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THE HIMALAYAN DISASTER: TRANSNATIONAL DISASTER MANAGEMENT MECHANISM A MUST

We talked with Palash Biswas, an editor for Indian Express in Kolkata today also. He urged that there must a transnational disaster management mechanism to avert such scale disaster in the Himalayas. http://youtu.be/7IzWUpRECJM

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS TALKS AGAINST CASTEIST HEGEMONY IN SOUTH ASIA

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Monday, March 26, 2012

प्रचार का आवरण

प्रचार का आवरण

Monday, 26 March 2012 10:37

लाल्टू 
जनसत्ता 26 मार्च, 2012: गुजरात और नरेंद्र मोदी फिर से सुर्खियों में हैं। एक ओर 2002 की दुखदायी घटनाओं- गोधरा और उसके बाद का जनसंहार- के दस साल बाद कई सामाजिक कार्यकर्ताओं और चिंतकों ने लेखाजोखा लेने की कोशिश की है कि दस साल बाद हम कहां खडे हैं; गुजरात में जनसंहार के दोषियों में से किसे सजा मिली और कौन खुला घूम रहा है; पीड़ितों में से कौन जिंदगी को दुबारा पटरी पर ला पाया है और कौन नहीं। दूसरी ओर 'टाइम' पत्रिका के मार्च अंक के आवरण पर नरेंद्र मोदी की तस्वीर है और अंदर एक साक्षात्कार आधारित आलेख है, जिसमें मोदी को कुशल प्रशासक के रूप में चित्रित किया गया है और साथ ही सवाल उठाया गया है कि क्या यह व्यक्ति भारत का नेतृत्व कर सकता है। राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस पार्टी की गिरती साख और दो साल बाद 2014 में होने वाले आम चुनावों के मद्देनजर राजनीतिक गलियारों में इन बातों को गंभीरता से लिया जा रहा है।
कइयों ने सवाल उठाया है कि अमेरिकी समीक्षकों का अचानक मोदी से मोह क्योंकर बढ़ने लगा। आखिर कल तक असहिष्णु सांप्रदायिक माना जाने वाला व्यक्ति महज प्रचार-कंपनियों को पैसा खिला कर अपनी छवि सुधारने में सफल कैसे हो गया। इसे समझने के लिए पूंजीवाद और अमेरिकी और यूरोपीय व्यापारी समुदाय की फासीवादियों और अन्य मानव-विरोधी ताकतों के प्रति ऐतिहासिक भूमिका कैसी रही है, इस ओर नजर डाल सकते हैं। 1936 में स्पेन में लोकतांत्रिक ताकतों के साथ तानाशाह फ्रांको के समर्थन में सेना और अन्य चरमपंथी राष्ट्रवादियों के गृहयुद्ध के दौरान दीगर पश्चिमी मुल्कों के बीच यह समझौता हुआ कि कोई दूसरा मुल्क किसी पक्ष की ओर से युद्ध में हस्तक्षेप नहीं करेगा।
इसके बावजूद दोनों पक्षों के समर्थन में धन और बल यानी हर तरह की मदद पहुंची। हिटलर के अधीन जर्मन सेनाओं ने खुल कर राष्ट्रवादियों के समर्थन में लड़ाई में हिस्सा लिया। पाबलो पिकासो की बीसवीं सदी की महानतम माने जाने वाली कलाकृति गुएर्निका, इसी नाम के गांव पर 26 अप्रैल 1937 को जर्मन बमबारी से हुए ध्वंस और करीब तीन सौ लोगों की मृत्यु पर आधारित है। अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस जैसे देशों ने लोकतांत्रिक बलों की मदद के लिए स्पेन पहुंचने की कोशिश करते लोगों को गिरफ्तार किया। भारत से मुल्कराज आनंद पत्रकार के रूप में जाना चाहते थे, पर ब्रिटिश सिपाहियों ने उन्हें रोक दिया। अमेरिका से चोरी-छिपे स्पेन पहुंचे कुछ बहादुरों ने अब्राहम लिंकन ब्रिगेड नाम से फौज की टुकड़ी बनाई और युद्ध में हिस्सा लिया। दूसरी ओर, कम से कम सोलह हजार जर्मन सिपाहियों और उनके द्वारा प्रशिक्षित औरों ने फ्रांको के राष्ट्रवादियों के समर्थन में लड़ाई लड़ी। इसी तरह मुसोलिनी के इटली से भी आए सैनिकों ने राष्ट्रवादियों के पक्ष में लड़ाई में हिस्सा लिया। आंद्रे मालरो के प्रसिद्ध उपन्यास 'ले एस्पों' (मानव की आस) में ऐसे कई संदर्भों का रोचक वर्णन है।
स्पेन के पास खनिज तेल के स्रोत न थे। फ्रांको को यह संसाधन अमेरिकी और ब्रिटिश तेल कंपनियों से मिला। पूंजीवाद के मानव-विरोधी पक्ष का यह एक अच्छा उदाहरण है कि एक ओर तो निरपेक्षता के नाम पर लोकतंत्र समर्थकों को स्पेन जाने से रोका गया और दूसरी ओर तानाशाह को मुनाफे के लिए सारे संसाधन दिए गए। इतिहास में ऐसे उदाहरण अनगिनत हैं। इसलिए आज टाइम मैगजीन में आवरण पर नरेंद्र मोदी की शक्ल देख कर या उस पर लिखा आलेख पढ़ कर और अमेरिका की ब्रूकिंग्स संस्था द्वारा उसकी प्रशंसा देख कर आश्चर्य नहीं होना चाहिए। अमेरिकी कंपनियों को मुनाफा चाहिए। यह मुनाफा गुजरात के लोग भेजें या भविष्य में भारत के एक जन-विरोधी नेतृत्व को हटा कर दूसरे जन-विरोधी नेतृत्व के जरिए उनको मिले, उन्हें इससे कोई मतलब नहीं।
अभी कुछ समय पहले अमेरिकी संसद में नरेंद्र मोदी की निंदा का प्रस्ताव पारित हुआ था। अमेरिका ने मोदी को अपने यहां आने के लिए वीजा देने से भी इनकार कर दिया था। अमेरिका का व्यापारी समुदाय इससे बहुत खुश तो नहीं होगा, क्योंकि आर्थिक साम्राज्यवाद के लिए गुजरात के धनकुबेरों के साथ उन्हें संबंध बनाए रखना है। बाद में अगर मनमोहन के मोह से छूटने की जरूरत महसूस हो रही है तो नई कठपुतली भी ढूंढ़ना है। इसलिए डेनमार्क के पाकशास्त्री रेने रेद्जेपी पर चार पन्नों और ब्रिटिश फैशन लेबल मलबेरी पर तीन पन्नों के साथ मोदी पर दो ही सही, टाइम मैगजीन में पन्ने तो हैं ही।
फ्रांको, मुसोलिनी और हिटलर आए और गए। उस जमाने में उन मुल्कों में अधिकतर लोगों ने उनका समर्थन किया। आज उसी जर्मनी में लोग यह सोच कर अचंभित होते हैं कि ऐसा कैसे हुआ कि इतनी बड़ी तादाद में लोगों ने हिटलर जैसे एक मानसिक रूप से बीमार आदमी का नेतृत्व स्वीकार किया। यह मनोविज्ञान का एक बड़ा सवाल है। मोदी जैसों का राष्ट्रवाद, जो आज कुछ लोगों के लिए गुजराती राष्ट्रवाद है, बहुसंख्यक लोगों को अल्पसंख्यक लोगों के प्रति नफरत करने के लिए मजबूर करता है। इस नफरत के बिना ऐसे राष्ट्रवाद का अस्तित्व नहीं टिकता।
नरेंद्र मोदी को गुजरात के बहुसंख्यक लोगों का समर्थन हासिल है। दंगों की निंदा को गुजरात और गुजरातियों की आलोचना

बनाने में मोदी को सफलता जरूर मिली, पर यह झूठ लंबे समय तक बनाए रखना संभव नहीं है। नरेंद्र मोदी जो हैं सो हैं, इतिहास उन्हें उचित जगह पर ही रखेगा। तमाम सूचनाओं के होते हुए भी लोगों को यह समझ न आए कि आज नफरत की राजनीति   का समर्थन भविष्य में उनके बच्चों के लिए बेइंतहा शर्म का सबब होगा, ऐसा हो नहीं सकता। अमेरिकी पब्लिसिटी कंपनियों को बहुत सारा पैसा देकर एक ऐसे व्यक्ति ने अपनी साख बनाए रखने की कोशिश की है, जिसका नाम लेते हुए हर भले आदमी को शर्म आती है। यह किसका पैसा है? यह गुजरात के लोगों का पैसा है।
पूंजीवाद मूलत: मानव-विरोधी है। मुनाफे के लिए अमेरिकी कंपनियां कुछ भी कर सकती हैं। पर क्या सचमुच वे कुछ भी कर लें और लोग आंखें मूंदे वह मान लेंगे? यह 1936 नहीं है कि प्रचार के बूते सच गायब किया जा सके। नफरत की राजनीति करने वालों की करतूतें जगजाहिर हैं। लाख कोशिशें करने पर भी वे बच नहीं सकते। उनको सजा मिलने में देर हो सकती है, पर सजा उनको मिलेगी ही। एहसान जाफरी और शाह आलम शिविर में बिलखती रूहों से लेकर इशरत जहां तक के सच सिर्फ पैसों और अमेरिकी पब्लिसिटी से गायब नहीं हो सकते।
1936 में हिटलर और फ्रांको ने क्या कहा, वह गायब नहीं हुआ है। लोग उसे आज भी सुनते हैं और मानव की अधोगति पर अचंभित होते हैं। नरेंद्र मोदी ने नब्बे के दशक में सत्ता हथियाने के लिए भाषण-दर-भाषण में मुसलमानों के खिलाफ जो जहर उगला था, वह सारा हमारी स्मृति में है। उसकी परिणति गोधरा के पहले और बाद की घटनाओं में हुई। यह गुजरात के लोगों को तय करना है कि उनके बच्चे भविष्य में उनके बारे में इतिहास में क्या पढ़ेंगे। नरेंद्र मोदी की सारी कोशिशें सच को दबा नहीं पाएंगी।
इधर कई वर्षों से एक बड़ा झूठ यह फैलाया जा रहा है कि मोदी की वजह से गुजरात राज्य में अपूर्व तरक्की हुई है। गुड गवर्नेंस- ये दो शब्द, जिनका मतलब है अच्छा प्रशासन, ऐसे कहे जाते हैं जैसे मोदी की सरकार के पहले अंग्रेजी भाषा में इनका अस्तित्व ही नहीं था।
गुजरात के बारे में जानकारी रखने वाले लोग यह बताते हैं कि अव्वल तो यह बात सच नहीं है। गुजरात कई सूचकांकों में अन्य कई राज्यों से पीछे है। जो तरक्की दिखती भी है, वह न केवल उच्च और मध्यवर्गों तक सीमित है, वह अधिकतर पहले से हुए निवेश और पहले से चल रही योजनाओं की वजह से है। जब से अफ्रीकी देशों से निकले गुजराती मूल के व्यापारियों में से कई अमेरिका या ब्रिटेन से लौट कर भारत और गुजरात में बस गए हैं, तब से शहरीकरण और उसके साथ होता पूंजीवादी विकास वहां चल रहा है। यह बात गुजरात के पढ़े-लिखे लोगों से छिपी नहीं है।
सकल घरेलू उत्पाद में बीस साल पहले भी गुजरात राष्ट्रीय औसत से आगे था और आज भी है। पर योजना आयोग के आंकड़ों से पता चलता है कि गुजरात गरीबी उन्मूलन में बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों से पीछे है। मानव विकास के कई सूचकांकों में भी गुजरात अन्य कई राज्यों से पीछे है। राज्य के चौवालीस फीसद बच्चे कुपोषण के शिकार हैं।
इसमें कोई शक नहीं कि अक्सर तानाशाह आतंक के जरिए व्यवस्थाओं में कहीं-कहीं प्रशासनिक नियमितता लाने में सफल होते हैं। अभी कुछ वर्षों पहले तक बहुत-से ऐसे लोग मिल जाते थे जो देश की सभी समस्याओं की वजह अंग्रेजों के चले जाने को मानते थे। कई लोग तो भारत में हिटलर जैसा तानाशाह चाहते रहे हैं। पर क्या हम सचमुच इतने नादान हैं कि हमें तानाशाही की सीमाएं मालूम नहीं? भारत के लोग गठबंधन की राजनीति से परेशान हो सकते हैं, पर हाल में राज्यों से जो चुनाव परिणाम आए हैं, उनसे साफ दिखता है कि उनकी राजनीतिक समझ परिपक्व है और तानाशाही उन्हें स्वीकार नहीं है।
गुजरात के नागरिकों की पीड़ा हर मानव की पीड़ा है। इतिहास हमें बताता है कि समय-समय पर इंसान हैवान बना है। अतीत में ताकत के बल पर ही सभ्यताएं बनती-बिगड़ती थीं। आधुनिक काल में संगठित रूप से मानव ने सवाल उठाना शुरू किया है कि हैवानियत से हम कैसे बचें। गुजरात में हुए जनसंहार की निंदा और अपराधियों को उचित सजा देने की मांग गुजरातियों की निंदा नहीं है। किसी जनसंहार के विरोध में उठी आवाज इतिहास के हर जनसंहार का विरोध है।
यह जरूरी है कि हम विरोध करें, ताकि फिर कभी न केवल गोधरा और उसके बाद की घटनाएं न हों, बल्कि 1984 जैसा, 1947 जैसा, हिटलर के जनसंहार जैसा जनसंहार या ऐसी कोई भी सांप्रदायिक हिंसा कभी न हो। अपने दो पन्नों के साक्षात्कार में टाइम मैगजीन की ज्योति थोट्टम ने मोदी से गुजरात के दंगों की बाबत पूछा तो उनका जवाब था- मैं इस बारे में बात नहीं करना चाहता- लोग बोलेंगे। मानवता को इंतजार है कि गुजरात के लोग अब नफरत की राजनीति के खिलाफ बोलें और अपने बच्चों को निष्कलंक भविष्य दें। यही गुजरात का सच्चा गौरव होगा। यह हर मानव का सच्चा गौरव होगा।

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