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THE HIMALAYAN DISASTER: TRANSNATIONAL DISASTER MANAGEMENT MECHANISM A MUST

We talked with Palash Biswas, an editor for Indian Express in Kolkata today also. He urged that there must a transnational disaster management mechanism to avert such scale disaster in the Himalayas. http://youtu.be/7IzWUpRECJM

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS TALKS AGAINST CASTEIST HEGEMONY IN SOUTH ASIA

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Sunday, April 1, 2012

जीवन शैली से ही रचना प्रक्रिया का निर्माण होता है : शेखर जोशी

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[LARGE][LINK=/index.php/dekhsunpadh/1037-2012-04-01-12-40-24]जीवन शैली से ही रचना प्रक्रिया का निर्माण होता है : शेखर जोशी   [/LINK] [/LARGE]
Written by NewsDesk Category: [LINK=/index.php/dekhsunpadh]खेल-सिनेमा-संगीत-साहित्य-रंगमंच-कला-लोक[/LINK] Published on 01 April 2012 [LINK=/index.php/component/mailto/?tmpl=component&template=youmagazine&link=a434b652fe18b5d3d8a84ddbcf60342159e2581f][IMG]/templates/youmagazine/images/system/emailButton.png[/IMG][/LINK] [LINK=/index.php/dekhsunpadh/1037-2012-04-01-12-40-24?tmpl=component&print=1&layout=default&page=][IMG]/templates/youmagazine/images/system/printButton.png[/IMG][/LINK]
वर्धा : महात्मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा के इलाहाबाद क्षेत्रीय केंद्र में ''मेरी शब्द यात्रा'' विषय पर आयोजित कार्यक्रम के दौरान हिंदी के वरिष्‍ठ कथाकार शेखर जोशी ने अपनी रचना प्रक्रिया को साझा करते हुए कहा कि जीवन शैली से ही रचना प्रक्रिया का निर्माण होता है पर आज संकट इस बात का है कि हमारी जीवन शैली में सामाजिक सरोकारों के लिए जगह नहीं बची है। सत्यप्रकाश मिश्र सभागार में आयोजित समारोह की अध्यक्षता सुप्रसिद्ध नाटककार अजीत पुष्‍कल ने की।

नामचीन साहित्यिक दिग्गजों को संबोधित करते हुए शेखर जोशी ने कहा कि मेरा जन्म किसान परिवार में हुआ। लोक गीत व संगीत से मेरी जीवन पद्धति जुड़ी रही है। कुछ ऐसी परिस्थितियां हुई कि मुझे विस्थापित होना पड़ा। विस्थापन का मेरे जीवन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा कि मैं लेखन की ओर प्रवृत्त हुआ। मुझे दो बार विस्थापन होना पड़ा। पहली बार विस्थापन के दौरान नानी के गांव जाना पड़ा, गांव का आकर्षण अदभुत था। पेड़, पहाड़ आदि का परिवेश के सौन्दर्य बोध को स्मृतियों में रखकर सृजनात्मक कार्य किया। मेरा दूसरा विस्थापन पढ़ाई के लिए हुआ। इस दौरान भी मेरा जुड़ाव पुस्तकालयों की साहित्यिक पुस्तकों से रहा। विज्ञान का विद्यार्थी होने के बावजूद भी मेरा मन कहानी-कविता में लगता था। इलाहाबाद को अपनी लेखकीय भूमि बताते हुए कहा कि अजमेर, अल्मोड़ा, देहरादून और दिल्ली प्रवास के उपरांत जब मैं इलाहाबाद आया तो देखा कि यह भूमि साहित्यिक रूप से बहुत ही समृद्ध है।

उन्‍होंने कहा कि परिमल व प्रलेस वालों ने साहित्य, कला, संस्कृति के लिए बहुत ही अच्छा माहौल बनाया था। परिमल वालों को लगा कि हमारे बीच एक कथाकार आ गया है। भैरव जी, अश्‍क जी के यहां बराबर गोष्ठियां हुआ करती थीं। भगवती चरण उपाध्याय, शमशेर बहादुर सिंह, मार्कण्डेय, अमरकांत जी आदि ने इस परम्परा का निर्वहन किया। उन्होंने चिन्ता जताते कहा कि इलाहाबाद की धरती साहित्यिक रूप से संबल थी पर आज इसकी कमी देखने को मिल रही है। शेखर जोशी ने अपने कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए अपनी प्रमुख कृतियों का पाठ भी किया। कार्यक्रम का संयोजन, संचालन व धन्यवाद ज्ञापन क्षेत्रीय केंद्र के प्रभारी प्रो. संतोष भदौरिया द्वारा किया गया। अजित पुष्‍कल एवं एए फातमी ने शॉल, पुष्‍पगुच्छ प्रदान कर साहित्यकार शेखर जोशी का स्वागत किया।

गोष्ठी में प्रमुख रूप से अनुपम आनंद, अनिल रंजन भौमिक, जयकृष्‍ण राय तुषार, रविरंजन सिंह, अनिल सिद्धार्थ, हिमांशु रंजन, नन्दल हितैषी, असरार गांधी, धनंजय चोपड़ा, अविनाश मिश्र, हिमांशु रंजन, श्रीप्रकाश मिश्र, नीलम शंकर, मत्स्येन्द्र लाल शुक्ल, फजले हसनैन, एहतराम इस्लाम, रेनू सिंह, संजय पाण्डेय, अनिल भदौरिया, सुरेन्द्र राही, अमरेन्द्र सिंह, सत्येन्द्र सिंह, शिवम सिंह, राकेश सहित तमाम साहित्य प्रेमी उपस्थित रहे।

बलि का बकरा बनने को तैयार नहीं कोल इंडिया, पर सरकार उतारू!

http://www.news.bhadas4media.com/index.php/yeduniya/1032-2012-03-31-14-26-12

[LARGE][LINK=/index.php/yeduniya/1032-2012-03-31-14-26-12]बलि का बकरा बनने को तैयार नहीं कोल इंडिया, पर सरकार उतारू! [/LINK] [/LARGE]
Written by एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास Category: [LINK=/index.php/yeduniya]सियासत-ताकत-राजकाज-देश-प्रदेश-दुनिया-समाज-सरोकार[/LINK] Published on 31 March 2012 [LINK=/index.php/component/mailto/?tmpl=component&template=youmagazine&link=5938b56fa15a9e20be6ea94cebfb01d2e2f46840][IMG]/templates/youmagazine/images/system/emailButton.png[/IMG][/LINK] [LINK=/index.php/yeduniya/1032-2012-03-31-14-26-12?tmpl=component&print=1&layout=default&page=][IMG]/templates/youmagazine/images/system/printButton.png[/IMG][/LINK]
सरकार को इतनी जल्दी क्यों पड़ी है कि कोल इंडिया की वाजिब शिकायतों की सुनवाई नहीं हो रही है ? कोयला ब्लाकों के घोटाले में हाथ काला होने के बावजूद निजी बिजली कंपनियों के लिए सरकार सरकारी नवरत्न कंपनी कोल इंडिया की बलि चढ़ाने पर आमादा है। हालांकि कोल इंडिया बलि बनने के लिए फिलहाल तैयार नहीं है। कोयला की भूमिगत आग अभी ठंडी पड़ने के आसार नहीं है। तय है कि लपटें अबकी दफा कोयलांचल से बाहर बाकी देश को भी झुलसाने के लिए काफी है।सरकार कोल इंडिया पर दबाव डालकर फ्यूल सप्लाई एग्रीमेंट साइन करवाने की तैयारी कर रही है। एक तरफ कंपनी कह रही है कि उसे एग्रीमेंट के लिए और वक्त चाहिए। उधर, दूसरी ओर कोयला मंत्री का कहना है कि 31 मार्च की डेडलाइन खत्म होने से पहले कंपनी एग्रीमेंट पर दस्तखत कर देगी। लेकिन, क्या कोल इंडिया सच में ये करार करना चाहती है? क्योंकि पिछले 2 दिनों में कोल इंडिया के बोर्ड की 2 बार बैठक हो चुकी है और फ्यूल सप्लाई एग्रीमेंट को लेकर कोई सहमति नहीं बन पाई।

हालांकि कोल इंडिया ने सरकार से इसके लिए थोड़ा वक्त मांगा है और साथ ही फ्यूल सप्लाई एग्रीमेंट के तहत पेनाल्टी भी घटाने को कहा है।बिजली कंपनियों के समक्ष पैदा हुई ईंधन की जबरदस्त किल्लत के बीच प्रधानमंत्री कार्यालय :पीएमओ: ने बिजली फर्मों के वरिष्ठ प्रतिनिधियों के साथ एक बैठक की। पीएमओ ने सार्वजनिक क्षेत्र की कोल इंडिया को बिजली फर्मों के साथ ईंधन आपूर्ति समझौते पर हस्ताक्षर करने का भी निर्देश दिया।इससे पहले 15 फरवरी को पीएमओ ने कोल इंडिया को निर्देश दिया था कि वह ऐसे बिजली संयंत्रों के साथ ईंधन आपूर्ति करार करें, जिसने बिजली वितरण कंपनियों के साथ लंबी अवधि का करार किया है। 31 दिसंबर 2011 तक परिचालन शुरू करने वाले बिजली संयंत्रों के साथ 31 मार्च 2012 तक र्अंधन आपूर्ति करार करने को कहा गया था।

तैयारी देखते हुए लगता है कि कोलइंडिया को एअर इंडिया के अंजाम तक पहुंचाने के लिए सरकार राजधानी एक्सप्रेस की गति से भाग ​​रही है। अभी रक्षा बजट और रक्षा तैयारियों पर वास्तविक तैयारियों के आंकड़े सामने आने लगे हैं। पवित्रता और गोपनीयता की दुहाई से ​​देश की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो जाती। इसीतरह सरकारी कंपनियों के बारह बजाने का जो गोरखधंधा चला है, उसके बारे में एअऱ इंडिया ​और बीएसएनएल के हश्र को देखते हुए जागे हुए लोगों के कान खड़े हो जाने थे। पर लगता है कि यह देश अब अटूट निद्रा में है और सत्यानाश की किसी सुनामी से किसी की नींद में खलल नहीं पड़ने वाली!सरकार ने ये भी कहा है कि वो टीसीआई के दबाव में कोल इंडिया को करार करने से नहीं रोक सकती। इसके अलावा कोयला मंत्री ने ये भी साफ किया है कि कोयले की कीमत कोल इंडिया सरकार खुद तय करती है, सरकार इस बारे में कोई निर्देश नहीं देती। और न ही टीसीआई, कोल इंडिया पर कीमतों को बढ़ाकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर जितना करने का दबाव डाल सकती है।सूत्रों के मुताबिक सरकार अब राष्ट्रपति के जरिए अपनी बात मनवाने की तैयारी में है। कंपनी में सबसे बड़ी हिस्सेदारी रखने वाला ब्रिटेन का फंड टीसीआई भी कंपनी में सरकार के दखल को गलत बता चुकी है।इस मामले में कोल इंडिया का बोर्ड कोयला मंत्रालय को एफएसए में नियमों में बदलाव पर प्रस्ताव भेजेगा। लेकिन सरकार एफएसए नियमों में बदलाव को तैयार नहीं दिख रही है।

कोल इंडिया लिमिटेड (सीआईएल) ने बिजली कंपनियों को करार के तहत 80 फीसदी कोयले की आपूर्ति सुनिश्चित करने के सरकार के निर्देश को मानने से मना कर दिया है। ईंधन आपूर्ति करार के मसौदे पर विचार करने के बाद कोल इंडिया के निदेशक मंडल ने कोयले की आपूर्ति (मात्रा) को लेकर बिना कोई प्रतिबद्घता के मसौदे को मंजूर करने का निर्णय किया।इससे पहले कंपनी के वरिष्ठ अधिकारियों ने कोयला मंत्रालय के अधिकारियों से मुलाकात की थी और 20 साल तक बिजली कपंनियों को आपूर्ति सुनिश्चित करने के करार पर हस्ताक्षर करने में असमर्थता जताई थी। कोल इंडिया ने बिजली क्षेत्र के उपभोक्ताओं के साथ समझौते की रूपरेखा तय करने के लिए और समय मांगा है। सरकार ने कोल इंडिया लिमिटेड को यह संकेत दे दिया है कि उसे पीएमओ के निर्देश का सख्ती से पालन करना चाहिए और बिजली उत्पादक कंपनियों के साथ ईंधन आपूर्ति समझौते पर हस्ताक्षर करते समय 80 फीसदी सुनिश्चित आपूर्ति का वादा करना चाहिए, भले ही सीआईएल के कई स्वतंत्र निदेशकों की इस पर आपत्ति है। कोयला मंत्रालय के एक उच्च अधिकारी ने कहा, 'सरकार ने अपना रुख एकदम स्पष्ट कर दिया है, यद्यपि 80 फीसदी की शर्त पर निर्णय टल दिया गया है।'टीसीआई कोल इंडिया के फ़्यूल सप्लाई क़रार के सख़्त ख़िलाफ़ है और वह लगातार इसका विरोध कर रही है।टीसीआई ने वित्त मंत्रालय को नोटिस भेजा है, जिसमें लिखा है कि कोल इंडिया ने सरकार के दबाव में आकर फ़्यूल सप्लाई क़रार किया है और इसकी वजह से कंपनी के कारोबार पर बुरा असर पड़ा है।

गौरतलब है कि अगर कोल इंडिया फ्यूल सप्लाई एग्रीमेंट कर लेती है तो पावर कंपनियों को जरूरत का 80 फीसदी कोयला मिलना तय हो जाएगा। हालांकि, कोल इंडिया का शेयरधारक टीसीआई लगातार फ्यलू सप्लाई एग्रीमेंट का विरोध कर रहा है। लेकिन सरकार ने टीसीआई की आपत्ति पर साफ कह दिया है कि निवेशक चाहें तो कंपनी में बने रह सकते हैं या उससे निकल भी सकते हैं।बहरहाल सरकार कोल इंडिया के इस प्रस्ताव पर विचार करके पेनाल्टी घटा सकती है।लेकिन पेनाल्टी घटाने से कोयला आपूर्ति की गारंटी से जुड़ी समस्याएं कत्म नहीं हो जातीं।लंदन की हेज फंड द चिल्ड्रेन इनवेस्टमेंट फंड (टीसीआई) ने कोल इंडिया (सीआईएल) मेंं अपने निवेश के मामले को लेकर भारत सरकार के खिलाफ दो द्विपक्षीय निवेश समझौते के तहत कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी है। टीसीआई की ब्रिटेन और साइप्रस स्थित दो इकाइयों के जरिए कोल इंडिया में 1 फीसदी से अधिक की हिस्सेदारी है और उसने मंगलवार को वित्त मंत्रालय को नोटिस भेजा है। नोटिस में भारत और ब्रिटेन के बीच वर्ष 1994 में हुए द्विपक्षीय निवेश समझौते और वर्ष 2002 में भारत और साइप्रस के बीच हुए ऐसे ही समझौते का उल्लेख है। बैंकों से पावर कंपनियों को कर्ज जुटाने में कोई दिक्कत नहीं आ रही है। मंत्रालय लगातार इस बात पर नजर रख रहा है कि बैंक पावर कंपनियों को कर्ज आसानी से दे।ग्यारहवीं योजना के दौरान तय लक्ष्य पूरा न कर पाने की प्रमुख वजह ईंधन की उपलब्धता में कमी और कोयले की ऊंची कीमतों का होना रहा है। कोल इंडिया (सीआईएल) अप्रैल में शुरू हो रही अगली तिमाही में कोयले की कीमतों में बढ़ोतरी कर सकती है। कंपनी ने जनवरी में अपने विशाल कार्यबल के वेतन में 25 फीसदी से ज्यादा बढ़ोतरी की घोषणा का उसकी वित्तीय सेहत पर पडऩे  वाले असर को देखते हुए यह कदम उठाया है।कोल इंडिया दुनिया की सबसे बड़ी कोयला खनन कंपनी है और घरेलू कोयला आपूर्ति में उसकी 82 फीसदी से ज्यादा हिस्सेदारी है। यही कारण है कि खनन कंपनी द्वारा की जाने कीमत में कोई भी बढ़ोतरी का कोयले की ज्यादा खपत वाले बिजली, इस्पात, सीमेंट और उर्वरक जैसे प्रमुख क्षेत्रों में व्यापक असर देखा जाता है।

विद्युत मंत्रालय ने 12वीं योजना के लिए 75,785 मेगावाट उत्पादन क्षमता का विस्तार करने का लक्ष्य रखा है। हालांकि इसके लिए कितने निवेश की जरूरत होगी, अभी इसका आंकलन मंत्रालय भी नहीं कर पाया है। ग्यारहवीं योजना के दौरान 53,922 मेगावाट उत्पादन क्षमता का विस्तार हुआ है। जो कि योजना के लिए तय लक्ष्य से करीब 8,000 मेगावाट कम है। सरकार ने इसके पहले 11वीं योजना का संशोधित लक्ष्य 62,000 मेगावाट रखा था। बुधवार को विद्युत मंत्रालय द्वारा आयोजित संवाददाता सम्मेलन में विद्युत मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने कहा कि 29 मार्च तक हमने 11वीं योजना में 53,922 मेगावाट उत्पादन क्षमता का विस्तार किया है। शिंदे के अनुसार, तय लक्ष्य पूरा न कर पाने की प्रमुख वजह ईंधन की उपलब्धता में कमी और कोयले की ऊंची कीमतों का होना रहा है। उन्होंने बताया कि बारहवीं योजना को लेकर सरकार का 75,785 मेगावाट उत्पादन क्षमता का विस्तार करने की योजना है।

[B]मुंबई से एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास की रिपोर्ट. [/B]
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उपभोक्ता वायदा बाजार में हर्षद मेहता जैसा घोटाला होने की सुगबुगाहट, ज्यादा हो हल्ला मचने से पहले सरकार इस मामले को निपटाने की फिराक में!

उपभोक्ता वायदा बाजार में हर्षद मेहता जैसा घोटाला होने की सुगबुगाहट, ज्यादा हो हल्ला मचने से पहले सरकार इस मामले को निपटाने की फिराक में!

मुंबई से एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास

पेट्रोल की कीमतों और ईंधन संकट को लेकर ही नहीं,उपभोक्ता बाजार से भी आने वाले दिनों में आम लोगों और सरकार दोनों को खासी परेशानी हो सकती है।कमोडिटी बाजार में सट्टेबाजी से न सिर्फ कारोबार चौपट हो रहा है, कीमतें तेजी से बढ़ जाने से मंहगाई भी बेलगाम हुई जाती है। इसमें घोटाले की गुंजाइश भी ज्यादा है, जिसका सीधा असर आम आदमी पर होना है । पर वायदा कारोबार की तकनीकी बारीकियों से अनजान लोगों के लिए​ ​ ऐसे गड़बड़झाले की खबर लगना मुश्किल होता है। पर इस बार पर्दाफाश करने का जिम्मा उठाया है एसोचैम ने। ज्यादा हो हल्ला मचने से पहले सरकार इस मामले को निपटाने की फिराक में है।सरकार और वायदा बाजार आयोग के बाद अब उपभोक्ता वायदा बाजार में लगातार आ रही बेलगाम तेजी ने इंडस्ट्री बॉडी एसोचैम की भी नींद उड़ा दी है। एसोचैम को कमोडिटी बाजार में हर्षद मेहता जैसा घोटाला होने की सुगबुगाहट आने लगी है। एसोचैम ने कमोडिटी एक्सचेंज  एनसीडीईएक्स में ट्रेडर्स की मिलीभगत पर सवाल उठाए हैं और सरकार से इस मामले की जांच कराने को कहा है।एसोचौम ने सरकार से इस पूरे मामले की सीबीआई जांच कराने की मांग की है। एसोचैम का कहना कि कुछ सटोरियों ने मिलकर एनसीडीईएक्स पर कब्जा कर लिया है। वहीं इस मिलीभगत के चलते कमोडिटी बाजार में कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है।कमोडिटी बाजार में हो रही बेलगाम गड़बड़ियों पर मचे घमासान के बाद अब उपभोक्ता मंत्रालय भी जाग गया है। उपभोक्ता मामलों के मंत्री के वी थॉमस ने अपने विभाग के सचिव को कमोडिटी बाजार में हो रही गड़बड़ियों की जांच कर रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया है।कंज्यूमर अफेयर्स मंत्रालय ने एफएमसी को सख्त हिदायत दी है कि वो कमोडिटी एक्सचेंज के कामकाज पर गहराई से नजर रखे। साथ ही जरूरत पड़ने पर कड़े से कड़े कदम उठाए।खाद्य मुद्रास्फीति घटकर इकाई अंक में आ गई है, ऐसे में उपभोक्ता मामलों का मंत्रालय संसद के चालू बजट सत्र में वायदा अनुबंध नियमन अधिनियम में संशोधन के लिए नए सिरे से प्रयास कर रहा है। विभाग के अधिकारियों ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि ये संशोधन अवकाश के बाद इसी सत्र में पारित हो जाएंगे।

तेल की बढ़ती कीमतों, दलहन और सोने-चांदी के भावों में हो रही उठापटक के कारण लोगों का रुझान वायदा कारोबार की तरफ बढ़ने लगा है।किसानों के साथ साथ व्यापारी वर्ग से जुड़े लोगों का कहना है कि अचानक फसलों के भाव में उतार चढ़ाव का कारण वायदा बाजार है।चूंकि मांग और आपूर्ति के कारक यहां कीमतों के लिए नियामक का कार्य करते हैं, इसलिए वायदा कारोबार के जरिए जिंस उत्पादक अपने भावी घाटे (कीमतों में भावी कमी की आशंका के मद्देनजर) के विरुद्द हेजिंग कर सकता है। फ्यूचर ट्रेडिंग पूरी तरह से हेजिंग का साधन ही है। इस तरह, कीमतों में नाटकीय वृद्धि और कमी के लिए जिम्मेदार माने जाने वाले कमोडिटी एक्सचेंज, भारतीय अर्थव्यवस्था में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और उत्पादकों को उनके उत्पादन का समुचित मूल्य दिलाते हैं। सरकार बैंकों, म्युचुअल फंडों और दूसरी वित्तीय संस्थाओं को भी कमोडिटी कारोबार में हिस्‍सा लेने की अनुमति दे सकती है। यहां एक बात कहना आवश्यक है कि कमोडिटी बाजार सिर्फ बड़े टर्नओवर वाले कारोबारियों और पूंजी के खिलाड़ियों को फायदा पहुंचाते हैं, सामान्य छोटे उत्पादक अपनी सीमाओं के चलते इस बाजार के प्रत्यक्ष लाभों से वंचित ही रह जाते हैं। दुबई के कर्ज संकट का केंद्र भले ही रियल एस्टेट रहा हो, लेकिन भारत में कमोडिटी कारोबार में इसके झटके आने वाले कुछ महीनों तक महसूस किए जाते रहेंगे। भारतीय कंपनियों के लिए दो वजहों से दुबई महत्वपूर्ण हो गया है। पहली बात यह है कि दुबई मोती, सोना और हीरे से लेकर चाय, कपास, बासमती और चीनी जैसी अधिकांश कमोडिटी का कारोबारी केंद्र है। अधिकांश कारोबारी इस शहर को माल को एक जगह से लाकर दूसरी जगह भेजने के लिए इस्तेमाल करते हैं और वहां के स्थानीय बैंकों को आमतौर पर छह महीने के शॉर्ट टर्म कारोबार के लिए महाजन की तरह इस्तेमाल किया जाता है।   

गुरूवार को एसोचैम के द्वारा कमोडिटी बाजार पर सट्टेबाजी के आरोपों के कमोडिटी वायदा बाजार में दिन भर घमासान मचा रहा। वहीं अब एनसीडीईएक्स ने कमोडिटी बाजार में हो रहे बेलगाम उतार-चढ़ाव पर रोक लगाने के लिए चना, सरसों, आलू पर विशेष कैश मार्जिन लगा दिया है।एनसीडीईएक्स ने चने पर 10 फीसदी का विशेष कैश मार्जिन लगाया है। जिसके बाद अब चने पर कुल कैश मार्जिन बढ़कर 15 फीसदी हो गया है। इसी तरह सरसों पर भी 10 फीसदी का स्पेशल कैश मार्जिन लगाया गया है।आलू के अप्रैल वायदा के खरीद सौदों पर 20 फीसदी और मई वायदा के खरीद सौदों पर 25 फीसदी का स्पेशल कैश मार्जिन लगाया गया है। जिसके बाद अब आलू के अप्रैल वायदा पर कुल 25 फीसदी और मई वायदा पर 30 फीसदी का कैश मार्जिन देना होगा।

कंज्यूमर अफेयर्स मंत्रालय ने एफएमसी को सख्त हिदायत दी है कि वो कमोडिटी एक्सचेंज के कामकाज पर गहराई से नजर रखे। साथ ही जरूरत पड़ने पर कड़े से कड़े कदम उठाए।गौरतलब है कि इंडस्ट्री चैंबर ने ग्वार गम, हल्की, काली मिर्च की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव के पीछे सटोरियों का हाथ होने की आशंका जताई है। वहीं चीनी, दाल जैसी आवश्यक कमोडिटी भी सट्टेबाजों की भेट चढ़ने का आरोप एसोचैम लगाया है। वायदा बाजार आयोग के सख्त रुख के बाद बुधवार को सरसों और चने की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई। आगे भी इनकी कीमतों में गिरावट आ सकती है। हाजिर कारोबारियों ने सरसों और चने के वायदा कारोबार पर भी रोक लगाने की मांग की है। एफएमसी ने एक्सचेंजों से अक्टूबर 2010 से अब तक के सरसों, चना समेत अन्य तेजी से बढऩे वाली जिंसों के आंकड़े मांगे हैं।

के वी थॉमस का कहना है कि उन्हें कमोडिटी बाजार में गड़बड़ियों की कई शिकायतें मिली हैं। वहीं जांच की रिपोर्ट आने पर दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी।थॉमस के मुताबिक वायदा बाजार आयोग में समय-समय पर सुधार किए जाते रहे हैं, वहीं आगे भी जरूरत के मबजूत कानून बनाए जाएंगे। ताकि कमोडिटी बाजार में हो रही हेराफेरी पर लगाम लगाई जा सके।

वहीं कमोडिटी एक्सचेंज एनसीडीईएक्स ने एसोचैम के आरोपों का जवाब देते हुए कहा है कि वह सिर्फ एक प्लेटफॉर्म है और यहां कीमतें मांग और आपूर्ति के हिसाब से तय होती हैं।

मालूम हो कि जिंस वायदा बाजार में सुधार की खातिर वायदा बाजार आयोग (एफएमसी) ने स्वचालित कारोबार (अल्गोरिद्म ट्रेडिंग) के लिए दिशानिर्देश तैयार करने की योजना बनाई है। इस समय दिशानिर्देश के अभाव में आयोग ने किसी कारोबारी को ऐसा करने से नहीं रोका है। इलेक्ट्रॉनिक मार्केट में कुछ थोक सौदे उस कंप्यूटर के जरिए स्वत: ही हो जाते हैं, जिनमें अल्गो सॉफ्टवेयर लगा होता है। इस सॉफ्टवेयर का जुड़ाव समाचार एजेंसी से होता है, जो विभिन्न स्रोतों से ऑनलाइन सूचना हासिल कर सेकंड से भी कम समय में खुद ही सौदे कर लेता है। जबकि वैयक्तिक कारोबारी सूचना का विश्लेषण करने के बाद किसी खास कारोबार के बारे में फैसला लेता है। फिलहाल आम कारोबारी सूचना के आधार पर कारोबार का फैसला लेता है, लेकिन तब तक कीमतों में फेरबदल हो चुका होता है। ऐसे में सॉफ्टवेयर से कारोबारियों के खास वर्ग को ही लाभ मिलता है। स्पष्ट तौर पर तेजी से और स्वत: कारोबार के लिए अल्गो ट्रेडिंग सॉफ्टवेयर से लैस कंप्यूटर एक्सचेंज के सर्वर के काफी नजदीक होते हैं।एल्गोरिद्मिक ट्रेडिंग का इस्तेमाल संस्थागत कारोबारियों द्वारा किया जाता है और वे बाजार के असर व जोखिम के प्रबंधन की खातिर बड़े सौदे को छोटे-छोटे सौदों में बांट देते हैं। बिकवाल कारोबारी मसलन मार्केट मेकर्स और कुछ हेज फंड बाजार को नकदी मुहैया कराते हैं। ऐसे में वे स्वचालित कारोबार के जरिए ही सौदे करते हैं। एल्गोरिद्मिक ट्रेडिंग का इस्तेमाल मार्केट मेकिंग, आर्बिट्रेज या शुद्ध रूप से सटोरिया गतिविधियों समेत किसी भी निवेश रणनीति के लिए किया जा सकता है। एल्गोरिद्मिक व्यवस्था में निवेश का फैसला और इसका क्रियान्वयन किसी भी चरण में किया जा सकता है या इसका संचालन पूरी तरह से स्वचालित तकनीक से किया जा सकता है।एल्गोरिद्मिक ट्रेडिंग का खास वर्ग उच्च बारंबारता वाला कारोबार है, जिसमें कंप्यूटर उस वक्त उपलब्ध सूचना के आधार पर ऑर्डर देने का फैसला करता है। जबकि कारोबारी पहले सूचना को पढ़कर उसका विश्लेषण करता है और उसके बाद ऑर्डर देता है। इतने में एल्गोरिद्मिक ट्रेडिंग के जरिए सौदा पूरा हो चुका होता है। मौजूदा समय में कई कारोबारी शेयर बाजार में तेजी से सौदे करने के लिए इस व्यवस्था का उपयोग करते हैं। ऐसे कारोबार सिर्फ बड़े सौदे के लिए ही मुमकिन हैं।

चना, सरसों और दूसरी कमोडिटी के साथ अब सोयाबीन वायदा में भी गड़बड़ी की आशंका जताई गई है।सोया सेक्टर में काम करने वाली संस्था सोयाबीन प्रोसेसर एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एसओपीए-सोपा) ने वायदा कारोबार पर बेहद गंभीर आरोप लगाते हुए केंद्रीय खाद्य व उपभोक्ता मामलों के मंत्री के वी थॉमस से सोया वायदा की जांच की मांग की है।सोपा के मुताबिक वायदा कारोबार से किसानों को कोई फायदा ही नहीं हो रहा है, केवल कुछ सटोरिए दाम बढ़ाकर पैसे बना रहे हैं।

वायदा बाजार में चना और सरसों की कीमतों में तेजी को रोकने के लिए वायदा बाजार आयोग (एफएमसी) सख्त हो गया है। आयोग ने नेशनल कमोडिटी एंड डेरिवेटिव्स एक्सचेंज लिमिटेड (एनसीडीईएक्स) को चना और सरसों के मौजूदा सभी लांग साइड (खरीद) सौदों पर 10 फीसदी का अतिरिक्त मार्जिन लगाने का निर्देश दिया है जो 31 मार्च से प्रभावी होगा।

एनसीडीईएक्स सप्ताह भर में चना के वायदा अनुबंधों पर पहले ही दो बार में पांच-पांच फीसदी का अतिरिक्त मार्जिन लगा चुका है। जिसका असर वायदा बाजार में इसकी कीमतों पर भी देखा गया। आयोग की सख्ती के परिणामस्वरूप ही एनसीडीईएक्स पर सप्ताह भर में चना की कीमतों में 10.5 फीसदी की गिरावट आई है। 22 मार्च को मई महीने के वायदा अनुबंध में चना का भाव बढ़कर 4,019 रुपये प्रति क्विंटल हो गया था जबकि शुक्रवार को इसका भाव घटकर नीचे में 3,597 रुपये प्रति क्विंटल पर कारोबार करते देखा गया।

अतिरिक्त मार्जिन का असर शुक्रवार को सरसों के वायदा कारोबार पर भी देखा गया। मई महीने के वायदा अनुबंध में सरसों की कीमतों में 2.8 फीसदी की गिरावट आकर भाव 3,789 रुपये प्रति क्विंटल पर कारोबार करते देखा गया। हाजिर बाजार में भी चने की कीमतों में पिछले सात दिनों में करीब 11.5 फीसदी की गिरावट आई है।

23 मार्च को दिल्ली मंडी में चना का भाव बढ़कर 3,900 रुपये प्रति क्विंटल हो गया था जबकि शुक्रवार को भाव 3,450 रुपये प्रति क्विंटल रह गया। सरसों का भाव इस दौरान 3,940 रुपये से घटकर 3,840 रुपये प्रति क्विंटल रह गया। चना के थोक कारोबारी समीर भार्गव ने बताया कि मार्च क्लोजिंग के कारण चना और सरसों की खरीद कम हो रही है। साथ ही आगामी दिनों में आवक भी बढऩे की संभावना है।

एनसीडीईएक्स पर मई महीने के वायदा अनुबंध में पिछले तीन महीनों में चने की कीमतों में 23.2 फीसदी और सरसों की कीमतों में 20 फीसदी की तेजी आई थी। मई महीने के वायदा अनुबंध में चने का भाव बढ़कर 24 मार्च को 3,920 रुपये प्रति क्विंटल हो गया जबकि दो जनवरी को इसका भाव 3,181 रुपये प्रति क्विंटल था।

इसी तरह से सरसों का भाव मई महीन के वायदा अनुबंध में इस दौरान 3,362 रुपये से बढ़कर 4,019 रुपये प्रति क्विंटल हो गया था। जिसके बाद उपभोक्ता मामले मंत्रालय ने इसकी कीमतों पर अंकुश लगाने के लिए एफएमसी को निर्देश दिया था।

चालू विपणन सीजन के लिए केंद्र सरकार ने चने का न्यूनतम समर्थन मूल्य 2,800 रुपये और सरसों का एमएसपी 2,500 रुपये प्रति क्विंटल तय किया हुआ है। कृषि मंत्रालय के दूसरे आरंभिक अनुमान के अनुसार वर्ष 2011-12 में चने का उत्पादन 76.6 लाख टन होने का अनुमान है जो पिछले साल के 82.2 लाख टन से थोड़ा कम है।

मधु कोड़ा और राजकुमार अग्रवाल के साथ बढ़ता हुआ झारखंड

मधु कोड़ा और राजकुमार अग्रवाल के साथ बढ़ता हुआ झारखंड



नज़रिया, मोहल्ला रांची

मधु कोड़ा और राजकुमार अग्रवाल के साथ बढ़ता हुआ झारखंड

1 APRIL 2012 NO COMMENT

♦ सुनील तिवारी

बकौल राजकुमार अग्रवाल देश के नब्बे फीसदी नेता हैं भ्रष्ट, देश को कर रहे हैं नष्ट और कहते हैं कि हम पर करो ट्रस्‍ट। कल अग्रवाल साहब का यह कथन इलेक्ट्रोनिक मीडिया की सुर्खियों में था। वाह राजकुमार जी, क्या खूब कहा आपने। तभी तो आपने राज्यसभा चुनाव में अपने इस कथन को प्रमाणित कर इतिहास ही कायम कर दिया।

कुछ दिनों पहले मधु कोड़ा एंड कंपनी ने झारखंड का नाम देश-विदेश में रौशन किया था, इस बार आपने लोकतंत्र एवं उसके पहरेदारों को उसकी औकात बताने का काम कर झारखंड को कलंकित करने की रही-सही कसर भी पूरी कर दी। आप जैसे धनपशुओं की वजह से भी झारखंड रोज दस कदम पीछे खिसक रहा है। पहले नेताओं मंत्रियों को घर बुलाकर फुल्का खिलाते हैं, बेटे बेटियों की शादी में उन्हें दामाद की तरह सम्मान देकर चार्टेड जहाज से बुलवाते हैं, फिर उनसे जायज नाजायज काम करवाते हैं, झारखंड की संपदा लूटते हैं। फिर नेताओं को दम भर गरियाते हैं।

इस बार भी फुल्का एवं नोट संस्कृति के दम पर राज्यसभा जाने की योजना का हाथी तो आप निकाल ही चुके थे। शुक्र है कि आयकर वालों की मेहरबानी से आपकी पूंछ ही अटक गयी। बधाई हो आपको। चिंता मत कीजिए, कुछ दिन केस मुकदमा लड़िए। फिर मजे से निकाल जाइए, इसके लिए पैसे की कोई कमी तो है नहीं आपको। कोई बाप-दादे की संपति बेच कर थोड़े लाया है आपने, जो दर्द होगा। फिर नये सिरे से लग जाइए गोरखधंधे में। मॉल कमाइए, लुटाइए, लोकतंत्र को खरीदिए-बेचिए, नवीनतम तजुर्बे का लाभ मिलेगा और अगली बार आपकी जीत पक्की होगी।

(सुनील तिवारी। झारखंड के वरिष्‍ठ पत्रकार। आर्यावर्त, नवभारत टाइम्‍स, जनसत्ता और प्रभात खबर के साथ वक्‍त वक्‍त पर जुड़े रहे। राजनीति में दिलचस्‍पी। उनसे tiwari.sunilkumar@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)


चीन का रक्तचरित : हमारी गुलामी की बेड़ियों को तोड़ दो!

चीन का रक्तचरित : हमारी गुलामी की बेड़ियों को तोड़ दो!



आमुख, नज़रिया, संघर्ष

चीन का रक्तचरित : हमारी गुलामी की बेड़ियों को तोड़ दो!

1 APRIL 2012 6 COMMENTS

♦ नीरज कुमार

दिल्ली की सड़क पर एक शख्स शोलों में जल रहा था। आग की लपटें उसके बदन को चीरती हुई धधक रही थी। वो चीखते-चिल्लाते हुए दौड़ रहा था। और लोग टकटकी लगाये देख रहे थे। ऐसी भयावह तस्वीर मैंने कभी नहीं देखी लेकिन जब सामने आया तो रोंगटे खड़े हो गये। हाथों में चीन के खिलाफ गुस्से से भरी तख्तियां और तिब्बती झंडा लिए लोग ड्रैगन के खिलाफ विरोध कर रहे थे…. चीन के साम्राज्यवाद और तानाशाह के खिलाफ आवाज उठा रहे थे तभी एक तिब्बती युवक ने अपने शरीर को आग के हवाले कर दिया। आजादी की खातिर खुदकुशी करने की कोशिश की। चीन के राष्ट्रपति हू जिन ताओ की भारत यात्रा के विरोध में आग लगा ली। आखिरकार उस तिब्बती युवक की अस्पताल में मौत हो गयी। वो तिब्बत की आजादी की खातिर शहीद हो गया।

चीनी सरकार के प्रमुख का भारत दौरा जब-जब होता है, ये चिंगारी और भड़कने लगती है। विरोध के स्वर और तेज हो जाते हैं। गुलामी का जख्म और हरा हो जाता है। आजादी की आवाज और बुलंद हो जाती है। इस बार भी हजारों तिब्बती शरणार्थी अपनी आवाज को दुनिया के बंद कानों तक पहुंचाना चाहते थे। कान में तेल डाले सो रहे मुल्कों को बताना चाहते थे कि कैसे चीन ने तिब्बत को तिब्बतियों के लिए "ग्वांतेनामो वे" बना दिया है।

आग के शोलों के हवाले करने की ये कोशिश पहली बार नहीं हुई। चीन के दमनचक्र के खिलाफ पिछले कई बरसों से तिब्बती आत्मदाह कर रहे हैं। अब तक करीब दो दर्जन तिब्बतियों ने खुद को आग के हवाले कर दिया। अपनी आजादी के लिए तिब्बत और तिब्बत के बाहर भगवान बुद्ध को माननेवाले तिब्बती आत्मदाह पर उतारू हो आये हैं। लेकिन आत्मदाह की इन चिंगारियों को बुझानेवाला कोई नहीं। इस दुनिया में कोई नहीं जो तिब्बतियों पर हो रहे चीन के जुल्मोसितम पर मुंह खोले। अमेरिका की भी घिग्घी बध जाती है। जब बात चीन की आती है तो वो यूरोपीय देश बैकफुट पर आ जाते हैं। हां, ये जरूर है कि कमजोर देश के खिलाफ कार्रवाई करनी हो तो अमेरिका और यूरोपीय देश आगे आ जाते हैं। ड्रोन हमले शुरू कर देते हैं। तानाशाह और आतंकवाद को खत्म करने के नाम पर हजारों बेगुनाहों का कत्ल करते हैं। लेकिन सामने दुश्मन ताकतवर हो, तो अमेरिका को नानी याद आ जाती है।

ऐसे में भारत की तो बात ही छोड़ दीजिए। भारत की ढुलमुल नीतियों की वजह से ही चीन बाघ बनकर हमेशा गुर्राता रहा। आंखें दिखाता रहा। जब हम अपने मुद्दों को ठीक तरीके से नहीं रख सके तो भला तिब्बितयों के मुद्दे को क्या उठाते और इस बार भी यही हुआ। चीनी राष्ट्रपति हू जिन ताओ के भारत दौरे पर ब्रिक्स के किसी भी मुल्क ने तिब्बती मसले पर चूं-चपर तक नहीं की। आर्थिक मंदी से मुक्ति दिलाने की बात ब्राजील, रूस, दक्षिण अफ्रीका के साथ भारत भी करता रहा। जिस कम्‍युनिस्‍ट सरकार ने तिब्बत को आत्मदाह करने पर मजबूर कर दिया है वो दुनिया की खुशहाली के बारे में क्‍या सोचेगा। चीन सिर्फ अपने फायदे की सोचता है। उसकी भारत के प्रति भी विदेश नीति चालाकी भरी है। लेकिन भारत हमेशा कड़े कदम उठाने में हिचकिचाया है।

जब हमारे प्रधानमंत्री अरुणाचल प्रदेश जाते हैं तो चीन ऐतराज जताता है। जब हम तिब्बतियों के धर्मगुरु दलाई लामा का स्वागत करते हैं, तो चीन हमें घुड़की देता है। वो अलग बात है कि मीडिया में जब ये बातें लीक हो जाती हैं, तो भारत सरकार डैमेज कंट्रोल करने के लिए चीन को जवाब देता है। लेकिन वो भी दीनहीन बनकर।

1954 में डॉ भीमराव अंबेडकर ने कहा था कि यदि भारत ने तिब्बत को मान्यता प्रदान की होती, जैसा कि उसने 1949 में चीनी गणराज्य को प्रदान की थी तो आज भारत-चीन सीमा विवाद न होकर तिब्बत-चीन सीमा विवाद होता। चीन को ल्हासा पर अधिकार देकर प्रधानमंत्री ने चीनी लोगों को अपनी सेनाएं भारत की सीमा पर ले आने में पूरी सहायता पहुंचाई है।

डॉ भीमराव अंबेडकर की आशंका यूं ही नहीं थी। हमारी चीन के प्रति विदेश नीति शुरू से ही ढुलमुल रही है। हमने आंखें मूंदकर अपने पड़ोस में चीन के दमनचक्र को देखा। हमने तिब्बितयों पर हो रहे अत्याचार पर चुप्पी साध ली। शुतुरमुर्ग की तरह बने रहे कि मसला चीन और तिब्बत का है तो हमें क्या लेना। लेकिन बात इतनी सी नहीं है।

तिब्बत में चीन का दमनचक्र 1950 से ही जारी है। चीन की कम्‍युनिस्‍ट सेना तिब्बतियों को तब से रौंद रही है। तिब्बितियों को गुलामी की बेड़ियों में जकड़ी है। इसी से आजाद होने के लिए 1959 में तिब्बतियों के धर्मगुरु दलाई लामा तिब्बत से भारत भाग आये। उनके साथ करीब अस्सी हजार तिब्बती भारत आये। लेकिन जो लोग तिब्बत में रह गये, उनकी आवाज को दबाने के लिए चीन ने हर तरीके का हथकंडा अपनाया। यूएन का सदस्य होने के बावजूद चीन ने यूएन चार्टर की धज्जियां उड़ायीं। चीन दुनिया को अब भी बता रहा है कि उसकी तानाशाही चलती रहेगी, जिसे जो चाहे करना हो कर ले।

14वें दलाई लामा के मुताबिक चीनी सत्ता में हजारों तिब्बतियों को मार डाला गया। हजारों बौद्ध भिक्षुओं को शक के आधार पर जेलों में डालकर थर्ड डिग्री टॉर्चर किया गया। बौद्ध मठों को निशाना बनाया गया। तिब्बत की निर्वासित सरकार के प्रधानमंत्री लोबसांग सांगेय का आरोप है कि तिब्बत में अघोषित मार्शल लॉ लागू है। बौद्ध भिक्षुओं और नन को दलाई लामा की निंदा करने और देशभक्ति शिक्षा लेने के लिए बाध्य किया जा रहा है। विदेशी मीडिया को तिब्बत क्षेत्र में एंट्री पर रोक लगा दी गयी है। जब चीन में बाहरी मुल्कों की मीडिया को आजादी नहीं तो भला तिब्बत में कैसे मिल पाएगी। जिस मुल्क में अपने ही छात्रों पर टैंक चढ़वा दिये जाते हैं, उस मुल्क से मानवाधिकार की क्या उम्मीद की जा सकती है। 1989 में चीन में जब छात्रों ने लोकतंत्र की आवाज उठायी तो उन्हें कुचल दिया गया। चीन की कम्‍युनिस्‍ट सरकार यातना देने पर उतर आयी।

तिब्बत को बर्बाद करने के लिए चीन की कम्‍युनिस्‍ट सरकार के पास पूरा ब्लू प्रिंट है। दुनिया के सबसे ऊंचे रेलमार्ग का निर्माण करके चीन ने न सिर्फ तिब्बत पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली बल्कि वहां के खनिजों का भी भरपूर दोहन कर रहा है। तिब्बत जैसे शांतिप्रिय देश आज चीन के सैन्यीकरण का अहम अड्डा बन गया है। चीन बड़ी चालाकी के साथ एक तरफ जहां तिब्बतियों के खिलाफ दमनचक्र चला रहा है, वहीं तिब्बत को एटामिक अस्त्रों के रेडियोधर्मी कचरा फेंकने का कूड़ा दान भी बना डाला है, जिसकी वजह से उन तमाम नदियों का पानी दूषित हो रहा है, जिनका उदगम स्थल तिब्बत है। सिंधू, ब्रह्मपुत्र जैसी नदियां भारत और बांग्लादेश जैसे घनी आबादी वाले देश से भी बहती है। सबसे चिंता की बात ये है कि चीन को विदेशी करेंसी देकर अमेरिका और यूरोप के अनेक देशों ने एटामिक रेडियो कचरे फेंकने की छूट हासिल कर ली है।

चीन का दावा रहा है कि तिब्बत उसका हिस्सा रहा है। लेकिन इतिहास ऐसा नहीं कहता। 1911-12 में चीनियों ने थोड़े समय के लिए तिब्बत पर अधिकार जरूर जमा लिया था लेकिन तिब्बतियों ने उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया। मशहूर इतिहासकार एच ई रिचर्डसन भी मानते है कि तिब्बतियों को चीनी नहीं कहा जा सकता। चीनी दो हजार बरसों से भी ज्यादा समय से तिब्बतियों को एक अलग नस्ल के रूप में देखते रहे हैं। फिर क्यों चीन की कम्‍युनिस्‍ट सरकार एक मुल्क की पहचान को ध्वस्त करने में जुटी है, तिब्बतियों के अस्तित्व को मिटाने पर तुली है?

(नीरज कुमार कुमार। युवा टीवी पत्रकार। भारतीय जनसंचार संस्‍थान से डिप्‍लोमा। लंबे अरसे से न्‍यूज 24 की संपादकीय टीम का हिस्‍सा। उनसे niraj.kumar@bagnetwork.in पर संपर्क किया जा सकता है।)


आज हैप्‍पी सिब्‍बल्‍स डे है! राजघाट जाएं, चुटकुले सुनाएं!

आज हैप्‍पी सिब्‍बल्‍स डे है! राजघाट जाएं, चुटकुले सुनाएं!



 आमुख, मीडिया मंडी, मोहल्ला दिल्ली, संघर्ष

आज हैप्‍पी सिब्‍बल्‍स डे है! राजघाट जाएं, चुटकुले सुनाएं!

1 APRIL 2012 NO COMMENT

♦ आलोक दीक्षित

हाल ही में पत्रकारों की एक अंतर्राष्ट्रीय संस्था रिपोर्टर्स विदाउट बार्डर्स ने 'एनिमी आफ द इंटरनेट' नाम से एक लिस्ट तैयार की थी, जिसमें इंडिया भी शामिल था। लिस्ट में बर्मा, चीन, क्यूबा, ईरान, सउदी अरब, सीरिया, तुर्कमेनिस्तान, उजबेकिस्तान और वियतनाम को इंटरनेट पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सबसे बड़ा दुश्मन बताया गया था। दुख की बात है कि अपनी तानाशाही से सारी दुनिया को मुंह चिढ़ाता चीन और दुनिया की सबसे बड़ी डेमोक्रेसी भारत इस बार एक ही कार्नीवाल के पार्टीसिपेंट थे। हमारे लिए जो राहत की बात थी, वह यह कि इस सूची में हमारे देश को केवल ऑब्‍जर्वेशन लिस्ट में रखा गया था। क्या एक डेमोक्रेटिक देश के लिए यह एक शर्म की बात नहीं है। सरकार द्वारा पिछले एक साल में इंटरनेट को सेंसर करने की वकालतों, देश में वेब कंपनियों पर चल रहे तमाम केसेस और आईटी एक्ट में तकनीकी खामियों को इसका जिम्मेदार माना जा रहा है। इस पर आईटी मिनिस्ट्री का कहना है कि सरकार किसी भी तरह की सेंसरशिप नहीं ला रही है, पर फिलहाल सारे बयान लोगों के मन में केवल भ्रम ही पैदा करते हैं क्यूंकि देश में इनफॉर्मेशन टेक्नालाजी एक्ट 2011 अभी भी लोगों को मुंह ही चिढ़ा रहा है।

सबसे पहले न्यूयार्क टाइम्स ने यह खुलासा किया था कि कपिल सिब्बल ने सोशल नेटवर्किंग साइट्स के रिप्रजेंटेटिव्स के साथ गुपचुप तरीके से एक मीटिंग की थी, जिसमें उन पर सरकार विरोधी कंटेंट को हटाने का दबाव डाला गया था। बाद में अपने बयान में भी सिब्बल ने यह दोहराया था कि सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर नकेल कसे जाने की जरूरत है। हर तरफ से क्रिटिसिज्म मिलने के बाद कपिल सिब्बल सोशल नेटवर्किंग और इंटरनेट माध्यमों पर नियंत्रण के मुद्दे पर भले ही फिर से कोई बयानबाजी न की हो, पर गुपचुप तरीके से सरकार कई सारी वेबसाइटों पर लगाम लगा चुकी है। भारत सरकार ने अकेले गूगल और फेसबुक से लगभग 150 साइटों पर लगाम लगाने की सिफारिश की है। विदेशी साइटों पर सरकार का कोई सीधा नियंत्रण नहीं है, पर जो सर्वर इंडिया से चल रहे हैं, सरकार उन पर दबाव डालकर साइटों को बंद करवा देती है। गूगल ट्रांसपैरेंसी रिपोर्ट 2011 के मुताबिक भारत सरकार ने अपनी 68 शिकायती पत्रों के जरिये 358 आइटम्स को हटाने की रिक्वेस्ट की, जिनमें गूगल ने आधी शिकायतों पर ही कार्यवाही की। सरकार ने 1739 एकाउंट्स की पर्सनल डिटेल्स जानने की रिक्वेस्ट की और 2439 लोगों की यूजर एकाउंट डिटेल्स की जानकारी गूगल से मांगी। इनमें से 70 प्रतिशत की जानकारी दे दी गयी। दुखद बात यह है कि यह पूरी प्रक्रिया ही गैर-कानूनी है और इसके लिए सरकार अपने अधिकारों का दुरुपयोग कर रही है।

संविधान की मूल भावनाओं के खिलाफ है आईटी एक्ट

दुनिया का हर संविधान 'प्रीजम्शन आफ इनोसेंस' के सिद्धांत को मानता है यानि नागरिक तब तक इनोसेंट है, जब तक कि यह सिद्ध न कर दिया जाए कि उसने कोई गुनाह किया है। संविधान कहता है कि 'भले ही हजार मुजरिम बिना सजा के बरी हो जाएं, पर एक बेगुनाह को सजा नहीं मिलनी चाहिए'। यही वजह है कि दुनिया के हर कंस्टीट्यूशन में गुनहगार साबित करने की जिम्मेदारी 'स्टेट' को दी गयी है। हमने अजमल कसाब को भी फेयर ट्रायल का मौका दिया और यह साबित करने के बाद कि वह गुनहगार है, उसे फांसी की सजा सुनायी गयी। इसके उलट इंटरनेट को सेंसर करने और उस पर लगाम लगाने के लिए हमने 'डेमोक्रेसी की आत्मा' कहे जाने वाले इस सिद्धांत को ही झुठला दिया है। इस कानून में कहा गया है कि बिना किसी जुडीशिअल आर्डर के किसी वेबसाइट या डोमेन को बंद किया जा सकता है। यानि अब आपकी वेबसाइट को गलत कंटेट के नाम पर बंद कर दिया जाएगा और यह साबित करना कि आपने अपनी वेबसाइट, कमेंट या आर्टिकल के जरिए कोई गैरकानूनी काम नहीं किया है, आपकी जिम्मेदारी होगी। यह उसी तरह है कि आपको बिना किसी नोटिस के जेल में बंद कर दिया जाए और फिर आप साबित कीजिए कि आप सही हैं और फिर 5-10 साल चले केस के बाद कोर्ट आर्डर में आप खुद को बेगुनाह साबित कर लें।

आईटी मिनिस्टर कपिल सिब्बल के बयान में कहा गया था कि सोशल नेटवर्किंग साइट्स को अपने कंटेंट पर निगरानी रखनी चाहिए। उनका मानना है कि सोशल साइट्स पर कुछ ऐसी तस्वीरें डाली जा रही हैं, जो धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाती हैं। मिनिस्टर ने यह भी कहा कि अगर साइट्स कोई ठोस कदम नहीं उठाती हैं, तो सरकार इन पर कार्यवाही करेगी। उन्‍होंने इसके लिए एक कानून की भी वकालत की है। इंडिया में सोशल नेटवर्किंग साइट्स का एक केस भी चल रहा है, जिसमें मांग की गयी है कि साइट्स अपने कंटेंट के लिए जिम्मेदार हों। अगर ऐसा होता है तो फेसबुक पर भद्दा कमेंट करने पर कमेंट करने वाले के साथ-साथ फेसबुक पर भी मुकदमा चलाया जाएगा। आप ब्‍लॉग लिखकर सरकार की बुराई करेंगे और आपका केस ब्‍लॉगर या वर्डप्रेस लड़ेंगे। यानि अब फेसबुक और गूगल को आपके लिखे हर कंटेंट की निगरानी करनी होगी। इसके लिए इन कंपनियों को बहुत बड़े स्टाफ की जरूरत पड़ेगी और जो सेवाएं एक आम आदमी को फ्री में मिल रही हैं, उनके लिए उसे भुगतान करना पड़ेगा। बात सिर्फ भुगतान तक ही सीमित नहीं रहेगी। आपका लिखा ब्‍लॉग या स्टेटस अपडेट कंपनी का कोई कर्मचारी चेक कर रहा होगा और वह अपने विवेक से आपको सही और गलत साबित कर रहा होगा। आपकी बनायी पेंटिंग को गूगल का एक आईटी एक्सपर्ट सेंसर करेगा। कपिल सिब्बल की कंटेंट सेंसर करने की मांग इतनी बेवकूफाना है कि सारी दुनिया ने इसकी खिल्ली उड़ायी है। यह वैसे ही हुआ कि कागज पर गलत लिखने के लिए जेके पेपर मिल पर मुकदमा चलाया जाए, गलत फोटो खींचने के लिए कोडेक पर केस हो और महिलाओं की लुट रही चेनों के लिए पल्सर गाड़ियों को जिम्मेदार ठहराकर बजाज कंपनी पर मुकदमा चलाया जाए।

खत्म हो जाएगा इंटरनेट

सेंसरशिप को लाने का एक और भी नुकसान है। इंटरनेट हमारे बीच अपनी कुछ खासियतों को लेकर ही इतना लोकप्रिय हुआ है। यह आपको सब कुछ फ्री में देता है और साथ ही आपको इसके लिए किसी लाइसेंस की जरूरत नहीं है। आप अपना खुद का एक ब्‍लॉग बनाकर कम्युनिटी मैगजीन चला सकते हैं, लोकल न्यूज दे सकते हैं। आप चाहें तो अपनी पहचान छुपा कर भी इंटरनेट पर काम कर सकते हैं। आपको ढेरों ऐसे ब्‍लॉगर्स मिल जाएंगे, जो कि सरकारी कर्मचारी हैं और आधिकारिक रूप से नहीं लिख सकते हैं। अपनी पहचान को छिपा कर वे सूचना की दुनिया में ढेरों योगदान दे रहे हैं। आज इंटरनेट पर हिंदी सिर्फ ब्‍लॉगर्स के सहारे ही जिंदा है। वेब वर्ल्ड के बेहद इंटरैक्टिव होने के कारण यहां बुरी चीजों के लिए कोई जगह नहीं है। यह ऐसी दुनिया है, जहां डार्विन का 'सर्वाइवल आफ द फिटेस्ट' का सिद्धांत सबसे बेहतर ढंग से लागू होता है। अगर हम इंटरनेट से उसके ये फीचर्स छीन लेंगे तो यह आम आदमी की पहुंच से काफी दूर हो जाएगा। देश में इंटरनेट का विरोध करनी वाली एक बड़ी लाबी प्रिंट मीडिया की ही है। इंटरनेट के आने के बाद जिस माध्यम को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है, वह है प्रिंट मीडिया। देश में प्रिंट मीडिया का कारोबार लगभग 19,300 करोड़ रुपयों का है जो कि 2015 तक 31,010 करोड़ पहुंच जाएगा। फिलहाल देश में 35 करोड़ से भी ज्यादा रीडर्स हैं, जो कि आने वाले समय में तेजी से बढ़ कर 50-60 करोड़ तक पहुंच जाएंगे। प्रिंटिंग की दुनिया में हमारा देश दूसरा सबसे बड़ा बिजनेस हब है। इस सबके बावजूद यहां बिजनेस का काफी बड़ा हिस्सा उन राइटर्स को नहीं मिलता, जो कि वाकई इस कंटेंट के जन्मदाता हैं। यहां तक कि रीडर्स को भी किताबें सस्ते में नहीं मिल पातीं।

मतलब साफ है कि यह बिजनेस न तो राइटर्स का भला करता है और न ही रीडर्स का। पूंजीपतियों का एक बड़ा वर्ग फ्री इंटरनेट को अपने लिए सबसे बड़ा खतरा मानता है। 1956 में हिंद पाकेट बुक्स ने एक रुपये में किताबें निकाल कर सबको चौंका दिया था, पर उसकी किताबें भी अब 100 रुपये से कम की कीमत पर पढ़ने को नहीं मिल पातीं। प्रेमचंद से लेकर उदय प्रकाश और विनोद कुमार शुक्ल तक को भी उनकी लेखनी पर रायल्‍टी के लिए संघर्ष करना पड़ा है। प्रेमचंद के बारे में बताया जाता है कि उनके उपन्यास 'रंगभूमि' के लिए उन्‍हें मात्र 1800 रुपये रायल्टी दी गयी थी। छोटे राइटर्स को तो अपनी रचना छपवाने तक के लिए भी प्रकाशकों और संपादकों के चक्कर काटने पड़ते थे। ऐसे में इंटरनेट अगर ऐसे माध्यम के तौर पर सामने आया है, जो कि पूरी तरह फ्री है और बिना किसी विशेष मेहनत के ज्ञान को फैला रहा है, तो भला सरकार को दिक्कत क्यूं हो रही है। अगर इंटरनेट से उसकी खूबियों ही छीन ली जाएं, तो उसके अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगेगा।

इंटरनेट है हमारी सॉफ्ट पावर

सरकार शायद इस बात को लेकर बौखलायी हुई है कि इंटरनेट का इस्तेमाल सरकारी नीतियों के खिलाफ किया जा रहा है। इंटरनेट और बाकी दुनिया को अपने फायदे के लिए सेंसर करते समय सरकार शायद यही नहीं समझ रही कि आखिर देश के इंटरनेट यूजर्स उसकी सॉफ्ट पावर को ही बढ़ा रहे हैं। 'टेड' में बोलते हुए शशि थरूर ने कहा था हर देश के लिए यह जरूरी है कि वह अपनी सॉफ्ट पावर को बढ़ाये। सॉफ्ट पावर की संकल्पना करने वाले 'हार्वर्ड' के एक पंडित जोसेफ न्येयह के मुताबिक सॉफ्ट पावर एक देश की वह क्षमता है, जो दूसरो को अपनी ओर आकर्षित करती है। शशि थरूर के मुताबिक कोई देश अपनी संस्कृति से, अपने राजनीतिक मूल्यों से या अपनी विदेश नीतियों से ऐसा ही करते हैं। हर देश के पास कुछ ऐसी चीजें हैं जो उसकी सॉफ्ट पावर को बढ़ाती हैं। उदाहरण के लिए चीन का 'बीजिंग ओलिंपिक्स'। अमेरिकियों के पास 'वाइस आफ अमेरिका', फुलब्राइट स्कालरशिप', 'हालीवुड', 'एमटीवी' और 'मैकडानल्ड्स'। इन सॉफ्टपावर्स ने वह कुछ किया, जो अमेरिका सारी दुनिया पर हमला कर या बिजनेस फैला कर कभी नहीं कर सकता था।

हम इंडियंस के पास ढेर सारा ज्ञान है, जिसे हम हमारी सॉफ्ट पावर के तौर पर इस्तेमाल कर सकते हैं। देश में अभी भी कुल आबादी का 10 प्रतिशत भाग ही इंटरनेट जानता है और 3-5 प्रतिशत लोग ही इसे रेगुलर यूज करते हैं। इसके बावजूद भी हम दुनिया में आईटी की सबसे बड़ी मार्केट बन कर उभरे हैं। हमारा लिखा हुआ कंटेंट ही सारी दुनिया के इंटरनेट पर तैरता है। वह दिन दूर नहीं, जब आईटी और नॉलेज में हम दुनिया के लीडर होंगे। इन परिस्थितियों में क्या हम चीन की राह पर बढ़ सकते हैं। वह चीन जहां इंटरनेट पर निगरानी रखने के लिए 30 हजार एक्सपर्ट्स की एक बड़ी फौज है। चीन के पास अपना खुद का बनाया एक सर्च इंजन बायडू है और इंटरनेट कंटेट को फिल्टर करने के लिए कई तरह के टूल्स का इस्तेमाल किया जाता है। एक देश जहां वह देखा, सुना, लिखा और पढ़ा जाता है जो सरकार तय करती है। ऐसा न हो कि सेंसरशिप की चीनी राह पकड़ते हुए हम अपनी सबसे बड़ी सॉफ्टपावर को ही बर्बाद कर दें। आखिर हम अपनी ही कुल्हाड़ी से अपने पैरों पर चोट कैसे कर सकते हैं?

एक अप्रैल : 'फूल्स-डे' नहीं, (कपिल) 'सिब्बल्स-डे'

इंटरनेट सेंसरशिप के खिलाफ हमारे अभियान के तहत आज, रविवार एक अप्रैल को राजघाट पर हम सिब्बल्स डे मना रहे हैं। पिछले एक साल में मंत्री महोदय के प्री सेंसरशिप पर दिये गये बयान सारी दुनिया में हंसी का विषय बन गये। आईटी एक्ट में 2011 में किये गये संशोधनों के बाद दुनिया के बीच भारत की छवि एक डेमोक्रेटिक देश की न होकर तानाशाह की हो गयी है और इसके जिम्मेदार कोई और नहीं बल्कि माननीय कपिल सिब्बल जी ही हैं। यह हम नहीं जर्नलिस्ट्स के अंतर्राष्ट्रीय संगठन 'रिपोर्टर्स विदाउट बार्डर्स' का कहना है।

मूर्खता से भरपूर रहेगा यह कार्यक्रम

देश से आईटी एक्ट को हटाने और इंटरनेट पर सरकार से सकारात्मक रवैये की मांग करते हुए दिल्ली के तमाम ब्‍लॉगर्स, इंटरनेट यूजर्स, पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता रविवार को राजघाट परिसर में एकत्र हो रहे हैं। जोकर टोपी (जिसमें 'मैं हूं सिब्बल' लिखा होगा) पहने हुए हाथों में सीटी लेकर हम सभी लोग गांधीवादी तरीके से राजघाट पर मूर्खता के गीत गाएंगे और एक दूसरे को मूर्खतापूर्ण तरीकों से गिफ्ट देकर और केक काटकर फूल्स डे विश करेंगे। इस दौरान भारत में इंटरनेट को मूर्खतापूर्ण तरीकों से सेंसर किये जाने की पुरानी घटनाओं को याद कर ठहाके भी लगाये जाएंगे।

आपके लिए हमारा स्पेशल गिफ्ट हैंपर

आपके लिए हमने एक स्पेशल गिफ्ट हैंपर भी तैयार कर रखा है, जिसमें एक सिब्बल कैप (जोकर कैप), सीटी, चुटकुलों की किताब, कुछ गुब्बारे, सांप सीढ़ी और लूडो शामिल है। अपनी आवाज बचाने के लिए राजघाट पर आयोजित इस कार्यक्रम में पहुंचें। और हां, कृपया वहां से अपना गिफ्ट लेना न भूलें।

(आलोक दीक्षित। अपनी आवाज बचाओ (सेव योर वॉयस) अभियान के सक्रिय सदस्‍य। टीवी9 और दैनिक जागरण के साथ टीवी और प्रिंट की पत्रकारिता करने के बाद पिछले कुछ सालों से न्‍यू मीडिया में सक्रिय। मार्च 2011 से Bangalured के संपादक। आलोक से writeralok@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)


कविता में घर

कविता में घर


Sunday, 01 April 2012 14:26

नंदकिशोर आचार्य 
जनसत्ता 1 अप्रैल, 2012: भवानी भाई से यह मेरी पहली मुलाकात थी। उन्नीस सौ तिहत्तर की गर्मियों की बात है। जयप्रकाश नारायण ने 'एवरीमेंस वीकली' का प्रकाशन शुरू किया था। संपादक थे स.ही. वात्स्यायन 'अज्ञेय'। मैं अप्रैल में 'एवरीमेंस' में चला आया था और वात्स्यायन जी के साथ ही रह रहा था। एक शाम वात्स्यायन जी का मन भवानी भाई से मिलने का हुआ और हम लोग उनके घर पहुंच गए। 'चिति' के सिलसिले में उनसे पत्राचार हुआ था और मेरे पत्र के जवाब में उनका उत्साहवर्धक पत्र मिला था और उसी अंतर्देशीय में उन्हीं की हस्तलिपि में दो कविताएं भी मिली थीं, जो 'चिति' के दूसरे अंक में प्रकाशित हुई थीं। मैं तो इसी से मगन था, लेकिन पहली ही मुलाकात में उनके सादा व्यक्तित्व और निश्छल स्नेह ने मुझे अभिभूत कर दिया। यह प्रभाव फिर गहराता ही गया।
'एवरीमेंस वीकली' में प्रमुखत: साहित्य-संस्कृति से संबंधित पृष्ठों का दायित्व मेरा था। अंग्रेजी अखबार सामान्यत: हिंदी की उपेक्षा ही करते हैं, इसलिए वात्स्यायन जी चाहते थे कि 'एवरीमेंस' को इस दिशा में सचेष्ट होना चाहिए। मैंने इसी सिलसिले में भवानी भाई से साक्षात्कार के लिए अनुरोध किया। जुलाई के अंतिम सप्ताह में प्रकाशित यह साक्षात्कार भी मुझे विस्मित करने वाला था। 
भवानी भाई की प्रसिद्धि एक गांधीवादी लेखक के रूप में थी। लेकिन विचारधारा और कविता के संबंधों के सवाल पर उनका स्पष्ट मत था कि 'कविता किसी विचारधारा की अभिव्यक्ति का उपकरण नहीं है- बल्कि वह अभिव्यक्ति का माध्यम तभी तक है जब तक हम उसके माध्यम से किसी पूर्वनिर्धारित सत्य को कहना चाहते हैं। एक कवि के रूप में मेरे पास कुछ भी पूर्वनिर्धारित नहीं है। कविता मेरे तर्इं अभिव्यक्ति नहीं, अनुभव का माध्यम है।' इसलिए यह स्वाभाविक ही था कि उनकी सर्वोच्च आस्था शब्द में हो। 'सच पूछो तो मैं नहीं कह सकता कि ईश्वर में मेरा पूर्ण विश्वास है' मेरे एक और सवाल के उत्तर में भवानी भाई ने कहा। 'मेरी वास्तविक आस्था मेरे शब्दों में है। शब्द कवि का माध्यम नहीं है, यदि सच्चा कवि है तो वह स्वयं ही शब्द का माध्यम है।' 
भवानी प्रसाद मिश्र की कविता हिंदी की सहज लय की कविता है। खड़ी बोली में बोलचाल के गद्यात्मक-से लगते वाक्य-विन्यास को ही कविता में बदल देने की जो अद्भुत शक्ति है, उसकी अचूक पहचान भवानी भाई की कविता में दिखाई देती है। यह प्रवृत्ति छायावाद-पूर्व की कविता में तो थी ही, पर नई कविता के जिन कवियों में इसका सृजनात्मक विकास हुआ दिखाई देता है उनमें अज्ञेय, रघुवीर सहाय और केदारनाथ सिंह आदि के साथ भवानी प्रसाद मिश्र का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। यह भी ध्यातव्य है कि आधुनिक हिंदी कवियों में उन्हीं को कुछ लोकप्रियता मिली है, जो इस गद्यात्मक विन्यास में अंतर्निहित लयात्मकता को मूर्त्त कर सके हैं। भवानी भाई इसमें अप्रतिम हैं। 
बोलचाल की इस लयात्मक संरचना के ही कारण उनकी कविता का स्वभाव मूलत: बातचीत का या कहें कि वर्णन करने का है और इसी कारण उसमें एक प्रभावी, पर सहज नाटकीयता आ जाती है और ये सब गुण मिल कर उनकी कविता में वह सामर्थ्य विकसित कर देते हैं कि वह सरलतम तरीके से जटिलतर स्थितियों और अनुभवों को संप्रेषित करने में कामयाब होती है। दरअसल, भवानी भाई की सरल कथन-भंगिमा हमें अनवधान में डाल देती है और उसी के चलते हम अनुभव की उस जटिल संरचना को पहचान पाने में चूक जाते हैं। वह एक छलपूर्ण सरलता है। कविता में इस किस्म की सरलता को पारदर्शिता कहा जाना चाहिए, लेकिन इसे सिद्ध कवि ही हासिल कर पाते हैं। परस्पर विरोधी भावों या स्थितियों के जटिल अनुभव के एक साथ संप्रेषित हो पाने के लिए ऐसी कविता को अधिक सावधानी से पढ़ने की जरूरत होती है: 

'खुशी को/ बारहा मना किया था/ मैंने/ कि न जाए वह/ मेरे खून की धारा से/ कहने अपना दुख/ मगर वह गई/ और अब खा रही है वहां/ डुबकियां' ('रक्तकमल')
'अस्तित्व का आंगन/ कृतज्ञता की धूप से भरा है/ और तिस पर भी/ सूना है विस्तार/ देहरी से ठाकुरद्वारे तक का'  ('जैसे याद आ जाता है') 
भवानी भाई की कविता के हवाले से अज्ञेय का नई कविता के इस अनूठे रस को मिश्र रस कहना और गंभीर बात को हल्के ढंग से कहने की इस भंगिमा को उल्लेखनीय मानना सही लगता है। 
बोलचाल की इस लय के ही कारण भवानी प्रसाद मिश्र की कविता में एक विशेष प्रकार की लोक आत्मीयता का स्पर्श महसूस होता है। यह आत्मीयता केवल संप्रेषण के स्तर पर नहीं, बल्कि स्वयं अनुभव के स्तर पर व्यंजित होती है- बल्कि यह कहना शायद अधिक सही होगा कि इसी कारण प्रकृति या अन्य चीजों का अनुभव अधिक आत्मीय या कौटुंबिक स्तर पर होता है और इसलिए भवानी प्रसाद मिश्र की कविता में वह घर बराबर मौजूद रहता है, जिसकी तलाश बाद की कविता बराबर करती रही है। भवानी भाई जिस किसी भी चीज के बारे में बतियाते हैं, उसे घरेलू बना देते हैं- प्रकृति तक को। जब वह कहते हैं:
'बहुद दूर/ दक्षिण की तरफ/ नीली है पहाड़ की चोटी/ और लोटी-लोटी लग रही है/ आंगन के पौधे की आत्मा/ स्तब्ध इस शाम के/ पांवों पर।' ('अंधेरी रात')
तो आंगन का पौधा और शाम ही नहीं, दूर दिखती पहाड़ की नीली चोटी भी जैसे परिवार का एक अंग हो जाती है। वृद्धावस्था और मृत्यु तक के प्रति भवानी भाई एक आत्मीय स्वर में बात करते हैं और यह स्वर विस्मित   करता है- खासतौर पर जब पश्चिम के आधुनिक साहित्य में इनका त्रासदायक अनुभव ही सघन दीखता है।
'आराम से भाई जिंदगी/ जरा आराम से/ तेजी तुम्हारे प्यार की बरदाश्त नहीं होती अब/ इतना कस कर किया गया आलिंगन/ जरा ज्यादा है इस जर्जर शरीर को।' ('आराम से भाई जिंदगी')
भवानी भाई की प्रेम कविताएं भी अलग से ध्यान आकर्षित करती हैं- खासतौर पर प्रौढ़ प्रेम की कविताएं जिनमें उद्दाम शृंगारिकता के बजाय आत्मीय सहजीवन और उसके सुख-दुख ही प्रेम की व्यंजना है। 
'कैसे कहता/ सबसे बड़ा सुख/ सपने में मिला था/ सच यही है/ मगर इस सच को कभी मैंने दुख नहीं बनने दिया/ और ले लिए इसलिए उस दिन/ सवाल के जवाब में सरला के दोनों हाथ/ हाथों में/ और देखा हम दोनों ने चुपचाप/ एक दूसरे को थोड़ी देर।'  ('क्या चाहती हो तुम')
भवानी भाई की कविता में जब भी व्यंग्य या क्षोभ दिखाई देता है- बल्कि उनकी भी उल्लेखनीय उपस्थिति वहां है- तो आत्मीयता के अभाव या उस पर हुए आघातों के विभिन्न रूपों के प्रति विरोध के रूप में ही। इसलिए वहां भी घृणा नहीं एक सात्त्विक क्रोध की ही अभिव्यक्ति है। 
लेकिन तब क्या भवानी प्रसाद मिश्र का काव्य-संसार साधारण भारतीय जन के ऐतिहासिक और मानसिक द्वंद्वों से प्रसूत अहिंसा-बोध या संवेदन की आधुनिक प्रक्रिया का प्रतिफलन ही नहीं है? हां, निश्चय ही वह काव्यात्मक प्रक्रिया का प्रतिफलन है!
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