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THE HIMALAYAN DISASTER: TRANSNATIONAL DISASTER MANAGEMENT MECHANISM A MUST

We talked with Palash Biswas, an editor for Indian Express in Kolkata today also. He urged that there must a transnational disaster management mechanism to avert such scale disaster in the Himalayas. http://youtu.be/7IzWUpRECJM

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS TALKS AGAINST CASTEIST HEGEMONY IN SOUTH ASIA

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Monday, March 26, 2012

घबड़ाये से हैं विदेशी निवेशक! नये आयकर कानून का असर रंग दिखाने लगा!कोल इंडिया के खिलाफ टीसीआई ने मोर्चा खोला!

घबड़ाये से हैं विदेशी निवेशक! नये आयकर कानून  का असर रंग दिखाने लगा!कोल इंडिया के खिलाफ टीसीआई ने मोर्चा खोला!

केंद्रीय आयोजना व्यय का महज 2.71 फीसदी हिस्सा कृषि व संबंधित गतिविधियों पर खर्च

मुंबई से एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास

घबड़ाये से हैं विदेशी निवेशक!  बजट में रखे गए जीएएआर के प्रस्ताव पर बाजार में चिंता है।जनरल एंटी-अवोइडेंस रूल (जीएएआर)  के जरिए सरकार डबल टैक्सेशन नियम का गलत इस्तेमाल करने वालों पर लगाम लगाना चाहती है। इस नये आयकर कानून  का असर रंग दिखाने लगा! शुरूआती दौर में सपाट कारोबार कर रहे बाजार में भारी गिरावट देखने को मिल रही है।सरकार का मानना है कि विदेशी सब्सिडियरी कंपनियों द्वारा सौदा करके टैक्स चोरी की जाती है। जीएएआर के तहत आयकर विभाग को उन सौदों पर टैक्स लगाने लगाने का अधिकार मिलेगा, जिनका मकसद टैक्स बचाना है। कंपनियों के अलावा पी-नोट्स पर भी जीएएआर का असर होगा।जीएएआर की वजह से पी-नोट्स धारक बाजार से पैसा निकालना पसंद कर सकते हैं। नया नियम 1 अप्रैल से लागू होगा, इसलिए उससे पहले एफआईआई बिकवाली कर सकते हैं।पी-नोट्स के जरिए एफआईआई निवेशकों ने बाजार में काफी पैसा लगा रखा है।जीएएआर का सबसे ज्यादा असर मॉरिशस के जरिए आने वाले निवेश पर पड़ेगा। ऐसे में, एफआईआई निवेशक सिंगापुर या दूसरे जगहों का रुख कर सकते हैं। सेंसेक्स और निफ्टी करीब 1.5 फीसदी की गिरावट के साथ कारोबार कर रहे हैं। सेंसेक्स 219 अंक गिरकर 17,143 के स्तर पर और निफ्टी 66 अंक गिरकर 5,212 के स्तर पर  कारोबार कर रहा है। बाजार में बिकवाली का दबाव बढऩे से गिरावट देखने को मिल रही है। सकारात्मक संकेतों अभाव में सोमवार को स्थानीय शेयर बाजारों में की शुरूआत कमजोर रही। बिकवाली के दबाव में बंबई शेयर बाजार का सेंसेक्स 90 अंक कमजोर खुला।बाजार से खेलने वाले विदेशी निवेशक वोडाफोन के घेरने की सरकारी तैयारियों से दबाव में आ गये हैं। निवेश में सतर्कता बरती जा रही है। बाजार को मजबूत करने के लिए जो राजीव गांधी इक्विटी योजना का तोहफा दिया प्रणव मुखर्जी ने, उसे लेकर भी बाजार उत्साहित नजर नहीं आता।प्रतिष्ठित 30 शेयर वाला सेंसेक्स में पूंजीगत सामान, धातु, आईटी और बैंकिंग क्षेत्र के शेयरों पर बिकवाली का दबाव ज्यादा था। सेंसेक्स पिछले सप्ताह के बंद की तुलना में 89.64 अंक अथवा 0.52 प्रतिशत की कमजोरी से खुला।शुक्रवार को सेंसेक्स 165.27 अंक लाभ में बंद हुआ था। नेशनल स्टाक एक्सचेंज का निफ्टी भी 29.40 अंक की गिरावट के साथ 5,248.80 अंक पर खुला। वहीं अमेरिकी मुद्रा के मुकाबले यूरो में मजबूती के बीच रुपया आज अंतर बैंक विदेशी विनिमय बाजार में डालर के मुकाबले सात पैसे मजबूत होकर 51.10 पर खुला।डीलरों ने कहा कि अमेरिकी डालर के मुकाबले यूरो के मजबूत होने से रुपए में मजबूती देखी जा रही है। पिछले सत्र गुरुवार को रुपए 50 पैसे कमजोर होकर 51.17 पर बंद हुआ था।निवेशकों की नींद तो पहले से ही 2 जी, आदर्श घोटाले और एंट्रिक्स-देवास डील के चलते उड़ी हुई थी, रही सही कसर कोल ब्लॉक्स के आवंटन में घोटाले से पूरी हो गई। इन घोटालों के चलते देश की छवि दिन-ब-दिन बिगड़ती जा रही है ऐसे में इस बात की आशंका है कि एफआईआई यहां पैसा लगाने से परहेज कर सकते हैं।

वित्तमंत्री के वायदे से बाजार को राहत नहीं मिला। गौरतलब है कि वित्तमंत्री एक तरफ तो शख्त फैसले की बात करते हैं और दूसरी तरफ उद्योग जगत की पीठ सहलाते हुए भरोसा दिलाने की कोशिश करते हैं कि निवेशकों के हितों की रक्षा की जायेगी। पर इससे बात बनती नजर नहीं आती। वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने साफ शब्दों में कहा है कि आने वाले महीनों में सरकार कुछ बड़े और कड़े कदम उठाएगी। कुछ कठिन फैसले होंगे। अगर देश को आर्थिक तरक्की के रास्ते पर आगे ले जाना है तो इन कठिन फैसलों पर अमल करना होगा । मुखर्जी ने उद्योग जगत को भरोसा दिलाया है कि टैक्स कानून में बैक डेट से बदलाव के प्रस्ताव के पीछे कोई द्वेष भावना नहीं है। यही नहीं, बड़ी तादाद में पुराने केसेज को दोबारा खोलने की भी कोई मंशा नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि इनकम टैक्स डिपार्टमेंट व्यापारियों के साथ पुलिस जैसा बर्ताव नहीं करेगा। गौरतलब है कि प्रणव ने बजट में इनकम टैक्स कानून में एक ऐसे बदलाव का प्रस्ताव दिया है जो अप्रैल, 1962 से प्रभावी माना जाएगा। इसका मकसद उन सौदों पर टैक्स लगाना है जिसमें वे विदेशी कंपनियां शामिल हैं जो भारत में भी कारोबार करती हैं।उद्योग जगत को आशंका है कि इनकम टैक्स कानून में पुरानी तारीखों से बदलाव के बाद विभाग पुराने मामलों को फिर खोल सकता है। यहां सीआईआई मीट के दौरान मेंबरों के सवालों के जवाब में उन्होंने कहा कि मुझे खुद को भी बचाए रखना है। मेरे पास अपना पैसा नहीं है। मैं 120 करोड़ लोगों की ओर से टैक्स के तौर पर दिए गए धन का संरक्षक हूं।

वोडाफोन टैक्स का मामला अभी ठंडा नहीं हुआ और बाजार निवेशकों के संशय के घरे में हैं । इसी के मध्य सबसे खराब और सबसे ताजा खबर यह है कि कोल इंडिया के मैनेजमेंट के खिलाफ लंदन के हेज फंड चिल्ड्रंस इंवेस्टमेंट फंड (टीसीआई) ने मोर्चा खोल दिया है।कोल इंडिया में सबसे बड़े विदेशी निवेशक टीसीआई का कहना है कि वो कंपनी के प्रबंधन को बदलने के लिए अदालत जाएगा। फंड के मुताबिक हफ्ते भर में भारत सरकार के खिलाफ मुकदमा दायर होगा।टीसीआई के मुताबिक सस्ता कोयला बेचने की वजह से कोल इंडिया को सालाना 20 अरब डॉलर का नुकसान हो रहा है। भारत सरकार कोल इंडिया पर सब्सिडी पर कोयला बेचने का दबाव बना रही है, जिससे एफआईआई निवेशकों को नुकसान हो रहा है।कंपनी के निदेशक मंडल के खिलाफ अदालत जाने की धमकी देने वाला लंदन के हेज फंड- द चिल्ड्रन इन्वेस्टमेंट फंड (टीसीआई) सीआईएल के जवाब से संतुष्ट नहीं है। टीसीआई ने कोयला सचिव आलोक पर्ती को पत्र लिखकर सीआईएल का वरिष्ठ प्रबंधन बदलने की गुजारिश की है। टीसीआई ने कहा है, 'प्रबंधन में जरूरी नेतृत्व क्षमता नहीं है, जो परिचालन का विकास कर सके।'टीसीआई 1.01 फीसदी हिस्सेदारी के साथ कोल इंडिया में दूसरी सबसे बड़ी शेयरधारक है।टीसीआई के पार्टनर ऑस्कर वेलदुईजेन ने 12 मार्च को कोल इंडिया के वरिष्ठ प्रबंधन को लिखे गए पत्र में उन पर विश्वास संबंधी कर्तव्यों के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए, कानूनी कार्रवाई की धमकी दी थी। उन्होंने लिखा था, 'अगर सार्वजनिक तौर पर कोल इंडिया की ओर से कोयले की कीमतों को बढ़ाने और बताए गए कर्तव्यों का सही पालन करने के लिए प्रतिबद्घता नहीं जताई जाती है, तो हम अदालत जाएंगे।' इस पत्र में टीसीआई ने आरोप लगाया था कि कोल इंडिया ने सरकार के निर्देश पर कोयले के दाम में की गई बढ़ोतरी वापस ली थी।सरकार को लिखे गए पत्र में टीसीआई ने कहा है कि कोल इंडिया के चेयरमैन व प्रबंध निदेशक पार्थ भट्टाचार्य के सेवानिवृत्त होने के बाद कंपनी में जरूरी नेतृत्व क्षमता नहीं है। पत्र में उन्होंने लिखा है, 'अब समय आ गया है कि जब निदेशक मंडल प्रबंधन की जवाबदेही तय करे या फिर निदेशक मंडल या प्रबंधन में तुरंत प्रभाव से फेरबदल किया जाए।'उन्होंने लिखा, 'भारत सरकार ने कोल इंडिया का प्रदर्शन सुधारने के लिए इसके निजीकरण की योजना बनाई थी, जो तर्कसंगत भी थी। लेकिन अहम मसलों पर प्रदर्शन नहीं करने के कारण कोल इंडिया निवेशक और देश के लोगों के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन नहीं कर पा रही है। देश के विकास में कोल इंडिया की अहम भूमिका है, जिसे वह पूरी तरह निभा नहीं पा रही है। हम गुजारिश करते हैं कि मामलों पर पारदर्शी तरीके से कार्रवाई की जाए।'

बहरहाल पूंजी बाजार में खुदरा निवेशकों को अधिक से अधिक आकर्षित करने के लिए सरकार 'राजीव गांधी इक्विटी बचत योजना' की लॉक-इन अवधि घटाने पर विचार कर रही है। आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, वित्त मंत्रालय इस योजना की लॉक-इन अवधि प्रस्तावित तीन साल से घटाकर एक साल कर सकता है। बजट 2012-13 में वित्त मंत्री ने पूंजी बाजार में खुदरा निवेशकों की बाजार में भागीदारी बढ़ाने और बचत को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से राजीव गांधी इक्विटी बचत योजना पेश की है। इस योजना के तहत निवेशक बीएसई और एनएसई में सूचीबद्ध शीर्ष 100 कंपनियों में निवेश कर सकते हैं। राजीव गांधी इक्विटी बचत योजना के अंतर्गत, खुदरा निवेशकों को सालाना 10 लाख रुपये से कम की आमदनी पर तीन साल की लॉक-इन अवधि के साथ 50,000 रुपये तक निवेश करने पर आयकर में 50 फीसदी कर में कटौती का लाभ मिलेगा।आरजीईएसएस की घोषणा बजट में की गई है जो भारतीय शेयरों में खुदरा निवेशकों को लंबी अवधि के निवेश के लिए प्रोत्साहित करता है। फोलियो के हिसाब से इक्विटी म्युचुअल फंडों का आधार सबसे अधिक है। भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) के आंकड़ों के अनुसार जनवरी में कुल इक्विटी फोलियो 3.84 करोड़ था। इनमें ईएलएसएस करीब 80 लाख थे।


निवेशकों को जो बात सबसे ज्यादा परेशान कर रही है, वह यह है कि वोडाफोन टैक्स मामले में सुप्रीम कोर्ट से दोबारा झटका खाने के बावजूद सरकार ने अभी हार नहीं मानी है। सरकार का कहना है कि टैक्स कानून में संशोधन के बाद कंपनी को टैक्स देना ही पड़ेगा।वित्त मंत्रालय के मुताबिक संसद से इनकम टैक्स कानून में संशोधन को मंजूरी मिलने के बाद वोडाफोन को 11,000 करोड़ का टैक्स भरना पड़ेगा और इसके लिए सरकार को टैक्स मांगने के लिए नया नोटिस भेजने की जरूरत भी नहीं होगी।मंगलवार को ही सुप्रीम कोर्ट ने वोडाफोन टैक्स मामले में सरकार की पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी थी। जिसके बाद सरकार को तुरंत वोडाफोन को 2,500 करोड़ रुपये में 4 फीसदी का टैक्स जोड़कर वापस करना पड़ा है। सरकार ने वोडाफोन से साल 2007 में हच के साथ हुए 11.2 अरब डॉलर के सौदे पर 11,000 करोड़ रुपये का टैक्स मांगा था।

मुथूट फाइनेंस, मण्णपुरम फाइनेंस जैसी कंपनियों के गोल्ड लोन को आरबीआई के सख्त नियमों के चलते झटका लगा है।आरबीआई ने इसके लोन पर कैप लगा दिया है। फिलहाल ज्वैलरी पर केवल 60 फीसदी लोन लिया जा सकता है जबकि पहले यह सीमा 75 फीसदी तक थी। इसके अलावा टियर-1 पूंजी पर्याप्तता 12 प्रतिशत रखना अनिवार्य कर दिया है। इसकी कंपनियों के सुरक्षा मार्जिन में इजाफा होगा लेकिन इससे कंपनियों की आय भी प्रभावित होगी।खुदरा मूल्यों पर आधारित महंगाई दर अभी भी ज्यादा है, साथ ही संसद का सत्र खत्म होने पर ईंधन की कीमतों में इजाफे के डर से सेंटिमेंट पर काफी असर पड़ा है।सोने का कारोबार इसके महत्वपूर्ण समर्थन मूल्य से कम पर किया जा रहा है। इसे 1627 डॉलर और 1610 डॉलर पर मामूली समर्थन है।

एक तरफ तो उद्योग जगत की दलील है कि घरेलू तथा विदेशी निवेशकों को भारत की विकास संभावनाओं से पूरी सहमति है लेकिन निर्णय निर्माण प्रक्रिया को तेज करना होगा। तो दूसरी तरफ घरेलू शेयर बाजार की इस डांवाडोल हालत में  सरकारी जिगर में अभी इतना  दम बाकी  है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सोमवार को दक्षिण कोरियाई निवेशकों को भारत आमंत्रित करते हुए कहा कि दक्षिण कोरिया से निवेश आकर्षित करना भारत की प्राथमिकता है| मनमोहन सिंह अपने दो दिवसीय आधिकारिक दौरे के दौरान दक्षिण कोरियाई मुख्य कार्यकारी अधिकारियों को सम्बोधित कर रहे थे|मनमोहन ने कहा कि सरकार व्यापारिक वातावरण सुधारने के लिए और ओडिशा में पॉस्को इस्पात संयंत्र परियोजना को आगे ले जाने के लिए सक्रिय कदम उठा रही है| उन्होंने कहा, "दक्षिण कोरिया से निवेश भारत की प्राथमिकता है। हम निवेशकों की चिंताओं को दूर करने के लिए सक्रिय कदम उठाएंगे और देश में व्यापार का वातावरण तैयार करेंगे। हमारे देश में कई राज्य विदेशी निवेश को सक्रियरूप से प्रोत्साहित कर रहे हैं, और हम इन प्रयासों को समर्थन देंगे। मैं कोरियाई उद्योग जगत से आग्रह करूंगा कि भारत में भरोसा बनाए रखें।" यूरोप और चीन में पर्चेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (पीएमआई) में गिरावट, रुपये की कमजोरी और ईंधन के बढ़ते हुए दामों की वजह से वैश्विक शेयर बाजार में सुस्ती का दौर रहा। ऐसे में सप्ताह के अंत में कंप्ट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल (कैग) से लीक हुई रिपोर्ट ने शेयर बाजार को हिला कर रख दिया जिसने निवेशकों और विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) की नींद उड़ा दी। इस मुद्दे को साफ होने में अभी और वक्त लगेगा और यही वजह है कि शेयर बाजारों में अनिश्चतता का माहौल व्याप्त है। एफआईआई पर अब घरेलू कारक ही भारी पडऩे लगे हैं। फरवरी और मार्च के महीने में विदेशी निवेशकों की शेयर बाजार में अच्छी खासी निवेश की योजना पर बजट, चुनाव और रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति भारी पड़ गई। इसका नतीजा यह हुआ है कि पिछले दो महीनों में विश्व के सभी शेयर बाजारों में सबसे खराब प्रदर्शन करने के मामले में बांबे स्टॉक एक्सचेंज (बीएसई) दूसरे स्थान पर पहुंच गया है।

गौरतलब है कि १५ जनवरी से सरकार ने विदेशी निवेशकों के लिए शेयर बाजार का यह दरवाजा खोला है ! पर वोडाफोन विवाद और नये आयकर कानून से सारा मामला गुड़ गोबर होने में देरी नही लगी। जबकि भारत के आर्थिक विकास का पूरा फायदा जहाँ विदेशी निवेशक उठा रहे हैं दूसरी ओर देश की महज तीन फीसदी आबादी को इसका लाभ मिल रहा है।बीते 20 साल में भारत ने धीरे धीरे विदेशी पैसे के लिए अपना बाजार खोला. कई सालों तक भारत ने करीब आठ फीसदी की दर से आर्थिक विकास किया, जिसकी वजह से विदेशी निवेशक इसकी तरफ आकर्षित हुए। सही मायने में देश की आर्थिक उपलब्धियों की पहुँच आम जनता तक नहीं के बराबर है। देश की आर्थिक प्रगति की पहुँच महज सात प्रतिशत लोगों तक है और इसमें भी तीन प्रतिशत से कम लोग ही इसका फायदा उठा पा रहे हैं। देश का धनाढ्य वर्ग और अमीर होता जा रहा है जबकि गरीब दिनोंदिन और गरीब हो रहा है।भारत सरकार के मुताबिक 15 जनवरी से अकेले विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बाजार में कारोबार कर सकेंगें। अब तक विदेशी निवेश म्युचुअल फंड और किसी संस्थागत ढांचे के जरिए ही भारतीय शेयर बाजार में निवेश कर पाते थे।सरकार के इस फैसले को आर्थिक सुधार की दिशा में बढ़ाया गया एक कदम माना जा रहा था। लेकिन फिलहाल भारतीय शेयर बाजारों का बुरा हाल है, लिहाजा विदेशी निवेशक तुंरत निवेश करने लगेंगे, इसकी उम्मीद करना बेमानी है।दूसरी तरफ यूपीए सरकार भले ही ढिंढोरा पीटती रहे कि उसने कृषि को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रखी है, लेकिन बजट 2012-13 के दस्तावेजों से साफ है कि वह केंद्रीय आयोजना व्यय का महज 2.71 फीसदी हिस्सा कृषि व संबंधित गतिविधियों पर खर्च करती है। नए वित्त वर्ष 2012-13 में कुल केंद्रीय आयोजना व्यय 6,51,509 करोड़ रुपए का है। इसमें से 17,692.37 करोड़ रुपए ही कृषि व संबंद्ध क्रियाकलापों के लिए रखे गए हैं। इन क्रियाकलापों में फसलों से लेकर पशुपालन, डेयरी, मछली पालन, प्लांटेशन, खाद्य भंडारण, सहकारिता व अन्य कार्यक्रम शामिल हैं। नए साल में ग्रामीण विकास का परिव्यय 40,763.45 करोड़ रुपए और सिंचाई व बाढ़ नियंत्रण का खर्च 1275 करोड़ रुपए तय किया गया है। कृषि व इन दोनों मदों को मिलाकर कुल केंद्रीय आयोजना खर्च 59730.82 करोड़ रुपए निकलता है। ग्रामीण इलाकों से जुड़ा ये सारा खर्च केंद्र सरकार के कुल आयोजना व्यय का केवल 9.17 फीसदी निकलता है।स देश की 65 फीसदी श्रमशक्ति गांवों में लगी हो, 70 फीसदी से ज्यादा आबादी की आजीविका जहां से चलती हो, उस विशाल क्षेत्र को केंद्रीय आयोजना व्यय का महज 9.17 फीसदी देना सरकार की नीयत को साफ कर देता है। इस खर्च में मनरेगा जैसी रोजगार योजनाओं के लिए रखे गए 33,000 करोड़ रुपए भी शामिल हैं।

टाटा पावर में सबसे अधिक गिरावट है। कंपनी के शेयर करीब 3.5 फीसदी की गिरावट के साथ 96 रुपये के स्तर पर कारोबार कर रहे हैं।इसके अलावा आईसीआईसीआई बैंक, एनटीपीसी, स्टरलाइट इंडस्ट्रीज, भारती एयरटेल और बीएचईएल के कारोबार में भी गिरावट दर्ज की जा रही है। जबकि जिंदल स्टील, टाटा स्टील और विप्रो के कारोबार में मामूली तेजी देखने को मिल रही है। रियल्टी, बैंकेक्स, पावर, ऑयल ऐंड गैस और कैपिटल गुड्स के शेयरों में भी करीब 1 फीसदी से अधिक की गिरावट है।


डालर के मुकाबले कमजोर पड़ते रूपए, राजनीतिक नेतृत्व पर घटते भरोसे और धुंधलाते कारोबारी विश्वास  के बीच शुक्रवार को लगातार पांचवे सप्ताह  गिरावट पर रहे शेयर बाजार में आने वाले हफ्ते पेट्रोल, डीजल और गैस की कीमतों में बढ़ोतरी की आशंका कहर बरपा सकती है। सरकार की ओर से ऐसे संकेत मिले हैं कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की उंची कीमतों को देखते हुए आयात बिल घाटा कम करने के लिए  लिए वह पेट्रोलियम उत्पादों पर से सब्सिडी घटा सकती है। जाहिर बात है कि यदि ऐसा हुआ तो पहले ही दम तोड़ रहे बाजार पर दोहरी मार पड़ेगी। ऐसे में बाजार में निवेश से मुनाफा कमाना जोखिम भरा हो सकता है। पिछले सप्ताह बाम्बे शेयर बाजार का सेंसेक्स १०४.४६ अंक लुढ़क कर १७३६१.७४ अंक पर सिमटा। नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का निफ्टी ३९.७० अंक उतर कर ५२७८.२० अंक के स्तर तक फिसल गया। कथित कोयला खदान आवंटन मामले पर कैग रिपोर्ट आने के बाद सरकारी खजाने को १०.७ लाख करोड़ रूपए का नुकसान होने की मीडिया खबरों ने भी बाजार को नुकसान पहुंचाया। सहयोगी दल के दबाव में बढ़े रेल किराए की आंशिक वापसी से सरकार की कमजोर स्थिति उजागर हुई जिससे निवेश माहौल कमजोर बना।

तेल एवं प्राकृतिक गैस मंत्री एस जयपाल रेड्डी ने शुक्रवार को संकेत दिए कि इस माह के अंत तक पेट्रोल की कीमतों में बढ़ोतरी हो सकती है। रेड्डी ने संवाददाताओं से बातचीत में कहा कि पेट्रोल की कीमतों में बदलाव किए जाने की जरूरत है। हालांकि उन्होंने कहा कि दाम बढ़ाये जाने से पहले सहमति बनाई जायेगी। यह पूछे जाने पर कि क्या सरकार फिर से पेट्रोल की कीमतों को सरकारी नियंत्रण में लाना चाहती है, रेड्डी ने इससे इंकार किया। डीजल को नियंत्रण मुक्त किए जाने के संबंध में रेड्डी ने कहा कि अब सही समय है कि इस संबंध में सोचा जाना चाहिए, किंतु डीजल को प्रशासनिक मूल्य प्रणाली से अलग करने से पहले आम सहमति बनाई जायेगी। उन्होंने कहा फिलहाल डीजल को सरकारी मूल्य नियंत्रण से अलग नहीं किया जा रहा है। अमरीका और अन्य देशों से ईरान से पेट्रोल नहीं खरीदने के दबाव के संबंध में रेड्डी ने कहा कि ईरान से भारत तेल खरीदता रहेगा। उन्होंने कहा, हम ईरान से तेल का आयात लगातार करते रहेंगे। हम तेल का आयात अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के अनुसार करेंगे। देश की तेल विपणन क्षेत्र की अग्रणी कंपनी इंडियन आयल कार्पोरेशन के अध्यक्ष आर एस बुटोला ने भी पेट्रोल की कीमतों में वृद्धि किए जाने के संकेत दिए हैं। उन्होंने कहा है कि फिलहाल जिस दाम पर पेट्रोल बेचा जा रहा है उससे कंपनी को ७.७० रूपए प्रति लीटर का नुकसान हो रहा है। बुटोला ने कहा कि लागत से कम कीमत पर पेट्रोल बेचने से हो रहे नुकसान की भरपाई करने का आग्रह सरकार से किया गया है। उन्होंने कहा कि यदि तेल विपणन कंपनियों के अनुरोध को स्वीकार कर नुकसान की भरपाई नहीं करेगी तो पेट्रोल के दाम बढ़ाने पर विचार किया जायेगा।

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