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THE HIMALAYAN DISASTER: TRANSNATIONAL DISASTER MANAGEMENT MECHANISM A MUST

We talked with Palash Biswas, an editor for Indian Express in Kolkata today also. He urged that there must a transnational disaster management mechanism to avert such scale disaster in the Himalayas. http://youtu.be/7IzWUpRECJM

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS TALKS AGAINST CASTEIST HEGEMONY IN SOUTH ASIA

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Saturday, March 24, 2012

आग है , तभी न धुंआ है! ​मुंबई से एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास


आग है , तभी न धुंआ है!

​मुंबई से एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास

धनबाद, ऱानीगंज और झरिया के कोयला खदानों में सुलगती भूमिगत आग बाकी देश के लोगों को दखने का शायद ही मौका मिला हो।​​ ​झारखंड के झरिया और बंगाल के  रानीगंज शहरों को रोज राज के धंसान से बचाने के लिए खानों के राष्ट्रीयकरण के बाद से लगातार तरह तरह की कोशिशें होती रही हैं। पर आग आज भी बूझने का नाम नहीं लेती। भूमिगत आग की चपेट में फंसी झरिया रानीगंज समेत पूरी आबादी को​ ​ अन्यत्र हटाने का प्रयास भी करीब चार दशकों से जारी है। पर इसका भी असर नहीं है। कैग रपट से समूचे कोयले उद्योग में समाहित​ ​ भूमिगत आग की झांकी पेश हुई है। बाकी देश को सिर्फ धुआं ही नजर आ रहा है और इस धुएं के आर पार देखना मुश्किल है। पर कोयला​ ​ उद्योग और बिहार बंगाल से लेकर छत्तीसगढ़ महाराष्ट्र तक विस्तृत कोयलांचल के लोग बखूबी इस आग की भयावहता से दिन प्रतिदिन ​​मुखातिब होते हैं। इस मलाईदार महकमे के लिए सत्तवर्ग के माफियावार में अंततः उसे  ही अक्सर लहूलुहान होना पड़ता है।​
​​
​प्रधानमंत्री के बचाव में यूपीए के संकटमोचक प्रणव मुखर्जी अब लामबंद हो गये हैं। पर हो हल्ला थम ही नहीं रहा। अगर लीक हुई रपट कैग के मुताबिक भ्रामक है, तो एक नहीं दो नहीं, एकमुश्त ५८ कंपनियों से नीलामी में हासिल कोयला ब्लाक वापस लेने की कार्रवाई क्यों की जा रही है। जाहिर है, आग है , तभी न धुंआ है! इस बीच कोलइंडिया ने भी राजनीतिक दलों का तर्ज पर पैंतरा बदलकर बिजली कंपनियों को कोयला ​​देने की गारंटी देने के करार पर दस्तखत करने से इंकार कर दिया है।केंद्र सरकार ने कोल इंडिया को सख्त निर्देश दिया है कि वह बिजली कंपनियों को दीर्घकालिक कोयला आपूर्ति की गारंटी दे, नहीं तो उस पर पेनाल्टी लगाई जा सकती है। यह पहल सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय की तरफ से की गई है। निर्देश में कहा गया है कि कोल इंडिया 2015 में चालू की जानेवाले बिजली परियोजनाओं के साथ 20 साल तक ईंधन (कोयला) सप्लाई करने का करार करे। सरकारी बयान के अनुसार इससे देश में 50,000 मेगावॉट से ज्यादा बिजली पैदा की जा सकेगी। अभी तक कोल इंडिया ज्यादा से ज्यादा पांच साल तक कोयला देने का अनुबंध करती रही है। बता दें कि देश के कोयला उत्पादन में कोल इंडिया का एकाधिकार है। कुल उपलब्ध कोयले का 82 फीसदी उत्पादन अकेले यह कंपनी करती है।निर्देश की खबर मिलते ही निजी क्षेत्र की तमाम बिजली कंपनियों के शेयर छलांग लगा गए। रिलांयस पावर के शेयर में 12.9 फीसदी, टाटा पावर में 6 फीसदी और अडानी पावर में 13.78 फीसदी की बढ़त दर्ज की गई। सरकार का यह फैसला बिजली कंपनियों के प्रतिनिधियों द्वारा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से गुहार लगाने का नतीजा है। ये लोग 18 जनवरी 2012 को प्रधानमंत्री से मिले थे। उनकी शिकायत थी कि कोल इंडिया सिर्फ 50 फीसदी कोयला आपूर्ति का आश्वासन देती है जिसके चलते अप्रैल 2009 से किसी करार पर हस्ताक्षर नहीं हो पाए हैं।

कोल इंडिया की चेयरपर्सन और मैनेजिंग डायरेक्टर जोहरा चटर्जी का कहना है कि बजट में कोयले पर से इंपोर्ट ड्यूटी हटाए जाने से कोयले की कमी की दिक्कतें दूर हो जाएंगी। चटर्जी के मुताबिक अप्रैल में कोल इंडिया कोयले की कीमतों में बढ़ोतरी पर विचार कर सकता है। वहीं अप्रैल में कोयले की कीमतों में बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है। इसके अलावा 31 मार्च 2012 तक कोल इंडिया द्वारा बिजली कंपनियों के साथ कोयले की आपूर्ति के लिए करार पूरा करने की उम्मीद है।लेकिन हकीकत इसके विपरीत है। उत्पादन में कमी और नये वेतनमान के दबाव में कोल इंडिया ३१ मार्च कत गारंटी करार पर दस्तखत ​​करने की सेहत  में नहीं है। हूक्मउदूली की औपचारिकता बस बाकी है।सभी बिजली कंपनियों के बजाय कोल इंडिया कुछेक के साथ करार​ ​ दस्तखत करके इस मामले को ागे टालने की तैयारी मेंहै, कोयला उद्योग सूत्रों का कहना है।

आर्थिक सुधार तेज करने की दिशा में राजकोषीट घाटा को प्रभावी ​​राजस्व घा​टा बना दिया गया। योजना आयोग ले तो गरीबी की परिभाषा ही बदल डालने की कवायद कर ली। रेल बजट को सुधार की गाड़ी ​​आगे बढ़ने के लिए एसिड टेस्ट बताया गया। जिसमें रेलमंत्री का झुलसकर अवसान हो गया।ओएऩजीसी की हिस्सेदारी की नीलामी को विनिवेश का नया तरकीब बताया गया, जो फ्लाप शो साबित हुआ। बिजली कंपनियों को कोयला आपूर्ति की गारंटी दिलाने के लिए प्रधानमंत्री के दफ्तर से  हस्तक्षेप का जबर्दस्त हाइप बना, उसका यह हश्र! जाहिर है कि कि कोयले की भूमिगत आग से सरकार और प्रधानमंत्री की साख कैग की लीपापोती की तमाम कोशिशों के बावजूद दांव पर है और यह आग क्या क्या चबा जायेगी, सिर्फ देखते जाइये!

सीएजी की अधबीन रपट का वह मसौदा है, जिसके मुताबिक कोयले की खदानों के आबंटन की वजह से उद्योगों को 10.7 लाख करोड़ का नाजायज फायदा मिला। जाहिर है, संसद का सत्र चल रहा है और विपक्ष को सरकार पर हमला करने का मसाला मिल गया है। 2-जी घोटाले में सीएजी के मुताबिक 1.76 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ था और उसमें सरकार हिल गई थी। नए मामले में 2-जी घोटाले से छह-सात गुनी रकम बताई जा रही है।इसके मुताबिक, साल 2004 से 2009 तक 155 कोयला खदानें निजी और सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों को दी गईं, इनकी नीलामी न करने से इन कंपनियों ने 10.7 लाख करोड़ रुपये अतिरिक्त का फायदा उठाया। सीएजी ने हालांकि यह साफ किया है कि यह अंतिम रिपोर्ट नहीं है, बल्कि मसौदा है, जो चर्चा के लिए बनाया गया था। सीएजी ने यह भी कहा है कि 10.7 लाख करोड़ रुपये उद्योगों ने अतिरिक्त कमाए, इसका अर्थ यह नहीं है कि सरकार को इतना घाटा हुआ। संभव है कि रपट को अंतिम रूप देने तक बहुत सारे बदलाव हो जाएं और अंतिम रपट सरकार के लिए उतनी विस्फोटक न साबित हो या इसका उलटा भी हो सकता है।दिलचस्प तथ्य यह है कि इनमें से कई खदानें छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और झारखंड में हैं, जहां भाजपा का राज है। एक तथ्य यह भी है कि सरकार ने 2009 में कोयला खदानों की नीलामी को लेकर एक विधेयक प्रस्तुत किया था, जो वर्ष 2010 में पारित हुआ, लेकिन इस बीच खदानों की लीज पांच साल के लिए बढ़ा दी गई।

अभी यह सवाल संसद में उठा नही है कि सरकार बिजली कंपनियं पर इतनी मेहरबान क्यों है, शायद इसेके लिए किसी कैग रपट या अखबारी लीकेज का इंतजार हो।प्राकृतिक संसाधनों की लूट खसोट की बहती गंगा में कैसे लोग पवित्तता की रक्षा करते हुए मालामाल होते हैं, कोयला उद्योग और कोयलांचल से बेहतर कोई नहीं जानता। बहरहाल वित्त वर्ष 2012-13 के बजट में बिजली क्षेत्र को कई राहत दी गई हैं। वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने अपने अभिभाषण में फ्यूल संकट से गुजर रही बिजली परियोजनाओं के लिए स्टीम कोयले, एलएनजी और नेचुरल गैस के आयात पर लगने वाले सीमा शुल्क को अगले दो साल तक समाप्त करने की घोषणा की। वर्तमान में कोयले के आयात पर पांच फीसदी का सीमा शुल्क लगता है।योजना आयोग ने भी कोयले की किल्लत को दूर करने के लिए इस शुल्क को समाप्त करने की सिफारिश की थी। साथ ही इस पर लगने वाले सीवीडी को 5 फीसदी से घटाकर एक फीसदी करने का प्रावधान किया गया। बिजली कंपनियों को यह छूट 31 मार्च 2014 तक जारी रहेगी।आगामी वित्त वर्ष के लिए विद्युत मंत्रालय ने 15,291 करोड़ रुपये की मांग रखी है।प्रस्तावित बजट में बिजली परियोजनाओं की वित्तीय व्यवस्था का भी ख्याल रखा गया है। अब बिजली परियोजना स्थापित करने वाली कंपनियों को विदेशी बैंकों से कर्ज लेना आसान होगा।वित्त मंत्री ने बजट में विदेशी बैंकों से लिए जाने वाले कर्ज की ब्याज पर लगने वाले कर को 20 फीसदी से घटाकर 5 फीसदी कर दिया है। एसोसिएशन ऑफ पावर प्रोड्यूसर्स के मुताबिक उन्होंने बिजली परियोजनाओं के लिए दस मांगें सरकार के समक्ष रखीं थी और उनमें से कई मांगें सरकार ने मान लीं।


वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने कोयला ब्लॉक आवंटन मामले पर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट पर राजनीतिक दलों द्वारा किये जा रहे होहल्ले को अनावश्यक बताते हुये आज कहा कि यह रिपोर्ट शुरुआती प्रक्रिया का हिस्सा है, अंतिम रिपोर्ट आने पर इसमें से 90 प्रतिशत मुद्दे हट जाते हैं।मुखर्जी ने विभिन्न राजनीतिक दलों के गुस्से को शांत करने के प्रयास में कहा, ''कैग की यह कथित रिपोर्ट अंतिम रिपोर्ट नहीं है, यह कैग की सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है, इसमें उठाये गये मुद्दों का मंत्रालय को जवाब देना है, अंतिम रिपोर्ट उसके बाद तैयार होगी और कई बार पहले उठाये गये 90 प्रतिशत तक मुद्दे अंतिम रिपोर्ट से हटा दिये जाते हैं।''

वित्त मंत्री ने कहा कि कैग एक संवैधानिक संस्था है और इसका कार्य सरकार के कामकाज में कमियों को ढूंढ़ना है। मुखर्जी ने कहा ''मैंने बार बार यह कहा है कि इसका काम सरकार की प्रशंसा कर प्रमाणपत्र देना नहीं है बल्कि सरकारी कामकाज में कमियां ढूंढना है...फिर उसकी जांच प्रक्रिया को लेकर अनावश्यक सनसनी क्यों फैलाई जाती है।''उन्होंने कहा कि कैग की मसौदा रिपोर्ट के आधार पर कुछ समाचारपत्रों ने कोयला आवंटन मामले में सरकार को 10 लाख करोड़ रुपये का नुकसान होने का मामला उछाला है। संसद में इस मुद्दे को लेकर काफी शोरशराबा हुआ जिसके बाद प्रधानमंत्री कार्यालय को कैग से एक पत्र मिला जिसमें कहा गया कि समाचार भ्रामक है।

मुखर्जी ने कहा कि कैग की रिपोर्ट पर अंतत: संसद को ही संज्ञान लेना है। ''वास्तविकता यह है कि यह रिपोर्ट ही नहीं है, कैग को अभी अपनी रिपोर्ट को अंतिम रुप देना है। रिपोर्ट लोक लेखा समिति के पास जायेगी, जो कि इस पर विचार विमर्श कर अपने विचार संसद में रखेगी।''

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