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THE HIMALAYAN DISASTER: TRANSNATIONAL DISASTER MANAGEMENT MECHANISM A MUST

We talked with Palash Biswas, an editor for Indian Express in Kolkata today also. He urged that there must a transnational disaster management mechanism to avert such scale disaster in the Himalayas. http://youtu.be/7IzWUpRECJM

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS TALKS AGAINST CASTEIST HEGEMONY IN SOUTH ASIA

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS TALKS AGAINST CASTEIST HEGEMONY IN SOUTH ASIA

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Sunday, June 1, 2014

विष वृक्ष फलने लगा तो भोग लगाइये,जाति मजबूत करने की राजनीति के नतीजे से आग बबूलाहोने के बजाय अब भी वक्त है कि बाबासाहेब के रास्ते चले वरना धर्म बदलने के बाद भी जिस जाति की वजह से यह कयामत है,उसी जाति को ढोने वाले बंदों का खुदा कोई नहीं।बाबा साहेब भी नहीं।और मार्क्स भी नहीं। गुंडों की सल्तनत का महापर्व है यह

विष वृक्ष फलने लगा तो भोग लगाइये,जाति मजबूत करने की राजनीति के नतीजे से आग बबूलाहोने के बजाय अब भी वक्त है कि बाबासाहेब के रास्ते चले वरना धर्म बदलने के बाद भी जिस जाति की वजह से यह कयामत है,उसी जाति को ढोने वाले बंदों का खुदा कोई नहीं।बाबा साहेब भी नहीं।और मार्क्स भी नहीं।

गुंडों की सल्तनत का महापर्व है यह


पलाश विश्वास

विष वृक्ष फलने लगा तो भोग लगाइये,जाति मजबूत करने की राजनीति के नतीजे से आग बबूलाहोने के बजाय अब भी वक्त है कि बाबासाहेब के रास्ते चले वरना धर्म बदलने के बाद भी जिस जाति की वजह से यह कयामत है,उसी जाति को ढोने वाले बंदों का खुदा कोई नहीं।बाबा साहेब भी नहीं।और मार्क्स भी नहीं।सर्वस्वहाराओं का चौरतरफा सत्यानाश समय है यह।


विडंबना यह है कि वर्ग संघर्ष के जरिये क्रांति का सपना देखने वाले वामपंथी भी सत्तासुख के लिए जाति समीकरण जोड़ते रहे हैं।


बंगाल में तो वर्ण वर्चस्व और मनुस्मृति राज बाकी देश की तुलना में बेहद मजबूत है।बिना केसरिया सुनामी के बंगाल में जीवनयापर मुकम्मल केसरिया है।बंगाल के विभाजन के जरिये सत्ता से बहुजनों को बेदखल तो किया ही गया,दलित शरणार्थियों को बंगाल बाहर करके देशभर में छिड़ककर उनकी बहचान और राजनीतिक ताकत मिटा दी गयी। बहुसंख्य ओबीसी को सत्ता से जोड़कर रखा गया तो अखंड बंगाल में बहुसंख्यक मुसलमान अल्पसंख्यक बनकर वोट बैंक में तब्दील हो गये। सच्चर कमिटी की रपट की भूमिका सिंगुर नंदीग्राम भूमि आंदोलन से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है,इस पर चर्चा कम हुई है,लेकिन बाकी देश के केसरिया कायाकल्प को समझने के लिए इसे समझना बेहद जरुरी है। सन 1977 तक बंगाल में अल्पसंख्यक मुसलमान बाकी देश की तरह कांग्रेस के पाले में बने रहे।सत्ता खातिर कामरेड ज्योति बसु की अगुवाई में बाहर छिटका दिये गये दलित शरणार्थिों को बंगाल वापस बुलाकर शरणार्थी वोट बैंंक बनाने का खेल इसीलिए रचा गया क्योंकि मुसलमान कांग्रेस के पास थे और वामदलों का कोई मुकम्मल वोट बैंक नहीं था,लेकिन जबतक मरीचझांपी में शरणार्थी आकर बसे,तब तक 1977 के लोकसभा चुनाव में मुसलमान वामदलों के साथ हो गये।1977 से लेकर 2009 तक मुसलमान वोट बैंक वामदलों के कब्जे में रहा।इस बीच गैरजरुरी शरणार्थियों को मरीचझांपी नरसंहार के जरिये जनवरी ,1979 में वाम सरकार ने बंगाल से खदेड़ बाहर कर दिया ।  


खास बात यह है कि 2009 के लोकसभा चुनाव से पहले सच्चर कमिटी रपट से खुलासा हुआ कि बंगाल में वाम शासन के दौरान मुसलमानों का कल्याण हुआ नहीं है। मुसलमान नंदाग्राम नरसंहार के बाद एकमुश्त ममता बनर्जी के साथ खड़े हो गये तो बंगाल में बजरिये परिवर्तन मां माटी मानुष की सरकार का गठन हो गया।


लेकिन अब ताजा सर्वेक्षण आज ही बांग्ला दैनिक अखबार एई समय में प्रकाशित हुआ है, जिसके तहत परिवर्तन जमाने में भी बंगाल में मुसलमानों के खिलाफ वही  साजिशाना धोखाधड़ी का सिलसिला जारी है जैसा कि आईपीएस साहित्यकार नजरुल इस्लाम ने अपनी पुस्तक मुसलमानदेर कि करणीय,में खुलकर पहले ही लिख दिया है कि मुसलिम कट्टरपंथ को संरक्षण देने के अलावा ममता बनर्जी के नमस्ते दोया अभियान से मुसलमानों का कोई कल्याण नहीं हो रहा है।


गौरतलब है कि अखंड बंगाल में मुसलमान ही बहुजन आंदोलन की रीढ़ है तो पश्चिम बंगाल में मुसलमानों और दलितों का कोई गठबंधन नहीं है।आदिवासी और बहुसंख्य ओबीसी अलग अलग हैं।इन सबको खैरात और आरक्षण बांटकर समीकरण साधा जाता रहा है।


गौरतलब है कि बंगाल में तमाम किसान आंदोलनों में मुकम्मल बहुजन समाज का वजूद रहा है। अठारवी सदी में ईस्ट इंडिया कंपनी का राज शुरु होने के तत्काल बाद हुए चुआड़ विद्रोह से लेकर नील विद्रोह,सन्यासी विद्रोह होकर तेभागा आंदोलन तक।


गौरतल है कि मतुआ आंदोलन का प्रस्थान बिंदू ब्राह्मणवाद का विरोध रहा है और हरिचांद ठाकुर से लेकर गुरुचांद ठाकुर तक मतुआ एजंडा पर स्त्री मुक्ति,कर्मकांड निषेध, शिक्षा आंदोलन,अस्पृश्यता मोचन से भी ऊपर भूमि सुधार का कार्यक्रम सबसे ऊपर था और इसी एजंडे को अपनाकर तेभागा की पकी हुई जमीन पर वाम दलों का जनाधार बना।


गौरतलब है कि बंगाल में अब अबेडकर को संविधानसभा भेजने वाले जोगेंद्रनाथ मंडल को जैसे याद नहीं किया जाता ,ठीक उसी तरह अखंड बंगल के प्रथम प्रधानमंत्री फजलुल हक को याद करने वाला इस पार उसपार बंगाल में कोई नहीं है।


लेकिन इन्हीं फजलुल हक की कृषक प्रजा पार्टी ने 1901 में ढाका में बनी मुसलिम लीग और उसके बाद बनी हिंदू महासभा दोनों की हवा खराब कर रखी थी और वे बहुजनों के निर्विरोध  नेता थे।उनकी पार्टी के एजंडा पर भूमि सुधार सबसे ऊपर था।लेकिन सत्ता में आते ही फजलुल श्यामा हक मंत्रिमंडल ने भूमि सुधार आंदोलन को हाशिये पर रख दिया।नतीजतन बंगाल में मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा दोनों की चल निकली।


बाकी देश में जो बहुजन आंदोलन मुसलमान समर्थन से ओबीसी को साथ लेकर चल रहा था, वह जाति पहचान पर आधारित था,संशाधनों के बंटवारे और भूमि सुधार के एजंडा मार्फत अबेडकरी जाति उन्मूलन एजंडा के तहत पूंजीवाद और ब्राह्मणवाद दोनों को दुश्मन मानकर नहीं। विपरीत इसके आरक्षण राजनीति के तहत सत्ता वर्ग ने बंगाली मुसलमानों की तरह बहुजन जातियों को रंग बिरंगी पार्टियों के वौटबेंक में सीमाबद्ध कर दिया।जिसके नतीजे के बतौर बहुजनों की मजबूत दो चार जातियां सत्ता तक पहुंच गयी और सत्ता संरक्षण में उन जातियों के बाहुबलि धनपशुओं ने बाकी छह हजार से ज्यादा जातियों पर कहर बरपाने का सिलसिला जारी रखा है।


बंगल में जाति पहचान की बात कोई करता नहीं है और नकोई जाति पूछता है लेकिन मुकम्मल जाति तंत्र है। बाकी देश में जाति तंत्र ही लोकतंत्र है।अंबेडकर ने हिंदू समाज में जाति उ्मूलन असंभव जानकर बौद्ध धर्म अपनाया तो अब जाति व्यवस्था को बहुजन राजनीति के सत्ता माध्यम बना देने और सत्ता वर्ग की मौकापरस्त सत्ता राजनीति से अस्मिता मजबूत बनाओ अभियान के तहत काशीराम के आवाहन मुताबिक अपनी अपनी जाति मजबूत करने के तहत आरक्षण का लाभ लेने के लिए धर्मान्तरित बहुजनों के मार्फत इस्लाम,ईसाइत, सिखधर्म, बौद्धधर्म में भी जाति वर्चस्व का खेल शुरु हो गया। अंबेडकर के जाति उन्मूलन के एजंडा को फेल करके बहुजन आंदोलन ने सोशल इंजीनियरिंग के जरिये कई राज्यों में सवर्णों को जो सत्ता से अलग कर दिया,जवाबी बंगाली ओबीसी सोशल इंजीनियरिंग से उसका पटाक्षेप हो गया।


दलित उत्पीड़न का सिलसिला अनंत है।स्त्री का दमन अनंत है। अब रामराज में खुल्ला सांढ़ बने गये मजबूत जाति के गुंडातंत्र वही गुल खिला रहे हैं , जो बंगाल में परिवर्तान राज का रोजनामचा है।


विडंबना है कि इस गुंडाराज से बचने के लिए बहुजन और वाम कार्यकर्ता नेता भारी पैमाने पर केसरिया तंबू में ही शरण ले रहे हैं जैसे बंगाल में तृणमूली गुंडाराज से बचनेके लिए सुरक्षा की गारंटी अब हिंदू महासभा वंशलतिका भाजपा है,जिसका चालीस के दशक के आखिर तक विशुद्ध आर्थिक एजंडे के तहत बंगाल के अखंड बहुजनसमाज ने मुस्लिम लीग की तरह हाशिये पर रख दिया था।


खास बात तो यह है कि बंगाल और भारत के मुकाबले बांग्लादेश में दलित आंदोलन समूचे  बहुजन समाज,प्रगतिशील तबके और धर्मनिरपेक्ष लोकतात्रिक ताकतों के साथ सत्ता वर्ग और कट्टरपंथ के विरुद्ध अब भी लामबंद है क्योंकि वहां सत्ता समीकरण के लिए दलित आंदोलन नहीं है और वजूद बहाल रखना बुनियादी तकाजा है। मार खाने के डर से न कोई मसीहा है और न कोई दुकान।न बहुजन मजबूत जातियों का वहां वजूद है और न उनका कोई गुंडातंत्र है।                                                                                                                                          


अनीता भारती ने सही लिखा हैः

दलित महिलाओं के साथ लगातार बढ रहे उत्पीडिन, शोषण, बलात्कार और हत्याएो को राष्ट्रीय समस्या मानकर उससे युद्धस्तर पर लडना और खत्म करना होगी, ताकि दलित महिलाओं के मान- सम्मान और स्वाभिमान को सुरक्षित किया जा सके.


फिर दुसाध जी का यह फेसबुकिया मंतव्य

गाँव के दबंगों ने,जो जाति से पटेल हैं,उनकी भाई-भाभी की अनुपस्थिति का लाभ उठकर रेप की घटना अंजाम दिया है.आगे कोई कार्रवाई न हो इसके लिए जान से मारने की धमकी दे रहे हैं.घटना मिरजापुर जिले की है.दबंगों के प्रभाव के कारण पुलिस सही एक्शन नहीं ;ले रही है.मिर्जापुर,भगाणा और बदायूं केस की तह में जाने पर पाएंगे की घटना के पीछे हिन्दू समाज की कमजोर का यम बनने की मानसिकता जिम्मेवार है.अनवरत जारी ऐसी घटनाओं पर हाय-तोबा से कुछ नहीं होने वाला.आपको यह बात ध्यान रखकर कार्य योजना बनानी होगी की की हिन्दू सख्त का भक्त भी होते हैं.अतः असशाक्तों को सशक्त बनाकर ही ऐसी बर्बर घटनाओं से राष्ट्र को निजात दिला सकते हैं.अतः सोचे बीमार हिन्दू समाज को कैसे दुरुस्त कर सकते हैं.


लालजी निर्मल का कहना हैः

बहुजनों का आन्दोलन तो सिर्फ आरक्षण तक सिमित हो कर रह गया |देश की चौथाई आबादी तो आज भी बेबस और बदहाल है |दलितों में भी जाति बोध,जाति मोह पनप रहा है |जातियों के किये जा रहे सशक्तिकरण से अम्बेडकर के सपनों का भारत तार तार हो रहा है | सवाल है क्या अम्बेडकरी आन्दोलन कमजोर हो रहा है !सवाल है क्या दलितों के सशक्तिकरण के लिए जमीन वितरण का एजेंडा मुख्य बिंदु बनाया जाना चाहिए,सवाल है क्या हजारों सालों की दासता ने जब दलितों का सब कुछ निगल लिया तो आजादी के बाद दलितों को जीवन यापन के लिए मुआवजा नहीं दिया जाना चाहिए था | दलित आन्दोलन को इन सारे सवालों से जूझना होगा |



इसी सिसलसिले में हमारे आदरणीय मित्र आनंद तेलतुंबड़़े का लिखा भी पढ़ लेंः

अपने अकेले बेटे को क्रूर तरीके से खो देने वाले राजू और रेखा आगे की भयावह मानवीय त्रासदी 'हत्याओं' की संख्या में बस एक और अंक का इजाफा करेगी और भगाना की उन लड़कियों को तोड़ कर रख देने वाला सदमा और जिंदगियों पर हमेशा के लिए बन जाने वाला घाव का निशान एनसीआरबी (नेशनल क्राइम रिसर्च ब्यूरो) की 'बलात्कारों' की गिनती में जुड़ा बस एक और अंक बन कर रह जाएगा. ऐसी सामाजिक प्रक्रियाओं द्वारा पैदा किए गए उत्पीड़न के आंकड़े अब भी 33,000 प्रति वर्ष के निशान के ऊपर बनी हुई हैं. इन आधिकारिक गिनतियों का इस्तेमाल करते हुए कोई भी यह बात आसानी से देख सकता है कि हमारे संवैधानिक शासन के छह दशकों के दौरान 80,000 दलितों की हत्या हुई है, एक लाख से ज्यादा औरतों के बलात्कार हुए हैं और 20 लाख से ज्यादा दलित किसी न किसी तरह के जातीय अपराधों के शिकार हुए हैं. युद्ध भी इन आंकड़ों से मुकाबला नहीं कर सकते हैं. एक तरफ दलितों में यह आदत डाल दी गई है कि वे अपने संतापों के पीछे ब्राह्मणों को देखें, जबकि सच्चाई ये है कि इस शासन की ठीक ठीक धर्मनिरपेक्ष साजिशों ने ही उन शैतानों और गुंडों को जन्म दिया जो दलितों को बेधड़क पीट पीट कर मार डालते हैं और उनका बलात्कार करते हैं….


हमेशा के लिए बन जाने वाला घाव का निशान एनसीआरबी (नेशनल क्राइम रिसर्च ब्यूरो) की 'बलात्कारों' की गिनती में जुड़ा बस एक और अंक बन कर रह जाएगा. इन मानवीय त्रासदियों को आंकड़ों में बदलने वाली सक्रिय सहभागिता, जिनके बगैर वे भुला दी गई होती, गुम हो गई है. ऐसी सामाजिक प्रक्रियाओं द्वारा पैदा किए गए उत्पीड़न के आंकड़े अब भी 33,000 प्रति वर्ष के निशान के ऊपर बनी हुई हैं. इन आधिकारिक गिनतियों का इस्तेमाल करते हुए कोई भी यह बात आसानी से देख सकता है कि हमारे संवैधानिक शासन के छह दशकों के दौरान 80,000 दलितों की हत्या हुई है, एक लाख से ज्यादा औरतों के बलात्कार हुए हैं और 20 लाख से ज्यादा दलित किसी न किसी तरह के जातीय अपराधों के शिकार हुए हैं. युद्ध भी इन आंकड़ों से मुकाबला नहीं कर सकते हैं. एक तरफ दलितों में यह आदत डाल दी गई है कि वे अपने संतापों के पीछे ब्राह्मणों को देखें, जबकि सच्चाई ये है कि इस शासन की ठीक ठीक धर्मनिरपेक्ष साजिशों ने ही उन शैतानों और गुंडों को जन्म दिया जो दलितों को बेधड़क पीट पीट कर मार डालते हैं और उनका बलात्कार करते हैं.


इसने सामाजिक न्याय के नाम पर जातियों को बरकरार रखने की साजिश की है, इसने पुनर्वितरण के नाम पर भूमि सुधार का दिखावा किया जिसने असल में भारी आबादी वाली शूद्र जातियों से धनी किसानों के एक वर्ग को पैदा किया. वह सबको खाना मुहैया कराने के नाम पर हरित क्रांति लेकर आई, जिसने असल में व्यापक ग्रामीण बाजार को पूंजीपतियों के लिए खोल दिया. वह ऊपर से रिस कर नीचे आने के नाम पर ऐसे सुधार लेकर आई, जिन्होंने असल में सामाजिक डार्विनवादी मानसिकता थोप दी है. ये छह दशक जनता के खिलाफ ऐसी साजिशों और छल कपट से भरे पड़े हैं, जिनमें दलित केवल बलि का बकरा ही बने हैं. भारत कभी भी लोकतंत्र नहीं रहा है, जैसा इसे दिखाया जाता रहा है. यह हमेशा से धनिकों का राज रहा है, लेकिन दलितों के लिए तो यह और भी बदतर है. यह असल में उनके लिए शैतानों और गुंडों की सल्तनत रहा है.


दलित इन हकीकतों का मुकाबला करने के लिए कब जागेंगेॽ कब दलित उठ खड़े होंगे और कहेंगे कि बस बहुत हो चुका!



Amalendu Upadhyaya with Ajit Pratap Singh and 2 others

27 mins ·

किसी से कम नहीं है। तीनों ही जातियों का जिले के क्षेत्र विशेष में अलग-अलग आतंक है। बदायूँ, एटा और बरेली तीनों ही जिलों में मौर्या मजबूत आर्थिक व बाहुबल वाली जाति है।

घटना जिस कटरा सआदतगंज की है वह पूर्ववर्ती उसहैत विधानसभा क्षेत्र में आता है जहां से भगवान सिंह शाक्य पूर्व मंत्री और पूर्व मंत्री नरोत्तम सिंह शाक्य विधानसभा में प्रतिनिधित्व करते रहे हैं। नरोत्तम सिंह शाक्य के पुत्र ब्रजपाल सिंह शाक्य भी कई चुनाव लड़े लेकिन कामयाब नहीं हुए। इसी विधानसभा क्षेत्र से सपा के मिनी मुख्यमंत्री कहे जाने वाले बनवारी सिंह यादव व उनके पुत्र आशीष यादव भी विधायक रहे हैं।

कुल मिलाकर लब्बो-लुबाव यह है कि पीड़ित पक्ष किसी दबी-कुचली दलित जाति का नहीं है बल्कि वह भी मजबूत बाहुबली जाति हैं और इस क्षेत्र में यादवों व मुरावों में हमेशा संघर्ष होता रहा है। दोनों ही पक्षों को अपनी-अपनी सरकारों में बनवारी सिंह यादव, भगवान सिंह शाक्य और ब्रजपाल सिंह शाक्य सारी सीमाएं तोड़कर मदद करते रहे हैं। कोई भी इस मामले में बेदाग नहीं है।

इसलिए मीडिया ने जिस तरह से इस घटना को प्रचारित किया वह उसकी नादानी नहीं बल्कि षडयंत्र है। बेशक सरकार पर सवाल उठाए जा सकते हैं जब सरकार का अभियुक्तों को संरक्षण प्राप्त हो, लेकिन प्रथमदृष्टया ऐसा देखने में नहीं आया कि सरकार ने अभियुक्तों को संरक्षण दिया हो। जैसा कि समाजवादी पार्टी के नेता डॉ. इमरान इदरीस का दावा है- "5 आरोपी पकड़ लिए गए हैं। पूरा थाना बर्खास्त कर दिया गया। 2 सिपाहियों को पकड़ा गया। स्वयं मुख्यमंत्री जी ने मामला फ़ास्ट ट्रेक कोर्ट में दे दिया है। इसके बावजूद भी मीडिया इसको तूल दिए है।"

इमरान का आरोप गलत भी नहीं है। अभी हमारा मीडिया मोदीमीनिया से बाहर नहीं निकला है और भाजपा का भौंपू होने का फर्ज बखूबी निभा रहा है। कानून व्यवस्था को लेकर अखिलेश सरकार से जो सवाल पूछे जा रहे हैं, वही सवाल शिवराज सरकार से क्यों नहीं पूछे जा रहे ? यहां मकसद अखिलेश सरकार का बचाव करना कतई नहीं है बल्कि मीडिया का भाजपा के प्रोपैगण्डा सेल की तरह काम करने को लेकर है। अखिलेश सरकार अगर कानून व्यवस्था के मसले पर खरी नहीं उतरती है तो बेशक उसे फाँसी चढ़ा दीजिए लेकिन मीडिया को अब भाजपा के अफवाहतंत्र की तरह काम करने से बचना चाहिए।


Sudha Raje

7 hrs ·

कितने हैवान """""""

आज जो वातावरण बना हुआ है उस वातावरण में बलात्कारियों दंड तो देना है ही अति आवश्यक और तत्काल भी । साथ ही आवश्यक है कि वे सब कारण दूर किये जायें जिनके होने से "स्त्रियों पर आक्रमण होते हैं ।

1*"मानसिक "

भारत में जिस तेजी से सूचना संचार का विस्तार हुआ है उसी तेजी से अश्लीलता और ब्लू फिल्मों पोर्न बेबसाईटों गंदी अश्लील किताबों फिल्मों टीवी सीरियलोंअश्लील पोस्टरों और चित्रों का आक्रमण भी गाँव गाँव नगर नगर घर घर स्कूल कॉलेज आश्रम अस्पताल सब जगह पहुंच रहा है ।

ये सब देख सुनकर पढ़कर """दैहिक वासना भङकती है ''''लोग बुरी तरह इसी हवस और उत्तेजना से भरे जब होते है तो सेक्स की प्रबल इच्छा विवश करती है """ऐसे मानसिक हालात में विवेक खत्म हो जाता है और अश्लील किताब पढ़कर फिल्म देखकर या विज्ञापन टीवी सीरियल नाच गाना देखकर ""दैहिक वासना की आग में जलता असंयमी पुरुष """आसपास कोई भी स्त्री देखकर तत्काल उसे ही पाकर भूख बुझा लेना चाहता है । ये भूख जब बुझाने को स्त्री नहीं मिलती तो आसान शिकार """छोटे और किशोर बच्चे मिलते हैं या कमजोर लङके ""बलात्कार या कुकर्म ""जैसे अपराध इसी मनोदशा में होते हैं

घरेलू स्त्रियों का घर के नाते रिश्तेदारों द्वारा किये गये बलात्कार कुकर्म और बहला फुसलाकर दुष्कर्म के कारण """सबसे पहले ""मानसिक हालात """बेकाबू और भङकी हुयी वासना की आग है ।

जिसकी वजह है """हर तरह हर समय हर किसी के पास बरसती """अश्लीलता सेक्स और पोर्न सामग्री """

©®सुधा राजे

क्रमशः जारी

सीरीज """""""


S.r. Darapuri

17 hrs · Edited ·

उत्तर प्रदेश दलित महिलाओं पर बलात्कार के मामले में देश भर में दूसरे स्थान पर है. एनसीआरबी के ताजा आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2012 में पूरे भारत में दलित महिलाओं के साथ बलात्कार के 1576 मामलों में से 285 अर्थात कुल अपराध का 18.1% उत्तर प्रदेश से थे. इसी प्रकार अपहरण आदि के 490 मामलों में से 258 (52.65%) केवल उत्तर प्रदेश से ही थे. इस से स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश में दलितों पर अत्याचार की स्थिति शोचनीय है. वैसे तो मायावती के शासन काल में भी दलितों पर अत्याचारों में कोई ख़ास कमी नहीं थी.

यह आंकड़े कुल घटित अपराध का केवल छोटा सा हिस्सा है क्योंकि अधिकतर अपराध तो दर्ज ही नहीं किये जाते. इस का मुख्य कारण यह है कि अपराध दर्ज न करने वाले पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध कोई कार्रवाही नहीं होती क्योंकि इस में मुख्य मंत्री से लेकर निचले स्तर के अधिकारियों तक की मिली भगत रहती है.

'थाने पहुँचे तो सबसे पहले हमारी जात पूछी' - BBC Hindi - भारत

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बदायूँ ज़िले में दो नाबालिग लड़कियों को गैंगरेप के बाद पेड़ से लटका दिया गया था. पीड़ित परिवारों ने पुलिस पर गंभीर आरोप लगाए हैं.

BBC NEWS

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Ashok Azami

1 hr · Edited ·

बलात्कार एक घृणित अपराध है. लेकिन कभी गौर से सोचियेगा कि दिल्ली के बाद अब उत्तर प्रदेश पर ही इतना जोर क्यों है? तमाम बातों के आगे यह बात भी है कि वहां क़ानूनी कार्यवाही हुई है, अपराधी गिरफ्तार हो रहे हैं और पुलिसकर्मी सस्पेंड, लेकिन कार्यवाही का कहीं ज़िक्र नहीं है. सारा ज़ोर सरकार को घेरने भर पर है.

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दिल्ली में निर्भया काण्ड के बाद बहुत कुछ हुआ है पर उस पर कोई हल्ला नहीं. भगाणा के पीड़ित जंतर मंतर पर हैं और केंद्र सरकार का कोई बंदा नहीं गया पर उस पर एकदम चुप्पी. क्योंकि दिल्ली में उस हल्ले का फल हासिल कर लिया है मीडिया ने. भ्रष्टाचार पर हुए शोर के दौर को याद कीजिए. ज़रा सा अलग बात करने पर आपको कांग्रेसी कांग्रेसी कहकर टूटने वाले लोग आज नई सरकार के हर फैसले को डिफेंड करते नज़र आ रहे हैं. रक्षा क्षेत्र में सौ प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पर एकदम चुप हैं वे लोग जो सेना के लिए ऐसे बेकल थे कि उनका चलता तो खुद वर्दी पहन लेते. खुद को "कांग्रेसी नहीं" साबित करने के लिए हमारे प्रगतिशील साथियों ने भी जम कर हल्ला बोला. बिना यह सोचे कि सी ए जी का जो आंकड़ा है वह सिर्फ अनुमानों पर आधारित है. बिना यह सोचे कि मीडिया किस तरह एकतरफा चीजें पेश कर रहा है.

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अब यू पी की बारी है. असल में यह सब सत्रह के चुनाव की तैयारी है. सोचिये मध्य प्रदेश में सबसे ज्यादा बलात्कार के केस आते हैं लेकिन आज तक कभी उस पर कोई मुद्दा क्यों नहीं बना ऐसा? मुलायम का निंदनीय बयान सौ बार दुहराया जाता है लेकिन उसके पहले दिए संघ प्रमुख के बयान या ऐसे अन्य लोगों के बयानों का कोई ज़िक्र क्यों नहीं होता? मध्य प्रदेश में चुनाव से पहले सरकारी अधिकारीयों के सहारे फंड इकट्ठा करने में जिन लोगों का नाम आया उन पर कभी बात नहीं होती. माननीय उच्चतम न्यायालय के निर्देश पर बनी काले धन पर एस आई टी पर नई सरकार का स्वागत करने वाले सूचना के तौर पर भी कभी नहीं बताते कि उस एस आई टी के प्रमुख वह जज हैं जिन्होंने वर्तमान प्रधानमंत्री के गुजरात में मुख्यमंत्री रहते लगे भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच कर उन्हें क्लीन चिट दी थी. नई सरकार के हिंदी प्रेम पर बलिहारी होने वाले वाइब्रेंट गुजरात के सम्मलेन में बोली गयी हास्यास्पद अंग्रेज़ी पर कुछ नहीं कहेंगे. भारत सरकार की वेबसाईट के अंग्रेजी में मूल रूप से होने वाले भाजपा सरकारों की ऐसी ही वेबसाइट्स पर चुप लगा जायेंगे.

दुर्भाग्य से यू पी के शासक इसके लिए मौक़ा भी खूब उपलब्ध करा रहे हैं.

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मीडिया और सोशल साइट्स का युद्ध अगले चरण में पहुँच गया है. आप निष्पक्ष होने का प्रयास करते कैसे किसी एक पक्ष की रणनीति का हिस्सा बन जाते हैं पता ही नहीं चलता. अन्ना आन्दोलन याद कर लीजिये जब हम जैसे लोग कह रहे थे अन्ना के संघ प्रेम पर और क्रांतिकारी लोग जनता को देख इतना मगन थे कि अपना अपमान तक बर्दाश्त कर उन्हें डिफेंड करने में लगे थे. जनरल साहब, रामदेव, किरण बेदी और अब अन्ना का स्टैंड देखकर उन्हें शर्म तो क्या आएगी?

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बाक़ी सब होशियार हैं...किसी को क्या सलाह देनी? सोशल मीडिया को इतना समझता हूँ कि यह पता है कि इस पर कमेन्ट नहीं आने वाले. फिर भी सच तो कहना होगा अपने हिस्से का.


International Dalit Solidarity Network (IDSN)

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Two teenage Dalit girls gang-raped and hanged in India. Police did not act till villagers blocked the road with the dead bodies of the girls. They had themselves had to cut the dead bodies down from the tree. This is yet another atrocious example of the failing of the justice system when Dalits are the victims and of the brutality faced by Dalit women all over india.

http://www.independent.co.uk/news/world/asia/police-officers-accused-as-lowcaste-teenage-girls-are-gangraped-and-hung-from-a-tree-in-india-9450875.html

Police officers accused as low-caste teenage girls are 'gang-raped and hung from a tree' in India

Police are searching for a group of men accused of gang-raping and...

THE INDEPENDENT

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गुंडों की सल्तनत का महापर्व: आनंद तेलतुंबड़े


Posted by Reyaz-ul-haque on 6/01/2014 05:44:00 PM




आनंद तेलतुंबड़े का यह लेख दलितों की जिंदगी के एक ऐसे सफर पर ले चलता है, जहां हिंसक उत्पीड़नों, हत्याओं और बलात्कारों को उनकी रोजमर्रा की जिंदगी बना दिया गया है. अनुवाद रेयाज उल हक.


एक तरफ जब मीडिया में लोकतंत्र के महापर्व की चकाचौंध तेज हो रही थी, वहीं दूसरी तरफ देश के 20.1 करोड़ दलितों को अपने अस्तित्व के एक और रसातल से गुजरने का अनुभव हुआ. उन्होंने शैतानों और गुंडों की सल्तनत का महापर्व देखा. बहरहाल, उनके लिए लोकतंत्र बहुत दूर की बात रही है. इस अजनबी तमाशे में वे यह सोचते रहे कि क्या उन्हें इस देश को अब भी अपना देश कहना चाहिएॽ


'हरेक घंटे दो दलितों पर हमले होते हैं, हरेक दिन तीन दलित महिलाओं के साथ बलात्कार होता है, दो दलितों की हत्या होती है, दो दलितों के घर जलाए जाते हैं,' यह बात तब से लोगों का तकिया कलाम बन गई है जब 11 साल पहले हिलेरी माएल ने पहली बार नेशनल ज्योग्राफिक में इसे लिखा था. अब इन आंकड़ों में सुधार किए जाने की जरूरत है, मिसाल के लिए दलित महिलाओं के बलात्कार की दर हिलेरी के 3 से बढ़कर 4.3 हो गई है, यानी इसमें 43 फीसदी की भारी बढ़ोतरी हुई है. ऐसे में जो बात परेशान करती है वह देश की समझदार आबादी का दोमुहांपन है. यह वो तबका है जिसने डेढ़ साल पहले नोएडा की एक लड़की के क्रूर बलात्कार पर तूफान मचा दिया था, और इसकी तारीफ की जानी चाहिए, लेकिन उसने हरियाणा के जाटलैंड में चार नाबालिग दलित लड़कियों के बलात्कार पर या फिर 'फुले-आंबेडकर' के महाराष्ट्र में एक दलित स्कूली छात्र की इज्जत के नाम पर हत्या पर चुप्पी साध रखी है. इस चुप्पी की अकेली वजह जाति है, इसके अलावा इसे किसी और तरह से नहीं समझा जा सकता. अगर देश के उस छोटे से तबके की यह हालत है, जिसे संवेदनशील कहा जा सकता है, तब दलित जनता बेवकूफी और उन्माद के उस समुद्र से क्या उम्मीद कर सकती है, जिसमें जाति और संप्रदाय का जहर घुला हुआ हैॽ

भगाना की असली निर्भयाएं

भगाना हरियाणा में हिसार से महज 13 किमी दूर एक गांव है जो राष्ट्रीय राजधानी से मुश्किल से तीन घंटे की दूरी पर है. 23 मार्च को यह गांव उन बदनाम जगहों की लंबी फेहरिश्त में शामिल हो गया, जहां दलितों पर भयानक उत्पीड़न हुए हैं. उस दिन शाम को जब चार दलित स्कूली छात्राएं – मंजू (13), रीमा (17), आशा (17) और रजनी (18) – अपने घरों के पास खेत में पेशाब करने गई थीं तो प्रभुत्वशाली जाट जाति के पांच लोगों ने उन्हें पकड़ लिया. उन्होंने उन लड़कियों को नशीली दवा खिला कर खेतों में उनके साथ बलात्कार किया और फिर उन्हें कार में उठा कर ले गए. शायद उनके साथ रात भर बलात्कार हुआ और फिर उन्हें सीमा पार पंजाब के भटिंडा रेलवे स्टेशन के बाहर झाड़ियों में छोड़ दिया गया. जब उनके परिजनों ने गांव के सरपंच राकेश कुमार पंगल से संपर्क किया, जो अपराधियों का रिश्तेदार भी है, तो वह उन्हें बता सकता था कि लड़कियां भटिंडा में हैं और उन्हें अगले दिन ले आया जा सकता था. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. भारी नशीली दवाओं के असर में और गहरी वेदना के साथ लड़कियां अगली सुबह झाड़ियों में जगीं और मदद के लिए स्टेशन तक गईं, लेकिन उन्हें दोपहर बाद 2.30 बजे तक इसके लिए इंतजार करना पड़ा जब राकेश और उसके चाचा वीरेंदर लड़कियों के परिजनों के साथ वहां पहुंचे. लौटते वक्त परिजनों को ट्रेन से भेज दिया गया और लड़कियों को कार में बिठा कर भगाना तक लाया गया. रास्ते में राकेश ने उनके साथ गाली-गलौज और बदसलूकी की, उन्हें पीटा और धमकाते हुए मुंह बंद रखने को कहा. जब वे गांव पहुंचे तो दलित लड़को ने कार को घेर लिया और लड़कियों को सरपंच के चंगुल से निकाला. अगले दिन लड़कियों को मेडिकल जांच के लिए हिसार के सदर अस्पताल ले जाया गया. वहां सुबह से दोपहर बाद डेढ़ बजे तक जांच चली, जो समझ में न आने वाली बात थी. लड़कियों ने बताया कि डॉक्टरों ने कौमार्य की जांच के लिए टू फिंगर टेस्ट जैसा अपमानजनक तरीक अपनाया जिसकी इतनी आलोचना हुई है और सरकार ने बलात्कार के मामले में इसका इस्तेमाल करने पर प्रतिबंध लगा रखा है. 200 से ज्यादा दलित कार्यकर्ताओं के दबाव और मेडिकल रिपोर्ट में बलात्कार की पुष्टि होने के बाद सदर हिसार पुलिस थाना ने (एससी/एसटी) उत्पीड़न रोकथाम अधिनियम के तहत प्राथमिकी दर्ज की. हालांकि लड़कियों द्वारा दिए गए बयान में राकेश और वीरेंदर का नाम होने के बावजूद उनको इससे बाहर रखा.


ऐसा हिला देने वाला अपराध भी पुलिस को कार्रवाई करने के लिए कदम उठाने में नाकाम रहा. खैरलांजी की तरह, जब हिसार मिनी सेक्रेटेरिएट पर 120 से ज्यादा दलित जुटे और जनता का गुस्सा भड़क उठा तथा शिकायतकर्ता लड़कियों के साथ भगाना के 90 दलित परिवार दिल्ली में जंतर मंतर पर 16 अप्रैल से धरना पर बैठे तब हरियाणा पुलिस हरकत में आई और उसने 29 अप्रैल को पांच बलात्कारियों – ललित, सुमित, संदीप, परिमल और धरमवीर – को गिरफ्तार किया. दलित परिवार इंसाफ मांगने के मकसद से दिल्ली आए हैं, लेकिन इसके साथ साथ एक और वजह है. वे गांव नहीं लौट सकते क्योंकि उन्हें डर है कि बर्बर जाट उनकी हत्या कर देंगे. इन दलित मांगों को सुनने और न्यायिक प्रक्रिया को तेज करने के बजाए हिसार जिला अदालत अपराधियों को रिहा करने के मामले को देख रही है. हालांकि ये बहादुर लड़कियां, असली निर्भयाएं, खुद अपनी आपबीती जनता के सामने रख रही हैं, लेकिन दिलचस्प रूप से मीडिया ने बलात्कार से गुजरने वाली महिलाओं की पहचान को सार्वजनिक नहीं करने के कायदे का पालन नहीं किया, जैसा कि उसने गैर दलित 'निर्भयाओं' के साथ बेहद सतर्कता के साथ किया था. राजनेताओं के बकवास बयानों से तिल का ताड़ बनाने में जुटे मीडिया ने इन परिवारों द्वारा किए जा रहे विरोध की खबर को दिखाने के लायक तक नहीं समझा – एक अभियान शुरू करने की तो बात ही छोड़ दीजिए, जैसा उसने उन ज्यादातर बलात्कार मामलों में किया है, जिनमें बलात्कार की शिकार कोई गैर दलित होती है. ऐसी भाषा में बात करने से नफरत होती है, लेकिन उनका व्यवहार इसी भाषा की मांग करता है.


दिसंबर 2012 में जारी की गई पीयूडीआर की जांच रिपोर्ट इसके काफी संकेत देती है कि भगाना बलात्कार महज अमानवीय यौन अपराध भर नहीं है बल्कि ये दलितों को सबक सिखाने के उपाय के बतौर इस्तेमाल किया गया है. वहां दलित परिवार जाटों द्वारा अपनी जमीन, पानी और श्मशान भूमि पर कब्जा कर लेने और अलग अलग तरीकों से उन्हें उत्पीड़ित करने के खिलाफ विरोध कर रहे थे.

महाराष्ट्र के चेहरे पर एक और दाग

हरियाणा की घिनौनी खाप पंचायतों वाले जाट इज्जत के नाम पर हत्या के लिए बदनाम हैं, लेकिन फुले-शाहूजी-आंबेडकर की विरासत का दावा करने वाले सुदूर महाराष्ट्र में एक गरीब दलित परिवार से आने वाले 17 साल के स्कूली लड़के को आम चुनावों की गहमागहमी के बीच 28 अप्रैल को एक मराठा लड़की से बाद करने के लिए दिन दहाड़े बर्बर तरीके से मार डाला गया. यह दहला देने वाली घटना अहमदनगर जिले के खरडा गांव में हुई. फुले का पुणे यहां से महज 200 किमी दूर है, जहां से उन्होंने ब्राह्मणवाद के खिलाफ विद्रोह की चिन्गारी सुलगाई थी. दलित अत्याचार विरोधी क्रुति समिति की एक जांच रिपोर्ट ने उस क्रूर तरीके के बारे में बताया है, जिससे गांव के सिरे पर एक टिन की झोंपड़ी में रहने वाले और एक छोटे से मिल में पत्थर तोड़ कर गुजर बसर करने वाले भूमिहीन दलित दंपती राजु और रेखा आगे से उनके बेटे को छीन लिया गया. नितिन आगे को गांव के एक संपन्न और सियासी रसूख वाले मराठा परिवार से आनेवाले सचिन गोलेकर (21) और उसके दोस्त और रिश्तेदर शेषराव येवले (42) ने पीट पीट कर मार डाला. नितिन को स्कूल में पकड़ा गया, उसके परिसर में ही उसे निर्ममता से पीटा गया, फिर उसे घसीट पर गोलेकर परिवार के ईंट भट्ठे पर ले आया गया, जहां उनकी गोद और पैंट में अंगारे रखकर उसे यातना दी गई और फिर उनकी हत्या कर दी गई. इसके बाद उसका गला घोंट दिया गया, ताकि इसे आत्महत्या के मामले की तरह दिखाया जा सके. नितिन से प्यार करने वाली गोलेकर परिवार की लड़की के बारे में खबर आई कि उसने आत्महत्या करने की कोशिश की और ऐसी आशंका जताई जा रही है उसे भी जाति की बलिवेदी पर नितिन के अंजाम तक पहुंचा दिया गया.


स्थानीय दलित कार्यकर्ताओं के दबाव में, अगले दिन नितिन की लाश की मेडिकल जांच के बाद पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर लिया जिसमें उसने आरोपितों पर हत्या करने, सबूत गायब करने, गैरकानूनी जमावड़े और दंगा करने का आरोप लगाया है. यह मामला भारतीय दंड विधान के तहत और उत्पीड़न रोकथाम अधिनियम की धारा 3(2)(5) और नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम की धारा 7 (1)(डी) के तहत भी दर्ज किया गया है. पुलिस ने सभी 12 व्यक्तियों को गिरफ्तार कर लिया है, जिसमें दोनों मुख्य अपराधी और एक नाबालिग लड़का शामिल है. लेकिन दलित अब यह जानते हैं कि दलितों के खिलाफ किए गए अपराध के लिए देश में संपन्न ऊंची जाति के किसी भी व्यक्ति को अब तक दोषी नहीं ठहराया गया है. अपनी दौलत के बूते और सबसे विवेकहीन पार्टी में – जिसका नाम राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) है – अपनी पहुंच के बूते गोलेकर परिवार को शायद जेल में बहुत दिन नहीं बिताने पड़ेंगे. आखिरकार एनसीपी के दिग्गजों के रोब-दाब वाले इस अकेले जिले में ही, हाल के बरसों में हुए खून से सने जातीय उत्पीड़न के असंख्य मामलों में क्या हुआॽ नवसा तालुका के सोनाई गांव के तीन दलित नौजवानों संदीप राजु धनवार, सचिम सोमलाल धरु और राहुल राजु कंदारे के हत्यारों का क्या हुआ, जिन्होंने 'इज्जत' के नाम पर उनकी हत्या की थीॽ धवलगांव की जानाबाई बोरगे के हत्यारों का क्या हुआ, जिन्होंने बोरगे को 2010 में जिंदा जला दिया थाॽ उन लोगों का क्या हुआ जिन्होंने 2010 सुमन काले का बलात्कार करने के बाद उनकी हत्या कर दी थी या फिर उनका जिन्होंने वालेकर को मार कर उनकी देह के टुकड़े कर दिए थे, या 2008 में बबन मिसाल के हत्यारों का क्या हुआॽ यह अंतहीन सूची हमें बताती है कि इनमें से हरेक उत्पीड़न में असली अपराधी कोई धनी और ताकतवर इंसान था, लेकिन दोषी ठहराया जाना तो दूर, मामले में उस नामजद तक नहीं बनाया गया.

जागने का वक्त

अपने अकेले बेटे को इस क्रूर तरीके से खो देने वाले राजू और रेखा आगे की भयावह मानवीय त्रासदी 'हत्याओं' की संख्या में बस एक और अंक का इजाफा करेगी और भगाना की उन लड़कियों को तोड़ कर रख देने वाला सदमा और जिंदगियों पर हमेशा के लिए बन जाने वाला घाव का निशान एनसीआरबी (नेशनल क्राइम रिसर्च ब्यूरो) की 'बलात्कारों' की गिनती में जुड़ा बस एक और अंक बन कर रह जाएगा. इन मानवीय त्रासदियों को आंकड़ों में बदलने वाली सक्रिय सहभागिता, जिनके बगैर वे भुला दी गई होती, गुम हो गई है. ऐसी सामाजिक प्रक्रियाओं द्वारा पैदा किए गए उत्पीड़न के आंकड़े अब भी 33,000 प्रति वर्ष के निशान के ऊपर बनी हुई हैं. इन आधिकारिक गिनतियों का इस्तेमाल करते हुए कोई भी यह बात आसानी से देख सकता है कि हमारे संवैधानिक शासन के छह दशकों के दौरान 80,000 दलितों की हत्या हुई है, एक लाख से ज्यादा औरतों के बलात्कार हुए हैं और 20 लाख से ज्यादा दलित किसी न किसी तरह के जातीय अपराधों के शिकार हुए हैं. युद्ध भी इन आंकड़ों से मुकाबला नहीं कर सकते हैं. एक तरफ दलितों में यह आदत डाल दी गई है कि वे अपने संतापों के पीछे ब्राह्मणों को देखें, जबकि सच्चाई ये है कि इस शासन की ठीक ठीक धर्मनिरपेक्ष साजिशों ने ही उन शैतानों और गुंडों को जन्म दिया जो दलितों को बेधड़क पीट पीट कर मार डालते हैं और उनका बलात्कार करते हैं.


इसने सामाजिक न्याय के नाम पर जातियों को बरकरार रखने की साजिश की है, इसने पुनर्वितरण के नाम पर भूमि सुधार का दिखावा किया जिसने असल में भारी आबादी वाली शूद्र जातियों से धनी किसानों के एक वर्ग को पैदा किया. वह सबको खाना मुहैया कराने के नाम पर हरित क्रांति लेकर आई, जिसने असल में व्यापक ग्रामीण बाजार को पूंजीपतियों के लिए खोल दिया. वह ऊपर से रिस कर नीचे आने के नाम पर ऐसे सुधार लेकर आई, जिन्होंने असल में सामाजिक डार्विनवादी मानसिकता थोप दी है. ये छह दशक जनता के खिलाफ ऐसी साजिशों और छल कपट से भरे पड़े हैं, जिनमें दलित केवल बलि का बकरा ही बने हैं. भारत कभी भी लोकतंत्र नहीं रहा है, जैसा इसे दिखाया जाता रहा है. यह हमेशा से धनिकों का राज रहा है, लेकिन दलितों के लिए तो यह और भी बदतर है. यह असल में उनके लिए शैतानों और गुंडों की सल्तनत रहा है.


दलित इन हकीकतों का मुकाबला करने के लिए कब जागेंगेॽ कब दलित उठ खड़े होंगे और कहेंगे कि बस बहुत हो चुका!


Enough is enough ANAND TELTUMBDE

Enough is enough

ANAND TELTUMBDE

  • Villagers near the site of crime at Katra Shahadatganj village where two sisters were gangraped and hanged from a tree, in Badaun district on Saturday.
    PTIVillagers near the site of crime at Katra Shahadatganj village where two sisters were gangraped and hanged from a tree, in Badaun district on Saturday.
  • The images of two innocent Dalit girls hanging from a tree in Katra village in Badaun district of Uttar Pradesh and a crowd of spectators looking bewildered at them best describes our national character. We can endure any amount of ignominy, can stand any level of injustice, and tolerate any kind of nonsense around us with equanimity. It is no use saying if those girls were our own daughters or our own sisters, we would still stare at them, bewildered and resigned like anyone in that crowd did. In just the past two months, while we as a country were busy playing fiddle to Narendra Modi and his promise of acche din, there have been a series of gory rapes and murders of Dalit teens across the country.

    But beyond the residual anger, there is hardly any real concern for these atrocities. The rulers are not concerned, the media is hardly interested, and then there is indifference of the progressive lot and Dalits' own frigidity towards them. It is shameful that we take the rape and murder of innocent Dalits as an adjunct of our social environment and forget about them.

    Rapes aren't Manu-ordained

    Whenever we speak about castes, we bury our neck ostrich like into sands of mythic past and blind ourselves to our own times where contemporary castes have been constructed. All the stereotypical theories that are in vogue either promote inaction or intoxication with one's caste identity – a veritable suicidal instinct. They absolve our rulers of their dirty intrigues that enlivened castes into modern times, with the alibi of social justice. The Constitution outlawed untouchability but not castes. It was not social justice but the ability of castes to splinter people that made the post-independence rulers wanted castes to survive. The reservations in an equality-aspiring country could be an exceptional policy, which it was as instituted by the colonial rulers. The scheduled castes, as identified on a solid criterion of untouchability in 1936 were such exceptional people wanting an exceptional policy. But during the constitution making, it was made open-ended, first by extending it to the tribes by creating a separate schedule with fluid criteria and then to all others that could be identified by the State as 'educationally and socially backward'. The latter was appropriately used by our rulers in 1990 in the form of Mandal reservations taking the lid off the can of caste worms.

    This and their other intrigues have created the modern monsters who unleash caste atrocities on Dalits. With the rhetoric of socialism, they systematically drove the country in capitalist direction. Right from clandestinely adopting the Bombay Plan drawn up by the big capitalists in January 1944 as our first three five year plans, giving an impression that India was truly embarking on a socialist path, to implementing the calibrated land reforms and rolling out a capitalist strategy of Green Revolution, which together created a class of rich farmers out of the most populous shudra caste-band, as a rural ally of the central bourgeoisie. The erstwhile upper caste landlords were replaced by the rich farmers assuming the baton of Brahmanism. Dalits on the other hand, were reduced to be the rural proletariat, with the collapse of the traditional jajmani ethos of interdependence, utterly dependent on the rich farmers for farm wages. It soon gave rise to wage struggles, which were responded to by culturally unsophisticated new custodians of casteism by unleashing terror, using a weird amalgam of caste and class that precipitated into gory atrocities starting from Kilvenmani in Tamilnadu in 1968 to their intensification today in the age neoliberalism. The shudras which were potential ally of Dalits (ati-shudra) in the schema of Jotiba Phule were made the oppressors of Dalits by the intrigues of the new rulers.

    Atrocities are not statistics

    "Every hour two Dalits are assaulted; every day three Dalit women are raped, two Dalits are murdered, and two Dalit homes are torched", has become a catchphrase since Hillary Mayell had coined it while writing in National Geographic full 11 years ago. Well, today these figures have to be revised upward as for instance, the rape rate of Dalit women has shot up from Hillary's 3 to well over 4.3, a whopping 43 percent rise. Even the sensex has its ups and downs but the atrocities on Dalits have only shown rising trend. Still it fails to shame us. With characteristic cool we carry on with our business, occasionally demanding stringent legislation knowing well how the Atrocity Act also has been rendered toothless by the justice delivery system. Right since this Act was promulgated; there have been open demands for its repeal by the casteist outfits. Shiv Sena in Maharashtra for instance, made it as a centerpiece of its electoral campaign in 1995 and the Maharashtra Government literally withdrew 1100 cases registered under the Act.

    The reluctance to register crime against Dalits under this Act is proverbial. Even in Khairlanji, which even a layman identified as a caste atrocity, the fast track court did not find any caste angle to apply the Atrocity Act. Despite the glaring fact that the entire village attacked the Dalit family in concert torturing, raping and murdering a woman, her daughter and two sons, and that the women's dead bodies were found naked with assault marks all over them, the trial court did not find a case of conspiracy or outraging women's modesty. Even the high court did not feel it worthwhile correcting this abominable observation. Such travesty of justice is a legion in atrocity cases. The entire justice delivery system, right from police to judges is fraught with such glaring anomalies. In the very first case of Kilvenmani, wherein 42 Dalit labourers were burnt alive, the Madras High Court had observed that the rich landlords, who owned even a car could not be committing such a crime and acquitted them. The least said about the police in India, better it is; most of them being the criminals in uniform. They come clearly against Dalits in every case of atrocity. Whether it is faulty investigation and/or incompetent prosecution, even the courts have been suspect in creating an insidious pattern of judgements. Recently, the Patna High Court stunned the world acquitting all the criminals of Ranvir Sena in case after case of Dalit massacres that came before it. The Andhra Pradesh High Court also did the same in the infamous Tsundur case, where all the convicts by the lower courts were acquitted after years of running.

    Emboldening criminals

    It is this trend set by the justice delivery system that emboldens the criminals to commit any atrocity against Dalits. They do know that they would never be punished. Firstly, they see Dalits, who are dependent for their survival on them, would not ordinarily dare to go against them. Many cases of atrocities thus have still birth, mostly in remote parts of the country. But if they do not, the real culprits escape the police net and their minions are made to undergo the judicial process. The police manage it by deliberately leaving investigation faulty; the case is presented by incompetent prosecutor and ultimately ends in indifferent to biased judgement. This process thus becomes quite reassuring to the criminals.

    Can one imagine the temerity of the rapists in Bhagana where four teenage Dalit girls of 13 to 18 years age could be brutally gang-raped entire night and thrown up into bushes in the adjacent state, still hoping that everything would be hushed up? Can one imagine their pain in braving their dishonor, sitting in the capital along with their parents demanding justice for months and no one taking note of them? Can we imagine the subtle casteism of the so called progressives in the country who raised a nationwide fury over a rape and murder of a non-Dalit girl, naming her nirbhaya, but keeping silent over the plight of these Bhagana girls? Can we imagine the suffering of a 17 year Dalit school boy, Nitish of Kharda village in Ahmednagar district of Maharashtra, the plight of his poor parents whose lone son he was, when he was beaten to death in broad day light just because he dared to speak with a girl who belonged to the dominant community? And can we imagine what might have befallen those two innocent girls who were devoured by the criminals entire night and then hanged to death? And these are not the only cases. There have been scores of such cases of atrocities in both these states that happened during the last two months but did not find much space in media. Can one imagine the perpetrators committing such heinous crimes without the support of the politicians? In all these cases the criminals are nakedly protected by the political biggies of the Congress in Haryana, the Samajwadi Party in UP and the NCP in Maharashtra.

    The lynching of black men in the US led to the black youth taking up guns and teaching the whites to behave. Do the casteist criminals want this specter to come alive in India?

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গৌরিক বাংলায় মুসলিমদের কি করণীয়,সাচার কিমিটির রিপোর্টের পর বাম হারিয়ে,নজরুল ইসলামকে তোয়াক্কা না দেবার পর এবার অন্ততঃ ভাবুন যেহেতু বাংলায় কথা বলা মুসলমানদের নাগরিকত্বে এখন অনুপ্রবেশকারির তকমা সাঁটা এবং পরিবর্তন জমানায় ভোটব্যান্ক রাজনীতির পেয়াদা মুসলিমরা সেই তিমিরেই এই মা মাটি মানুষ সরকারের রাম রাজত্বের সীতায়ণেও! বাংলায় টানা সাত দশক যাবত অখন্ড মনুস্মৃতিরাজ, পদ্মঅদৃশ্য রামরাজত্ব,যারই মুখর বিস্তার সারা ভারতবর্ষে! আমি তুচ্ছাতিতুচ্ছ উদ্বাস্তু সন্তান,বাংলার বৌদ্ধকালীন ঐতিহ্য, বাংলার কৃষক আন্দোলন,বাংলার স্বাধীনতা সংগ্রাম,বাংলার মুসলিম লীগ প্রত্যাখ্যান,বাংলার ভাষা আন্দোলন,ওপার বাংলায় বাংলা ভাষার জন্য লাখো লাখো প্রাণ,ও লাখো নারীর ইজ্জত কুরবানি,এবং হরিচাঁদ গুরুচাঁদের আন্দোলন, ফজলুল হক ও যোগেন্দার নাথ মন্ডলের কথা মনে রেখে শুধু একবার নজরুল ইসলামের মুসলিমদের কি করণীয়,এবং মুলনিবাসীদের কি করণীয় বই দুটি পড়ে দেখুন।

গৌরিক বাংলায় মুসলিমদের কি করণীয়,সাচার কিমিটির রিপোর্টের পর বাম হারিয়ে,নজরুল ইসলামকে তোয়াক্কা না দেবার পর এবার অন্ততঃ ভাবুন যেহেতু বাংলায় কথা বলা মুসলমানদের নাগরিকত্বে এখন অনুপ্রবেশকারির তকমা সাঁটা এবং পরিবর্তন জমানায় ভোটব্যান্ক রাজনীতির পেয়াদা মুসলিমরা সেই তিমিরেই এই মা মাটি মানুষ সরকারের রাম রাজত্বের সীতায়ণেও!


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পলাশ বিশ্বাস

ভাঙতে হলে জানতে হয়

প্রতিষ্ঠান বাধা দিয়েছিল। সুকুমারী ভট্টাচার্য (১৯২১-২০১৪) দমেযাননি। নিজের উদ্যমে সংস্কৃত পড়লেন। ঢুকলেন শাস্ত্র, কাব্য, পুরাণের অন্দরে। ভাঙলেন প্রাচীন ভারতের 'পবিত্র' একমাত্রিক ধারণা। বিশ্বজিত্‌ রায়।

http://www.anandabazar.com/editorial/%E0%A6%AD-%E0%A6%99%E0%A6%A4-%E0%A6%B9%E0%A6%B2-%E0%A6%9C-%E0%A6%A8%E0%A6%A4-%E0%A6%B9%E0%A7%9F-1.36646


বাংলায় টানা সাত দশক যাবত অখন্ড মনুস্মৃতিরাজ, পদ্মঅদৃশ্য রামরাজত্ব,যারই মুখর বিস্তার সারা ভারতবর্ষে!


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সারা ভারতে চল্লিশ বছরের পেশাগত সাংবাতিকতায় যতই লোকে চিনুক আমাকে দেশ বিদেশে, বিদুষী অহিন্দু শুদ্র সুকুমারী ভট্টাচার্যের বাংলা মুলিকে আমি কিন্তু কোনো ক্ষেতের মুলো নইউত্তর ভারতে থাকা কালীন কাগজে কাগজে রিক্রুটার হওয়ার সুবাদে শত শত সম্পাদক নিজ হাতে গড়লেও এই কলকাতার বর্ণ বৈষম্য চক্রব্যুহে আমি আজও বাস্তুহারা উদ্বাস্তু চাষা যশোরের নড়াল এলাকায় এককালে তেভাগা যোদ্ধা হওয়ার সুবাদে ভারত ভাগের আগে স্বভুমি থেকে উত্খাত মা ভূমির সন্ধানে রাজ্যে রাজ্যে উদ্বাস্তু আন্দোলনে ঝাঁপিয়ে পড়া,ওপার বাংলায় ভাষা আন্দোলনে জেল খাটা, দুই বাংলা এক করার স্বপ্নসন্ধানী,তেলেঙ্গানা আন্দোলনের পর পর অখন্ড উত্তর প্রদেশে ঢিমরি ব্লক কৃষক বিদ্রোহের হাত ভাঙ্গা নেতা যিনি মেরুদন্ডে ক্যান্সার নিয়ে সারা দেশে পাগলের মত স্বজনদের হাসি কান্নায় শরিক ছিলেন,এমন এক চন্ডালের অযোগ্য সন্তান


এই বাংলায় অক্ষরশঃ আমি একজন ভাড়াটিয়া। পাণিহাটিতে চল্লিশ বছর পর বাম জমানা শেষে আমায় জল কিনে খেতে হয়। চাল চুলো নেই। বাবা ক্ষমতার রাজনীতি করেননি।সারা জীবন আন্দোলন করেছেন। পৈতৃিক  স্মপত্তি বলতে কিছুই নেই।চাকরি আর দুবছর,তারপর আশ্রয়হীন বাবার মতই উদ্বাস্তু হওয়ার হাতছানি।


মাননীয় আইপিএস অফিসার ও বরেণ্য সাহিত্যিক নজরুল ইসলামের পায়ের নখের যোগ্য নই।সেই তিনি বৃন্দাবন বনবীথিকার রোমান্চকর সুশীল সমাজের ঘোর কাটিয়ে সাচারোত্তর বামঅবসৃত মামাটি জমানায় লিখে ফেলেছেন মুসলিমদের কি করণীয়,সেও বহুদিন হল,নজরুলের তুলনায় আমার লেখা বাংলা ভদ্রলোকের পাতে দেওয়ার মত নয়,মানুষটিও আমি সে হিসেবে মোটেই সুবিধার নই।ভাগ্যক্রমে আমার বাবা যদি শরত মাণিক তারাশন্কর বিভুতি চর্চিত ব্রাত্য অন্ত্যজ সমাজের চরিত্র হতে পারতেন,আমার পক্ষে নিদেন শীর্ষেন্দুর ভুতুড়ে চোর চুয়াড় আখ্যানই কপালে লেখা।


সেই অক্ষর পরিচয়ের জমানায় রোজ উদ্বাস্তু উপনিবেশে ডাকে আসা দৈনিক বসুমতীতে শ্রদ্ধেয় বিবেকানন্দ মুখোপাধ্যায়ের সম্পাদকীয় বাবার নির্দেশে অবশ্য পাঠ ,এক খানি সন্চয়িতা ও একখানি অগ্নিবীণা হাতে নিয়ে সেই যে আ মরি বাংলা ভাষার টান,সেই টানে সুযগ পয়েই আগু পিছু না ভেবে চলে এলাম বাংলায় যে এবার বাংলায় লিখতে পড়তে পারব।সে গুড়ে বালি,তাও প্রায় তেইশ বছর।বড় আন্তর্জাতিক কাগজে আমি একজন সাব এডিটার,এই পরিচয় নিয়েই বেঁচে ছিলাম এতদিন।


বাংলা অভ্র সফ্টওয়ার আবিস্কারক যুগ যুগ জিও।অভ্রকল্যাণে বাংলা লেখার বর্ণ পরিচয় শিখছি। গুরু গম্ভীর বিষয়ে নিয়মিত লেখা আমার পেশা,ভাষা ঝরঝরে বাঙালিসুলভ না লিখতে পারা প্রতিবন্ধকতা।তবু যতদিন থাকতে পারছি বাংলায়,মানে উত্খাত হওয়ার আগে পর্যন্ত না লিখে পারছি না,এই আমার অপরাধ।


বাংলা ফজলুল হকের মত মনের মানুষকে ভুলে গেছে। ওসপার বাংলা কি ওসপার বাংলা ,ফজলুল সাহেবকে নিয়ে কোনো লেখা চোখে পড়ে না।বাংলা যোগেন্দ্রনাথ মন্ডলকে বিশ্বাসঘাতক তকমা দিয়েছে। বাংলায় নীল বিদ্রোহের সময় থেকে যাবতীয় কৃষক আন্দোলন,ভূমি সংস্কারের দাবি,অস্পৃশ্যতামোচন, শিক্ষা আন্দোলন,নারীর ক্ষমতায়ণ ইত্যাদিতে যে পহিচাঁদ গুরুচাঁদের আন্দোলন তাঁকে বাঙালি আম্বেডকর আন্দোলনের মতই ক্ষমতাদখলের এটিএম করে ফেলেছে।


অথচ  অখন্ড ভারতবর্ষের প্রধানমন্ত্রিত্বের সবচেয়ে যোগ্য প্রাথী ছিলেন ফজলুল হক,নেহরু ত ননই,জিন্নাও নন এবং নেতাজিও নন।বাংলার মাটিতে মুসলিম লীগ গঠন হওয়ার পরও বাংলার মুসলিম জনগণ সেদিন কৃষক প্রজা পার্টির ব্যানারে ভূমি সংস্কারের দাবি তুলেছিল,কিন্তু ফজলুল সাহেব শ্যামা হক মন্তরিসভা গড়ে সেই যে হিন্দু মহাসভাকে তোল্লাই দিলেন,বাংলায় ব্রাত্য মুসলিম লীগির দ্বিজাতি তত্ব ভারতবর্ষের ভবিষত্ হয়ে গেল যার মূল্যপবাঙালিকে দিতে হল সবচেয়ে বেশি। 47 এর রক্তপাতেই শেষ হল না বিধিলিপি,একাত্তরও ভুগতে হল।তারপর সেই শ্যামাপ্রসাদের উত্তরসুরিরা ভারত বর্ষে হিন্দু রাষ্ট্রের এজন্ডায় সবার উপরে রাখলেন বাঙালি জাতিকে ধ্বংস করার কার্যক্রম।প্রণয়ণ হল নাগরিকত্ব সংশোধনী আইন।18 মে ,1948 এর পর ভারতে আসা বাঙালিরা যারা নাগরিকত্ব অর্জন করেননি তাঁরা সবাই সর্বদলীয় সম্মতিতে বেনাগরিক হয়ে গেলেন।শুধু বাঙালিরা।যোহেতু বারত ভাগের পর পান্জাব ও সিন্ধ থেকে আসা উদ্বাস্তুরা রিফুজে রেজিস্ট্রেশনের পর পর একযোগে শ্ক্ষতিপুরণ ও নাগরিকত্ব পেয়ে গিয়েছিলেন।বাংলার নেতারা দলিত উদ্বাস্তুদের সে সুযোগ না দিয়ে পত্রপাঠ তাঁদের সারা ভারতে ছড়িয়ে দিয়ে অখন্ড বাংলায় সংখ্যাগুরু মুসলিমদের সংখ্যালঘু সাজিয়ে পর পর টানা সাত দশক মুসলিমদের জন্য কিছু না করেই বর্ণ আধিপাত্যে বর্ণবৈষম্যে বাংলার জীবন যাপনে সুধু রাজনৈতিক ক্ষমতাদখলেই নয়,সর্বক্ষেত্রে মনুস্মৃতি রাজ জারী রাখলেন।


বাকী ভারতবর্ষ রামরাজত্বের চাষ আজ দেখছে,পকুরের পদ্ম চোখে না পড়লেও বাংলায় টানা সাত দশক পদ্মসুগন্ধী রামরাজত্বই চলছে।যেখানে রোজানা সম্বুক হত্যা আয়োজন।প্রত্যহ সীতায়ণ। রোজই একলব্যের গুরুদক্ষিণা।


এই রামরাজত্বের পায়দল সেনা হলেন বাংলার তাবত মুসলমান এবং দলিতেরা ও অবশ্যই আদিবাসিরা এবং ওবিসি। বাংলার এই পদ্মঅদৃশ্য বৈজ্ঞানিক সোশাল ইন্জিনিযারিং থেকে অনুপ্রেরণা নিয়েই সঙ্ঘ পরিবারের ওবিসি প্রধানমন্ত্রিত্বের চালে বহিস্কৃত জনগণের পন্চাশভাগকে সরাসরি গৌরিক করে দেওয়ার ফলেই ভারতবর্ষে আজ রামরাজত্ব।যেখানে দলিত উদ্বাস্তুরা এবং বাংলায় কথা বলা মুসলমান অনুপ্রবেশকারি ছাড়া আর কিছু নয়ে।


আজকের এই সময়ের রিপোর্টখানি তুলে দিলাম।

আমি তুচ্ছাতিতুচ্ছ উদ্বাস্তু সন্তান,বাংলার বৌদ্ধকালীন ঐতিহ্য, বাংলার কৃষক আন্দোলন,বাংলার স্বাধীনতা সংগ্রাম,বাংলার মুসলিম লীগ প্রত্যাখ্যান,বাংলার ভাষা আন্দোলন,ওপার বাংলায় বাংলা ভাষার জন্য লাখো লাখো প্রাণ,ও লাখো নারীর ইজ্জত কুরবানি,এবং হরিচাঁদ গুরুচাঁদের আন্দোলন, ফজলুল হক ও যোগেন্দার নাথ মন্ডলের কথা মনে রেখে শুধু একবার নজরুল ইসলামের মুসলিমদের কি করণীয়,এবং মুলনিবাসীদের কি করণীযবই দুটি পড়ে দেখুন।




এই সময়: এ রাজ্যে মুসলিমদের আর্থ-সামাজিক অবস্থার শোচনীয় ছবি উঠে এসেছিল সাচার কমিটির রিপোর্টে৷ সাত বছর আগের ওই রিপোর্ট নিয়ে রাজনৈতিক তরজা কিছু কম হয়নি৷ ২০০৮-এর পঞ্চায়েত ভোট থেকে এ পর্যন্ত বামফ্রন্টের সংখ্যালঘু ভোটব্যাঙ্কে যে ধারাবাহিক ধস নেমেছে, সাচার কমিটির রিপোর্টকেই তার অন্যতম কারণ বলে মনে করে রাজনৈতিক মহলের একটা বড় অংশ৷ তবে রাজ্যে পালা বদলের পরও মুসলিমদের অবস্থার যে বিশেষ কোনও পরিবর্তন হয়নি, দু'টি বেসরকারি সংস্থার করা সমীক্ষায় তা স্পষ্ট৷ সমীক্ষার রিপোর্টে প্রকাশ, শিক্ষা ও আর্থ-সামাজিক দিক থেকে এখনও অনেকটাই পিছিয়ে এই রাজ্যের মুসলিমরা৷


মুখ্যমন্ত্রী মমতা বন্দ্যোপাধ্যায় দাবি করেছেন, মুসলিমদের উন্নয়নে ৯০ শতাংশ কাজই করে ফেলেছে তাঁর সরকার৷ তবে সমীক্ষায় উঠে আসা একটি তথ্যই বলে দিচ্ছে, মুখ্যমন্ত্রীর সেই দাবি আদৌ ঠিক নয়৷ সমীক্ষায় দাবি, গ্রামে বসবাসকারী ৭৯ হাজার ৯১৩ মুসলিম পরিবারের মধ্যে ডাক্তার বা ইঞ্জিনিয়ারের মতো পেশায় রয়েছেন মাত্র একজন৷ শনিবার ওই সমীক্ষার প্রাথমিক রিপোর্ট প্রকাশ করেন কবি শঙ্খ ঘোষ ও সাহিত্যিক নবনীতা দেবসেন৷


অ্যাসোসিয়েশন স্ন্যাপ এবং গাইডেন্স গিল্ড নামে ওই দু'টি সংস্থা প্রায় আড়াই বছর ধরে রাজ্যের ১৯টি জেলার ৩২৫টি গ্রাম এবং ৭৫টি শহরে সমীক্ষাটি চালিয়েছে৷ ৯৭ হাজারেরও বেশি বাড়িতে গিয়ে বিভিন্ন বয়সের সাড়ে চার লক্ষের বেশি মুসলিম পুরুষ-মহিলার সঙ্গে কথা বলেছেন সংস্থার প্রতিনিধিরা৷ শুধু সংখ্যাতত্ত্বের উপর নির্ভর না করে সরাসরি বাড়ি বাড়ি গিয়ে চালানো হয়েছে সমীক্ষাটি৷ তাই এই রিপোর্ট অনেক বেশি নির্ভরযোগ্য বলেও দাবি করেছেন দুই সংস্থার প্রতিনিধিরা৷


কী রয়েছে এই প্রাথমিক রিপোর্টে?


সমীক্ষায় বলা হয়েছে, গ্রামের মুসলিমদের ৯১ শতাংশই বাংলাভাষী৷ তাঁদের মধ্যে ৭৫ শতাংশই খেটে খাওয়া মানুষ৷ শিক্ষা থেকে বঞ্চিত তাঁদের বড় অংশ৷ সমীক্ষায় প্রকাশ, গ্রামীণ এলাকার ১৯ শতাংশের বেশি মুসলিম নিরক্ষর৷ শহরাঞ্চলে এই হার সাড়ে সাত শতাংশের বেশি৷ আর গ্রামে বসবাসকারী সাড়ে ১২ শতাংশের বেশি মুসলিম সম্প্রদায়ের মানুষের পড়াশোনা শেষ হয়ে যায় প্রাথমিক স্তরেরও আগে৷ শহর এলাকায় এই হার প্রায় সাড়ে আট শতাংশ৷ ১৯টি জেলার মধ্যে সাক্ষরতার হারে সবচেয়ে পিছিয়ে পড়া জেলাগুলির শীর্ষে রয়েছে উত্তর দিনাজপুর৷ এর পর রয়েছে নদিয়া, পুরুলিয়া এবং কোচবিহার৷ খাস কলকাতাতেও চার শতাংশের বেশি মুসলিম সম্প্রদায়ের মানুষ সাক্ষরতার আলো দেখেননি৷


যে ৩২৫টি গ্রামে এই সমীক্ষা চলেছে, সেগুলি শুধুই মুসলিম অধ্যুষিত গ্রাম, এমনটা নয়৷ এর মধ্যে যেমন উচ্চবর্ণের হিন্দু প্রধান গ্রাম রয়েছে, তেমনই রয়েছে তফসিলি, সংখ্যালঘু এবং মিশ্র বর্ণের মানুষ বাস করেন, এমন গ্রামও৷ তাতে দেখা যাচ্ছে, মুসলিম অধ্যুষিত ২৭ শতাংশ গ্রামেই রাস্তায় সারা বছর জল জমে থাকে৷ পাকা রাস্তা আছে তিন শতাংশেরও কম গ্রামে৷ আট শতাংশের বেশি গ্রামে এখনও বিদ্যুত্‍ পেঁৗছয়নি৷


পাশাপাশি পেশাগত দিক থেকেও যে মুসলিমরা রাজ্যে এখনও অবহেলিত, তা-ও পরিষ্কার ওই রিপোর্টে৷ সমীক্ষায় গ্রামীণ এলাকায় ডাক্তার বা ইঞ্জিনিয়ারের মতো পেশাদার মিলেছে মাত্র একজন৷ আর শহরাঞ্চলে এই হার মাত্র দু'শতাংশ৷ মুসলিম জনসংখ্যার বেশিরভাগই এখনও খেতমজুরি বা দিনমজুরির কাজ করে সংসার চালান৷


কী বলছে সমীক্ষা


মুসলিমদের মধ্যে নিরক্ষরতার হার সব মিলিয়ে ১৭.৫৯ শতাংশ, ১২ শতাংশের শিক্ষা শেষ প্রাথমিক স্তরের আগেই স্নাতক স্তর পর্যন্ত পড়েছেন ৪.৮৫ শতাংশ, স্নাতকোত্তর মাত্র ১.৮৬ শতাংশ মুসলিম সাক্ষরতার হারে সবচেয়ে পিছিয়ে উত্তর দিনাজপুর জেলা মুসলিম অধ্যুষিত গ্রামগুলির ২৭.১৩ শতাংশে রাস্তায় জল জমে থাকে, পাকা রাস্তা মাত্র ২.৮৮ শতাংশ গ্রামে ৭৫ শতাংশ মুসলিমই শ্রমজীবী ডাক্তার, ইঞ্জিনিয়ারের মতো পেশাদার মাত্র ২.০২ শতাংশ, প্রাথমিক-মাধ্যমিক স্কুল বা কলেজ শিক্ষক এক শতাংশেরও কম

মুখ্যমন্ত্রীর বিরুদ্ধে ফৌজদারি ধারায় মামলা দায়ের নজরুল ...

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২৩ আগস্ট, ২০১৩ - এবার সরাসরি মুখ্যমন্ত্রীর বিরুদ্ধে ফৌজদারি ধারায় অভিযোগ দায়ের করলেন আইপিএস অফিসার নজরুল ইসলাম।

বই প্রকাশে আইপিএস নজরুল ইসলাম | কলকাতা ২৪x৭, বাংলায় সর্বাধিক ...

kolkata24x7.com/কলকাতা/বই-প্রকাশে-আইপিএস-নজরুল-ই.html

৩ মার্চ, ২০১৪ - কলকাতা: প্রাক্তন আইপিএস নজরুল ইসলামের বিতর্কিত তিনটি বইপ্রকাশ হল সোমবার। এদিন কলকাতা প্রেস ক্লাবে বইগুলির আনুষ্ঠানিকভাবে প্রকাশিত হয়। এইদন সাংবাদিকদের মুখোমুখি হয়ে বইগুলি প্রকাশের ক্ষেত্রে মুখ্যমন্ত্রী মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়ের বিষোদগারের কথা উল্লেখ করেন। এই বইগুলির প্রকাশের ক্ষেত্রে সরকারের তরফে বিভাগীয় ...

সুপ্রিম কোর্টে গৃহীত নজরুল ইসলামের মামলা | কলকাতা ২৪x৭

kolkata24x7.com/কলকাতা/সুপ্রিম-কোর্টে-গৃহীত-নজর.html

৪ এপ্রিল, ২০১৪ - কলকাতা: হাই কোর্টে সুবিচার না পেয়ে সুপ্রিম কোর্টের দ্বারস্থ হলেন আইপিএস নজরুল ইসলাম। শুক্রবার এই মামলা গৃহীত হয়েছে সুপ্রিম কোর্টে। নজরুল ইসলাম পাঁচ আইপিএসের পদোন্নতি সংক্রান্ত যে মামলা করেছিলেন সেই মামলায় ঠিকমত বিচার না হওয়াতেই সুপ্রিম কোর্টে যাওয়ার সিদ্ধান্ত নেন তিনি। সুপ্রিম কোর্টের তরফে রাজ্যের ...

পাঁচ আইপিএস-এর পদোন্নতি বাতিলের নির্দেশ - প্রথম পাতা

my.anandabazar.comআমার কলকাতা

রাজ্যের পাঁচ আইপিএস অফিসারের ডিজি পদে পদোন্নতি বাতিলের নির্দেশ দিল সেন্ট্রাল অ্যাডমিনিস্ট্রেটিভ ট্রাইবুনাল বা ক্যাট। এঁদের মধ্যে রয়েছেন রাজ্য পুলিশের ... এরপরই ৫ আইপিএসের পদোন্নতি প্রক্রিয়াকে চ্যালেঞ্জ করে সেন্ট্রাল অ্যাডমিনিস্ট্রেটিভ ট্রাইবুনালের দ্বারস্থ হনআইপিএস অফিসার নজরুল ইসলাম। বর্তমানে তিনি এডিজি প্রভিশন পদে ...

EKolkata24 - #bigbreakingnews: আইপিএস নজরুল ইসলামের দায়ের ...

https://eu-es.facebook.com/kolkata24x7/posts/654572834604112

bigbreakingnews: আইপিএস নজরুল ইসলামের দায়ের করা মামলার প্রেক্ষিতে রাজ্যের পাঁচ ডিজির নিয়োগ বাতিলের নির্দেশ দিল সেন্ট্রাল অ্যাডমিনিস্ট্রেটিভ ট্রাইব্যুনাল...

নজরুল ইসলাম - Oneindia Bengali

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৪ ফেব্রুয়ারী, ২০১৪ - নজরুল ইসলাম News - Get List of Updates on নজরুল ইসলাম news, নজরুল ইসলামbreaking news and নজরুল ইসলাম current news on bengali.oneindia.in. ... ৪ ফেব্রুয়ারি : আইপিএস নজরুল ইসলামের দায়ের করা মামলার প্রেক্ষিতে রাজ্যের পাঁচ ডিজির নিয়োগ বাতিলের নির্দেশ দিল সেন্ট্রাল অ্যাডমিনিস্ট্রেটিভ ট্রাইব্যুনাল (ক্যাট)।

পাঁচ আইপিএস-এর পদোন্নতি বাতিলের নির্দেশ - Yahoo ...

https://bengali.yahoo.com/প-চ-আইপ-এস-এ-পদ-ন-নত-134714720.html

৩ ফেব্রুয়ারী, ২০১৪ - Yahoo Anandabazar Bengali News তে 'পাঁচ আইপিএস-এর পদোন্নতি বাতিলের নির্দেশ'পড়ুন৷ রাজ্যের পাঁচ আইপিএস অফিসারের ডিজি পদে পদোন্নতি বাতিলের নির্দেশ দিল সেন্ট্রাল ... এরপরই ৫ আইপিএসের পদোন্নতি প্রক্রিয়াকে চ্যালেঞ্জ করে সেন্ট্রাল অ্যাডমিনিস্ট্রেটিভ ট্রাইবুনালের দ্বারস্থ হন আইপিএস অফিসার নজরুল ইসলাম।

সুপ্রিম কোর্টে গৃহীত হল নজরুলের মামলা - SakalerVarta.com ...

www.sakalervarta.com/sn/2014/04/04/6095.html

৪ এপ্রিল, ২০১৪ - কলকাতা: হাইকোর্টে সুবিচার না পেয়ে সুপ্রিম কোর্টের দ্বারস্থ হয়েছিলেন আইপিএস অফিসার নজরুল ইসলাম। শুক্রবার সুপ্রিম কোর্ট নজরুল ইসলামের দায়ের করা এই মামলাটি গ্রহণ করেছে। নজরুল ইসলাম রাজ্যের পাঁচ আইপিএস অফিসারের পদন্নোতি সংক্রান্ত যে মামলাটি করেছিলেন, সেই মামলায় ঠিকমতো বিচার না হওয়াতে সুপ্রিম কোর্টে ...

cryfreedom: আইপিএস অফিসার নজরুল ইসলাম সাহিত্যিক।বাংলায় ...

kolkatacries.blogspot.com/2013/03/blog-post_5109.html

১২ মার্চ, ২০১৩ - মুখ্যমন্ত্রীকে বিস্ফোরক চিঠি দিলেন আইপিএস অফিসার নজরুল ইসলাম। তেসরা ফেব্রুয়ারি তাঁর জন্মদিনে মুখ্যমন্ত্রীর পাঠানো শুভেচ্ছাবার্তা অগ্রাহ্য করে তীব্র ক্ষোভ জানিয়ে চিঠি লিখেছেন তিনি। তাঁকে অপদস্থ করার জন্য সরাসরি অভিযোগ এনেছেন মুখ্যমন্ত্রীর সচিবালয়ের কার্যত প্রধান গৌতম সান্যালের বিরুদ্ধে।

সাচ টাইমস - মুখ্যমন্ত্রীকে বিস্ফোরক চিঠি নজরুল ইসলামের।

ben.sachtimes.com/0bn2641idcontent.htm&print=1

১২ মার্চ, ২০১৩ - 12.03.2013, সাচ টাইমস, কলকাতা : মুখ্যমন্ত্রীকে বিস্ফোরক চিঠি দিলেন আইপিএস অফিসার নজরুল ইসলাম।


কেন্দ্রীয় হস্তক্ষেপের হুমকি

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তাপস প্রামাণিক



সন্দেশখলি: রাজ্যের শাসকদলের 'সন্ত্রাস' বন্ধ করার জন্য ২৪ ঘণ্টার চরমসীমা দিল কেন্দ্রের শাসকদল৷ না হলে কেন্দ্রীয় স্বরাষ্ট্র মন্ত্রকের দ্বারস্থ হবে বিজেপি৷ এমনকি, প্রয়োজনে প্রধানমন্ত্রীরও হস্তক্ষেপ চাওয়া হতে পারে বলে জানিয়ে দিলেন দিল্লি থেকে আসা বিজেপি সংসদীয় দলের প্রতিনিধিরা৷


শনিবার সন্দেশখালিতে তৃণমূল কংগ্রেসের হাতে আক্রান্ত বিজেপি সমর্থকদের দেখতে এসে রীতিমতো হুমকির সুরে প্রতিনিধি দলের নেতা মুখতার আব্বাস নকভি বললেন, 'আমাদের সিপিএম ভাববেন না, আমরা বিজেপি! এভাবে আক্রমণ চলতে থাকলে বেশিদিন আমরা শান্ত থাকব না৷ সরকারকে সাবধান করছি!' মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়ের সরকারকে 'গণহত্যার সরকার' অভিহিত করে তাঁর মন্তব্য, 'আইনশৃঙ্খলা রক্ষার দায়িত্ব রাজ্যের৷ রাজ্য যদি তার দায়িত্ব পালন না করতে পারে, তা হলে কেন্দ্রকে হস্তক্ষেপ করতে হবে৷' মুখ্যসচিব সঞ্জয় মিত্রের সঙ্গে দেখা করে তাঁরা জানিয়ে দেন, সরকার শাসক দলের এই হিংসা বন্ধে ২৪ ঘণ্টার মধ্যে উপযুক্ত ব্যবস্থা না নিলে বিজেপি কেন্দ্রীয় স্বরাষ্ট্র মন্ত্রকের দ্বারস্থ হবে৷ পরে সাংবাদিক সম্মেলনে দলের তরফে নাকভি এবং মীনাক্ষী লেখি জানান, তাঁরা সন্দেশখালিতে হিংসার যে নমুনা দেখলেন, তার বিস্তারিত বিবরণ দলের জাতীয় সভাপতি তথা কেন্দ্রীয় স্বরাষ্ট্রমন্ত্রী রাজনাথ সিংকে রিপোর্ট দিয়ে জানাবেন৷


নকভি ছাড়াও দলে ছিলেন মীনাক্ষী লেখি, রাজ্যের দুই নবনির্বাচিত সাংসদ বাবুল সুপ্রিয় এবং এস এস আলুওয়ালিয়া, বিজেপির রাজ্য সভাপতি রাহুল সিনহা এবং রাজ্য নেতা শমীক ভট্টাচার্য৷ সন্দেশখালিতে নির্যাতিত সমর্থকদের সঙ্গে কথা বলার পরে বিজেপি নেতারা কলকাতায় ফিরে এসএসকেএম হাসপাতালে গুলিবিদ্ধ সমর্থকদের দেখতে যান৷ পরে তাঁরা নবান্নে মুখ্যসচিবের সঙ্গে রাজ্যের আইনশৃঙ্খলা পরিস্থিতি নিয়ে কথা বলেন৷ বিজেপি নেতাদের অভিযোগ, রাজ্যের আইনশৃঙ্খলা পরিস্থিতি বাম আমলের থেকেও খারাপ৷ তৃণমূলের আমলেও পুলিশ-প্রশাসন শাসক দলের দাসে পরিণত হয়েছে৷


নকভি বলেন, 'আমরা মুখ্যসচিবকে বলেছি ২৪ ঘণ্টার মধ্যে অভিযুক্তদের গ্রেপ্তার করে মামলা করতে হবে৷ না হলে আমরা পরবর্তী পদক্ষেপ করব৷ যা দেখলাম তা রিপোর্ট আকারে বিজেপির সর্বভারতীয় সভাপতি তথা কেন্দ্রীয় স্বরাষ্ট্রমন্ত্রীকে দেব৷ এখানে যা হয়েছে, তা হিংসা নয়, সন্ত্রাস৷ রাজ্য সরকারের মদতে পশ্চিমবঙ্গে বিশৃঙ্খলা, হিংসা চলছে৷ এটা হিংসার সরকার৷' বামফ্রন্ট সরকারের সঙ্গে তুলনা করে তাঁর অভিযোগ, আগের সরকারের থেকেও বেশি হিংসার শাসন কায়েম করেছে তৃণমূল৷ লেখি বলেন, 'রাজ্য যদি কোনও ব্যবস্থা না নেয়, আমরা প্রয়োজনে প্রধানমন্ত্রীর হস্তক্ষেপ চাইব৷'


সন্দেশখালিতে আক্রান্তরা সকলেই তফসিলি জাতি এবং উপজাতিভুক্ত৷ বিজেপি নেতারা এদিন গ্রামবাসীদের কাছে জানতে চান, ঘটনার পর রাজ্য তফসিলি কমিশনের কোনও প্রতিনিধি এসেছিলেন কি না৷ তাঁরা জানান, কেউ আসেননি৷ এতে বিস্মিত নেতারা জানিয়ে দেন, দরকার হলে জাতীয় তফসিলি কমিশন এই ঘটনার তদন্ত করবে৷


বাম আমলে এনডিএ সরকারের জোটসঙ্গী থাকাকালীন তৃণমূল নেত্রী মমতা বন্দ্যোপাধ্যায় ঠিক যে ভাবে হিংসার ইস্যুতে সিপিএমকে ৩৫৬ ধারা প্রয়োগের জুজু দেখাতেন এবং কেন্দ্রীয় হস্তক্ষেপ চাইতেন, কেন্দ্রে ক্ষমতায় আসার পরে বিজেপিও তার প্রাক্তন জোটসঙ্গী তৃণমূলের বিরুদ্ধে সেই পথই নিয়েছে৷ স্পষ্টতই বোঝা যাচ্ছে, আগামী বছর কলকাতা-সহ অনেকগুলি পুরসভার এবং পরের বছর রাজ্য বিধানসভার নির্বাচনই বিজেপির পাখির চোখ৷ তাই দিল্লির ক্ষমতায় বসেই বিজেপি রাজ্যের তৃণমূল সরকারকে চাপের মুখে রাখতে চাইছে৷


গত মঙ্গলবার সন্দেশখালির বেড়মজুর ২ নম্বর গ্রাম পঞ্চায়েত এলাকায় হালদারঘেরিতে তৃণমূলের দুষ্কৃতীদের হাতে বিজেপি সমর্থকরা আক্রান্ত হন বলে অভিযোগ৷ 'তৃণমূল-আশ্রিত' দুষ্কৃতীদের গুলিতে প্রায় ২১ জন দলীয় সমর্থক জখম হন৷ অভিযোগ, পুলিশের সামনেই এই হামলা চলে৷ আহতদের মধ্যে ১৩ জন এখনও এসএসকেএম হাসপাতালে চিকিত্‍সাধীন৷ শনিবার সন্দেশখালির সেই ঘটনাস্থলে দাঁড়িয়ে বিজেপির কেন্দ্রীয় নেতারা রাজ্যের আইনশৃঙ্খলা পরিস্থিতি নিয়ে কার্যত তুলোধোনা করলেন মা-মাটি-মানুষের সরকার এবং মুখ্যমন্ত্রী মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়কে৷ গ্রামবাসীদের আশ্বস্ত করে নকভি বলেন, 'আপনাদের সঙ্গে যে অন্যায় হয়েছে তার হিসাব দিতে হবে রাজ্য সরকারকে৷ তৃণমূল পুরো গুন্ডারাজ চালাচ্ছে৷ এই সরকারের ক্ষমতায় থাকার কোনও নৈতিক অধিকার নেই৷'


এদিন সকাল সোয়া ১১টায় কলকাতা বিমানবন্দরে নেমেই বিজেপি নেতারা সোজা সন্দেশখালি চলে যান৷ গাড়ি থেকে নেমে বৃষ্টির জল কাদায় থইথই কাঁচা রাস্তা ধরে তাঁরা দুপুর পৌনে দু'টো নাগাদ পূর্ব রামপুর আদিবাসী ফ্রি প্রাইমারি স্কুলে পেঁৗছন৷ অনেক আগে থেকেই সেখানে ভিড় করেছিলেন স্থানীয় বাসিন্দারা৷ স্কুলে গিয়ে প্রথমে কেন্দ্রীয় নেতারা স্থানীয় নেতাদের সঙ্গে আলোচনা করেন৷ তার পর স্কুলের বারান্দায় দাঁড়িয়ে তাঁরা মাইক হাতে নিয়ে গ্রামবাসীদের মুখোমুখি হন৷


প্রতিনিধিদের সামনেই ক্ষোভ উগরে দেন ঝুমা সর্দার৷ তাঁর অভিযোগ, '২৬ তারিখ প্রধানমন্ত্রী পদে নরেন্দ্র মোদীর শপথ উপলক্ষে এলাকায় লাড্ডু বিতরণ করা হয়৷ সেদিনই বিকালে এক গ্রামবাসীকে বেধড়ক মারধর করে তৃণমূল-আশ্রিত দুষ্কৃতীরা৷ তার প্রতিবাদে মঙ্গলবার রাস্তা অবরোধ করে বিক্ষোভ চলছিল৷ সেই সময়ে আচমকা দুটো গাড়ি করে দুষ্কৃতীরা বাইরে থেকে এসে আমাদের উপর গুলি চালায়৷' আর এক গ্রামবাসী কবিতা সর্দার বলেন, 'আমরা বিজেপি-কে ভোট দিয়েছি বলে তৃণমূলের গুন্ডারা গ্রামে ঢুকে হামলা করছে৷ বাড়ি-ঘর ভাঙচুর করছে৷ এমনকি মহিলা ও শিশুরাও রেহাই পাচ্ছে না৷ ওরা শাসিয়ে গিয়েছে, নেতারা চলে গেলেই আবার হামলা হবে৷ আমরা বাচ্চাকাচ্চা নিয়ে কোথায় যাব?'


লেখি বলেন, 'মমতাজি নিজেকে মা-মাটি-মানুষের নেত্রী বলে দাবি করেন৷ অথচ, তফসিলিদের প্রতি ওনার কোনও সহানুভূতি নেই৷' সাংসদ বাবুল সুপ্রিয় প্রশ্ন তোলেন, 'মা-মাটি-মানুষের সরকারের মুখ্যমন্ত্রী কি এখানে এসেছিলেন?' জনতার জবাব আসে, 'না'৷ বাবুল বলেন, 'গ্রামবাসীদের রক্ষা করার দায়িত্ব পুলিশের৷ পুলিশ কেন তদন্ত করতে আসেনি? তৃণমূল ভয়ের বাতাবরণ তৈরির চেষ্টা করছে৷ আপনারা রুখে দাঁড়ান৷ বদল শুরু হয়ে গিয়েছে৷ পুলিশ যদি রক্ষা না করে মানুষ নিজেদের রক্ষা কী ভাবে করতে হয়, তা জানে৷'


ঘটনার জন্য বিজেপি-র পক্ষ থেকে সরাসরি অভিযোগ আনা হয়েছে শাজাহান শেখ নামে এক স্থানীয় তৃণমূল নেতার বিরুদ্ধে৷ ঘটনার পিছনে ওই নেতার সক্রিয় মদত রয়েছে বলে গ্রামবাসীরা অভিযোগ জানিয়েছেন৷ ওই নেতার নাম করে লেখি বলেন, 'শাজাহানের বিরুদ্ধে অবিলম্বে ব্যবস্থা নিতে হবে৷' লেখি এবং আলুওয়ালিয়া বুলেটের খোল তুলে দেখিয়ে বলেন, 'এই সব জিনিস তদন্তের স্বার্থে পুলিশের আটক করা উচিত ছিল৷ কিন্ত্ত পুলিশ তার দায়িত্ব পালন করেনি৷ এটা বরদাস্ত করা হবে না৷'


জুলুমের হিসেব দিতে হবে, হুঁশিয়ারি রাজ্যকে

সকাল থেকেই টানা বৃষ্টি চলছিল। রাস্তায় থকথকে কাদা। তবু শনিবারের বারবেলায় সেই জলকাদা ভেঙে বিজেপি নেতারা যখন গ্রামে ঢুকলেন, তাঁদের ঘিরে উপচে পড়ল ভিড়। দলের কয়েকশো কর্মী-সমর্থক তো ছিলেনই, সিপিএমেরও প্রচুর লোকজন তাঁদের সঙ্গে জুটে যান। এঁদের একটা বড় অংশ যে ইতিমধ্যে বিজেপির দিকে ঝুঁকে গিয়েছেন, তা-ও কার্যত স্পষ্ট।

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জ্যাকেট-বোমা জঙ্গিদের হাতে, নিশানায় মোদীও

বাচ্চা মেয়েটির গায়ে একটি হাতকাটা জ্যাকেট। সেই জ্যাকেটে আটকানো আইইডি। নায়কোচিত শৌর্যেই শিশুটিকে বাঁচালেন শাহরুখ খান। আব্বাস-মাস্তানের 'বাদশা' ছবিতে। শেষ পর্যন্ত ওই 'বম্ব ভেস্ট' বিস্ফোরণে মারা গেল দুষ্কৃতীরাই। সেলুলয়েডের পর্দাকে হার মানিয়ে 'বম্ব ভেস্ট'-এর বদলে বাস্তবে হাজির 'জ্যাকেট-বোমা'। মানববোমারই রকমফের। দেখলে মনে হবে, নেহাতই সাদামাঠা ফুলহাতা জ্যাকেট। সাদা চোখে তো নয়ই, হরেক রকম সন্ধানী যন্ত্র দিয়ে সামনে-পিছনে-ভিতরে পরীক্ষা চালিয়েও অনেক সময়ে চট করে ধরা যায় না সেই পরিধানের কালান্তক রূপ।

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আপনারা গেলে কে বাঁচাবে, প্রশ্ন বিমানকে

আপনাদের ডাকিনি। কেন এসেছেন? আপনারা চলে যাবেন। ওরা আসবে। কে বাঁচাবে আমাদের? মহিলার একের পর এক ঝাঁঝালো প্রশ্ন ভেসে আসছিল বাইরের চাতাল থেকে। দলীয় কর্মীর ভাঙচুর হওয়া ঘরে দাঁড়িয়ে তাঁর স্ত্রীর ওই প্রশ্ন শুনে থ বিমান বসু-সহ বামফ্রন্টের রাজ্য নেতৃত্ব। ভাবতেই পারেননি শনিবার আরামবাগে তৃণমূলের 'হামলা'য় দলীয় কর্মীদের ক্ষতিগ্রস্ত বাড়িঘর দেখতে গিয়ে এমন পরিস্থিতির মুখে পড়তে হবে তাঁদের!

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মোদী এখনই সঙ্ঘের মাথাব্যথা

দিগন্ত বন্দ্যোপাধ্যায়

নয়াদিল্লি, ১ জুন, ২০১৪, ০২:২৩:৫৪

তাদের পরামর্শ শিরোধার্য করে গোয়েন্দা শিরোমণি অজিত ডোভালকে জাতীয় নিরাপত্তা উপদেষ্টা করেছেন নরেন্দ্র মোদী। সাভারকরের জীবনী স্কুলপাঠ্য করার পক্ষে সওয়াল করেছে তাঁর দফতর। কিন্তু তাও নতুন প্রধানমন্ত্রীর কার্যকলাপ নিয়ে কপালের ভাঁজ মেলাচ্ছে না সঙ্ঘ পরিবারের। মোদী যে ভাবে বিজেপির উপরে নিয়ন্ত্রণ আরোপ করতে উঠে পড়ে লেগেছেন, তাতেই লাগাম হারানোর আতঙ্কে ভুগছেন সঙ্ঘের নেতারা।

বিজেপিতে যখন নেতৃত্বের লড়াই তুঙ্গে, জনপ্রিয়তার কারণেই সে সময়ে মোদীকে প্রধানমন্ত্রী প্রার্থী বেছেছিল সঙ্ঘ। জনপ্লাবনে ভেসে আজ তিনি কুর্সিতে। প্রধানমন্ত্রী হিসাবে শপথ নেওয়ার পর আজ শনিবার ছিল প্রথম ছুটির দিন। দিনটা কাটালেন দলের সাধারণ সম্পাদকদের সঙ্গে বৈঠক করে। বিকেলে আলোচনা সারলেন রাজনাথ সিংহ, অরুণ জেটলি, নিতিন গডকড়ীর মতো শীর্ষ নেতাদের সঙ্গে। দলীয় নেতাদের প্রধানমন্ত্রী নিজের বাসভবনে ডেকে পাঠিয়ে আলোচনা করছেন এটাও দিল্লির রাজনীতিতে একটা নতুন নজির, যাকে দলের ওপর নিরঙ্কুশ আধিপত্য কায়েমের চেষ্টা বলেই মনে করছে আরএসএস।

সঙ্ঘের এই মনোভাব মোদীও বিলক্ষণ বুঝছেন। আগামী দিনে সঙ্ঘের সঙ্গে সংঘাতের আশঙ্কাও করছেন। কিন্তু সেই সংঘাত যাতে মাত্রা না-ছাড়ায়, সে বিষয়ে সতর্ক পদক্ষেপই করতে চাইছেন নরেন্দ্র মোদী। কার্যত, সংঘাত আঁচ করেই সরকার গড়ার পরে সপ্তাহ ঘুরতে না ঘুরতেই দলের সঙ্গে যোগসূত্র নিবিড় করতে চাইছেন তিনি। নিজের বাসভবনে দলের সাধারণ সম্পাদক ও অন্য নেতাদের ডেকে বোঝাতে চাইছেন, সরকার ও দল একে অপরের পরিপূরক। আজ সাধারণ সম্পাদকদের মোদী বলেন, ভোটের সময় যে প্রতিশ্রুতি দেওয়া হয়েছে, তা পূরণ করার জন্য দলও যেন সরকারকে সাহায্য করে। সরকারের ভুল-ত্রুটি তারা যেন ধরিয়ে দেয়। সরকার ও সংগঠন মিলেমিশেই কাজ করবে।

আবার এটাও ঠিক, সরকারের রাশ নিজের হাতে তুলে নেওয়ার পর এ বারে দলে নিয়ন্ত্রণ চান মোদী। পরবর্তী সভাপতি পদে নিজের পছন্দের লোক অমিত শাহই তাঁর প্রথম পছন্দ। কিন্তু তাতে ঘোর আপত্তি সঙ্ঘের। প্রথমত, অমিত শাহের বিরুদ্ধে মামলার নিষ্পত্তি হয়নি। তা ছাড়া সঙ্ঘ জানে, অমিত সভাপতি হওয়া মানে সরকার ও দল উভয়েরই নিয়ন্ত্রণ মোদীর হাতে চলে যাওয়া। তারা এখন বলছে, প্রধানমন্ত্রী ও দলের সভাপতি উভয়েই গুজরাত থেকে হলে দেশের অন্য অংশের নেতারা ক্ষুব্ধ হতে পারেন। তাই সঙ্ঘ এখন বিকল্প নাম নিয়ে আলোচনা করছে।

অটলবিহারী বাজপেয়ী যখন প্রধানমন্ত্রী ছিলেন, সেই সময়ও আরএসএসের সঙ্গে সংঘাত নেহাত কম হয়নি সরকারের। সরকারের নানা সিদ্ধান্তের পদে পদে আপত্তি তুলতেন তৎকালীন সরসঙ্ঘচালক কে সুদর্শন। বাজপেয়ী সরকারের উদার অর্থনীতির বিরোধী ছিলেন তিনি। বিমা, টেলিকম বেসরকারিকরণের বিরোধিতাও করা হয়েছিল। স্বদেশি জাগরণ মঞ্চে বাজপেয়ী সরকারের উদার অর্থনীতির বিরুদ্ধে প্রস্তাব গ্রহণ করে সরকারকেই অস্বস্তির মুখে ফেলে দেন গোবিন্দাচার্য। বিশ্ব বাণিজ্য সংস্থায় সরকারের অবস্থানের বিরোধিতাতেও সরব হন সঙ্ঘ নেতা কুশাভাও ঠাকরে। যশোবন্ত সিংহকে বাজপেয়ী যখন অর্থমন্ত্রী করে নিয়ে আসেন, সেই সময়ও সঙ্ঘ তীব্র প্রতিবাদ জানিয়েছিল। কিন্তু সে সময়ে সঙ্ঘের সঙ্গে যোগসূত্র বজায় রেখে সরকারের পক্ষে সব সামলে চলতেন লালকৃষ্ণ আডবাণী।

মোদীর কাছে সঙ্ঘের প্রত্যাশার তালিকাও ছোট নয়। এই বিপুল জয়ের পর মোদী সংবিধানের ৩৭০ ধারা বিলোপ, রামমন্দির নির্মাণ, অভিন্ন দেওয়ানি বিধি, গো-হত্যা নিবারণের মতো বিষয়গুলি কার্যকর করতে সক্রিয় হবেন, সঙ্ঘের অনেক নেতাই সেই আশা করেন। মুরলীমনোহর জোশী মানব-সম্পদ উন্নয়ন মন্ত্রী থাকার সময় যে ভাবে শিক্ষায় গৈরিকিকরণে উদ্যোগী হয়েছিলেন, সঙ্ঘ চায় মোদী সরকারও তা অনুসরণ করুক।

কিন্তু এখনও পর্যন্ত মোদী সঙ্ঘের আশাপূরণের কোনও ইঙ্গিত দিচ্ছেন না। প্রধানমন্ত্রী দফতরের প্রতিমন্ত্রী হয়ে জিতেন্দ্র সিংহ যখন ৩৭০ ধারা বিলোপ নিয়ে আলোচনার দাবি তুললেন, সঙ্ঘ নেতৃত্ব সে'টি লুফে নেয়। আরএসএস নেতা রাম মাধবও বিষয়টি নিয়ে গোটা দেশে বিতর্ক দাবি করেন। মোদী কিন্তু সেই মন্ত্রীকে ধমকে বক্তব্য প্রত্যাহার করান। সঙ্ঘ চায়, পাকিস্তানের সঙ্গে চড়া সুরে কথা বলুন মোদী। মোদী উল্টে শান্তির পায়রা ওড়াচ্ছেন। ভোটের আগে যে যশোবন্ত সিংহকে দল থেকে বহিষ্কার করা হয়েছিল, তাঁকেই আবার ফিরিয়ে আনতে চাইছেন নতুন প্রধানমন্ত্রী।

তাদের পরামর্শ মেনে মোদী ডোভালকে জাতীয় নিরাপত্তা উপদেষ্টা করেছেন বটে, কিন্তু তার পরেও তাঁর কাজে স্বস্তি পাচ্ছে না আরএসএস।

বাজপেয়ী-সঙ্ঘ সংঘাত

• উদার নীতির বিরুদ্ধে সরব হয় সঙ্ঘ

• বিমা-টেলিকম বিনিয়ন্ত্রণেরও বিরোধিতা

• পাকিস্তান নিয়ে কড়া অবস্থানের চাপ

• বিশ্ব বাণিজ্য সংস্থা নিয়ে বিপরীত অবস্থান

• যশোবন্ত সিংহকে মন্ত্রী করার বিরোধিতা

মোদীর কাছে সঙ্ঘের প্রত্যাশা

• রামমন্দির নির্মাণ

• ৩৭০ ধারা বিলোপ

• অভিন্ন দেওয়ানি বিধি

• গো-হত্যা নিষিদ্ধ

• শিক্ষায় গৈরিকিকরণ


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