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THE HIMALAYAN DISASTER: TRANSNATIONAL DISASTER MANAGEMENT MECHANISM A MUST

We talked with Palash Biswas, an editor for Indian Express in Kolkata today also. He urged that there must a transnational disaster management mechanism to avert such scale disaster in the Himalayas. http://youtu.be/7IzWUpRECJM

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS TALKS AGAINST CASTEIST HEGEMONY IN SOUTH ASIA

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS TALKS AGAINST CASTEIST HEGEMONY IN SOUTH ASIA

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Sunday, April 1, 2012

सर्राफा हड़ताल के 15 दिन पूरे, कारोबारी पीछे हटने को तैयार नहीं

सर्राफा हड़ताल के 15 दिन पूरे, कारोबारी पीछे हटने को तैयार नहीं

Saturday, 31 March 2012 17:14

नयी दिल्ली, 31 मार्च (एजेंसी) गैर..ब्रांडेड आभूषणों पर एक फीसद उत्पाद शुल्क  तथा सोने के आयात पर सीमा शुल्क दोगुना किए जाने के प्रस्ताव के खिलाफ सर्राफा व्यापारी आज लगातार 15वें दिन हड़ताल पर रहे। वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी द्वारा 16 मार्च को बजट पेश किए जाने के बाद से ही सर्राफा कारोबारी हड़ताल पर हैं। बजट में जहां गैर ब्रांडेड आभूषणों पर एक फीसद का उत्पाद शुल्क लगाने का प्रस्ताव है, वहीं सोने के आयात पर सीमा शुल्क भी दोगुना कर 4 फीसद किए जाने का प्रस्ताव है। 
अखिल भारतीय सर्राफा संघ के अध्यक्ष शील चंद जैन ने कहा कि देश के विभिन्न हिस्सों के हड़ताली संगठनों ने फैसला किया है कि बड़े बाजारों के अलावा छोटे कस्बों में भी जौहरी अपना कारोबार बंद रखेंगे। जैन ने साफ किया कि जब तक सरकार अपने निर्णय को वापस नहीं लेती है, सर्राफा व्यापारी हड़ताल वापस नहीं लेंगे। 


ऑल इंडिया ज्वेलर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष विमल गोयल ने कहा कि हड़ताल की वजह से कारोबारियों के साथ सरकार को भी राजस्व का नुकसान हो रहा है। गोयल ने बताया कि अब तक हड़ताल की वजह से लगभग 11,000 करोड़ रुपये के कारोबार के नुकसान का अनुमान है। इस तरह यदि गणना की जाए तो सरकार को सीमा शुल्क के रूप में 450 करोड़ रुपये का नुकसान हड़ताल से हो चुका है। वहीं देश भर में वैट के रूप में भी करीब 112 करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान सरकार को हुआ है। 
व्यापारियों के प्रमुख संगठन कनफेडरेशन आफ आल इंडिया ट्रेडर्स के महासचिव प्रवीण खंडेलवाल ने कहा कि एक तरफ सरकार वस्तु एवं सेवा कर :जीएसटी: को लागू करना चाहती है, वहीं दूसरी ओर कराधान प्रणाली को जटिल बना रही है। खंडेलवाल ने कहा कि किसी भी तरह के अन्य कर चाहे वह उत्पाद शुल्क ही हो, से कराधान प्रणाली की जटिलता बढ़ेगी।

उत्तराखंड की बिजली परियोजना पर पर्यावरण मंत्रालय को हरित न्यायाधिकरण का नोटिस

उत्तराखंड की बिजली परियोजना पर पर्यावरण मंत्रालय को हरित न्यायाधिकरण का नोटिस

Sunday, 01 April 2012 12:29

नयी दिल्ली, एक अप्रैल (एजेंसी) राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण :एनजीटी: ने उत्तराखंड के गढ़वाल में अलकनंदा नदी पर 200 मेगावाट की श्रीनगर पनबिजली परियोजना का काम रोकने के बारे में एक याचिका पर केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय को नोटिस जारी कर उसका जवाब मांगा है। याचिका में इस परियोजना को नए सिरे से डिजाइन करने का निर्देश देने की अपील की गई है। न्यायाधिकरण ने पर्यावरण एवं वन मंत्रालय, उत्तराखंड सरकार और अलकनंदा हाइड्रो पावर कंपनी लि. :एएचपीसीएल: को नोटिस भेजकर 19 अप्रैल तक जवाब देने को कहा है। 
कार्यवाहक अध्यक्ष न्यायमूर्ति ए सूर्यनारायण नायडू की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि नोटिस जारी किया। 
यह आदेश पर्यावरण कार्यकर्ता विमल भाई और अर्थशास्त्री तथा आईआईएम बेंगलूर के पूर्व प्रोफेसर भरत झुनझुनवाला की याचिका पर दिया गया। 
याचिका में परियोजना 

का काम रोकने और उसे नए सिरे से डिजाइन करने का निर्देश देने की अपील की गई है, जिससे नदी के प्रवाह में बाधा न आए और तथा क्षेत्र के वन एवं पारिस्थितिकी तंत्र पर पर्यावरण के नकारात्मक असर को कम किया जा सके।
पीठ के सामने खुद मामले की दलीलें देते हुए झुनझुनवाला ने एएचपीसीएल का यूपी बिजली कारपोरेशन के साथ किया गया बिजली खरीद समझौता खत्म करने का निर्देश देने की मांग की। 
साथ ही उन्होंने एएचपीसीएल को उत्तराखंड बिजली कारपोरेशन के साथ नया समझौता करके स्थानीय इलाकों को यहां से पैदा बिजली की आपूर्ति करने का निर्देश देने के लिए भी कहा।
पर्यायवरण मंत्रालय ने तीन मई 1985 को 200 मेगावाट परियोजना स्थापित करने के लिए उत्तर प्रदेश राज्य बिजली बोर्ड को पर्यायवरण संबंधी मंजूरी दी थी।

 

भाषा और सामाजिक भेदभाव

भाषा और सामाजिक भेदभाव

Sunday, 01 April 2012 14:27

तुलसी राम 
जनसत्ता 1 अप्रैल, 2012: चार मार्च को एम्स के एक छात्र ने आत्महत्या कर ली। मीडिया में खबर आने लगी कि अंग्रेजी भाषा के चलते उस छात्र का अकादमिक प्रदर्शन ठीक नहीं था, इसलिए उसने अपनी जान दे दी। भारत में भाषाई भेदभाव बहुत पुराना है। सदियों तक अशिक्षा के दौर में संस्कृत माध्यम वाले 'गुरुकुल' में या तो ब्राह्मण पढ़ते थे या राजघराने के लोग। इसमें स्त्रियों की शिक्षा वर्जित थी, भले ही वे उच्च कुल की क्यों न हों। प्राचीन काल की गार्गी, लोपामुद्रा जैसी कुछ महिलाओं का इतिहासकार बहुत उदाहरण देते हैं कि वे वेद-पारंगत थीं और संस्कृत में शास्त्रार्थ करती थीं। इस सच्चाई के पीछे भ्रम ज्यादा फैलाया जाता है। हकीकत यह थी कि उस समय उन्हीं महिलाओं को शिक्षित होने का अधिकार था, जो अपने पिता या भाई से शिक्षा प्राप्त कर सकती थीं। गार्गी या लोपामुद्रा इसी श्रेणी में आती थीं। दूसरी तरफ संस्कृत को देववाणी कह कर इसे पवित्र घोषित कर दिया गया। ऐसी स्थिति में दलित या अन्य शूद्र जातियां न सिर्फ अशिक्षित रह गर्इं, बल्कि संस्कृत जानने वालों द्वारा सामाजिक भेदभाव की शिकार भी हो गर्इं। 
संस्कृत ग्रंथों को छिपा कर रखा जाता है। यहां तक कि शूद्रों के उन्हें देखने, सुनने या छूने पर कठिन दंड का प्रावधान था। यह बात और है कि संस्कृत की पवित्रता ही उसकी सबसे बड़ी दुश्मन बन गई। नतीजतन, यह मात्र कर्मकांड की भाषा बन कर रह गई। इस कड़ी में सुल्तानों और मुगलों के समय शिक्षा गुरुकुल से बाहर आई, पर मस्जिदों में सिमट कर रह गई। यानी मदरसा प्रणाली का विकास हुआ, जिसमें सिर्फ मुसलमान शिक्षित हो सके। दलितों या शूद्रों को यहां भी कोई अवसर नहीं प्राप्त हुआ। 
एक उल्लेखनीय तथ्य यह है कि गुरुकुल में जहां संस्कृत थी, मदरसों में उसका स्थान अरबी, फारसी और उर्दू ने ले लिया। ऐसे ही जब ब्रिटिश उपनिवेशवादियों का शासन आया, आधुनिक शिक्षा की नींव तो अवश्य पड़ी, पर इन शिक्षण संस्थाओं में भी उच्च जातियों का ही वर्चस्व स्थापित हो गया। यहां अंग्रेजी का वर्चस्व हो गया। परिणामस्वरूप यह देखा गया कि शिक्षा की प्रणाली चाहे जो भी रही, दलित सदियों तक उससे वंचित रहे। आजादी के पहले डॉ आंबेडकर को बड़ी मुश्किल से सिर्फ पांच दलित स्नातक यानी ग्रेजुएट मिले थे। इसलिए दलितों के बीच जो भी शिक्षा आई वह 1932 में पूना पैक्ट पर हस्ताक्षर होने के बाद आई। विशेष रूप से 1950 में जब भारत का नया संविधान लागू हुआ, तो आरक्षण व्यवथा के चलते शिक्षा के क्षेत्र में धीरे-धीरे दलित आने लगे। 
कुल मिलाकर यह स्पष्ट है कि शिक्षा का भाषाई माध्यम चाहे जो भी रहा, वह दलितों के लिए पराया सिद्ध हुआ। इसलिए भेदभाव एक आवश्यक प्रक्रिया का अंग बन गया। भारतीय समाज जाति-व्यवस्था पर आधारित है और जाति-व्यवस्था धर्म की देन है। इसलिए जातीय भेदभाव भी धर्म पर ही आधारित है। यहां तक कि भाषा को भी धर्म से जोड़ दिया गया। इस संदर्भ में भाषाओं का सांप्रदायीकरण भी हुआ। इसमें भी दलित कहीं फिट होते नहीं दिखे। ब्रिटिश शिक्षा प्रणाली आधुनिक तो थी, पर अंग्रेजी माध्यम ने इसे औपनिवेशिक बना दिया। कुल मिलाकर यह देखा गया कि भारत में शिक्षा प्रणाली चाहे जो भी रही हो, उसमें उच्च जाति या उच्च वर्गों का ही वर्चस्व रहा। 
चूंकि शिक्षा का संबंध सीधे-सीधे रोजगार से है, इसलिए शिक्षण संस्थानों में दलितों के साथ भेदभाव अंतर्निहित-सा हो गया है। इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से पता चलता है कि भाषाई कमजोरी सामाजिक भेदभाव को बढ़ाने में सहायक सिद्ध होती है। इस यथार्थ को देखते हुए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने वर्षों पहले एक अनोखी नीति अपनाई थी, जिसके तहत सभी विश्वविद्यालयों से कहा गया था कि वे अपने यहां 'ईक्वल अपार्चुनिटी आॅफिस' (ईओओ) यानी समान अवसर कार्यालय खोलें और दलित तथा आदिवासी छात्रों को रेमेडियल कोचिंग प्रदान करें। रेमेडियल कोचिंग का सुझाव दो तरह का था- एक, भाषाई कोचिंग यानी अंग्रेजी की कोचिंग, और दूसरा, विषय संबंधी कोचिंग।


इस मद में आने वाले सारे खर्चों की जिम्मेदारी विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने अपने ऊपर ली थी। 
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय देश का पहला संस्थान था, जिसने लगभग पंद्रह वर्ष पहले रेमेडिअल कोचिंग शुरू की थी। मैं खुद 'ईओओ' का तीन टर्म इंचार्ज था। इस संदर्भ में मेरा अनुभव अत्यंत निराशाजनक था। तमाम कोशिशों के बावजूद छात्र रिमेडियल कोचिंग में अनुपस्थित रहते थे। धीरे-धीरे यह व्यवस्था धराशायी हो गई। यहां मेरा एक अनुभव यह रहा है कि लगभग सारे छात्र दाखिला पाने के साथ ही संघ लोकसेवा आयोग और प्रदेश लोकसेवा आयोग (पीसीएस) की परीक्षाओं में शामिल होने की तैयारी में व्यस्त हो जाते हैं। नतीजतन, कक्षा में उनकी प्रगति संतोषजनक नहीं हो पाती। अधिकतर छात्र न इधर के होते हैं न उधर के। इस कारण अनेक छात्र-छात्राएं सामाजिक भेदभाव की शिकायत दर्ज करा चुके हैं। 
जांच के दौरान मैंने पाया कि कई मामलों में जातीय भेदभाव न होकर व्यक्तिगत स्तर पर आपसी समझ की कमी थी। ईओओ के अनुभव से यह भी पता चला कि शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी होने के कारण छात्र रेमेडियल कोचिंग में रुचि नहीं लेते थे। इससे यह सिद्ध होता है कि शिक्षा प्रणाली ही दोषपूर्ण और भेदभाव वाली है। अगर शिक्षा का माध्यम मातृभाषा हो, तो बहुत हद तक भाषाई भेदभाव कम किया जा सकता है। जब तक मातृभाषा को शिक्षा का माध्यम नहीं बनाया जाएगा, छात्रों के समक्ष अनेक समस्याएं खड़ी होती रहेंगी। विश्व समुदाय का उदाहरण है कि अपनी मातृभाषा   अपनाने वाले देश ही ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में आगे निकले। रूस, चीन, जापान, फ्रांस, जर्मनी, इटली, स्पेन, इंग्लैंड, अमेरिका आदि इसके ज्वलंत उदहारण हैं। इन सारे देशों में शिक्षा का माध्यम आज भी मातृभाषा है। 
डॉ आंबेडकर ने कभी कहा था कि अंग्रेजी शेरनी का दूध है, इसे जो पीएगा, वह दहाड़ेगा। ब्रिटिश राज में यह बात एकदम सही थी और भारतीय राज में भी तब तक सही जान पड़ेगी, जब तक शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी रहेगी। असली ज्ञान अपनी भाषा में उत्पन्न होता है, विशेष रूप से  साहित्य विदेशी भाषा में कभी पनप नहीं सकता। 
आजादी के बाद अगर आंकड़े इकट््ठा किए जाएं तो पता चलेगा कि अधिकतर छात्र अंग्रेजी में विफल होकर अपना भविष्य नष्ट कर चुके हंै। कुछ अच्छी अंग्रेजी जानने वाले छात्र आगे अवश्य निकल जाते हैं, जिसके कारण अंग्रेजी के महत्त्व को लोग स्वीकार करने लगते हैं। वास्तविकता यह है कि मातृभाषा की उपेक्षा के कारण अंग्रेजी का महत्त्व बढ़ता जा रहा है। एक वैकल्पिक भाषा के रूप में अंग्रेजी का अध्ययन ठीक है, पर शिक्षा का माध्यम हमेशा मातृभाषा ही होनी चाहिए। लेकिन इसका अर्थ यह कतई नहीं लगाना चाहिए कि मातृभाषा में शिक्षा का माध्यम होने से ही सामाजिक भेदभाव समाप्त हो जाएगा। 
इधर कुछ वर्षों से शिक्षण संस्थानों में भेदभाव की घटनाएं बड़ी तेजी से सामने आ रही हैं। कई आत्महत्याएं भी हुई हैं। इसका मूल कारण है कि पिछले दो दशकों के दौरान भारत की राजनीति में बड़े स्तर पर जातीय ध्रुवीकरण हुआ है, जिसके कारण सांप्रदायिक और क्षेत्रीयतावादी ध्रुवीकरण भी तेजी से बढ़ा है। इसका परिणाम यह हुआ है कि हर जाति का जातीय गौरव चरम सीमा पार कर गया है। जाति-विरोधी जागरूकता एकदम समाप्त हो गई है। इसलिए राजनीति में जातीय सोच धीरे-धीरे सामाजिक सोच बनता जा रहा है। परिणामस्वरूप जातीय भेदभाव बड़ी तेजी से उभरने लगा है। अब पार्टियां नहीं, बल्कि जातियां सत्ता में आ रही हैं। ऐसी स्थिति में भारतीय जनतंत्र जातीय जनतंत्र में बदलता जा रहा है। 
इसलिए जरूरत इस बात की है कि शिक्षा प्रणाली में आमूल परिवर्तन करके जाति-विरोधी मानसिकता तैयार की जाए। साथ ही जरूरत है फिर से जाति-विरोधी सामाजिक आंदोलनों को जीवित करके सामाजिक जागरूकता पैदा करने की। जब तक राजनीतिक सत्ता जाति पर आधारित रहेगी, जातीय भेदभाव भी जारी रहेगा। जातीय भेदभाव दूर करने में छात्रों की भूमिका सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण है। इसलिए स्कूली शिक्षा को पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष बनाना पड़ेगा, अन्यथा सामाजिक भेदभाव जैसे अब तक रहा है, आगे भी जारी रहेगा।

निष्ठा पर नाहक सवाल

निष्ठा पर नाहक सवाल


Sunday, 01 April 2012 14:28

तरुण विजय 
जनसत्ता 1 अप्रैल, 2012: सियाचिन में शून्य से नीचे तीस से लेकर चालीस डिग्री सेल्सियस तक के भयानक बर्फानी माहौल में तैनात सैनिक अकेलेपन, ऊब और तनाव के चलते सर्वाधिक मानसिक रोगों के शिकार होते हैं। बर्फ से हाथ-पांव की उंगलियां गलने और फिर काटे जाने के अनेक मामले सैनिक अस्पतालों में मार्मिक दृश्य पैदा करते हैं। साल में महीने भर की छुट््टी मिलेगी तो आठ दिन प्राय: जाने-आने में ही खर्च हो जाते हैं। अगर कभी बर्फानी दरारों और अतल गहरे पतले बर्फ से ढके गड्ढों में गिर जाएं तो शरीर जम जाता है, चमड़ी बर्फ से चिपक जाती है, रस्सी के सहारे भी ऊपर खींचा जाना असंभव होता है, और फिर दर्दनाक अंत : पल-पल ठहरी हुई आंखें निस्तेज होती जाती हैं। 
फिर भी सैनिक सियाचिन में तैनाती चाहता है। वहां का रोमांच और मातृभूमि के प्रति प्रेम उसे खींच लाता है- मौत का सामना करने के लिए। उसे परास्त करने के लिए। वह मौत पर विजय पाता है। पर दिल्ली के बाबू और नेता उसे हरा देते हैं।
वह फौज में इसलिए भरती हो ताकि देश की सुरक्षा के नाम पर दिल्ली के गद्दार फौजी सौदों में हजारों करोड़ रुपए की दलाली खा सकें? 
फिर उस सेनाध्यक्ष का गला पकड़ें, जिसने भ्रष्ट सौदों को बेनकाब किया?
और फिर सत्ता के तंबुओं में पनाह लेने वाले दिग्गज 'विशेषज्ञ-पत्रकार' कहें- जनरल वीके सिंह ने नया क्या कहा? जो बातें वे बता रहे हैं, वह सब तो सीएजी की रपटों में, रक्षा मंत्रालय की स्थायी समिति के विवरणों में बरसों से छपती आई हैं, पर उसे ये सांसद पढ़ते थोड़े ही हैं। 
अच्छी बात है, साहब। पेड-न्यूज पर सन्नाटा ओढ़ कर संसद को अनपढ़ कहना काफी सुहाता है। पर आप खुद फिर उन तथ्यों को क्यों नहीं उठा पाए? और अगर जनरल वीके सिंह नहीं बोलते तो क्या देश उस तीव्रता से सेना के साथ मंत्रालय के बाबुओं और नेताओं के छल पर चर्चा करता? 
भारत दुनिया का सबसे बड़ा शस्त्र खरीदार है। नौ खरब रुपए के रक्षा बजट का चालीस प्रतिशत हथियार, विमान, पनडुब्बियां खरीदने में व्यय होता है। भारत की बयासी प्रतिशत शस्त्रास्त्र आवश्यकताएं विदेशों से की जाने वाली खरीद से पूरी की जाती हैं। उसमें भी पचहत्तर प्रतिशत केवल रूस से खरीद होती है। अब धीरे-धीरे अकेले रूस पर निर्भरता न रख कर पैंतीस अन्य देशों से भी शस्त्र खरीदे जा रहे हैं। मगर लगभग हर शस्त्र खरीद पर सवाल खड़े हुए। हजार-हजार करोड़ के सौदों में सैकड़ों करोड़ के कमीशन का इंतजाम होता है। 
भारत सबसे ज्यादा शस्त्र खरीदने के बावजूद सत्तानबे प्रतिशत 'अपेक्षा से कम रक्षा-सिद्ध' क्यों है? 
2009 में कर्नाटक के अनुसूचित जाति संगठन के नेता हनुमंतप्पा ने प्रधानमंत्री, यूपीए अध्यक्ष और रक्षामंत्री को पत्र लिख कर टेट्रा ट्रकों की खरीद के बारे में जांच का आग्रह किया था। 
जांच नहीं की गई। पत्र दबा दिया गया। अब जब पत्र फिर से उजागर हुआ तो एक स्वनामधन्य विश्लेषक ने चैनल चर्चा में हनुमंतप्पा की योग्यता पर ही सवाल जड़ दिया- आपने किस हैसियत से, किस पात्रता से टेट्रा ट्रकों की जांच का पत्र लिखा?
मैंने जवाब में पूछा- क्या भारत के किसी भी नागरिक को, चाहे उसकी योग्यता का स्तर कुछ भी हो, देश के प्रधानमंत्री के पास ऐसा हर विषय उठाने का अधिकार नहीं है, जिसे वह जरूरी मानता है और देशहित में उसकी जांच की मांग करना उचित समझता है? अगर पात्रता और योग्यता की ही बात करनी है तो एके एंटनी क्या इंडियन मिलिट्री एकेडमी से ग्रेजुएट हैं कि उन्हें रक्षामंत्री बनाया जाना उपयुक्त माना गया? संदेशवाहक को मारो। जो गलत काम के खिलाफ लोगों को जगाए, चेतावनी दे, उसे कठघरे में खड़ा कर बेइज्जत करो कि नामाकूल, बदनीयत, तुमने इतने बड़े-बड़े लोगों की कलई खोलने का दुहस्साहस कैसे किया? जरूर तुम्हारे मन में कोई पूर्वग्रह, कोई बेईमानी होगी। अब क्यों बोल रहे हो, पहले क्यों नहीं बोले? तुमने सीधे प्रधानमंत्री को पत्र लिख कर शासकीय रीति-रिवाज का उल्लंघन किया है। तुमने अनुशासन तोड़ा है। जन्मतिथि पर तुम्हारी बात नहीं मानी गई, इसलिए खुंदक निकाल रहे हो, बदला ले रहे हो। इस्तीफा दो। वरना तुम्हें बर्खास्त कर देंगे। हिम्मत होती और अपने किए-अनकिए की ईमानदारी पर भरोसा होता, तो कबके बर्खास्त कर चुके होते।

जनरल वीके सिंह ने फौज की तैयारियों में भयानक दुर्बलताओं की ओर ध्यान दिलाने वाला पत्र प्रधानमंत्री को लिखा तो उसे 'लीक' कर दिया गया। किसने किया?
वे कौन हो सकते हैं, जिन्हें इस प्रकार के अत्यंत गोपनीय पत्र के लीक होने से फायदा पहुंच सकता है? 
शुरू के तीन दिनों तक चैनलों पर जो बहस चली, उसमें जनरल वीके सिंह पर ही पत्र 'लीक' करने के आरोप लगाए गए। 
जब जनरल वीके सिंह ने कहा कि यह अत्यंत गोपनीय पत्र 'लीक' करने का कुकृत्य देशद्रोह है और जिसने भी यह अपराध किया है उसके विरुद्ध निर्मम कार्रवाई होनी चाहिए, तो सिंह-विरोधी आक्रमण ढीले हुए। 
न केवल शानदार कीर्ति और बेदाग छवि वाले पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वीके मलिक, जनरल शंकर रायचौधरी और पूर्व नौसेनाध्यक्ष विष्णु भागवत जनरल वीके सिंह के समर्थन में खुल कर सामने आए हैं, बल्कि उत्तरी क्षेत्र के जीओसी लेफ्टीनेंट जनरल केटी परनायक ने जम्मू में पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि जनरल वीके सिंह ने फौज के पास अच्छे शस्त्रों, कारतूसों और सैन्य उपकरणों की कमी का जो पत्र लिखा है, वह तथ्यों पर आधारित है। 
अब क्या जवाब रहता है इस सरकार के पास? देशभक्त सैनिक को क्या इसी छल   के साए में जलते रहना होगा? बाहरी शत्रु की अपेक्षा भीतर का शत्रु ज्यादा घातक होता है। चाहे गढ़चिरौली हो, मलकानगिरि या उत्तर पूर्वांचल के क्षेत्र; सब जगह भीतरी शत्रुओं से सामना करते हुए सीमा सुरक्षाबल, सीआरपीएफ, भारत-तिब्बत सीमा पुलिस और सेना के जवान अपना बलिदान भी देते हैं और अपने परिवारों में देशभक्ति की अलख जगाए रखते हैं। सीमा सुरक्षा बल के अधिकारी विनोद शर्मा आतंकवादियों से लड़ते हुए मारे गए। अब उनकी बेटी उर्मिला आठ साल की है। उसने कहा, पापा हमें राष्ट्रगीत का सम्मान करना सिखा गए। अगर टीवी पर भी राष्ट्रगीत बज रहा हो और हम न खड़े हों, तो पापा को इतना गुस्सा आता था कि हमें सजा मिलती थी। लेकिन फौजी वर्दी और उसकी निष्ठा पर पत्थर फेंकने वाले आज संसद से मीडिया तक आवाज उठाते दिख जाते हैं, तो भारत सिकुड़ता प्रतीत होता है। हथियारों की खरीद में घोटाला करने वाले सीधे-सीधे बिना शक देशद्रोही हैं। उन्हें कतार में खड़ा कर उन्हीं के लायक सजा मिले तो सैनिक का जलना बंद हो।

अग्नि परीक्षा में खरे उतरकर बहुगुणा ने कायम की अपनी धाक

अग्नि परीक्षा में खरे उतरकर बहुगुणा ने कायम की अपनी धाक

Sunday, 01 April 2012 13:16

देहरादून, एक अप्रैल (एजेंसी) उत्तराखंड के हालिया विधानसभा चुनावों के बाद सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सांसद विजय बहुगुणा मुख्यमंत्री पद तक के अपने सफर के हर पड़ाव पर अग्नि परीक्षाओं में खरे उतरकर राज्य में अपना वर्चस्व कायम करने में कामयाब रहे ।  
राज्य के राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनाव के पहले नेतृत्व के सवाल पर बहुगुणा के नाम को कोई खास तवज्जो नहीं दी जाती थी । केंद्रीय मंत्री हरीश रावत सहित कुछ और नेता मुख्यमंत्री पद की दौड़ में शामिल दिखाई दे रहे थे । लेकिन बहुगुणा अपने कुशल नेतृत्व और पार्टी आलाकमान के प्रति अपनी निष्ठा के बूते मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज हो गए ।  
विश्लेषकों की मानें तो बहुगुणा ने जब मुख्यमंत्री पद संभाला तो ऐसा लग रहा था कि वह इस सरकार को कुशल नेतृत्व नहीं दे पाएंगे पर उन्होंने बड़ी ही सूझबूझ से न सिर्फ अपनी पार्टी के नेताओं को नतमस्तक होने पर मजबूर कर दिया बल्कि एक के बाद एक अग्नि परीक्षाओं में भी खरे उतरकर विपक्षी भाजपा के सारे सपनों को चकनाचूर कर दिया । 
भाजपा के विधायक तथा नेता जहां कुछ दिन पहले तक यह कहते हुये अघा नहीं रहे थे कि बहुगुणा के पास विधानसभा में अपेक्षित बहुमत नहीं है और जिस दिन गुप्त मतदान हो जाए उन्हें अपनी स्थिति समझ में आ जाएगी । लेकिन अब राज्य सभा के लिये कांग्रेस के उम्मीदवार महेन्द्र सिंह माहरा के विजयी होने के बाद उन नेताओं की जुबान पर ताला लग गया है । 
कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता राजीव महर्षि ने 'पीटीआई-भाषा' से कहा कि बहुगुणा अपने सरल और सौम्य स्वभाव के कारण इतने लोकप्रिय हो गये कि कांग्रेसजनों ने बिना किसी भेदभाव के उनका समर्थन किया और इसी वजह से वह एक के बाद एक कड़े इम्तिहानों में कामयाब भी हुए ।  
उन्होंने कहा कि बहुगुणा के सरल स्वभाव की वजह से विपक्षी भाजपा के भी कई नेता उनकी तारीफ करते हैं । 
बहुगुणा रिश्ते में भाजपा के वरिष्ठ नेता तथा पूर्व मुख्यमंत्री भुवनचंद्र खंडूरी के भाई हैं । 
मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद बहुगुणा पहली अग्नि परीक्षा से उस वक्त गुजरे जब राज्य विधान सभा अध्यक्ष का चुनाव होना था । भाजपा को इसमें पूरी उम्मीद थी कि बहुगुणा के विरोधी खेमे के विधायक या तो 'क्रॉस वोटिंग' कर सकते हैं या गैरहाजिर रहकर उन्हें झटका दे सकते हैं । इसी उम्मीद से भाजपा ने विधान सभा अध्यक्ष पद के लिए अपने पूर्व विधानसभा अध्यक्ष हरबंस कपूर को मैदान मे उतार दिया था । हालांकि, कपूर को जबर्दस्त मात मिली और कांग्रेस के गोविंद सिंह कुंजवाल ने बहुमत हासिल कर जीत दर्ज करने में कामयाबी हासिल की ।   

विधानसभा में कांग्रेस के 32, भाजपा के 31, बसपा के तीन, उत्तराखंड क्रांति दल के एक तथा तीन निर्दलीय विधायक हैं । राज्यपाल ने एक विधायक को मनोनीत भी किया है । 
राज्य की सत्ता गंवाने वाली भाजपा ने जब मुख्यमंत्री पर विधान सभा में विश्वासमत हासिल करने का दबाव बढ़ाया तो बहुगुणा ने बिना किसी हिचकिचाहट के पिछले दिनों विधान सभा में एक वाक्य का प्रस्ताव पेश कर विपक्षियों को भी चौंका दिया तथा उस प्रस्ताव पर प्रत्यक्ष रूप से वोटिंग करा अपना बहुमत साबित कर दिया जिसके विरोध में भाजपा के सदस्यों ने सदन से वाकआउट कर दिया था । 
सदन में विपक्षी सदस्य गुप्त मतदान की मांग कर रहे थे । उन्हें यह उम्मीद थी कि यदि गुप्त मतदान हो जाएगा तो बहुगुणा के कथित विरोधी खेमे के विधायक मुख्यमंत्री को झटका दे सकते हैं लेकिन इस परीक्षा में भी बहुगुणा पूरे खरे उतरे तथा उनके पक्ष में 39 विधायकों ने हाथ उठाकर अपना समर्थन दिया तथा उनकी सरकार द्वारा पेश किये गये लेखानुदान को भी पारित कर दिया । 
बहुगुणा ने सबसे महत्वपूर्ण अग्निपरीक्षा उस समय पास की जब राज्यसभा के लिये हुये चुनाव में गुप्त मतदान के जरिये 39 विधायकों ने कांग्रेस उम्मीदवार महेन्द्र सिंह माहरा को अपना मत दिया जबकि भाजपा
उम्मीदवार अनिल गोयल को मात्र 31 मत ही मिले तथा उनकों आठ वोटों से पराजय का मुंह देखना पडा । 
भाजपा ने इस चुनाव में गुप्त मतदान के चलते क्रास वोटिंग के साथ बसपा और निर्दलीयों के वोट की भी उम्मीद की थी लेकिन उनकी आस धरी की धरी रह गयी । मुख्यमंत्री के तौर पर बहुगुणा ने विपक्ष 
की उम्मीदों को धराशायी कर अपना वर्चस्व स्थापित कर दिया ।

अब सिर्फ तीन माह के लिए वैध होंगे चेक, ड्राफ्ट

अब सिर्फ तीन माह के लिए वैध होंगे चेक, ड्राफ्ट

Sunday, 01 April 2012 12:26

नयी दिल्ली, एक अप्रैल (एजेंसी) चेक और ड्राफ्ट अब सिर्फ तीन माह के लिए वैध होंगे। पहले यह समय सीमा छह माह थी। अब जारी करने की तिथि के तीन माह से अधिक के चेक और ड्राफ्ट बैंकों द्वारा स्वीकार नहीं किए जाएंगे। 
भारतीय रिजर्व बैंक ने चेक, बैंक ड्राफ्ट और इसी तरह की अन्य बैंक सुविधाओं की वैधता अवधि घटाकर तीन माह करने की घोषणा की थी। यह आदेश आज से प्रभावी हो गया है।
रिजर्व बैंक ने अपने आदेश में कहा था कि 1 अप्रैल, 2012 से बैंक ऐसे चेक, ड्राफ्ट, पेआर्डर या बैंकर्स चेक का भुगतान नहीं करेंगे, जो जारी करने की तिथि के तीन माह बाद पेश किए जाएंगे। 

केंद्रीय बैंक ने यह निर्देश इन शिकायतों के बाद दिया है कि कुछ लोग छह माह की वैधता सीमा का दुरुपयोग कर रहे हैं और इनका इस्तेमाल नकदी के रूप में कर रहे हैं। एक वरिष्ठ बैंक अधिकारी ने कहा कि केंद्रीय बैंक का यह फैसला पूरी तरह उचित है, क्योंकि चेक या ड्राफ्ट के लिए तीन माह की अवधि पर्याप्त है।


जमीयत के दोनों धड़ों में फिर खिंची तलवारें

http://www.jansatta.com/index.php/component/content/article/1-2009-08-27-03-35-27/15436-2012-04-01-06-06-18

Sunday, 01 April 2012 11:35

सुरेंद्र सिंघल 
देवबंद, 1 अप्रैल। देवबंदी मसलक के मुसलिमों के सामाजिक व मजहबी प्रमुख संगठन जमीयत उलमा-ए-हिंद के दोनों धड़ों के बीच दूरी और तनाव बढ़ने से इस्लामिक शिक्षण संस्था दारुल उलूम पर संकट के बादल फिर मंडरा सकते हैं। मौलाना असद मदनी के निधन के बाद से जमीयत उलमा-ए-हिंद दो धड़ों में बंट गई थी। एक धड़े पर उनके बेटे महमूद मदनी सांसद और दूसरे पर उनके भाई व दारुल उलूम के हदीस के विद्वान मौलाना अरशद मदनी का कब्जा हो गया था। दोनों धड़े गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी समर्थक माने जाने वाले दारुल उलूम के मोहतमिम मौलाना गुलाम मौहम्मद वस्तानवी को संस्था से निकाले जाने के मुद्दे पर जरूर एक हो गए थे लेकिन दारुल उलूम की मजलिसे शूरा (सर्वोच्च अघिकार प्राप्त प्रबंधक समिति) के सदस्य व एयूडीएफ सांसद मौलाना बदरुद्दीन अजमल के मुद्दे पर उनमें तनाव और दूरियां बढ़ गई थीं। मौलाना अरशद मदनी की अगुवाई वाले धड़े के देवबंद में 24-25 मार्च को हुए राष्ट्रीय अधिवेशन के बाद उस समय उनके बीच तनाव पैदा हो गया, जब देवबंद से लौटे सैकड़ों प्रतिनिधियों को दिल्ली जमीयत के दफ्तर मस्जिद अब्दुल नबी में देर रात महमूद मदनी समर्थक लोगों ने वहां से जबरिया निकालने का काम किया। 
इस घटना से गुस्साए मौलाना अरशद मदनी ने 27 मार्च को नई दिल्ली हाई कोर्ट में दो याचिकाएं दायर कीं। एक में महमूद मदनी और उनके करीबी कुछ हामियों के खिलाफ अवमानना का आरोप लगाया तो दूसरे में यह मांग की कि जमीयत के दिल्ली दफ्तर में उन्हें भी सुरक्षा गार्ड आदि नियुक्त करने का अधिकार दिया जाए। अवमानना मामले में मौलाना अरशद ने आरोप लगाया कि महमूद मदनी और उनके पीए मुबस्सिर अंसारी आदि पांच-छह लोगों ने जमीयत कार्यकर्ताओं को कार्यालय के उस हिस्से से बाहर निकालने का काम किया, जिसका स्टे हाई कोर्ट से मिला हुआ है। 
महमूद मदनी धड़े के नियाज अहमद फारुखी ने शनिवार को जनसत्ता को बताया कि हाई कोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति जीएस सिस्टानी ने अवमानना संबंधी मौलाना अरशद मदनी की याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि उन्हें दफ्तर परिसर में जिन तीन कमरों के इस्तेमाल का स्टे मिला है, वे उन्हीं का इस्तेमाल कर सकते हैं और वहां उतनी क्षमता के ही मेहमानों को बुला और ठहरा सकते हंै। जबकि 26 मार्च की घटना के रोज वहां दो-तीन सौ लोग जमा हो गए थे। नियाज अहमद फारुखी ने यह भी बताया कि याचिका की दूसरी मांग पर न्यायमूर्ति जीएस सिस्टानी ने महमूद मदनी पक्ष को अपना जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए, जिस पर 14 मई 2012 को मस्जिद नबी के इस्तेमाल प्रकरण पर फैसला देते समय विचार किया जाएगा। जाहिर है इस मुद्दे पर फिलहाल मौलाना अरशद मदनी को मायूसी हाथ लगी है। 

जमीयत के दोनों धड़ों के बीच महमूद मदनी की अगुवाई वाली जमीयत की असम इकाई के अध्यक्ष मौलाना बदरुद्दीन अजमल मुद्दे पर भी तलवारें खिंच गई हैं। पहले देवबंदी मदरसों के राष्ट्रीय अधिवेशन और बाद में जमीयत के अधिवेशन के दौरान मौलाना बदरुद्दीन के खिलाफ आपित्तजनक आठ पेज की पुस्तिका जारी कर उन पर हिंदुओं की मूर्ति पूजा करने और गैर इस्लामिक रीतिरिवाज करने का आरोप लगाया गया। इसका मौलाना बदरुद्दीन अजमल ने जोरदार खंडन किया। उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से उनके खिलाफ की गई इस घिनौनी साजिश की सीबीआई जांच की मांग भी की।  
जमीयत के इन दोनों धड़ों के बीच का तनाव और विवाद अगर जारी रहता है तो दारुल उलूम पर भी इसका असर पड़े बिना नहीं रहेगा। इन हालात से यह भी साफ हो गया कि लोकप्रिय और प्रगतिशील गुजराती मौलाना गुलाम मौहम्मद वस्तानवी को भी एक साजिश के तहत दारुल उलूम के मोहतमिम पद से हटाने का काम किया गया था। अब मौलाना वस्तानवी पक्ष के मजलिसे शूरा के सदस्य मौलाना बदरुद्दीन अजमल भी उन्हें शूरा से हटाने की साजिश की बू इस पूरे विवाद में महसूस कर रहे हैं। लेकिन उनका दावा है कि इस बार उनके विरोधियों की चालें अल्लाह कतई सफल नहीं होने देगा।
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