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THE HIMALAYAN DISASTER: TRANSNATIONAL DISASTER MANAGEMENT MECHANISM A MUST

We talked with Palash Biswas, an editor for Indian Express in Kolkata today also. He urged that there must a transnational disaster management mechanism to avert such scale disaster in the Himalayas. http://youtu.be/7IzWUpRECJM

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS TALKS AGAINST CASTEIST HEGEMONY IN SOUTH ASIA

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS TALKS AGAINST CASTEIST HEGEMONY IN SOUTH ASIA

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Wednesday, July 24, 2013

ये आंकड़े गरीबी उन्मूलन के नहीं हैं, गरीबों के सफाये के हैं।

ये आंकड़े गरीबी उन्मूलन के नहीं हैं, गरीबों के सफाये के हैं।


सबसे मजे की बात है कि बात बात पर अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ फ्रबल जनांदोलन करने वाले वामपंथियों को बंगाल में खोयी सत्ता का ऐसा सदमा लगा है कि जिस परमाणु संधि को रोकने के लिए उसने संधि का कार्यान्वन सुनिश्चित हो जाने पर तत्कालीन यूपीए सरकार से नाता तोड़ लिया, वह परमाणु संधि उसके लिए अब कोई मुद्दा ही नहीं है।


पलाश विश्वास



योजना आयोग के ताजा आंकड़ों से पता चलता है कि भारत लोक गणराज्य में लोक कल्याणकारी राज्य के  अवसान के बाद क्रयशक्ति निर्भर खुले बाजार में किस तेजी से गरीबों का सफाया हो रहा है।लगातार बढ़ती महंगाई के बीच केंद्र की यूपीए सरकार ने दावा किया है कि उनके कार्यकाल में गरीबों की संख्या पहले के मुकाबले आधी रह गई है.। गरीबों की संख्या घट रही है, कम से कम सरकारी आंकड़े तो यही बता रहे हैं। 2005 में देश की करीब 48 फीसदी आबादी गरीबी रेखा के नीचे थी, अब ये गिनती घटकर 22 फीसदी पर आ गई है।योजना आयोग ने जो आंकड़े जारी किए हैं उसके हिसाब से देश के गांवों में करीब 26 फीसदी लोग गरीबी रेखा के नीचे रहते हैं, जबकि शहरों में करीब 14 फीसदी गरीब हैं।योजना आयोग के मुताबिक गांवों में जो लोग 816 रुपये महीना और शहरों में 1,000 रुपये महीना से कम कमाते हैं वो गरीबी रेखा के नीचे रहते हैं।


ये आंकड़े गरीबी उन्मूलन के नहीं हैं, गरीबों के सफाये के हैं। पूरी विकासगाथा आंकड़ा निर्भर हैं और आंकड़ों को ग्राफिक्स में ठीकठाक दिखाने के लिे परिभाषाएं बदलने में योजना आयोग उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह आहलूवालिया किसी जादूगर से कम करिश्माई नहीं हैं। हम भारत के पढ़े लिखे सभ्य लोग इसी आंकड़ों के तिलिस्म में सांस लेने के अभ्यस्त हो गये हैं, क्योंकि विकास की चूंती हुई मलाई पढ़े लिखों तक अब भी पहुंच रही है। मुश्किल उन लोगों की है जिन्हें रोज नये नये आंकड़े, ताजातरीन कारपोरेट नीति निर्धारण और रोज बदलते कानून के तहत हाशिये पर धकेल दिया जाता है।प्रति व्यक्ति खपत के आधार पर देश की आबादी में गरीबों का अनुपात 2011-12 में घटकर 21.9 प्रतिशत पर आ गया। यह  2004-05 में 37.2 प्रतिशत पर था। योजना आयोग ने एक प्रकार से अपने पूर्व के विवादास्पद गरीबी गणना के तरीके के आधार पर ही यह आंकड़ा निकाला है। यानी जो प्रतिशत घटा है, वह योजना आयोग के मानदंड के मुताबिक अब किसी सरकारी अनुदान, मदद या राहत के पात्र नहीं है। उन्हें अपनी अर्जित क्रयशक्ति के अनुसार बची हुई सांसें खरीदकर जीना है। ये आंकड़े उसीको अधिसूचित कर रहे हैं।


राजनीति का हाल यह है कि कुड़नकुलम परमाणु बिजली केंद्र हो या जैतापुर, नियमागिरि हो या पास्को सम्राज्य ओड़ीशा के विस्तीर्ण इलाका, सेज पर सजा कच्छ का रण हो या नर्मदा बांध से लेकर टिहरी बांध, या समूचा  हिमालय. समूचा पूर्वोत्तर, समूचा दंडकारण्य जहां भारतीय जनता पर सैन्य राष्ट्र सबसे ज्यादा हमलावर है, वहां राजनीति खामोश है और लोकतंत्र भी।जनप्रतिरोध राष्ट्रद्रोह का पर्याय बना दिया गया है जबकि असली राष्ट्रद्रोही देश बेचने का धंधा कर रहे हैं। लातिन अमेरिकी देशों में, अमेरिका के सहोगी समेत ब्रिटेन समेत यूरोपीय देशों मे अमेरिकी प्रिज्म निगरानी की कड़ी आलोचना हो रही है। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जो बिडन को भारत आने से पहले ब्राजील सरकार को सफाई देनी पड़ी ।पर अपने ही नागरिकों की निगरानी के खिलाफ स्टिंग आपरेशन , फोन टैपिंग और घोटलों के पर्दाफाश, आरटीआई के दायरे में राजनीतिक दलों के लेने पर भारी हंगामा करने वाली राजनीति एकदम खामोश रही।भारत सरकार बायोमेट्रिक डिजिटल नागरिकता के जरिये नागरिकों की निगरानी और उनसे निष्कृति के तमाम कारपोरेट उपाय कारपोरेट पुरोहित नंदन निलेकणि के अश्वमेधी आधार अभियान के जरिये कर ही रही है और इस असंवैधानिक गैरकानूनी कारपोरेट योजना से सारी बुनियादी सेवाएं जोड़कर नागरिकों के अधिकारों को नलंबित कर रही है। भारत सरकार तो विरोध करने से रही जबकि भारत अब आतंक के खिलाफ अमेरिका और इजराइल के युद्ध में साझेदार है और इसी साझेदारी की शर्त पर भारत अमेरिकी परमाणु संधि पर दस्तखत करके दक्षिण एशिया को युद्ध और गृहयुद्ध का स्थाई कुरुक्षेत्र बना दिया गया है।हमारी आंतरिक सुरक्षा अब अमेरिकी और इजराइली निगरानी पर निर्भर है।


सबसे मजे की बात है कि बात बात पर अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ फ्रबल जनांदोलन करने वाले वामपंथियों को बंगाल में खोयी सत्ता का ऐसा सदमा लगा है कि जिस परमाणु संधि को रोकने के लिए उसने संधि का कार्यान्वन सुनिश्चित हो जाने पर तत्कालीन यूपीए सरकार से नाता तोड़ लिया, वह परमाणु संधि उसके लिए अब कोई मुद्दा ही नहीं है। अमेरिकी उपराष्ट्रपति के आने से पहले रुपये की गिरावट थामने चिदंबरम वाशिंगटन भागे थे जहां वे देश बेचने का पक्का इंतजाम कर आये। अमेरिका से उनके लौटते ही सुधारों की बहार आ गयी। बाकी क्षेत्रों को खोल देने के बाद भारतीय प्रतिरक्षा और भारतीय मीडिया को प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश के लिए खोलकर देश की संप्रभुता और लोकतंत्र के ताबूत पर आखिरी कीलें ठोंकने का काम कर ही चुके हैं चिदंबरम और सारी राजनीति और अराजनीति चिदंबरम मोंचेक के आंकड़ों के तिलस्मी भूलभुलैया में भटक गयी है। लोकसभा चुनावों के समीकरण साधन में बिजी राजनीति को यह अहसास ही नहीं होता कि रोज आर्थिक सुधारों के अश्वमेध  में कोताही के लिए अमेरिकी आकाओं से घुड़की खाने के बाद कैसे कैसे संसद को बाईपास करके रातोंरात कानून बदल दिये जा रहे हैं। राजनय भारतीय संसद और कानून व्यवस्था के मातहत है ही नहीं और न विदेशों के साथ होने वाले समझौते । जाहिर है कि वित्तीय प्रबंधक से लेकर सत्ता शिखरों के लोगो का कायाकल्प शेयर बाजार के आक्रामक सांड़ के रुप में हो गया है, जिनके आंकड़े छलावा के सिवाय कुछ नहीं हैं और जिनकी परिभाषाएं अब जनविरोधी ही नहीं, बाकायदा देशद्रोही हैं। इसी तरह अमेरिकी युद्ध कारोबार के तमाम सौदागर भारत आ जा रहे हैं। चिंदंबरम उनसे मिल ही आये। भारत अमेरिकी परमाणु समझौते के वाणिज्यिक इस्तेमाल पर समझौते बेखटके हो रहे हैं और किसी को कोई मतलब नहीं है। हमारे सामने व्यापार घाटे, विदेशी मुद्रा भंडार, रुपये के अवमूल्यन, विकास, राजस्व घाटे, रेटिंग, शेयरों की ताजा उछाल के आकड़ें छत्तीस व्यंजन की तरह सजा दिये गये तो हम खाते हुए अघाते ही नहीं है।भुक्खड़ों के देश में इसके अलावा कुछ हो भी नहीं सकता।


भारतीय अर्थव्यवस्था अब आंकड़ों में ही सिमट कर रह गयी है। विदेशी रेटिंग संस्थाएं विदेशी निवेशकों के हितों के मुताबिक कारपोरेट लाबिंइंग को मजबूत करते हुए अपनी रेटिंग के जरिये विकास भविष्यवाणियां करके मौद्रिक व वित्तीय नीतियों का समायोजन करती हैं। राजस्व घाटा के अबाध विदेशी पूंजी और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनिवार्यता को साबित करने केमद्देनजर दर्शाया जाता है। जबकि बजट घाटा हो या भुगतान संतुलन, उसके स्ताई समाधान के कोई उपाय ही नहीं होते। वहिस्कार और जनसंहार संस्कृति पर आधारित इस अर्थव्यवस्था की बुनियादी समस्याओं को संबोधित करने की कोई कोशिश नहीं होती। 1991 में मनमोहनी अवतार के बाद से कारपोरेट आकाओं का वर्चस्व है सलोकतांत्रिक प्रणाली, जहां संसद, न्यायपालिका, मीडिया और सरकार गैर प्रासंगिक हैं। कारपोरेट हित में राष्ट्रपति भवन तक का भी बेहिचक इस्तेमाल हो रहा है। निजी बिजली कंपनियों के हित साधने के लिए कोयला घोटाला के राष्ट्रव्यापी शोरशराबे के बीच कोलइंडिया का वर्चस्व तोड़कर कोल नियामक ही नहीं बनाया गया, बल्कि ईंधन आपूर्ति समझौते के लिए कोल इंडिया को मजबूर करने के लिए दो दो बार राष्ट्रपतिभवन से डिक्री जारी हो गयी। जाते जाते प्रतिभा पाटिल एक डिक्री जारी कर गयी, तो प्रणव मुखर्जी ने एकक और जारी कर दिया।आंकड़ों और ग्राफिक्स के सहारे ऊर्जा संकट परिभाषित करके कोयला आयात का बोझ उपभोक्ताओं पर डाल दिया गया और बिजली दरें बेलगाम हो गयी। तेल व गैस भंडार खत्म हो रहे हैं, तो जापान के समुंदर स्रोत से अर्जित गैस के मूल्य निर्धारण तरीका अपनाकर भारत के गैर समुद्रीय गैस भंडार की गैस की कीमतें दोगुणी कर दी गया। रिलायंस का लाभ 33 फीसद से ज्यादा हो गया। शेयर बाजार की सेहत सुधर गयी। जबकि सरकारी प्रचार तंत्र के आंकड़े यही साबित करने में लगे हैं कि ओएनजीसी समेत सरकारी तेल कंपनियां कितने फायदे में हैं। जैसे कि रिलायंस को इस वृद्धि से कोई मुनाफा होना ही नहीं है। हाल यह है कि कोल इंडिया औरओएनजीसी समेत जीवन बीमा निगम, भारतीय स्टेट बैंक, बंदरगाह, भारतीय रेल और भारतीय डाक जैसी सेवाओं का वेतहाशा निजीकरण हो रहा है। यूनियनें दलाली के सिवाय कुछ नहीं कर रहीं।


अर्थव्यवस्था की बुनियाद उसकी उत्पादन प्रणाली को ध्वस्त करके उसी मलबे की नींव पर यह हवाई बुलबुले को भारतीय वित्त प्रबंधक आंकड़ों के जरिये मैनेज कर रहे हैं। औद्योगिक उत्पादन शून्य से थोड़ा ऊपर है और भारत जैसे कृषि प्रधान देश, जहां जनसंख्या  का निनानब्वे फीसद हिस्सा किसी न किसी रुप से खेतों से जुड़ा हुआ है, वहां कृषि की हत्या करदी गयी। कृषि विकास दर औरऔद्योगिक विकास दर बढ़ाने की कोई कोशिश नहीं की जा रही है। भारतीय अर्थव्यवस्था को आउटसोर्सिंग, आयात, विदेशी निवशक संस्था, अबाध पूंजी प्रवाह, कालाधन, घोटाला, और शिक्षा, चिकित्सा, खाद्य, रोजगार, आवास, परिवहन, बिजली, ईंधन, बुनियादी ढांचा जैसी सेवाओं के निजीकरण के गड़बड़झाला का पर्याय बना दिया गया है। यह पूरा तंत्र क्रयशक्ति के वर्चस्व,बहिस्कार, अस्पृश्यता, नस्ली भेदभाव और जनसंहार आधारित है। जाजार के विस्तार को ही विकास बताया जा रहा है। भारतीय जनता को जल जंगल जमीन आजीविका नागरिकता नागरिक और मानव अधिकारों से वंचित करना ही विकास है। नस्ली भेदभाव के तहत चुने हुए भूगोल के विरुद्ध युद्ध की निरंतरता ही आर्थिक नीतियों की निरंतरता है।


ऊर्जा की खपत और प्रतिरक्षा व्यय अर्थव्वस्था के मौजूदा हालात के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार हैं और इस मामले में नीति निर्धारण प्रक्रिया में कोई पारदर्शिता नहीं है। आटोमोबाइल उद्योग को हर किस्म का प्रोत्साहन है और सारे स्वर्णिम राजपथ उन्हीं के हैं। सड़कें हैं नहीं, पर्यावरण को दांव पर लगाकर कार्बन उत्सर्जन को चरम सीमा पर पहुंचाकर सत्ता वर्ग की जो ऊर्जा खपत है, उसकी चपेट में है पूरा देश। सब्सिडी घटाकर गरीबों के सफाये का िइंतजाम हुआ लेकिनकिसी भी स्तर पर ऊर्जा अनुशासन है नहीं।सत्ता वर्ग के इस ऊर्जा खपत का खर्च हर करदाता की जेब से जाती हैं। सामाजिक सुरक्षा का बंदोबस्त राजनीतिक है वोटबैंक सापेक्ष और उसका कोई आर्थिक प्रबंधन है नहीं। खास वोटबैंक को खुसकरने के लिए बाकी जनता पर और ज्यादा बोझ का तंत्र है यह। बाजार के विस्तार के लिए सरकारी खर्च बढ़ाने की रणनीति के तहत इन योजनाओं की पात्रता तय करने और बाकी लोगों के बहिस्कार, नस्ली भेदभाव, अस्पृश्यता और जनसंहार के ाधार तय करनेके लिए विकास दर राजस्व घाटा, गरीब, जैसे आधारभूत परिभाषाएं बार बार बदली जा रही हैं


योजना आयोग के अनुसार, तेंदुलकर फार्मूला के तहत 2011-12 में ग्रामीण इलाकों में 816 रच्च्पये रच्च्पये प्रति व्यक्ति प्रति माह से कम उपभोग करने वाला व्यक्ति गरीबी की रेखा के नीचे था। शहरों में राष्ट्रीय गरीबी की रेखा का पैमाना 1,000 रच्च्पये प्रति व्यक्ति प्रति माह का उपभोग है। इसका मतलब है कि शहरों में प्रतिदिन वस्तुओं और सेवाओं पर 33.33 रुपये से अधिक खर्च करने वाला और ग्रामीण इलाकों में 27.20 रुपये खर्च करने वाला व्यक्ति गरीब नहीं है। इससे पहले आयोग ने कहा था कि शहरी इलाकों में प्रतिदिन 32 रच्च्पये से अधिक खर्च करने वाला व्यक्ति गरीब नहीं है। उसकी इस गणना से काफी विवाद पैदा हुआ था। योजना आयोग ने आज जो गरीबी का आंकड़ा दिया है वह उसी गणना के तरीके पर आधारित है। इसमें कहा गया है कि पिछले सात साल में देश में गरीबों की संख्या घटी है।


आयोग ने कहा कि पांच व्यक्तियों के परिवार में खपत खर्च के हिसाब से अखिल भारतीय गरीबी की रेखा ग्रामीण इलाकों के लिए 4,080 रच्च्पये मासिक और शहरों में 5,000 रच्च्पये मासिक होगी। हालांकि, राज्य दर राज्य हिसाब से गरीबी की रेखा भिन्न होगी।

वर्ष 2011-12 में ग्रामीण इलाकों में गरीबी रेखा से नीचे के लोगों की संख्या 25.7 प्रतिशत और गांवों में 13.7 फीसद थी। पूरे देश के लिए यह आंकड़ा 21.9 प्रतिशत रहा।

वहीं 2004-05 में ग्रामीण इलाकों गरीबी रेखा से नीचे के लोगों का अनुपात 41.8 प्रतिशत तथा शहरों में यह अनुपात 25.7 प्रतिशत। राष्ट्रीय स्तर पर गरीबी अनुपात उस वर्ष 37.2 प्रतिशत था।


संख्या के हिसाब से देखा जाए तो 2004-05 में देश में 40.71 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन कर रहे थे, वहीं 2011-12 में यह संख्या घटकर 26.93 करोड़ रह गई।

गरीबी रेखा का अनुपात 2011-12 में सुरेश तेंदुलकर समिति द्वारा सुझाए गए तरीके के हिसाब से निकाला गया है। समिति ने गरीबी की रेखा तय करने के लिए शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च के अलावा कैलोरी की मात्रा को इसमें शामिल किया है।


आयोग ने कहा कि राज्यवार देखा जाए, तो 39.93 प्रतिशत के साथ छत्तीसगढ़ में गरीबी का अनुपात सबसे ज्यादा है। झारखंड में यह 36.96 प्रतिशत, मणिपुर में 36.89 प्रतिशत, अरच्च्णाचल प्रदेश में 34.67 प्रतिशत और बिहार में 33.47 प्रतिशत है।


संघ शासित प्रदेशों में दादर एवं नागर हवेली में गरीबी का अनुपात सबसे ज्यादा 39.31 प्रतिशत है। चंडीगढ़ में 21.81 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन कर रहे हैं। गोवा में सबसे कम यानी 5.09 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं। केरल में यह आंकड़ा 7.05 प्रतिशत, हिमाचल प्रदेश में 8.06 प्रतिशत, सिक्किम में 8.19 प्रतिशत, पंजाब में 8.26 प्रतिशत तथा आंध्र प्रदेश में 9.20 प्रतिशत है।


संप्रग के घटक दल राकांपा सहित विभिन्न राजनीतिक दलों ने योजना आयोग के इस दावे को खारिज कर दिया कि गरीबों की संख्या 2004—05 में लगभग 37 प्रतिशत के मुकाबले अब घटकर 21. 9 प्रतिशत रह गई है।राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नेता एवं भारी उद्योग मंत्री प्रफुल्ल पटेल ने योजना आयोग के गरीबी के आंकड़ों पर सवाल उठाया है। उन्होंने शहरों के लिए प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 33.33 रुपये और गांवों के लिए 27.20 रुपये के खर्च के बेंचमार्क के आधार पर गरीबी के आंकड़े को पूरी तरह गलत करार दिया।



निर्धनता रेखा

http://hi.wikipedia.org/s/4mn

मुक्त ज्ञानकोष विकिपीडिया से

गरीबी रेखा या निर्धनता रेखा (poverty line) आय के उस स्तर को कहते है जिससे कम आमदनी होने पे इंसान अपनी भौतिक ज़रूरतों को पूरा करने मे असमर्थ होता है । गरीबी रेखा अलग अलग देशों मे अलग अलग होती है । उदहारण के लिये अमरीका मे निर्धनता रेखा भारत मे मान्य निर्धनता रेखा से काफी ऊपर है ।

यूरोपीय तरीके के रूप में परिभाषित वैकल्पिक व्यवस्था का इस्तेमाल किया जा सकता है जिसमें गरीबों का आकलन 'सापेक्षिक' गरीबी के आधार पर किया जाता है। अगर किसी व्यक्ति की आय राष्ट्रीय औसत आय के 60 फीसदी से कम है, तो उस व्यक्ति को गरीबी रेखा के नीचे जीवन बिताने वाला माना जा सकता है। औसत आय का आकलन विभिन्न तरीकों से किया जा सकता है।

उदाहरण के लिए माध्य निकालने का तरीका। यानी 101 लोगों में 51वां व्यक्ति यानी एक अरब लोगों में 50 करोड़वें क्रम वाले व्यक्ति की आय को औसत आय माना जा सकता है। ये पारिभाषिक बदलाव न केवल गरीबों की अधिक सटीक तरीके से पहचान में मददगार साबित होंगे बल्कि यह भी सुनिश्चित करेंगे कि कोई भी ऐसा व्यक्ति जो गरीब नहीं है उसे गरीबों के लिए निर्धारित सब्सिडी का लाभ न मिले। परिभाषा के आधार पर देखें तो माध्य के आधार पर तय गरीबी रेखा के आधार पर जो गरीब आबादी निकलेगी वह कुल आबादी के 50 फीसदी से कम रहेगी।

योजना आयोग ने 2004-05 में 27.5 प्रतिशत गरीबी मानते हुए योजनाएं बनाई थी। फिर इसी आयोग ने इसी अवधि में गरीबी की तादाद आंकने की विधि की पुनर्समीक्षा के लिए एक विशेषज्ञ समूह का गठन किया था, जिसने पाया कि गरीबी तो इससे कहीं ज्यादा 37.2 प्रतिशत थी। इसका मतलब यह हुआ कि मात्र आंकड़ों के दायें-बायें करने मात्र से ही 100 मिलियन लोग गरीबी रेखा में शुमार हो गए।

अगर हम गरीबी की पैमाइश के अंतरराष्ट्रीय पैमानों की बात करें, जिसके तहत रोजना 1.25 अमेरिकी डॉलर (लगभग 60 रुपये) खर्च कर सकने वाला व्यक्ति गरीब है तो अपने देश में 456 मिलियन (लगभग 45 करोड़ 60 लाख) से ज्यादा लोग गरीब हैं।

भारत में योजना आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि खानपान पर शहरों में 965 रुपये और गांवों में 781 रुपये प्रति महीना खर्च करने वाले शख्स को गरीब नहीं माना जा सकता है। गरीबी रेखा की नई परिभाषा तय करते हुए योजना आयोग ने कहा कि इस तरह शहर में 32 रुपये और गांव में हर रोज 26 रुपये खर्च करने वाला शख्स बीपीएल परिवारों को मिलने वाली सुविधा को पाने का हकदार नहीं है। अपनी यह रिपोर्ट योजना आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को हलफनामे के तौर पर दी। इस रिपोर्ट पर खुद प्रधानमंत्री ने हस्ताक्षर किए थे। आयोग ने गरीबी रेखा पर नया क्राइटीरिया सुझाते हुए कहा कि दिल्ली, मुंबई, बंगलोर और चेन्नई में चार सदस्यों वाला परिवार यदि महीने में 3860 रुपये खर्च करता है, तो वह गरीब नहीं कहा जा सकता।

बाद में जब इस बयान की आलोचना हुई तो योजना आयोग ने फिर से गरीबी रेखा के लिये सर्वे की बात कही।



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