Total Pageviews

THE HIMALAYAN DISASTER: TRANSNATIONAL DISASTER MANAGEMENT MECHANISM A MUST

We talked with Palash Biswas, an editor for Indian Express in Kolkata today also. He urged that there must a transnational disaster management mechanism to avert such scale disaster in the Himalayas. http://youtu.be/7IzWUpRECJM

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS TALKS AGAINST CASTEIST HEGEMONY IN SOUTH ASIA

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS TALKS AGAINST CASTEIST HEGEMONY IN SOUTH ASIA

Twitter

Follow palashbiswaskl on Twitter

Wednesday, July 18, 2012

Fwd: [New post] अमेरिका की सफाया सूची



---------- Forwarded message ----------
From: Samyantar <donotreply@wordpress.com>
Date: 2012/7/17
Subject: [New post] अमेरिका की सफाया सूची
To: palashbiswaskl@gmail.com


New post on Samyantar

अमेरिका की सफाया सूची

by समयांतर डैस्क

विजय प्रशाद

obamas-kill-list-posterमानव रहित अमेरिकी विमान अब नियमित रूप से अफगानिस्तान, पाकिस्तान, सोमालिया और यमन के आकाश में उड़ान भर रहे हैं। उनके कैमरे आ-जा रहे लोगों की मौजूदगी को रिकार्ड करते हैं। हजारों किलोमीटर दूर बेस कैंप में बैठा कमांडर मारने का आदेश देता है। अमेरिकी राष्ट्रपति इन तथाकथित आतंकवादियों की सूचियों को देख चुके हैं और जिन्हें मारा जा सकता है उन्हें चिह्नित कर चुके हैं। यह ओबामा की सफाया सूची (किल लिस्ट) है। अगर एक ही व्यक्ति को मारा जाना है, तो उस कार्रवाई को 'पर्सनालिटी स्ट्राइक' कहा जाता है। लेकिन जब ड्रोन एक से ज्यादा आदमियों को मारता है, तो उसे 'सिग्नेचर स्ट्राइक' कहा जाता है।

30 सितंबर, 2011 को दो अमेरिकी संहारक ड्रोन विमानों ने यमन के अल-जाफ प्रांत में एक कार पर हेलफायर मिसाइल दागे। मिसाइल ने कार को तबाह कर दिया। मारे गए चार लोगों में से दो अमेरिकी नागरिक थे - एक, मौलवी अनवर अल-अवलाकी और दूसरे अल-कायदा की अंग्रेजी पत्रिका इंसपायर के संपादक समीर खान। दो सप्ताह बाद 14 अक्टूबर को दूसरा ड्रोन हमला उन लोगों के समूह पर हुआ, जो रात्रि भोज के लिए जा रहे थे। मारे गए दस लोगों में मौलवी का 16 साल का लड़का अब्दुल रहमान अल-अवलाकी और उसका 17 वर्षीय चचेरा भाई अब्दुल रहमान भी था।

ब्यूरो ऑफ इनवेस्टिगेटिव जर्नलिज्म (बिज) का आंकलन है कि वर्ष 2001 से 2012 तक अमेरिका ने यमन में लगभग सौ ड्रोन हमले किए हैं, जिनमें 370 से 826 लोग मारे जा चुके हैं। हताहत सामान्य नागरिकों की संख्या 58 से 138 के बीच कुछ भी हो सकती है। इनमें 24 बच्चे भी शामिल हैं। ब्यूरो मानता है कि यह संख्या काफी कम है। अमेरिका ठीक-ठीक आंकड़े जारी नहीं करता है। वास्तव में हत्याओं की नीति को लेकर अमेरिका का रवैया स्पष्ट नहीं रहा है। वह हत्याओं का श्रेय तो लेता है, लेकिन योजना की जिम्मेदारी नहीं लेता।

वर्ष 2010 में संयुक्त राष्ट्र के पूर्व विशेष प्रतिनिधि फिलिप अल्सटन ने असंवैधानिक हत्याओं पर अपनी 29 पृष्ठ की एक तल्ख रिपोर्ट में बड़ी शक्तियों से कहा था कि वे असंवैधानिक हत्याओं के लिए कानूनी सीमा तय करें। रिपोर्ट के साथ संलग्न अपने बयान में एल्सटन ने अमेरिका के लिए राजनीतिक समस्या का जिक्र किया था: ''मैं विशेष रूप से इस बात को लेकर चिंतित हूं कि ऐसा लगता है, जब अमेरिका पूरी दुनिया में कहीं भी लोगों को निशाना बनाने के लिए अपने अधिकार का लगातार विस्तार करने का दावा करता है, वह इस तथ्य से अनजान है। लेकिन गलत तरीके से किसी को मारने के इस पुरजोर अधिकार पर, जिसमें कोई जवाबदेही नहीं है किसी का अधिकार नहीं है। अमेरिका या दूसरे देशों द्वारा ऐसा करने से जीवन के अधिकार की रक्षा और असंवैधानिक हत्याओं को रोकने के लिए बनाए गए नियमों को गंभीर नुकसान पहुंचता है।'' संयुक्त राष्ट्र के शांत कक्षों में ऐसी भाषा दुर्लभ है: यह इस बात को दबाव देकर कहती है कि अमेरिका लगातार ड्रोन हमलों के जरिये न केवल मौजूदा नियमों का उल्लंघन करता है, बल्कि यह विवाद सुलझाने के प्रस्तावों और युद्ध नियमों के लिए भी खतरा है।

बिज ने न केवल यमन से, बल्कि पाकिस्तान और सोमालिया से भी आंकड़े इकट्ठे किए हैं। पाकिस्तान में अमेरिकी ड्रोनों ने तकरीबन 2,462 से 3,145 लोगों को मारा है, जिनमें से 482 से 830 नागरिक थे। इनमें 175 बच्चे शामिल हैं। हताहत लोगों की संख्या 3,000 से ज्यादा है। शिकागो में संपन्न नाटो सम्मेलन के बाद अमेरिका ने वजीरिस्तान में सात बार ड्रोन हमले किए हैं। सोमालिया में अमेरिका ने कुछ ही ड्रोन हमले किए हैं, पर मरनेवालों की संख्या तकरीबन सौ के आसपास है। इनमें तीन बच्चे भी शामिल हैं।

बिज का आंकड़ा इकट्ठा करने का तरीका उदार है - यह इसके लिए खबरों और बयानों का इस्तेमाल करता है। इसलिए ये आकंड़े वास्तविक नहीं हैं, लेकिन ये ड्रोन हमलों की भयावहता का संकेत जरूर करते हैं। अमेरिका से सूचना नहीं मिलने के कारण सही आंकड़े जानने का कोई उपाय नहीं है।

वर्ष 2011 में ओसामा बिन लादेन की हत्या के साथ पहली बार असंवैधानिक हत्या का मामला सार्वजनिक हुआ था और इस वर्ष 30 जनवरी को पहली बार ड्रोन के इस्तेमाल की जानकारी अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा के एक इंटरनेट इंटरव्यू के जरिये सार्वजनिक हुई थी।

ड्रोन हमलों के बारे में ओबामा ने बताया कि ये हमले सक्रिय आंतकवादियों की सूची में शामिल उन लोगों पर निशाना साधकर किए जाते हैं, जो अमेरिकी लोगों, प्रतिष्ठानों और हवाई अड्डों को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करते हैं। उन्होंने बताया कि भौगोलिक परिस्थिति इन हमलों को जरूरी बनाते हैं। उनके अनुसार, कथित आतंकवादी पाकिस्तान के क्षेत्र में हैं, इसलिए वहां सामान्य सैन्य कार्रवाई नहीं की जा सकती। जाहिर है, फाटा इलाके (संघ शासित जनजातीय इलाके) में काफी ऐसे ड्रोन हमले किए गए हैं और अल कायदा के संदिग्ध आतंकवादियों, जो अफगानिस्तान और पाकिस्तान की सीमा से सटे दुर्गम इलाकों में रह रहे हैं, का पीछा किया जा रहा है। उनके बयान में जो मुख्य बात है, वह यह कि उनके पास सक्रिय आतंकवादियों की सूची है, जिसे मानव रहित ड्रोन विमानों के हमलों से मारा जा सकता है।

29 मई, 2012 को न्यूयॉर्क टाइम्स के जो बेकर एवं स्कॉट शाने ने इस सफाया सूची के होने की पुष्टि की थी। दो दर्जन आतंकवाद विरोधी अधिकारी हर मंगलवार को ह्वाइट हाउस स्थित सिचुएशन रूम में इस सफाया सूची पर विचार करते हैं। इस सूची को लंबी प्रक्रिया के बाद तैयार किया गया है। हफ्ते में एक बार राष्ट्रीय सुरक्षा निकाय से जुड़े सैकड़ों अधिकारी संदिग्ध आतंकवादियों की जीवनी का अध्ययन करते हैं और इस बात की सिफारिश करते हैं कि किसे सफाया सूची में डाला जाना चाहिए। ''गुप्त नामांकन की यह प्रक्रिया ओबामा प्रशासन की खोज है। '' बेकर एवं शाने लिखते हैं, ''पावर प्वाइंट स्लाइड, जिस पर यमन के अल कायदा की शाखा के संदिग्ध सदस्यों या उनके सोमालिया के शबाब मिलिशिया के सहयोगियों के नाम, उपनाम एवं जीवन की कहानियां होती हैं, के जरिये वे गंभीर बहस करते हैं। सीआईए इसके समानांतर और बेहद गुपचुप तरीके से खासकर पाकिस्तान पर केंद्रित चयन-प्रकिया अपनाती है, जहां यह एजेंसी ड्रोन हमलों का संचालन करती है। '' नामांकित व्यक्ति का नाम सफाया सूची में शामिल कर लिया जाता है। फिर ओबामा और उनके आतंकवाद विरोधी प्रमुख जॉन ब्रेनान उसका अध्ययन करते हैं और मंजूरी देते हैं। ओबामा व्यक्तिगत रूप से ''यमन और सोमालिया में होने वाले हर हमले और पाकिस्तान के जटिल और जोखिम भरे हमलों को भी मंजूरी देते हैं, जो कुल हमलों के लगभग एक तिहाई होते हैं।''

ओबामा जब राष्ट्रपति बने थे, तो यह वायदा किया था कि वह आतंकवाद पर युद्ध के तमाम गलत पहलुओं को खत्म करेंगे।

उन्होंने असाधारण प्रस्तुतीकरण कार्यक्रमों के खिलाफ अभियान चलाया और वायदा किया कि 'ब्लैक प्रिजन' एवं क्यूबा स्थित ग्वांतानामो जेल को बंद करेंगे। कानून को लेकर कुछ मुद्दों के कारण इस तरह की चिंताएं व्यक्त की गई थीं। ओबामा ने कहा कि न केवल इराक और अफगानिस्तान में, जहां की संख्याएं दिमाग फिरा देने के लिए काफी हैं, बल्कि पाकिस्तान, यमन और पूर्वी अफ्रीका में हवाई हमलों के जरिये कथित आतंकियों को मारे जाने के दौरान आम नागरिकों के हताहत होने से वह चिंतित हैं।

राष्ट्रपति का पदभार ग्रहण करने के कुछ ही दिनों बाद 22जनवरी, 2009 को ओबामा ने पाकिस्तान में हमले का आदेश जारी किया था। पहले हमले में संहारक ड्रोन से वजीरिस्तान के झरकी गांव में दो घरों पर निशाना साधा गया, इसमें 10 लोग मारे गए। दूसरा हमला कुछ ही घंटों बाद वजीरिस्तान के दूसरे गांव में किया गया, जिसमें आठ व्यक्ति मारे गए। मरने वालों में ज्यादातर बेगुनाह नागरिक थे। राष्ट्रपति ने जाहिरा तौर पर अपने सलाहकारों से पूछा, ''मैं जानना चाहता हूं कि आखिर यह कैसे हुआ?'' सीआईए ने अपने हमलों को और सटीक बनाने का वायदा किया। सटीकता के उनके दावे हद से बढ़-चढ़ कर थे। ड्रोन हमलों में बच्चों समेत आम नागरिकों का मारा जाना जारी है।

नतीजतन कथित आतंकवादियों को बेहतर तरीके से निशाना बनाने में विफल रहने वाली ओबामा की टीम ने हमले किए जाने वाले क्षेत्र (किल जोन) को पारिभाषित करने का एक बेहतर और अनूठा तरीका निकाला है। बेकर और शाने बताते हैं कि ''सरकार हमले वाले क्षेत्र में सेना की उम्र के सभी पुरुषों की गिनती लड़ाकों में करती है, तब तक जब तक कि कोई खुफिया जानकारी स्पष्ट रूप से उन्हें निर्दोष साबित नहीं कर देती। '' यह अजीब मानक है। कथित आतंकवादियों के आसपास रहने वाला कोई भी व्यक्ति अब आतंकवादी है। मारे जाने के बाद ही यह जाना जा सकता है कि वह आतंकवादी था या नहीं। यही कारण है कि ओबामा की टीम बहुत कम नागरिकों के मारे जाने (अनुषांगिक हत्याओं)की बात स्वीकार करती है।

ऐसे असाधारण मानक के कारण हमले के दौरान किसी के लिए आतंकवादी न होना असंभव है। यही कारण है कि हमलों के बाद मारे जाने वाले सभी व्यक्तियों को अधिकारीगण आतंकी बताते हैं। अमेरिकी विदेश सेवा के अधिकारियों का नई नीति से भ्रमित होने का भी यही कारण है। पाकिस्तान में अमेरिका के राजदूत कैमरन मंटर ने इसी कारण शिकायत की कि उन्हें ''इस बात का एहसास नहीं था कि उनका मुख्य काम लोगों की हत्या करना है। ''

अनजान क्षेत्रों में ड्रोन के इस्तेमाल में वृद्धि ओबामा के राष्ट्रपति काल के दौरान हथियारों की दूसरी स्फीति से मेल खाता है। वर्ष 2006 से अमेरिका ने सायबर हथियारों के इस्तेमाल का प्रयोग शुरू किया - खासकर ईरान के खिलाफ। पत्रकार डेविड सैंगर अपनी नई पुस्तक-कंफ्रंट एंड कंसील: ओबामाज सीक्रेट वार एंड सरप्राइजिंग यूज ऑफ अमेरिकन्स पावर (क्रॉउन बुक्स, जून, 2012)में स्टक्सनट जैसे साइबर हथियार के इस्तेमाल के बारे में विस्तार से बताते हैं। एक बार फिर ह्वाइट हाउस के सिचुएशन रूम में ओबामा वैज्ञानिकों के साथ ईरान के परमाणु उत्पादन प्रतिष्ठान पर हमले की योजना बना रहे हैं और इस योजना को ओलंपिक गेम्स कहते हैं। एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी सैंगर को बताते हैं कि काम संभालने के पहले दिन से वह (ओबामा) ईरान के परमाणु कार्यक्रमों को शिथिल करने के प्रति गंभीर हैं और कूटनीति, प्रतिबंध एवं हर बड़े फैसलों का सहारा ले रहे हैं। यह कहना ज्यादा सही होगा कि 2010 की गर्मियों के नातांज साइट के खिलाफ के कार्यक्रम में भी वह शामिल थे। उस समय जिस तरह अमेरिका ने साइबर हथियारों के इस्तेमाल से इंकार किया था, उसी तरह अब भी इंकार कर रहा है कि फ्लेम वायरस उसकी खोज है। सिचुएशन रूम की बैठकों में हिस्सा लेने वाले कई लोगों ने सैंगर को बताया कि ओबामा ''इस बात से अच्छी तरह वाकिफ हैं कि हर हमले के साथ वह अमेरिका को एक नए क्षेत्र में धकेल रहे हैं, जैसा कि उनके पूर्ववर्तियों ने 1940 के दशक में पहली बार परमाणु हथियारों, 1950 के दशक में इंटरकांटिनेंटल (अंतर्देशीय) प्रक्षेपास्त्रों और पिछले दशक में ड्रोन हमलों के प्रयोग से किया है। उन्होंने बार-बार चिंता जताई है कि अमेरिका का किसी भी तरह का स्वीकार कि वह सायबर हथियारों का इस्तेमाल, चाहे अत्यंत सावधानी और सीमित परिस्थितियों में ही क्यों न हो, कर रहा है, दूसरे देशों, आतंकवादियों और हैकरों को अपने हमलों को न्यायोचित ठहराने का मौका दे देगा।

ड्रोन एवं सायबर हथियारों का प्रयोग इस लिहाज से महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि ये अमेरिका को युद्ध की औपचारिक घोषणा किए बिना इन घातक हथियारों के इस्तेमाल की अनुमति देते हैं। अमेरिका ईरान, पाकिस्तान, यमन और सोमालिया में युद्ध से इंकार करता है, फिर भी लोगों को मारने एवं अपाहिज बनाने के लिए घातक तकनीक का इस्तेमाल करता है। यह तकनीकी ही है, जो उसे युद्ध के नियमों और अपने सांविधानिक प्रावधानों के उल्लंघन में सक्षम बनाता है। ड्रोन एवं सायबर वर्म का इस्तेमाल युद्ध के मौजूदा नियमों का उल्लंघन है। अमेरिका को बिना मंजूरी लिए इन हथियारों (परमाणु बम से लेकर साइबर वर्म तक) के इस्तेमाल की राजनीतिक शक्ति हासिल है।

अनंत धैर्य के साथ अमेरिकी प्रशासन ने युद्ध के नियमों को तोड़ा-मरोड़ा है और न्याय के नाम पर अपने क्षुद्र स्वार्थों को बढ़ावा दिया है। किल लिस्ट, सिग्नेचर किल्स, पर्सनालिटी किल्स, बिकन्स, इलेक्ट्रोनिक मोट्स: घातक और नए तरह के हथियारों की नई शब्दावली है। नैतिक आक्रोश के साथ अमेरिका उन आतंकवादियों के खिलाफ मोर्चा खोलता है, जो सड़क के किनारे बम गिराते हैं या आत्मघाती बंडी का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन हवाई हमलों के जरिए बम गिराने और साइबर हमले के खिलाफ उसका नैतिक आक्रोश दिखलाई नहीं देता है। यह दोगलापन साफ नजर आता है। एक वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी इस दोगलेपन को स्वीकार करते हैं, लेकिन वह उसे दोगलापन नहीं 'विडंबना' बताते हैं।

साभार: फ्रंटलाइन; अनु.: रमण कुमार सिंह

समयांतर डैस्क | July 17, 2012 at 4:50 pm | Tags: attacks, kill list, obama, usa | Categories: विचार | URL: http://wp.me/p2oFFu-8z

Comment    See all comments

Unsubscribe or change your email settings at Manage Subscriptions.

Trouble clicking? Copy and paste this URL into your browser:
http://www.samayantar.com/americas-kill-list/



No comments:

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...

PalahBiswas On Unique Identity No1.mpg

Tweeter

Blog Archive

Welcome Friends

Election 2008

MoneyControl Watch List

Google Finance Market Summary

Einstein Quote of the Day

Phone Arena

Computor

News Reel

Cricket

CNN

Google News

Al Jazeera

BBC

France 24

Market News

NASA

National Geographic

Wild Life

NBC

Sky TV