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THE HIMALAYAN DISASTER: TRANSNATIONAL DISASTER MANAGEMENT MECHANISM A MUST

We talked with Palash Biswas, an editor for Indian Express in Kolkata today also. He urged that there must a transnational disaster management mechanism to avert such scale disaster in the Himalayas. http://youtu.be/7IzWUpRECJM

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS TALKS AGAINST CASTEIST HEGEMONY IN SOUTH ASIA

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Friday, February 8, 2013

यह प्रजातंत्र किसका है

यह प्रजातंत्र किसका है


Wednesday, 06 February 2013 10:44

कश्मीर उप्पल 
जनसत्ता 6 फरवरी, 2013: अब्राहम लिंकन की प्रजातंत्र की यह परिभाषा बहुत प्रसिद्ध है, जिसमें वे कहते हैं कि 'जनता की सरकार, जनता के द्वारा, जनता के लिए'। हमारे देश में परिवार से राज्य तक, पितृसत्तात्मक सत्ता के फलस्वरूप, प्रजातंत्र की परिभाषा बदल गई है। यह कुछ इस प्रकार है, 'पुरुषों की सरकार, पुरुषों के द्वारा, पुरुषों के लिए'।
इस बात को सिद्ध करने के लिए हमें कहीं और नहीं, सीधे अपने संसद भवन में जाने की जरूरत है। एक अंतरराष्ट्रीय संगठन 'इंटर-पार्लियामेंट यूनियन' पूरे विश्व में प्रजातांत्रिक मूल्यों को बढ़ावा देने का काम करता है। इसकी नवीनतमरिपोर्ट के अनुसार, भारत के लोकतंत्र में महिलाओं की भागीदारी अत्यंत दयनीय अवस्था में है। वर्तमान में लोकसभा के 543 सदस्यों में केवल साठ महिला सदस्य हैं, जबकि राज्यसभा के 240 सदस्यों में केवल चौबीस। इसमें दो-चार की कमी-वृद्धि होती रहती है। 
इस तरह लोकसभा में महिला प्रतिनिधित्व 11 प्रतिशत और राज्यसभा में 10.7 प्रतिशत है। महिला प्रतिनिधित्व के मामले में विश्व के देशों में भारत का 105वां स्थान है। यही नहीं, इस मामले में भारत अपने पड़ोसी देशों से भी काफी पीछे है। इस सूची में नेपाल तिरपनवें, चीन साठवें और बांग्लादेश पैंसठवें स्थान पर है। 12 सितंबर 1996 को तत्कालीन सरकार द्वारा प्रस्तुत महिला आरक्षण विधेयक अभी संसद में पारित नहीं हो पाया है। मार्च 2010 में यूपीए सरकार ने इस विधेयक को कांग्रेस, भाजपा और वामदलों के समर्थन से राज्यसभा में पास करा लिया था, पर यह लोकसभा में कई दलों कीआपत्तियों के चलते पारित नहीं हो सका। इस विधेयक को ठंडे बस्ते में डालने के साथ ही राजनीतिक विमर्श से महिला आरक्षण के सवाल को गायब कर दिया गया। 
हमारे देश के स्वतंत्रता आंदोलन में कस्तूरबा गांधी, अरुणा आसफ अली, कैप्टन लक्ष्मी सहगल, सुचेता कृपलानी, राजकुमारी अमृत कौर आदि ने महिलाओं को गोलबंद करने में बड़ी भूमिका निभाई थी। इसलिए प्रजातांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए संसद में महिलाओं के प्रतिनिधित्व का प्रश्न महत्त्वपूर्ण हो जाता है। संसद में महिला प्रतिनिधित्व का जो हाल है वैसा ही विधानसभाओं का भी है। जबकि देश के सभी क्षेत्रों में महिलाओं के प्रतिनिधित्व का प्रश्न उनके सशक्तीकरण से जुड़ा हुआ है। 
यूरोप और अमेरिका में स्त्रियों को स्वतंत्रता और समता के जो अधिकार मिले हैं वे पिछले दो सौ वर्षों के निरंतर संघर्ष के परिणाम हैं। उस समय के विचारकों, लेखकों और साहित्यकारों ने स्त्री अधिकारों के प्रति समाज को जागृत किया था। अठारहवीं शताब्दी में औद्योगीकरण ने यूरोप की महिलाओं के सामने कई प्रश्न खड़े कर दिए थे। आज भूमंडलीकरण ने पुन: नए प्रश्न पैदा कर दिए हैं। हमारे देश में औद्योगीकरण द्वारा खड़े किए गए प्रश्न अभी हल भी नहीं हुए थे कि भूमडंलीकरण ने महिलाओं पर नए दवाब बना दिए हैं। पश्चिम की तुलना में हमारे देश की महिलाएं दोहरे दवाब का सामना कर रही हैं। औद्योगीकरण और भूमडंलीकरण ने उत्पादन और काम की ऐसी परिस्थितियां पैदा की हैं जो हमारे परंपरागत समाज से भिन्न हैं। भूमडंलीकरण में 'आउटसोर्सिंग' जैसे व्यवसायों ने दिन और रात का भेद खत्म कर दिया है। अब बहुत-सी महिला कर्मचारियों को रात में काम करना होता है। ऐसी स्थिति में पुरुषों का सोच बदलने की जरूरत है। 
भारत में कानूनों को कड़ाई से लागू कर कुछ समस्याओं को तो सुलझाया जा सकता है, पर सारी ताकत कानून में निहित नहीं है। इसलिए सामाजिक मोर्चे पर एक लंबी लड़ाई की तैयारी जरूरी है। शिक्षा, पैतृक संपत्ति में अधिकार और अन्य सवाल आगे हैं। हम यूरोप और अमेरिका में कई दशक तक महिलाओं के हक में चले आंदोलनों से सीख सकते हैं कि हमें एक लंबी और अनवरत लड़ाई के लिए किस तरह तैयार होना चाहिए। उन देशों में भी बूर्जुआ और सामंती वर्ग ने स्त्री आंदोलनों को कुचलने के प्रयास किए थे। प्रभावशाली राजनेता भी कुछ नहीं कर पा रहे थे।
फ्रांसीसी क्रांति के पूर्व अमेरिकी क्रांति के दौरान जॉर्ज वाशिंगटन और टॉमस जैफरसन पर दवाब पड़ा कि महिलाओं के मताधिकार और संपत्ति के अधिकार को संविधान में शामिल किया जाए। पर बूर्जुआ वर्ग के विरोध के कारण महिला विधेयक को संविधान में शामिल नहीं किया जा सका था।
महिला आंदोलन का सबसे महत्त्वपूर्ण दस्तावेज मेरी वोल्सिटनक्राफ्ट का 'महिलाओं के अधिकारों का औचित्य-प्रतिपादन' (1792) सिद्ध हुआ था। इसके बाद की शताब्दी के महिला आंदोलनों की रूपरेखा इसी पुस्तक से बनी थी। फ्रांसीसी क्रांति ने जिस तर्कबुद्धिसंगत समाज-राज्य की कल्पना की थी उसे बड़ी पूंजी और बड़े स्वामित्व ने कुचल दिया था। कई विचारकों ने भी 'नारी शरीर की प्राकृतिक दुर्बलता' को महिलाओं की असमानतापूर्ण स्थिति का कारण सिद्ध करने का प्रयास किया था।
उन्नीसवीं शताब्दी में कई लेखकों ने स्त्री अस्मिता के प्रश्न उठाए। प्रसिद्ध लेखक चार्ल्स फूरिए की तो यह मान्यता थी कि किसी भी समाज में आजादी का एक बुनियादी पैमाना यह है कि उस समाज विशेष में स्त्रियां किस हद तक आजाद हैं। 1830 से 1840 के दशक में स्त्रियों की पारिवारिक गुलामी के विरुद्ध विद्रोह का स्वर फ्रांसीसी कथा साहित्य में व्यापक अर्थों में मुखर होकर उठा था। इसके फलस्वरूप स्त्रियों के समान राजनीतिक अधिकारों का संघर्ष नए सिरे से शुरू हो गया।

1848 में न्यूयार्क में विश्व की कई लेखिकाओं और आंदोलनों की पहल पर प्रथम 'नारी अधिकार कांग्रेस' का आयोजन हुआ था। इस   सम्मेलन में नारी स्वतंत्रता का घोषणापत्र जारी किया गया। इसमें महिलाओं को कानूनी समानता, समान शैक्षणिक और व्यावसायिक अवसर, समान वेतन या मजदूरी और मताधिकार की मांग की गई थी।
मार्क्स और एंगेल्स ने अपने लेखन से सिद्ध किया कि स्त्रियों और बच्चों की सस्ती श्रमशक्तिकी लूट पंूजीवाद की एक महत्त्वपूर्ण आधारशिला है। उनके अनुसार स्त्रियों की सच्ची मुक्तिकी दिशा में पहला कदम पूंजीवादी व्यवस्था का खात्मा है। मार्क्सवाद की दृष्टि से बेवल की लिखी पहली पुस्तक 'नारी और समाजवाद' (1879) थी। इस तरह साम्यवाद के संघर्ष में अन्य अधिकारों के साथ-साथ स्त्री मुक्तिका सवाल भी जुड़ गया था।
ब्रिटेन में महिला संगठनों के आंदोलनों के दबाव से ही 1847 में महिलाओं के लिए दस घंटे का कार्यदिवस कानून बना। इसके बाद 1860 में महिलाओं को शिक्षण के अतिरिक्तअन्य पेशों में काम करने का अधिकार मिला था। इसी प्रकार महिलाओं को तलाक लेने का अधिकार 1858 में मिला। ब्रिटेन में 1918 के पहले तक केवल पुरुषों को पार्लियामेंट चुनाव में वोट देने का अधिकार था। जॉन स्टुअर्ट मिल ने तो 1867 में ही संसद में महिला-मताधिकार विधेयक रखा था जो पारित नहीं हो सका। इसके बाद मताधिकार के लिए महिलाओं के दो प्रकार के आंदोलन चले। एक संगठन लॉबिंग करके और दूसरा संगठन उग्र प्रदर्शनों के जरिए मताधिकार की लड़ाई लड़ता था। इन आंदोलनों के फलस्वरूप ही वहां महिलाओं को वोट देने का अधिकार मिला। 
यूरोप के कई और देशों में भी नारी स्वतंत्रता, समता और मताधिकार के आंदोलन चले। फ्रांसीसी क्रांति के दौरान महिलाओं ने सभी राजनीतिक गतिविधियों में खुलकर हिस्सा लिया था। उस समय कई महिला क्रांतिकारी क्लब बने। यह माना जाता है कि आधुनिक विश्व के इतिहास में ये प्रथम महिला संगठन थे। ओलिम्पी दि गूजे ने (1748-93) में 'महिला और महिला नागरिक' के अधिकारों की घोषणा की थी और उसे 1791 में राष्ट्रीय असेंबली के समक्ष पेश किया था।
अमेरिका और यूरोप में प्रबोधकालीन आदर्शों से प्रभावित होकर महिलाओं के प्राकृतिक अधिकार और स्वतंत्रता-समानता की मांग कई लेखकों और महिला संगठनों ने उठाई थी। इसके फलस्वरूप ही 1871 के पेरिस-कम्यून में स्त्रियों की भागीदारी संभव हुई। इसने पूरे यूरोप को प्रभावित किया।
संयुक्तराष्ट्र ने 8 मार्च 1975 से अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाने की शुरुआत की। यह दिवस महिला सशक्तीकरण के उद््देश्य से जाता है, जिसकी पहल 1985 में नैरोबी में आयोजित अंतरराष्ट्रीय महिला सम्मेलन में हुई थी।
भारत में सर्वप्रथम 1926 में विधानसभा में एक महिला को मनोनयन द्वारा सदस्य बनाया गया था, पर उसे मत देने का अधिकार नहीं था। 1937 में महिलाओं के लिए सीट आरक्षित कर दी गई थी, जिसके फलस्वरूप 41 महिला उम्मीदवार चुनाव में उतरी थीं। 1938 में श्रीमती आर सुब्बाराव राज्य परिषद में चुनी गर्इं। इसके बाद 1953 में रेणुका राय केंद्रीय व्यवस्थापिका में प्रथम सदस्य के रूप में चुनी गई थीं। भारत में संविधान के 73वें और 74वें संशोधन के जरिए महिलाओं के लिए पंचायतों और नगर निकायों में एक तिहाई आरक्षण की व्यवस्था की गई। 
अब संसद और विधानसभा में आरक्षण की लड़ाई शेष है। महिलाओं के ज्यादा प्रतिनिधित्व का आशय देश और प्रदेश में मंत्रिमंडल में महिलाओं की संख्या में वृद्धि होना है। जब जातियों और वर्गों का मंत्रिमंडल में ध्यान रखा जाता है तो महिलाओं के प्रतिनिधित्व का ध्यान क्यों नहीं आता है।
संयुक्तराष्ट्र की सहस्राब्दी रिपोर्ट महिलाओं के पक्ष में कुछ नए तथ्य प्रकाश में लाती है। इसके अनुसार विश्व के कुल कार्य-घंटों में दो तिहाई महिलाओं द्वारा संपन्न किए जाते हैं। महिलाओं को अनाज पैदा करने, भोजन बनाने, बच्चों की देखभाल, घर के बुर्जुगों की देखरेख, र्इंधन और पानी की व्यवस्था आदि कामों के लिए कोई वेतन नहीं दिया जाता। महिलाएं कुल विश्व की आय का केवल दस प्रतिशत कमाती हैं। इनका पद और वेतन भी नीचे का होता है।
विश्व की कुल संपत्ति का केवल एक प्रतिशत महिलाओं के नाम है। उनके नाम संपत्ति न होने से उन्हें कर्ज भी नहीं मिल पाता है। पुरुषों के अधीन होने और निशक्तरहने का सबसे प्रमुख कारण भी यही है कि महिलाओं के नाम भौतिक संपदा नहीं होती।
भारतीय महिलाओं के कई मुद््दे हैं जिन्हें लेकर एक बड़ा सुगठित राष्ट्रीय आंदोलन खड़ा होना चाहिए। स्त्री-अस्मिता का प्रश्न सरकार द्वारा दो-चार मांगें मान लेने का ही प्रश्न नहीं है। यह मसला एक-दो हफ्ते या महीने तक प्रदर्शन करने से ही हल नहीं होगा। विश्व के अन्य देशों का इतिहास बताता है कि महिलाओं के पक्ष में अनवरत कई दशकों और पूरी शताब्दी तक संघर्ष चलाए रखने के बाद ही सफलता प्राप्त हुई है। इसके लिए समाज के सभी वर्गों द्वारा एक साथ मिलकर काम करने की तैयारी होनी चाहिए। विश्व समाज आर्थिक, सामाजिक, टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में नए-नए क्षितिज छू रहा है। हमें देखना होगा कि हमारे जीवन का आधा भाग पीछे न छूट जाए। जीवन के एक पक्ष के पीछे छूट जाने से हम भी पीछे छूट जाते हैं।

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