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THE HIMALAYAN DISASTER: TRANSNATIONAL DISASTER MANAGEMENT MECHANISM A MUST

We talked with Palash Biswas, an editor for Indian Express in Kolkata today also. He urged that there must a transnational disaster management mechanism to avert such scale disaster in the Himalayas. http://youtu.be/7IzWUpRECJM

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS TALKS AGAINST CASTEIST HEGEMONY IN SOUTH ASIA

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Wednesday, September 2, 2015

हंगामा खूब है बरपा लेकिन जनता अब भी तमाशबीन है! कामरेड! हड़ताल तो हो गयी कामरेड,पर हम मुद्दों पर बात शुरु ही कहां कर सके हैं कि बदलाव की शुरुआत हो? बहुत खतरनाक है कि जनता को हिंसा की खबरों में बहुत मजा आता है और सुगंधित कंडोम की चिंता उसे सबसे ज्यादा है,अपने हकहकूक की कतई नहीं। यह बेहद खतरनाक है कि रोज रोज खून की नदियां लबालब बहती रहे,जिस किसी को देश बेचना हो ,बेचता रहे,जनता नींदभर सोती रहे।उसे खबर भी नहीं हो कि यह उसीका देश है जो जल रहा है और बात उसी के हकहकूक की हो रही है,जिसे रौंदने का पूरा इंतजाम है। हुक्मरान के लिए यह फिजां बहार है। कि जनता के मुद्दे और मसले हाशिये पर हैं और जिन्हें साथ होना चाहिए वे ही आपस में लहूलुहान है।जैसे बंगाल में हुआ। जैसे बंगाल में हड़ताल के मुद्दों पर कोई बहस नहीं है। पलाश विश्वास


हंगामा खूब है बरपा लेकिन जनता अब भी तमाशबीन है! कामरेड!


हड़ताल तो हो गयी कामरेड,पर हम मुद्दों पर बात शुरु ही कहां कर सके हैं कि बदलाव की शुरुआत हो?


बहुत खतरनाक है कि जनता को हिंसा की खबरों में बहुत मजा आता है और सुगंधित कंडोम की चिंता उसे सबसे ज्यादा है,अपने हकहकूक की कतई नहीं।



यह बेहद खतरनाक है कि  रोज रोज खून की नदियां लबालब बहती रहे,जिस किसी को देश बेचना हो ,बेचता रहे,जनता नींदभर सोती रहे।उसे खबर भी नहीं हो कि यह उसीका देश है जो जल रहा है और बात उसी के हकहकूक की हो रही है,जिसे रौंदने का पूरा इंतजाम है।

हुक्मरान के लिए यह फिजां बहार है।

कि जनता के मुद्दे और मसले हाशिये पर हैं


और जिन्हें साथ होना चाहिए वे ही आपस में लहूलुहान है।जैसे बंगाल में हुआ।


जैसे बंगाल में हड़ताल के मुद्दों पर कोई बहस नहीं है।



पलाश विश्वास

Farmers associated with Karnataka State Farmer Facilitators Union stage a demonstration to press for their demands in Bengaluru, on Sep 1, 2015

Ganesh Tiwari's photo.



आज मेरे इकलौते बेटे एक्सकैलिबर स्टीवेंस  का जन्मदिन है।हम उसके लिए कोई बेहतर दुनिया की शक्लसूरत बना नहीं सके हैं।फिरभी उसे जन्मदिन मुबारक ताकि हम जो कर न सकें ,वह कर दिखायें।


नवउदारवादी राजनीतिक आर्थिक जमाने में कामरेड महासचिव प्रकाश कारत ने परमाणु संधि पर यूपीए सरकार से अलगाव का फैसला एकदम सही किया था।


अफसोस कि आज तक इस देश की जनता को न परमाणु संधि के बारे में कुछ मालूम है और न देश और नागरिकों की संप्रभुता के बारे में कोई परवाह है।


न जनता को मालूम है उस सियासत हुकूमत और मजहब के त्रिशुल के बारे में जो उसके दिलोदिमाग में शूली और सलीब हैं।


अपने ही कामरेड को सही फैसले के लिए कटघरे में खड़ा करके सत्ता समीकरण साधते रहे कामरेड और देश बंटता ही रहा।


जाति धर्म पहचान के नाम पर बंटता चला गया देश तो मुद्दों पर बहस जनता तक ले जाने की जिम्मेदारी मीडिया पर छोड़कर लाल रंग खिलेगा सत्ता की दलाली में विचारधारा को तिलांजलि देकर?


बिना जनता के बीच जाये, बिना जनता से कुछ सीखें,बिना जनता की आवाज बुंलद किये,बिना जनता की भाषा,लोक और मुहावरों को समझें,आप जनता के हक हकूक कि लड़ाई लड़ लेंगे,जनता को साथ लिये बिना हवा में तलवारबाजी करते हुए जबकि बहुजन आपको जाति के नाम पर गरियाते हैं और लाल रंग से भागते हैं?आप सर्वहारा की बात तो करते हैं लेकिन सर्वहारा से मीलों दूर भागते हैं।


आपने 1991 से लेकर अब तक कुछ भी नहीं किया सत्ता में भागेदारी के सिवाय,मुझे अफसोस है कि आपके आंदोलन का समर्थन पूरी ताकत के साथ करता हूं,लेकिन मुझे यह सच सार्वजनिक कहना होगा क्योंकि सच कहनेवालों से कामरेडों को संघ परिवार के मुकाबले कहीं ज्यादा परहेज है।यह खतरनाक है।


सच कहने वालों के लिए न राजनीति में कोई जगह है और न वामपंथ में सच की कोई हैसियत है,यह बहुत खतरनाक है।


अंबेडकरी समाजवादी खेमे में सच कहना मना है।


कैसे राजनीतिक कैडर हैं?

कैसा राजनीतिक संगठन है ?


कैसा आंदोलन है?

कैसी हड़ताल है?


निजीकरण,अबाध पूंजी,विनिवेश और एफडीआई से जनता को कोई तकलीफ नहीं है।जनता निजीकरण को विकास समझ रही है।जनता पीपीपी माडल के हक में जनादेश दे रही है।हत्यारा रब है इन दिनों।


जनता को नहीं मालूम कि जल जंगल जमीन नागरिकता और मानवाधिकार क्या है और उनका क्या हो रहा है।


यह कैसा नाबालिग लोकतंत्र है कि जनता को न कानून मालूम है और न अपने हकहकूक के बारे में कुछ मालूम है?


नागरिक को नहीं मालूम कि उसका बन क्या रहा है।

झूठे मक्कार,हद दर्जे के बेईमान,पहलवान,सूदखोर महाजन, जमींदार, हत्यारे,बलात्कारी- कोई भी हो सकता है जनता का रहनुमा।


यह कैसा नाबालिग लोकतंत्र है?


यह कैैसा लोकतंत्र है कि चूंकि अखबारों में सबसे ज्यादा बंधुआ मजदूर हैं और मीडिया में नर्क गुलजार है तो चौथा खंभा लड़खड़ा गया है और किसी संपादक की कोई रीढ़ नहीं है,सारे के सारे डरे हुए हैं कि अगर मेहनतकशों के हकहकूक बहाल हुए तो सबसे पहले मजीठिया बराबर देना है?


यह कैसा नाबालिग लोकतंत्र है? मेहनतकशों के हकहकूक के खिलाफ बदलाव के सारे चमकदार दादा दीदी लामबंद हैं?


यह कैसा नाबालिग लोकतंत्र है? कि सारे के सारे जनप्रतिबद्ध रीढ़दार पत्रकार और संपादक गधों के सींग हैं?


यह कैसा नाबालिग लोकतंत्र है?

कि जनता निजीकरण में आजादी समझती है?


यह कैसा नाबालिग लोकतंत्र है?

कि जनता शेयर बाजार में सबकुछ दांव लगा लेती  है?


यह कैसा नाबालिग लोकतंत्र है?

कि जनता विदेशी पूंजी से लेकर विदेशी हुकूमत के हक में है?


यह कैसा नाबालिग लोकतंत्र है?

कि जनता निजीकरण में आजादी समझती है?


यह कैसा नाबालिग लोकतंत्र है?

विनिवेश,विनियंत्रण,विनियन और खुलकर बेदखली को विकास के लिए अनिवार्य आर्थिक सुधार समझती है जनता और जनता मेहनतकशों के साथ भी नहीं है?


यह बहुत खतरनाक है।


बहुत खतरनाक है कि जनता को हिंसा की खबरों में बहुत मजा आता है और सुगंधित कंडोम की चिंता उसे सबसे ज्यादा है,अपने हकहकूक की कतई नहीं।


रंगबिरंगे कार्ड धरने और उनका मनचाहा इस्तेमाल और बाजार में खरीददारी के पैसे,क्या यही है लोकतंत्र?


यह बेहद खतरनाक है कि  रोज रोज खून की नदियां लबालब बहती रहे,जिस किसी को देश बेचना हो ,बेचता रहे,जनता नींदभर सोती रहे।उसे खबर भी नहीं हो कि यह उसीका देश है जो जल रहा है और बात उसी के हकहकूक की हो रही है,जिसे रौंदने का पूरा इंतजाम है।


सबसे खतरनाक बात यह है कि न जनता को और न मेहनतकशों को अपने हक हकूक के बारे में कुछ मालूम है और न दंगाइयों की राजनीति को,अपना अपना घर भरने की राजनीति को इसकी कोई परवाह है।



चाट मसाला सेक्स परोसता हुआ मीडिया,जिहादी कत्लेआम के एजंडा को जनसरोकार बनाता हुआ मीडिया,फिर भी आप इन्हींको बयान जारी करके राजधानियों से जनांदोलन करते रहेंगे और जनता के बीच जाने की तकलीफ नहीं करेंगे तो जनता लुटती रहेगी,मरती खपती रहेगी इसीतरह और न लोकतंत्र होगा और न बदलाव।


कहीं से कोई मतवाला बच्च आयेगा और गिन गिनकर कुनबों समेत करोड़ों जनता लूटकर हुक्मरान का बाजा बजाते हुए देश को फिर ज्वालामुखी के मुहाने छोड़ जायेगा जाति धर्म के नाम,विचारधारा खामोश देखती रहेगी क्योंकि उसे न जमीन पर खड़े होने की तमीज है और न हकीकत के मुकाबले जनता को गोलबंद करने की समझ है।लगातार यही हो रहा है।


दंगाइयों को कत्लेआम की खुली छूट लोकतंत्र है।


देश बेचने का हक जनादेश है और जनता के हिस्से में कयामतों के सिवाय कुछ भी नहीं।


कायनात की रहमतों,बरकतों और नियामतों से भी जनता बेदखल और इसी बेदखली का नाम एकमुश्त राजनीति और अर्थव्यवस्था है।


किसी को अंदाजा भी नहीं है कि सरेआम चांदमारी हो रही है चूंते हुए सामग्रिक विकास के नाम पर,समता और न्याय के नाम पर, समरसता और धर्म,राष्ट्र और अस्मिता के नाम पर।


जो सर्वहारा हैं वे कहीं भी साथ खड़े नहीं हैं और एक दूसरे के खिलाफ जिहादी तेवर में लामबंद है तो कैसी राजनीति कर रहे हैं आप कि न जनता को गोलबंद कर पा रहे हैं और न देश दुनिया जोड़ पा रहे हैं?


कारपोरेट सीमेंट से बनी दीवारों को पहले तोड़िये।


राजनीतिक ध्रूवीकरण धर्म और अस्मिता के आधार पर हो रहा है।जात पांत जनसंख्या के आंकड़े पर गिरोहबंदी हो रही है और इसे राजनीति मान रही है जनता।उसी हिसाब से एक दूसरे के खिलाफ गिरोहबंद हो रही है जनता।


हुक्मरान के लिए यह फिजां बहार है।

कि जनता के मुद्दे और मसले हाशिये पर हैं

और जिन्हें साथ होना चाहिए वे ही आपस में लहूलुहान है।

जैसे बंगाल में हुआ।

जैसे बंगाल में हड़ताल के मुद्दों पर कोई बहस नहीं है।


सारा फोकस अखाड़े पर है कि कौन सियासत में किसे पटखनी दे रहा है और हंगामा खूब है बरपा लेकिन जनता अब भी तमाशबीन है।


इस देश की जनता को और मेहनतकश तबके को बधाई कि आखिरकार हकहकूक के लिए कोई आवाज तो बुलंद हुई है।


बधाई कि 1991 के नवउदारवादी सत्ययुग के रामराज में लापता स्वराज के लिए देशभर में गुहार की शुरुआत हो गयी है।


मेहनतकशों के हक हकूक के लिए राष्ट्व्यापी  हड़ताल की अभूतपूर्व कामयाबी की असल उपलब्धि यही है।


फिरभी चिंता की बात यह है कि यह हड़ताल आम हड़ताल नहीं बन सकी और राजनीति और कारपोरेट मीडिया की मेहरबानी कि यह आम हड़ताल भी पार्टीबद्ध राजनीति सी लग रही है,जिसमें जनता की भागेदारी और मेहनतकशों की रहनुमाई दिखी नहीं है।


फिरभी चिंता की बात है कि अब भी बिना जनता की भागेदारी के पार्टी,संगठन और बेलगाम भीड़ के दम पर बदलाव की बात सोच रहे हैं।भूल गये कि मजमा खड़ा करने से आंदोलन खड़ा नहीं होता।


भूल गये बेलगाम भीड़ दंगाई भीड़ होती है जो कत्लेआम का बहाना बन जाती है।


शुक्र है कि पार्टीबद्ध हिंसा के अलावा मेहनतकशों के हकहकूक की हड़ताल के बहाने दंगा अभी हुआ नहीं है।


जनता के बीच जाने की तकलीफ उठाये बिना,जनता के मुहावरों में जनता के बीच बदलाव के मुद्दों पर खुली बहस के बिना कोई आंदोलन आंदोलन नहीं होता।


जनता की भागेदारी हो जाये,मेहनतकशों की रहनुमाई हो जाये तो कामरेड बदलाव को रोक सकें,ऐसा कोई माई का लाल नहीं है।


दंगाई भीड़ की राजनीति सत्ता की राजनीति है,बदलाव की नहीं।

हमें भीड़ नहीं,हमें समझदार जनता की जरुरत है।


वरना यूं समझिये कि बात तो हुई लेकिन बात चली नहीं कहीं।


हड़ताल कामयाब तो हुई लेकिन मेहनतकशों को मालूम ही नहीं चला कि बात उसीके हकहकूक की हो रही है,कामरेड!


मुद्दों पर फोकस होता तो बंगाल में हिंसा हड़ताल की सबसे बड़ी खबर नहीं होती।


किस्सा फिर वही है कि गांवों से शहरों को घेरने की बात हो रही थी और गांवों का सिरे से सफाया हो गया।


कत्लेआम हो गया।


जनता को तब भी मालूम न हुआ और आज भी मालूम नहीं है कि दोस्त कौन है और दुश्मन कौन।


किस्सा फिर वही है कि आर्थिक मुद्दों पर बहस करने की हमारी तमीज ही नहीं है।


यूं समझें कि अमेरिका,ब्रिटेन और सभी विकसित देशों में राजनीति से राजनय अलग है।


चुनावों में बहस न राजनीति पर होती है और न राजनय पर।बहस चलती है अर्थव्यवस्था पर।


देश के आर्थिक मुद्दों पर,घरेलू मसलों पर।

दंगाई राजनीति नहीं होती है और न वहां राजनीति मजहबी होती है।


चुनी हई सरकार के जिम्मे छोड़ दी जाती है राजनय।मसलों पर खुली बहस होती है और सत्ता का कोई समीकरण नहीं होता राजनीति का नाम।राजनीति आंतरिक लोकतंत्र होती है जिसके तहत जनता अपने उम्मीदवार और रहनुमा चुनते हैं।


शुरु से अत्यंत संवेदनशील राजनय हमारे यहां सबसे खतरनाक राजनीति है,जो अंध राष्ट्रवाद है।


हुकूमत को जो काम गोपनीयता से अंजाम देने होते हैं,वह मजहबी जिहाद में तब्दील है और देश की सुरक्षा,एकता और अखंडता की कीमत पर अंध राष्ट्रवाद की मजहबी जिहादी राजनीति का खुल्ला कारोबार है सरहदों के आर पार आत्मघाती धमाकों की तरह।


हमारी समझ से परे है कि किसी आजाद देश के नागरिक और हुक्मरान राजनीतिक समीकरण साधने के लिए सरहद को दांव पर कैसे लगाते हैं और कैसे राजनीति युद्ध और गृहयुद्ध में तब्दील है।


कैसे राजनीति अपने ही देश और अपनी ही जनता के कत्लेाम पर आमादा है,यह हमारी समझ से परे है।


हमें न दादा की भाषा समझ में आ रही है और न दीदी की तुकबंदी।


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