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THE HIMALAYAN DISASTER: TRANSNATIONAL DISASTER MANAGEMENT MECHANISM A MUST

We talked with Palash Biswas, an editor for Indian Express in Kolkata today also. He urged that there must a transnational disaster management mechanism to avert such scale disaster in the Himalayas. http://youtu.be/7IzWUpRECJM

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS TALKS AGAINST CASTEIST HEGEMONY IN SOUTH ASIA

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Sunday, April 3, 2016

केसरिया बजरंगी बन जाने की वजह से ही जात पांत में बंटी हिंदीभाषी जनता गैरहिंदीभाषी राज्यों में हाशिये पर है। पलाश विश्वास

बंगाल में हिंदी भाषी वोटर भी हार जीत का फैसला कर सकते हैं और असम में भी उनका असर होना है।

केसरिया बजरंगी बन जाने की वजह से ही जात पांत में बंटी हिंदीभाषी जनता गैरहिंदीभाषी राज्यों में हाशिये पर है

पलाश विश्वास

अपने साथी रणधीर सिंह सुमन से आज हुई बातचीत के सिलसिले में बातों ही बातों में यह मामला सामने आया कि सभी लोग बंगाल में मुसलिम वोट बैंक के समीकरण को निर्णायक मान रहे हैं लेकिन बंगाल में हिंदी भाषी वोटर भी कम नहीं हैं।


दरअसल धर्म जाति के समीकरण और ध्रूवीकरण की जो राजनीति है ,मीडिया की दृष्टि भी वही है और राजनीति धर्म और जाति के अलावा कुछ देखती नहीं हैं।


वरना बंगाल में जितने मुसलमान वोटर हैं ,कायदे से गिनती कर लें तो हिंदी भाषी दोयम दर्जे के नागरिक उनसे ज्यादा ही होंगे।


वे मुसलमानों की तरह असुरक्षाबोध के शिकार नहीं है कि आखिरी वक्त तक टोह लगाते रहे कि जीतने वाल कौन है और फिर फैसला करे उनके वजूद के लिए कौन ज्यादा खतरनाक है और उसे हराना है,तब जाकर तय होता है कि किसे वोट देना है और किसे वोट न दें।


कल हमने भारतीय लोकतंत्र की इस गुत्थी के बारे में लिखा भी है कि मुसलमान आजादी के साथ अपने मताधिकार का इ्स्तेमाल कर सकते हैं या नहीं।उस पर पहले गौर कर लीजियेगा तो आगे हमारी बात आपको कायदे से समझ में आनी चाहिए।


हिंदीभाषियों की ऐसी कोई मजबूरी नहीं है और जाति के नाम वे हजार टुकड़ों में बंटे हैं तो मताधिकार के प्रयोग में भी वे स्वतंत्र है और विभिन्न दलों,पक्षों में उनके वोट स्थानीय और राष्ट्रीय राजनीति की वजह से बंट जाते हैं।


इसी वजह से देशभर में अहिंदी बाषी राज्यों में जहां हिंदी भाषियों की तादाद भारी है,वे अपनी संख्या के मुताबिक चुनाव नतीजे को बनाते बिगाड़ते नहीं है।


बंगाल में इनकी ताकत पर बहुत गौर किया था पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु और तत्कालीनमाकपा सचिव अनिल विश्वास ने और बड़ी संख्या में हिंदी भाषी वामदलों से जुड़े थे या कल कारखानों, उद्योग धंधों से जुड़े होने की वजह से वाम मजदूर संघों से जुड़े थे।


बाद के नेताओं ने हिंदी वोटरों को खास तवज्जो नहीं दी तो हिदी भाषी वोटर भी बिखर गये।


कल कारखाने बंद हुए तो यूनियनों से नाता भी टूट गया और उनकी हालत असंगठित क्षेत्र के मजदूरों जैसी हो गयी है जिनका कोई माई बाप नहीं है।


अब बंगाल के हिंदी भाषी अपनी जड़ों से पूरीतरह कटे होने के बावजूद जात पांत और हिंदुत्व के मामले में गायपट्टी से पीछे कतई नहीं है और उनकी फिक्र भी बंगाल की वजह से दिल्ली के भव्य राममंदिर कार्यक्रम की हिंदुत्व राजनीति को लेकर है ।


बंगाल के केसरिया कायाकल्प की जमीन भी यही है क्योंकि इन्ही हिंदी भाषियों के एक तबका दबंग और बाहुबलि है तो एक फीसद से भी कम दूसरा सबसे खास तबका वह है ,जिसके हाथों में बंगाल की समूची पूंजी,कारोबार,उद्यम और उद्योग है।


असम के हालात भी कमोबेश बंगाल जैसा ही है लेकिन असमिया अस्मिता और दंगाई सियासत की वजह से गैरअसमिया जनता के प्रति घृणा और हिंसा के साठ के दशक से शुरु हिंदुत्व अभियान के कारण पहले बंगाली शरणार्थियों के घर जले,फिर राजस्थानियों के और अब हिंदी भाषियों के प्रति भी वही वैमनस्य है।


क्योंकि गुजरात के बाद असम अब हिंदुत्व की प्रयोगशाला है।हिंदुत्व कीआग से असम में बंगाली और हिंदी भाषी गैर मुसलिम जनता भी कतई बची नहीं है और दंगाइयों के निशाने पर वे भी हैं जैसे मुसलमान हैं।


असम में भी हिंदीभाषी बिखरे बिखरे हैं और हिंदुत्व राजनीति के लगातार हमलों की वजह से वजूद के जोखिम की वजह से मुलमान संगठित हैं और चुनाव नतीजे परइसका असर भी होगा।  


कामरेड ज्योति बसु,कामरेड सुभाष चक्रवर्ती और कामरेड अनिल विश्वास ने हिंदीभाषियों के इन दोनों तबके को कायदे से साधा था और वाममोर्चे की यह एक बड़ी ताकत थी।


इन तीनों नेताओं के अवसान के बाद कामरेडों ने हिंदी भाषियों को कोई ज्यादा भाव नहीं दिया और दबंग और पैसे वाले तबके अपने अपने हितों के मुताबिक दीदी की सत्ता से नत्थी हो गये तो बाकी हिदीभाषियों की अनाथ दशा है।


बंगाल में चाहे उनकी जो हालत हो वे पूरे देश में राज करने के लिए जियादातर रामरज्या चाहते हैं और जात पांत धर्म कर्म में उलझे हैं या बिरादरी को गोलबंद करके रंग बिरंगे नेताओं की निजी फौजे हैं।


मुसलमान अपनी जान माल की फिक्र में संगठित हैं और इनकी सियासत अपना वजूद बचाने की जंग में हार जीत का मामला है।


इसके विपरीत हिंदी भाषी भव्य राममंदिर और अच्छे दिनों का ख्वाब भी देखते हैं तो कामरेड भी हैं और आपस में मूंछ की लड़ाई और मारकाट अलग है और सत्ता से नत्थी रहने का मौका भी नहीं चूकते।फिरभी जिन इलाकों में हिंदी भाषी वोट ज्यादा है,वहां वे संगठित तौर पर वोट दें,तो मुसलमानों के मुकाबले कम ताकतवर हिदीभाषी भी नहीं हैं।


एक जमाने में बंगाल औद्योगीकरण और कारोबार में अव्वल नंबर था।एक जमाने में बिहार बंगाल और ओड़ीशा पूरा एक मुलक था,जिसमें पूर्वी बंगाल और असम भी था।


तेरहवीं सदी से लेकर ब्रिटिश प्रेसीडंसी तक यह सिलसिला रहा है।


नवाब सिराजदौल्ला के साहूकार उमीचंद मारवाड़ी थे और जैनी हिंदी भाषियों का नवाबी जमाने से बंगाल के कारोबार में पकड़ रही है और बाद में राजस्थानी कारोबारियों के अलावा गुजराती कारोबारी भी कोलकाता में जम गये।


कयोंकि कारोबार और उद्योग में बांग्लाभाषी थे ही नहीं।


आभिजात वर्ग के लोग या जमींदार थे या दरबारी या नौकरीपेशा और इसीलिये बंगाली बाबूमोशाय हुआ करते हैं।


आम बंगाली कृषि के अलावा सत्तर के दशक तक सरकारी नौकरियों की जुगाड़ में गुजर बसर करते रहे हैं।


चायबागान हो या जूट मिल या बंगाल का मशहूर सूती उद्योग, दुर्गापुर आसनसोल  के शिल्पांचल और कोलकाता हावड़ा हुगली के बंद कल कारखानों में सर्वत्र भारी संख्या हिंदी भाषी मजदूरों की रही है तो कोलकाता के बड़ाबाजार से लेकर सारे बंगाल में कारोबार में लगा मजदूर संप्रदाय भी हिंदीभाषी हैं।जो पीढ़ीदर पीढ़ी बंगाल में बसे हैं और वे अब विशुध हिंदी भाषी भी नहीं हैं उनकी भाषा और संस्कृति कोलकाता और बंगाल के मिजाज के मुताबिक बदल गयी है और वे हिंदी भाषी है।


बिहार और झारखंड  से जुड़े आसनसोल और सिलीगुड़ी में भी हिंदी भाषी बांग्लाभाषियों से कहीं अधिक हैं और कोलकाता और हावड़ा में भी कमोबेश ये हालात है।


यहां तक कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के चुनाव क्षेत्र में भी हिंदी भाषी वोटर ही हार जीत तय करेंगे।


आज सुबह अरसे बाद बाराबंकी से लोकसंघर्ष के रणधीर सिंह सुमन जी का फोन आया।उनसे लंबी बातचीत हुई।


दरअसल उनसे राज्यसभा के किसी मुसलमान सांसद ने कहा है कि बंगाल में दीदी का मुसलिम वोट बैंक तेजी से टूट रहा है और अब कम से कम एक तिहाई मुसलमान सत्तादल को वोट नहीं देंगे।वे हमसे जानना चाहते थे कि दीदी क्या हार रही हैं।


इसका कोई सीधा जवाब हमारे पास नहीं है।


नारद का दंश कितना दीदी की साख को बनायेगा,बिगाड़ेंगा ,यह कहना मुश्किल है।


आज सुबह ही बांग्ला के सबसे बड़े दैनिक आनंद बाजार पत्रिका में नारद स्टिंग की दूसरी किश्त के तहत सहरी विकास मंत्री के कारनामों का खुलासा हुआ है कि कैसे विकास के नाम पर तमाम ठेके उन्हींके दफ्तर से ले देकर दे दिये जाते हैं।


पहले खुलासे की जांच भी शुरु नहीं हुई है तो जंगलमहल में मतदान की पूर्व संध्या को हुए इस नये खुलासा में दीदी के दागी मंत्रियों के खिलाफ जो सबूत पेश किये गये हैं।


अगर इसमें तनिक सच्चाई है तो इसे सत्ता दल के अंदर बैठे तमाम लोग समझ रहे होंगे और उनकी क्या प्रतिक्रिया होगी और दीदी को लोग अब भी कितना और किस हद तक कब तक ईमानदार मानते रहेंगे,इस पर बहुत कुछ तय होगा।


अभी कल ही अंग्रेजी दैनिक टेलीग्राफ और बांग्ला दैनिकों में बड़ाबाजार फ्लाईओवर हादसे के सिलसिले में दीदी के दावों की धज्जियां उड़ाकर तमाम सबूत और तथ्य पेश किये गये जिससे साप है कि ठेका चाहे किसी कंपनी को मिला हो,सारी निर्माण सामग्री के ठेके,सारे काम करने वाले लोग,तकनीशियन और विशेषज्ञ,सारी निगरानी और देखरेख सत्तादल के ही प्रोमोटर बिल्डर सिंडिकेट बाहुबलि नेताओं के नियंत्रण में थे और बुनियादी नक्शे में फेरबदल सुरक्षा और ट्रेफिक नियमों का उल्लंघन भी सत्तादल की सरकार और नगरनिगम की वजह से हुए।


होने को तो शारदा चिटफंड मामले के सारे दागी सत्ताई चेहरे तृणमल स्तर से लेकर शीर्ष स्तर तक कटघरे में थे लेकिन इस मामले के खुलासे के बावजूद बदला कुछ नहीं है।


इसलिए कहना मुश्किल है कि मुनाफावसूली और घूस,भ्रष्टाचार और बेईमानी से वोटरों की सेहत पर बंगाल और बाकी देश में कोई असर होता है या नहीं और हुआ भी तो जनादेश पर कितना असर उसका होता है।


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