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THE HIMALAYAN DISASTER: TRANSNATIONAL DISASTER MANAGEMENT MECHANISM A MUST

We talked with Palash Biswas, an editor for Indian Express in Kolkata today also. He urged that there must a transnational disaster management mechanism to avert such scale disaster in the Himalayas. http://youtu.be/7IzWUpRECJM

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS TALKS AGAINST CASTEIST HEGEMONY IN SOUTH ASIA

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Saturday, October 3, 2015

संघ परिवार: बदलाव और निरंतरता -इरफान इंजीनियर


03.10.2015

संघ परिवार: बदलाव और निरंतरता

-इरफान इंजीनियर

हमारे प्रधानमंत्री पूरी दुनिया में घूम-घूमकर ''मेक इन इंडिया'' के लिए वैश्विक पूंजी जुटाने की कोशिश कर रहे हैं। वे ऐसी घोषणाएं भी कर रहे हैं जिनसे बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत की ओर आकर्षित हों और उन्हें लगे कि वे यहां मनमाफिक मुनाफा कमा सकती हैं। हाल में, प्रधानमंत्री ने डिजीटल इंडिया के लिए विभिन्न कंपनियों के सीईओ से मुलाकात की। कंपनियों के सीईओ-चाहे वे भारतीय मूल के हों या अन्य देशों के नागरिक-केवल अपने शेयरधारकों के प्रति जवाबदेह होते हैं और उनका लक्ष्य अधिक से अधिक मुनाफा कमाना होता है। अगर वे भारत आना चाहते हैं तो उसका कारण केवल यह है कि यहां उन्हें सस्ता श्रम, ज़मीन व प्राकृतिक और अन्य संसाधन उपलब्ध हैं। इसके अतिरिक्त, भारतीय करदाताओं के धन से उन्हें अनुदान और अन्य कई सुविधाएं उपलब्ध करवाई जाती हैं। भारत सरकार के साथ विभिन्न कंपनियों के व्यावसायिक समझौतों की घोषणा तो होती है परंतु यह नहीं बताया जाता कि इन समझौतों की शर्तें क्या हैं। शायद इसलिए, क्योंकि इससे अगले दिन की हेडलाईनों के खराब हो जाने की आशंका रहती है।

जिस तेज़ी से आरएसएस, भाजपा और संघ परिवार ने अपने स्वदेशी आंदोलन से पल्ला झाड़ा है, वह सचमुच चकित कर देने वाला है। उनका स्वदेशी अभियान, विदेशी निवेश और विदेशी वस्तुओं के उपभोग का नीतिगत आधार पर विरोधी था। संघ परिवार से जुड़े अनेक संगठनों ने नवंबर 1991 में एक मंच पर आकर ''स्वदेशी जागरण मंच'' का गठन किया था।  इस मंच का लक्ष्य, तत्कालीन कांग्रेस सरकार की उदारीकरण-निजीकरण-वैश्वीकरण की नीतियों का विरोध करना था। स्वदेशी जागरण मंच शायद अब भी जिंदा है परंतु उसकी आवाज़ सुनाई नहीं देती। स्वदेशी जागरण मंच ने 1990 के दशक में उसी अभियान को आगे बढ़ाया था, जिसे भारतीय जनसंघ, स्वाधीनता के तुरंत बाद से लेकर 1970 के दशक तक चलाता रहा था।

कानपुर में आयोजित भारतीय जनसंघ की अखिल भारतीय सामान्य सभा की बैठक में 31 दिसंबर 1952 को पारित प्रस्ताव में कहा गया था कि ''यह खेदजनक है कि स्वतंत्रता के बाद से लोगों का ध्यान स्वदेशी आंदोलन पर से हट गया है और विदेशी कपड़ों, सौंदर्य प्रसाधनों व अन्य सामग्री के इस्तेमाल में बढ़ोत्तरी हो रही है। सरकार ने इस नुकसानदेह प्रवृत्ति को नियंत्रित करने के लिए कोई कदम नहीं उठाए हैं। उलटे, अनावश्यक विदेशी सामान का आयात बेरोकटोक बढ़ रहा है। अतः यह सत्र, अखिल भारतीय सामान्य सभा और केंद्रीय कार्यसमिति को यह निर्देश देती है कि अर्थव्यवस्था को स्वस्थ बनाए रखने के लिए, वे लोगों का ध्यान एक बार फिर स्वदेशी की तरफ आकर्षित करें और अपनी रचनात्मक गतिविधियों में इस अभियान को प्रमुख स्थान दें'' (भारतीय जनसंघ, 1973, पृष्ठ 5)। इसी प्रस्ताव में स्वदेशी को ''आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था के पुनर्निमाण और देश के अपने सामान के प्रति प्रेम'' के रूप में परिभाषित किया गया था।

भारतीय जनसंघ के अंबाला सत्र में 5 अप्रैल, 1958 को पारित प्रस्ताव क्रमांक 58.03 में कृषि उत्पादन को प्राथमिकता देने और सिंचाई, बेहतर बीज और कृषि जोत की अधिकतम सीमा के निर्धारण के कार्य पर फोकस करने की बात कही गई थी। इसी प्रस्ताव में आयात घटाने का आह्वान भी किया गया था।

लखनऊ में 1 जनवरी, 1961 को पारित प्रस्ताव क्रमांक 61.05 में विदेशी ऋण व विदेशी पूंजी संबंधी नीतियों पर पुनर्विचार करने की बात कही गई थी। वाराणसी में जनसंघ की अखिल भारतीय सामान्य परिषद की बैठक में 12 नवंबर, 1961 को पारित प्रस्ताव क्रमांक 61.17 में यह सलाह दी गई थी कि तीसरी पंचवर्षीय योजना के लक्ष्यों को पाने के लिए ''यंत्रीकृत लघु उत्पादन इकाईयों को औद्योगीकरण का आधार बनाया जाना चाहिए''।

गुवाहाटी में जनसंघ की केंद्रीय कार्यसमिति की बैठक में 4 जून, 1968 को पारित प्रस्ताव में चैथी पंचवर्षीय योजना के संदर्भ में यह कहा गया था कि वह ''हमारे अपने संसाधनों'' पर आधारित होनी चाहिए और स्वदेशी संसाधनों को ही देश का विकास का आधार बनाया जाना चाहिए। प्रस्ताव में यह भी कहा गया था कि हमें ''हमारी अपनी'' देशी टेक्नोलोजी का विकास भी करना चाहिए।

सन 1990 के दशक की शुरूआत में भाजपा और संघ परिवार, तत्कालीन सरकार की उदारीकरण व वैश्विकरण की नीतियों का जमकर विरोध करतीं थीं। वे केंटकी फ्राईड चिकिन (केएफसी) की दुकानों पर हमला करती थीं क्योंकि उनका मानना था कि इस तरह की दुकानें ''भारतीय संस्कृति'' के विरूद्ध हैं। इसके कुछ समय बाद, संघ परिवार ने अपना रंग बदल लिया। उसने यह कहना शुरू कर दिया कि विदेशी टेक्नोलोजी का तो स्वागत है परंतु विदेशी संस्कृति का नहीं। जैसा कि एलके आडवाणी ने कहा था, ''हमें कम्प्यूटर चिप्स चाहिए आलू के चिप्स नहीं''।

अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल में प्रथम वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा (13 अक्टूबर 1999 से 1 जुलाई 2002) और उसके बाद जसवंत सिंह (1 जुलाई 2002 से 22 मई 2004) ने अर्थव्यवस्था के उदारीकरण की प्रक्रिया को जारी रखा। परंतु इसके समानांतर, स्वदेशी जागरण मंच लोगों को स्वदेशी की अच्छाई के संबंध में शिक्षा भी देता रहा। मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से विदेशी पूंजी को आकर्षित करने का आक्रामक अभियान चलाया जा रहा है और स्वदेशी अभियान को तिलाजंलि दे दी गई है।

हिंदू राष्ट्रवादियों की आर्थिक नीतियों में ये जो बदलाव आए हैं, उनका उद्देश्य रोज़गार के नए अवसरों का सृजन नहीं है और ना ही इनके पीछे कोई अन्य पवित्र उद्देश्य है।

अरबपतियों के क्लब में भारतीयों की संख्या बढ़ती जा रही है। इस समय इनकी संख्या करीब 100 है। सात भारतीय कंपनियां, दुनिया की सबसे बड़ी 'फार्च्यून ग्लोबल 500' कंपनियों की सूची में शामिल हो गई हैं। वे दुनिया की सबसे बड़ी 500 कंपनियों में इसलिए शामिल हो पाईं क्योंकि उन्हें देश के प्राकृतिक संसाधन, मिट्टी के मोल उपलब्ध करवाए गए। इनमें शामिल हैं देश की खनिज संपदा, प्राकृतिक गैस, स्पेक्ट्रम व सस्ता श्रम। ये बड़ी कंपनियां अब विदेशी ब्राण्डों को खरीदने में रूचि लेने लगी हैं और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर समझौते कर रही हैं। भारतीय करोड़पतियों की संख्या में भी तेज़ी से बढ़ोत्तरी हुई है। धनी भारतीयों की संख्या, पिछले साल के 1,96,000 से बढ़कर 2,50,000 हो गई है। इसका अर्थ है कि एक वर्ष में धनी भारतीयों की संख्या में 27 प्रतिशत की वृद्धि हुई। हिंदू राष्ट्रवादी इसी वर्ग के हितों की रक्षा करना चाहते हैं और उन्हें करदाताओं के धन की कीमत पर और रईस बनाना चाहते हैं। वे ऐसी कंपनियों के लिए लाल कालीन बिछा रहे हैं जिनके बारे में यह भी स्पष्ट नहीं है कि उनके भारत में पूंजी निवेश से रोज़गार के अवसर बढ़ेंगे अथवा नहीं। दूसरी ओर, कृषि क्षेत्र, सरकार की उपेक्षा का शिकार है और किसानों की आत्महत्याएं जारी हैं।

संघ परिवार का वैचारिक यू-टर्न

भाजपा गिरगिट की तरह रंग बदलने में माहिर है। जब वह विपक्ष में होती है तब उसकी नीति कुछ होती है और सरकार में आने पर कुछ और।

जहां संघ परिवार ने आर्थिक मसलों पर अपनी नीतियां पूरी तरह से बदल दी हैं वहीं उसकी विचारधारा के मूलभूत सिद्धांतों में कोई परिवर्तन नहीं आया है। ये मूलभूत सिद्धांत हैं : 1. एकाधिकारवादी ढांचा - संघ परिवार के अंदर और देश में भी, 2. हिंदू राष्ट्रवाद के नाम पर देश पर पितृसत्तात्मकता व पदानुक्रम पर आधारित चुनिंदा सांस्कृतिक परंपराएं लादना, 3. समतावादी भारतीय परंपराओं और संस्कृतियों को नज़रअंदाज़ करना व 4. अल्पसंख्यकों को कलंकित करना।

एकाधिकारवादी ढांचा

हिंदू राष्ट्रवादी विचारधारा, भावनात्मक प्रतीकों का निर्माण करने में सिद्धहस्त है। अनुयायियों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे बिना कोई प्रश्न पूछे उस प्रतीक के आगे नतमस्तक हों। अगर एक बार किसी व्यक्ति के मन में किसी भी प्रतीक के प्रति असीम श्रद्धा उत्पन्न कर दी जाए तो उसे, इस आधार पर किसी भी एकाधिकारवादी व्यवस्था को स्वीकार करने के लिए राज़ी किया जा सकता है कि ऐसी व्यवस्था, उस प्रतीक की रक्षा के लिए आवश्यक है। भगवा ध्वज ऐसा ही एक प्रतीक है। भगवा ध्वज का अर्थ क्या है, यह आरएसएस के मुखिया सरसंघचालक तय करते हैं। आरएसएस ''एक चालक अनुवर्तिता'' (एक नेता के पीछे चलो) के सिद्धांत में विश्वास रखता है और इस नेता का चुनाव किसी लोकतांत्रिक प्रक्रिया से नहीं होता।

आरएसएस के सभी अनुशांगिक संगठनों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे सरसंघचालक के हर निर्देश और आदेश का पूर्ण रूप से पालन करें। आरएसएस के सभी कार्यकर्ताओं के लिए प्रशिक्षण लेना अनिवार्य होता है।

इस प्रशिक्षण के बावजूद, कई अनुयायी विद्रोह कर देते हैं। जनसंघ के सहसंस्थापक और बाद में अध्यक्ष रहे बलराज मधोक को जनसंघ से निष्कासित किए जाने पर उन्होंने कहा था कि उनका निष्कासन, संघ के फासीवादी रवैये का एक और उदाहरण है। उन्होंने यह भी कहा था कि आरएसएस, जनसंघ का इस्तेमाल अपने उपकरण बतौर कर रहा है। एलके आडवाणी ने जून 2013 में भाजपा के सभी पदों से इस्तीफा देने के बाद यह आरोप लगाया था कि आरएसएस, भाजपा का ''सूक्ष्म प्रबंधन'' कर रहा है। परंतु तत्कालीन सरसंघचालक मोहन भागवत ने आडवाणी को उनका इस्तीफा वापिस लेने के लिए राज़ी कर लिया था।

प्रजातंत्र, हिंदू राष्ट्रवादियों को कभी पसंद नहीं आया। गोलवलकर (1939, पृष्ठ 56) लिखते हैं ''...देश में 'वास्तविक' प्रजातांत्रिक 'राज्य' की मृगतृष्णा के पीछे भागते हुए हम हमारे सच्चे हिंदू राष्ट्रवाद को पूरी तरह भुला बैठे हैं।'' इंटेलिजेंस ब्यूरों के मुखिया टीवी राजेश्वर ने दावा किया था कि आरएसएस के तत्कालीन सरसंघचालक बाला साहेब देवरस ने इंदिरा गांधी द्वारा आपातकाल लगाए जाने का समर्थन किया था और उनसे संपर्क स्थापित करने की कोशिश भी की थी।

हिंदू राष्ट्रवादी चिंतक, हिंदू राष्ट्र को एक संस्कृति, एक इतिहास व एक भाषा के आधार पर परिभाषित करते हैं। तथ्य तो यह है कि राष्ट्र की अवधारणा ही पश्चिमी है। हिंदू परंपरा तो वसुधैव कुटुम्बकम (पूरा ब्रह्मंड एक परिवार है) में विश्वास रखती है।

ऐसी कोई एक भाषा नहीं है, जिसे सभी भारतीय बोलते हों और भारत में बहुआयामी सांस्कृतिक विविधताएं हैं। कई धर्म हैं, जातियां हैं, पंथ हैं और उनके अपने-अपने विश्वास और परंपराएं हैं। भाषायी, धार्मिक व जातिगत विभिन्नताओं के अतिरिक्त, क्षेत्रीय विभिन्नताएं भी हैं। गोलवलकर, गैर-हिंदुओं का आह्वान करते हैं कि वे हिंदू संस्कृति को अपनाएं और ''विदेशी'' न बने रहें। वे कहते हैं कि उन्हें हिंदू राष्ट्र की महिमा के अतिरिक्त और किसी चीज़ के बारे में नहीं सोचना चाहिए। और अगर वे ऐसा नहीं कर सकते तो उन्हें नागरिक का दर्जा नहीं मिलेगा और उन्हें बिना किसी अधिकार के देश में रहना होगा। संघ परिवार मुसलमानों को विश्वासघाती, विध्वंसक और क्रूर मानता और बताता है। हिंदू राष्ट्रवादी चिंतक, लोगों को एक धर्म, संस्कृति व भाषा के अलावा, श्रेष्ठता के भाव के आधार पर भी बांधना चाहते हैं।

हिंदू राष्ट्र की वह ''एक'' संस्कृति, धर्म और भाषा क्या होगी? वह विजेता आर्यों की परंपराओं और उनके ग्रंथों पर आधारित होगी। वह वेदों, उपनिषदों और अद्वैत वेदांत दर्शन पर आधारित होगी। वह भारतवर्ष से बौद्ध धर्म का सफाया होने के बाद, शंकराचार्य द्वार विकसित दर्शन पर आधारित होगी। गोलवलकर (1939, पृष्ठ 48) लिखते हैं ''उस महान आत्मा की शिक्षाओं की गलत समझ के कारण, बौद्ध धर्म, लोगों को उनकी आस्था के प्रति वफादारी की राह से डिगाने वाली शक्ति बन गया।'' हिंदू राष्ट्रवादियों ने तुकाराम, रविदास, कबीर, मीराबाई, सिक्ख धर्म, बौद्ध धर्म, जैन धर्म, चार्वाक दर्शन, सिद्ध व नाथ पंथ और कई अन्य तर्कवादी धार्मिक-दार्शनिक परंपराओं को नज़रअंदाज़ किया। इनमें से अधिकांश परंपराएं, समतावादी थीं। एक धर्म और एक संस्कृति की तलाश में, हिंदू राष्ट्रवादी चिंतकों ने उन ग्रंथों और परंपराओं  को चुना, जो समाज में ऊँचनीच की हामी हैं, जो जाति व्यवस्था को औचित्यपूर्ण मानती हैं और जो शुद्धता-अशुद्धता में विश्वास रखती हैं।

हिंदू राष्ट्रवादियों को जाति प्रथा से कोई शिकायत नहीं है। दीनदयाल उपाध्याय द्वारा प्रतिपादित एकात्म मानववाद का सिद्धांत, जाति व्यवस्था को आदर्श सामाजिक संगठन बताता है। बलराज मधोक ने जाति व्यवस्था को औचित्यपूर्ण ठहराते हुए कहा था कि जिस प्रकार मानव शरीर के विभिन्न अंग अलग-अलग कार्य करते हैं, उसी तरह विभिन्न जातियां अपने-अपने कर्तव्य निभाती हैं और सब मिलकर समाज का निर्माण करती हैं।  

अल्पसंख्यकों को कलंकित करने की नीति

हिंदू राष्ट्रवादी चिंतक, अल्पसंख्यकों को विदेशी और हिंदू राष्ट्र के लिए खतरा मानते हैं। यद्यपि अल्पसंख्यक भारत की सांझा संस्कृति में भागीदार हैं परंतु फिर भी उन्हें बाहरी बताया जाता है। आरएसएस, अल्पसंख्यकों की संस्कृति को स्वीकार नहीं करता। अल्पसंख्यकों से वह यह अपेक्षा करता है कि वे बहुसंख्यकों की संस्कृति को स्वीकार करें और वह भी उसके एकसार स्वरूप को। आरएसएस के पास यह निर्धारित करने के लिए कोई मापदंड नहीं है कि बहुसंख्यकों की विविधवर्णी संस्कृतियों में से किसे ''राष्ट्रीय संस्कृति'' के रूप में स्वीकार किया जाए। संघ और उससे जुड़े संगठन, अल्पसंख्यकों को देशद्रोही बताते हैं। मुसलमान पुरूष और हिंदू स्त्री के बीच विवाह को मुस्लिम समुदाय का षड़यंत्र बताया जाता है। वे  ऐसे विवाहों को लव जिहाद कहते हैं। उनके अनुसार इसका उद्देश्य हिंदू महिलाओं को बहला-फुसलाकर मुसलमान बनाना है।

केन्द्रीय संस्कृति व पर्यटन मंत्री के भारतीय संस्कृति को पश्चिमी प्रभाव से मुक्त करने संबंधी हालिया वक्तव्यों को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। मंत्री केवल हिंदू राष्ट्रवादियों की दृढ़ मान्यताओं को दोहरा रहे थे। हिंदू राष्ट्रवादियों का राजनैतिक लक्ष्य रूढि़वाद को बढ़ावा देना, समाज को धर्म के आधार पर ध्रुवीकृत करना और हिंदू राष्ट्रवाद की दुहाई देकर एकाधिकारवादी, अनुदार राज्य की स्थापना करना है। संघ परिवार चाहे आर्थिक उदारीकरण की कितनी ही बात कर ले राजनैतिक अनुदारता उसकी विचारधारा की मूल आत्मा है। (मूल अंग्रेजी से अमरीश हरदेनिया द्वारा अनुदित)

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