश्वर सिंह की हत्या के बाद वापस ले लिया गया था। पीयूसीएल की रिपोर्ट में इस बात का भी उल्लेख है कि औरंगाबाद में हत्या के मामलों के कई आरोपियों पर सरकार का वरदहस्त रहा है। यह इस बात को भी रेखांकित करता है कि बिहार पुलिस महिला आंदोलनकारियों को पीटने के साथ अभद्र, अमानवीय और गाली-गलौज की भाषा का इस्तेमाल करती है।

तीसरे हैं ब्रह्मेश्वर सिंह। ये संदेश ब्लॉक (भोजपुर) की खोपिड़ा पंचायत के 1971 से 17 वर्षों तक निर्विरोध मुखिया थे उन्होने सितंबर, 1994 में 'राष्ट्रीय किसान संघर्ष समिति' उर्फ रणवीर सेना का और मई 2012 में 'अखिल भारत राष्ट्रीय किसान संगठन' का गठन किया। सेना का गठन बड़े किसानों के हितों की रक्षा करने के उद्देश्य से किया गया था जो भाकपा माले के पीपुल्स फ्रंट के बरक्स था जिसका उद्देश्य छोटे किसानों और खेतिहर मजदूरों के अधिकारों, जमीन और उचित मजदूरी, के लिए संघर्ष करना था। रणवीर सेना कई जनसंहारों के लिए जिम्मेदार थी।

ब्रह्मेश्वर सिंह सात साल तक भूमिगत और नौ साल जेल में कैद रहा। 2002 में गिरफ्तार होने के बाद 2012 में वह जेल से छूटा। 2004 में उसने जेल के अंदर से ही लोक सभा चुनाव में भाग लिया और उसे एक लाख 60 हजार वोट मिले। भाकपा माले के उम्मीदवार स्वर्गीय राम नरेश राम, जो तत्कालीन विधायक थे, को ब्रह्मेश्वर सिंह से अधिक मत मिले थे। लेकिन दोनों आरजेडी के उम्मीदवार कांती सिंह के हाथों पराजित हुए। बथानी टोला जनसंहार के पटना हाई कोर्ट के फैसले पर जब जद (यू) के मंत्री ने यह घोषणा की कि राज्य सरकार 23 लोगों को दोष मुक्त करार दिए जाने के फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में अपील करेगी तो ब्रह्मेश्वर सिंह ने इस का विरोध किया था। सरकार में शामिल भाजपा के एक मंत्री का तो तर्क था कि पुराने घावों को नहीं कुरेदा जाना चाहिए।

सात मई, 2012 को ब्रह्मेश्वर सिंह ने अखिल भारत राष्ट्रीय किसान संगठन के गठन की यह कह कर घोषणा की कि इस का उद्देश्य किसानों के अधिकारों के लिए संघर्ष करना है। 1 जून, 2012 को भोजपुर के आरा शहर में अपने ही इलाके में उस की हत्या कर दी गई। हत्या के बाद अखिल भारत राष्ट्रीय किसान संगठन के समर्थकों ने अनुसूचित जाति/जनजाति के छात्रालय में आतंक मचाया, सार्वजनिक संपत्ति को बरबाद किया और भाजपा और जद (यू) के विधायक और डीजीपी, बिहार के साथ हाथापाई की। ब्रह्मेश्वर सिंह के शव को 2 जून, 2012 को आरा से 55 किमी दूर पटना में अंतिम संस्कार के लिए लाया गया। इस शवयात्रा ने पटना में आतंक मचा दिया। शवयात्रा के आयोजकों ने शोकाकुल लोगों से अपील की कि वे सड़कों, दियारा और श्मशान में लड़कियों को न छेड़ें। मीडिया में इस आशय की रिपोर्टें भी प्रकाशित हुईं कि ब्रह्मेश्वर सिंह की अंतिम यात्रा में गुजरात और ओडिशा से भी शोकाकुल लोग शामिल हुए थे। शवयात्रा मीडिया के प्रति आक्रामक थी।

अखिल भारत राष्ट्रीय किसान संगठन ने 3 जून, 2012 को पटना से जारी अपनी प्रेस विज्ञप्ति में पुलिस और मीडिया के साथ हुई बदतमीजी और अवांछित तत्त्वों की अराजकता के लिए क्षमा मांगी। उसने बदतमीजी को अपने संगठन के समर्थकों को बदनाम करने की साजिश बताया। अंतिम संस्कार की तैयारी भाजपा और उसके युवा संगठन ने की थी। यह बात गौर करने वाली है कि भाजपा के प्रदेश सचिव सीपी ठाकुर ने डीजीपी की यह कह कर प्रशंसा की कि शोकाकुल लोगों की उन्मादी भीड़ से निबटने में उन्होंने सराहनीय संयम का प्रदर्शन किया। बिहार के मुख्य मंत्री ने भोजपुर की अपनी तीन दिवसीय सेवा यात्रा को टाल दिया। वहां के जिस सर्किट हाउस में उन्हें रुकना था उसे ब्रह्मेश्वर सिंह के समर्थकों ने आग के हवाले कर दिया था। ब्रह्मेश्वर सिंह की हत्या की जांच का मामला मुख्य मंत्री ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को सौंप दिया है जैसी मांग भाजपा सहित अधिकांश पार्टियां कर रही थीं।

इस पूरे मामले में बिहार पुलिस का पक्षपाती रवैया फ ोरबसगंज, नाला रोड, पटना और औरंगाबाद में साफ देखा जा सकता है। इससे पहले कि बहुत देर हो जाए प्रगतिशील शक्तियों को शवयात्रा के दौरान हुई हिंसा को रोकने में बिहार पुलिस की निष्क्रियता और सेना के समर्थक वर्ग द्वारा एक दलित के अंगभंग करने के मामले के पीछे के मकसद को समझना चाहिए ।

रणवीर सेना की जांच के लिए राज्य सरकार द्वारा गठित जस्टिस अमीर दास आयोग को बंद करवा कर भाजपा ने सेना के प्रति अपने समर्थन को साफ कर दिया है। लक्ष्मणपुर बाथे जनसंहार के बाद राज्य सरकार ने अमीर दास आयोग का गठन कर इसे रणवीर सेना और राजनीतिक दलों के संबंधों की जांच करने का काम सौंपा था लेकिन राज्य सरकार ने 2006 में जांच रिपोर्ट जारी होने के ऐन पहले इसे रोक दिया।

बिहार कांग्रेस और आरजेडी की गुजरात की तरह की मिली भगत तब स्पष्ट हो गई जब दोनों दलों ने ब्रह्मेश्वर सिंह की हत्या पर श्रद्धांजलि दी। जिस वाहन में ब्रह्मेश्वर सिंह के शव को ले जाया जा रहा था उसमें शहीद लिखा था।

इस घटना के कुछ ही दिन बाद 6 जून को ऑप्रेशन ब्लू स्टार की 28वीं वर्षगांठ के अवसर पर पंजाब के मुख्य मंत्री बेअंत सिंह के हत्यारे बब्बर खालसा के सदस्य बलवंत सिंह राजोना को अकाली दल-भाजपा के संरक्षण में सिक्ख गुरुओं ने 'जीवित शहीद' की उपाधि से नवाजा। क्या यह महज इत्तफाक है?

ऐसा लगता है कि भाजपा ने राज्य के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के साथ मिल कर अपने 2014 के आम चुनाव के अभियान की शुरुआत कर दी है। इसमें प्रशासन के गुजरात मॉडल की गूंज है। हाल के राज्य सभा चुनावों में भले ही काडर रहित जद (यू) ने सुशील कुमार मोदी के नेतृत्व वाली प्रदेश भाजपा की कनिष्ठ भागीदारी को रेखांकित कर दिया हो लेकिन भोजपुर, पटना, गया, जहानाबाद, औरंगाबाद, बक्सर, रोहतास, कैमूर, अरवाल और पटना में फूटी अराजकता ने यह बात साबित कर दी है कि हिंसक सड़कों की राजनीति में काडर वाली भाजपा जद (यू) की वरिष्ठ भागीदार है। एक व दो जून की घटनाएं बतलाती हैं कि अखिल भारत राष्ट्रीय किसान संगठन के काडर, भाजपा और इसके अन्य संगठनों ने नीतीश कुमार की सरकार का समर्थन न कर एक संदेश देने का प्रयास किया है।

अपनी मृत्यु से पहले जो आखिरी काम ब्रह्मेश्वर सिंह ने किया वह था अपने संगठन को नए किसान संगठन का रूप देना। यह सही है कि एक नदी को दो बार पार नहीं किया जा सकता तो भी गंगा का मैदान मीठी और कड़वी दोनों प्रकार की फसलों के लिए बहुत उपजाऊ है। एक अनुभवी वाम नेता, जिन्होंने1990 के दौर में जनसंहार और प्रतिजनसंहार दोनों को ही देखा था, का कहना है कि बड़े और छोटे किसानों के वर्गीकरण में आंकलन की गड़बड़ी हुईलगती है। यदि वास्तव में ऐसा है तो राजनीतिक दलों को इसे दोबारा परिभाषित करना चाहिए और ऐसी समझदारी बनानी चाहिए कि मामले को ठीक किया जा सके। इसकी शुरुआत के रूप में डी. बंद्योपाध्याय की अध्यक्षता में गठित बिहार भूमि सुधार आयोग की उन सिफारिशों को तुरंत लागू करना चाहिए जो इसने अप्रैल, 2008 में सरकार को दी अपनी रिपोर्ट में की है।

सरकार ने समान स्कूल तंत्र जैसे प्रगतिशील एजेंडा को लागू करने के स्थान पर, जिसे राज्य सरकार के समान स्कूल व्यवस्था आयोग ने प्रस्तावित किया था और जिसमें मदन मोहन झा, अनिल सद्गोपाल और मुचकुंद दुबे शामिल थे, कूड़ेदान में डाल दिया और पूरी तरह से असफ ल विकास और शिक्षा के मॉडल को लागू किया है।

आज स्थिति यह है कि प्रतिगामी राजनीतिक माहौल में प्रतिगामी नीतियां अपना रंग दिखा रही हैं और बड़े जमींदारों और ठेकेदारों का राज हो गया है। नदी की घाटियों की खुदाई का काम हो रहा है जो सोवियत संघ जैसे विनाश को आमंत्रण है। पर्यावरण का विनाश करनेवाली केन्द्र की नदियों को जोडऩे की नीति का विरोध करने की बजाए बिहार सरकार खुद ही ऐसी नीतियां प्रस्तावित कर रही है। ऐसे समय में जब दक्षिण पंथी ताकतें विभिन्न रूपों में उभर रही हों तब पर्यावरणीय समझदारी का सबसे पहले विनाश होता है।

यह समझने के लिए बहुत विद्वता की आवश्यकता नहीं है कि गुजरात जैसा राजनीति और विकास का मॉडल बिहार के लिए उपयुक्त नहीं है। प्रसिद्ध समाजवादी चिंतक सच्चिदानंद सिन्हा कहते हैं कि गुजरात ही नहीं बल्कि चीन, जापान और योरोप के विकास का मॉडल भी बिहार के लिए उपयुक्त नहीं है।

नरसंहार पर आधारित राजनीति बिहार के लिए अभिशाप है लेकिन भाजपा का एक हिस्सा इस प्रयास में है कि वह गुजरात के मॉडल की यथावत नकल कर ले। एक व दो जून को भोजपुर और पटना की घटना इस बात का डरावना संकेत है कि चंद लोगों की हरकतों को नजरअंदाज करने के खतरनाक परिणाम हो सकते हैं।

यदि 2014 के आम चुनाव से पहले राज्य के ऐसे अफ सरों और मंत्रियों पर कार्यवाही नहीं होती है, अराजकता को हवा देने में जिनकी भागीदारी है, तो यह तय है कि बिहार गुजरात की राह पर चल पड़ेगा। अवांछित तत्त्व टोह ले रहे हैैं। आज उन्हें पता है कि वे बेखौफ अपना विस्तार कर सकते हैं और हिंसा की राजनीति करने वाले अपने लोगों के लिए चुनावी या गैर चुनावी जीत हासिल कर सकते हैं।

जिस सवाल का जवाब दिया जाना चाहिए वह यह है: कि क्या बिहार की प्रगतिशील पार्टियां और जागरूक समाज अपनी जड़ नजर आती राजनीतिक कल्पनाशीलता से इस संदेश को समझ सकेगा और इससे पहले की बहुत देर हो जाए राज्य और देश की राजनीति के लगातार हो रहे नाजीकरण को रोकने का संयुक्त रूप से प्रयास करेगा?

अनु: विष्णु शर्मा

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