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THE HIMALAYAN DISASTER: TRANSNATIONAL DISASTER MANAGEMENT MECHANISM A MUST

We talked with Palash Biswas, an editor for Indian Express in Kolkata today also. He urged that there must a transnational disaster management mechanism to avert such scale disaster in the Himalayas. http://youtu.be/7IzWUpRECJM

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS TALKS AGAINST CASTEIST HEGEMONY IN SOUTH ASIA

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Thursday, October 8, 2015

राम के होने का कोई प्रमाण नहीं है: प्रो राम शरण शर्मा

राम के होने का कोई प्रमाण नहीं है

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/04/2007 01:21:00 PM

राम के अस्तित्व और अयोध्या नगरी की ऐतिहासिकता पर दिये गये अपने लंबे व्याख्यान में इस बार प्रो राम शरण शर्मा राम और अयोध्या की ऐतिहासिकता के प्रमाणों के अभाव की चर्चा कर रहे हैं. आठवीं किस्त.

प्रो राम शरण शर्मा


सा पूर्व 1000-800 के ग्रंथ अथर्ववेद (10.2.31-33) में अयोध्या का सबसे पहला उल्लेख मिलता है और वह भी एक काल्पनिक नगर के रूप में. इसे देवताओं की नगरी के रूप में चित्रित किया गया है, जो आठ चक्रों से घिरी है और नौ प्रवेश द्वारों से सज्जित है, जो सभी ओर से प्रकाश में घिरे हैं. संयुत्त निकाय (नालंदा संस्करण, खंड-3, पृष्ठ-358, खंड-4,पृष्ठ-162) में, जो लगभग ईसा पूर्व 300 का पालि ग्रंथ है, अयोध्या को गंगा नदी के कि नारे बसा हुआ दरसाया गया है, जिसका फैजाबाद जिले में सरयु नदी के किनारे बसी अयोध्या से कुछ भी लेना-देना नही है. आरंभिक पालि ग्रंथ इस विचार का समर्थन नहीं करते कि गंगा शब्द का इस्तेमाल सरयू सहित सभी नदियों के लिए आम अर्थ में किया गया है. वे मही (गंडक ) और नेरजरा (फल्गू) नदियों सहित, जिनके किनारों पर बुद्ध ने पर्यटन किया था, बहुत-सी नदियों का विशेष रूप से उल्लेख करते हैं. इनमें सरभू अथवा सरयू का भी उल्लेख है, पर एक ऐसे संदर्भ में, जिसका अयोध्या से कुछ भी लेना-देना नहीं. वाल्मीकि रामायण के आधार पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अतिरिक्त महानिदेशक, मुनीशचंद्र जोशी ने अयोध्या को सरयू से कुछ दूरी पर ढूंढ़ निकाला. वाल्मीकि रामायण का उत्तरकांड ईसा की आरंभिक सदियों में रचा गया है. उसके अनुसार अयोध्या सरयू से अध्यर्घ योजना दूर है. यह सस्कृंत अभिव्यित बालकांड (22.11) में भी मिलती है और टीकाकारों के मुताबिक इसका अर्थ है 6 कोस अथवा 12 मील. वे इसका अर्थ डेढ़ योजन लगाते हैं. इससे पुन: उलझन उठ खड़ी होती है क्योंकि वर्तमान अयोध्या तो सरयू तट पर स्थित है. यह नदी पूर्व की ओर बहती है तथा बलिया और सारन जिलों में इसे पूर्वी बहाव को घाघरा कहते हैं. सारन जिले में जाकर यह गंगा में मिल जाती है. सरयू अपना मार्ग बदलती चलती है. जिसकी वजह से कुछ विद्वान बलिया जिले के खैराडीह इलाके को अयोध्या मानना चाहते हैं. सातवीं शताब्दी के चीनी यात्री ह्वेनसांग द्वारा अयोध्या की अवस्थिति के संबंध में प्रस्तुत साक्ष्य से भी कठिनाइयां उठ खड़ी होती हैं. उनके अनुसार अयोध्या कन्नौज के पूर्व दक्षिणपूर्व की ओर 600 ली (लगभग 192 किलोमीटर) दूर पड़ती थी और गंगा के दक्षिण की ओर लगभग डेढ़ किमी की दूरी पर स्थित थी. अयोध्या को लगभग गंगा पर स्थित बता कर चीनी यात्री संभवत: उसकी अवस्थिति के बारे में आरंभिक बौद्ध परंपरा की ही पुष्टि करते हैं. 


पिछली किस्तें : एकदोतीनचारपांचछह, सात
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ह्वेनसांग के अनुसार अयोध्या देश में 3000 बौद्ध भिक्षु थे और साधु-संन्यासियों व गैर बौद्धों की संख्या इससे कम थी. अयोध्या राज्य की राजधानी के विषय में बताते हुए वह एक पुराने मठ का जिक्र करते हैं, जो काफी समय से बौद्ध धर्म की शिक्षाओं का केंद्र बना हुआ था (सीयूकी, खंड-1,लंदन, 1906 पृष्ठ 224-25). इससे सातवीं शताब्दी में अयोध्या में बौद्ध धर्म के प्रभुत्व का संकेत मिलता है. फिर भी ह्वेनसांग का कहना है कि अयोध्या देश में 100 बिहार तथा 10 देव (ब्राह्मणों के अथवा अन्यों के ) मंदिर थे. इससे पहले ईसा की पांचवी शताब्दी में फाह्यान साकेत में बुद्ध की दातौन (दंत काष्ठ) का उल्लेख करता है, जो कि सात-एक हाथ ऊंची उगी हुई थी. हालांकि ब्राह्मणों ने इस पेड़ को नष्ट कर दिया था, फिर भी वह उसी जगह पर फिर से उग आया (जेम्स लेगी, ए रिकार्ड ऑफ बुद्धिस्ट किंगडम, आक्सफोर्ड, 1886, पृष्ठ 54-55). अयोध्या को परंपरागत रूप से कई जैन तीर्थंकरों अथवा धार्मिक उपदेशकों की जन्मस्थली भी माना जाता है और जैनी इसे तीर्थ मानते हैं. जैन परंपरा में इसे कोसल राज्य की राजधानी बताया गया है पर यह ठीक कहां स्थित है यह नहीं दरसाया गया. गुप्तकाल के बाद जाकर ही कहीं वर्तमान अयोध्या को राम की लोक विश्रुत अयोध्या के साथ जोड़ा जाने लगा. उस समय तक राम को विष्णु का अवतार माना जाने लगा था. 
अब तक विशेष रूप से अयोध्या का उल्लेख करने वाली मुहरों या सिक्कों का यहां पता नहीं चला है. हमें विभिन्न प्रकार के सिक्के जरूर मिलते हैं, जिन्हें अयोध्या सिक्कों के नाम से जाना जाता है, जो ईपू दूसरी शताब्दी से लेकर पहली शताब्दी और दूसरी शताब्दी ईस्वी तक के हैं. पर उन पर अयोध्या का नाम अंकित नहीं है. उदाहरण के लिए उज्जयिनी, त्रिपुरी, एरणु, कौशांबी, कपिलवस्तु, वाराणसी, वैशाली, नालंदा आदि की पहचान या तो मुहरों या फिर सिक्कों के आधार पर स्थापित की गयी है. अयोध्या से प्राप्त पहली शताब्दी के एक शिलालेख में पुष्यमित्र शुंग के एक वंशज का उल्लेख है पर सिक्के और शिलालेख राम दाशरथिवाली अयोध्या की पहचान नहीं करा पाते. यह सचमुच निराशाजनक बात है कि पर्याप्त उत्खनन और अन्वेषण के बावजूद हम वर्तमान अयोध्या को गुप्तकाल से पूर्व कहीं भी राम के साथ विश्ववासपूर्वक नहीं जोड़ सकते.

रामकथा को हिंदी भाषा क्षेत्र में हालांकि रामचरितमानस ने लोकप्रिय बनाया, तथापि अवधी भाषा का यह महाकाव्य वाल्मीकि के संस्कृत महाकाव्य रामायण पर आधारित है. मूल राम महाकाव्य कोई समरूप रचना नहीं है. मूल रूप से इसमें 6,000 श्लोक थे, जिन्हें बाद से बढ़ा कर 12,000 और अंतत: 24,000 कर दिया गया. विषयवस्तु के आधार पर इस ग्रंथ के आलोचनात्मक अध्ययन से पता चलता है कि यह चार अवस्थाओं से होकर गुजरा था. इसकी अंतिम अवस्था 12वीं शताब्दी के आसपास की बतायी जाती है और सबसे आरंभिक अवस्था ईपू 400 के आसपास की हो सकती है. किंतु यह महाकाव्य इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह वर्ग विभक्त, पितृसतात्मक और राज्यसत्ता आधारित समाज के व्यवस्थित कार्यचालन के लिए कतिपय आदर्श निर्धारित करता है. यह शिक्षा देता है कि पूत्र को पिता की, छोटे भाई को बड़े भाई की और पत्नी को पति की आज्ञा का पालन करना चाहिए. यह इस बात पर बल देता है कि विभिन्न वर्णों के लिए जो कर्तव्य निर्धारित किये गये हैं, उन्हें उनका पालन अवश्य करना चाहिए और वर्ण-जाति संबंधी कर्तव्यों से भटक जानेवालों को जब भी जरूरी हो निर्मम दंड दिया जाना चाहिए और अंत में यह राजा सहित सभी को आदेशि करता है कि धर्म के जो आदर्श राज्य, वर्ण और परिवार के अस्तित्व को बनाये रखने के लिए निर्दिष्ट किये गये हैं, उन्हीं के अनुसार चलें. विभीषण अपने कुल, जो गोत्र आधारित समाज के सदस्यों को एक साथ बांधे रखने के लिए सर्वाधिक आवश्यक था, के प्रति निष्ठा की बलि देकर भी धर्म नाम की विचारधारा में शामिल हुआ. वाल्मीकि द्वारा निर्दिष्ट सामाजिक और सांस्कृतिक मानदंड जैन, बौद्ध और अन्य ब्राह्मण महाकाव्यों और लोक कथाओं में भी दृष्टिगोचर होते हैं, महाकाव्य और लोक कथाएं भारत के सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास में मानदंडों, अवस्थाओं और प्रक्रियाओं को समझने के लिए निश्चय ही महत्वपूर्ण हैं, पर उनमें उल्लिखित कुछ ही राजाओं व अन्य महान विभूतियों की ऐतिहासिकता को पुरातत्व, शिलालेखों, प्रतिमाओं और अन्य स्त्रोतों के आधार पर सत्यापित किया जा सकता है. दुर्भाग्य से हमारे पास इस तरह का कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है, जो ईसा पूर्व 2000 से ईसा पूर्व 1800 के बीच एक ऐसी अवधि, जिसे पुराणों की परंपरा पर काम करनेवाले कुछ विद्वानों ने राम का काल बताया है, अयोध्या में राम दशरथि की ऐतिहासिकता को सिद्ध कर सके.


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