पूर्वोत्तर की चुनावी इबारत
पूर्वोत्तर की चुनावी इबारत
| Monday, 04 March 2013 11:50 |
अरविंद मोहन जनसत्ता 4 मार्च, 2013: पूर्वोत्तर के साथ मजाक जारी है। वहां हुए तीन राज्यों के विधानसभा चुनावों के समय यह और स्पष्ट रूप में दिखाई दिया, क्योंकि मुल्क की राजधानी में भी ये चुनाव किसी की दिलचस्पी का विषय बने हों ऐसा नहीं लगता। रही-सही कसर चुनाव आयोग ने पूरी कर दी, जिसने नतीजों की तारीख बजट के दिन रख दी, जिस दिन पूरा मीडिया और मुल्क बजट की चर्चा में ही लगा रहा। अगर चुनाव नतीजों के दिन भी मीडिया पूर्वोत्तर पर चर्चा कर लेता तो वे कई सवाल जरूर उभर कर सबकी आंखों के सामने आ जाते जो विधानसभा चुनावों में इन तीन राज्यों की जनता ने उठाए थे। यह मानना निहायत भोलापन ही होगा कि पूर्वोत्तर के लोगों के लिए कोई मसला ही नहीं बचा है और पांच साल बाद भी वे सरकार चुनते समय बेमतलब बातों पर मतदान करते हैं। असल में यह कांग्रेसी नजरिया है जो धीरे-धीरे सारे देशपर हावी हो चुका है। खतरा यह है कि चुनाव हारने से कांग्रेस का तो बहुत कुछ नहीं बिगड़ा, मगर पूर्वोत्तर की समस्याओं पर जल्द ध्यान नहीं दिया गया तो मुल्क का जरूर नुकसान हो जाएगा। कांग्रेस की हालत चुनाव के बाद बिगड़ी है या सुधरी है, यहां यह बताने की जरूरत नहीं है क्योंकि तीनों राज्यों की जनता द्वारा पुरानी सरकारों को फिर से जनादेश देने के चलते कांग्रेस की भी मेघालय सरकार बच गई है। पर बाकी दो राज्यों में उसकी पहले से ज्यादा धुनाई हो गई है। त्रिपुरा में तो उसे कोई भी मुकाबले में नहीं मान रहा था, लेकिन नगालैंड के बारे में शुरूमें यह लगा कि केंद्र की सत्ता पास रहने से उसे लाभ होगा। नगा लोगों को अपनी समस्या सुलझाने में केंद्र की भी मदद चाहिए ही। पर रणनीति के अभाव और आपसी गुटबाजी ने वहां भी कांग्रेस को पिटवा दिया। मेघालय की जीत को भी कई लोग कांग्रेस की जीत की जगह पीए संगमा की हार ज्यादा बताते हैं। यह माना जा रहा है कि पूर्व लोकसभा अध्यक्ष संगमा कांग्रेसी नेताओं से भी ज्यादा हवाई नेता हो चुके हैं। सिर्फ दिल्ली की राजनीति में उलझे रहने की कीमत उन्हें चुकानी पड़ी और इसी के चलते मुकुल संगमा अपनी गद््दी बचाने में सफल हो गए। यह सही है कि पूर्वोत्तर की राजनीति काफी कुछ पारंपरिक पहचान के इर्दगिर्द ही चलती आई है। सात राज्य होने के बाद भी कबीलाई पहचान की प्रमुखता वाली इस राजनीति का ही बोलबाला दिखता है। इस अर्थ में जाति की पहचान वाली राजनीति मैदानी इलाकों में आती-जाती रही है। नगा समस्या तो आजादी के समय से ही है। असम में सारे बंटवारे के बावजूद आज भी रह-रह कर यही राजनीति चलती है और कई बार तो एकदम उग्र रूप ले लेती है। पर यह भी रेखंकित करना जरूरी है कि सैकिया हों या अब माणिक सरकार, इन लोगों ने धीरे-धीरे शासन अर्थात कामकाज के आधार पर जनादेश पाने में सफलता पाई है। पर अन्य राज्यों में यह स्थिति नहीं है। नगालैंड की पूरी चुनावी लड़ाई इस बार सिर्फ पहचान के सवाल पर लड़ी गई तो मेघालय में कई कबीलों के अपने-अपने इलाके में प्रभावी होने से दो दशक से गठबंधन सरकार ही रही है। इस बार हुआ यह कि पीए संगमा के अपने लोग उनके प्रभाव वाले खासी इलाके में भी पिट गए। पर नगा लोग तो दूसरे राज्यों में चले गए, उनके पुराने इलाकों को भी एक साथ लाकर नया राज्य बनाने की राजनीति को ही वे पसंद करते हैं। त्रिपुरा में माणिक सरकार की उपलब्धियां इसलिए भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण हैं कि इनके चलते न सिर्फ वाम दलों का एकमात्र दुर्ग बचा हुआ है बल्कि अच्छी-भली पहचान की राजनीति को दफना दिया गया है। त्रिपुरा के आदिवासियों और बंगालियों का टकराव काफी डरावना था। कांग्रेस इसका इस्तेमाल भी करती थी। पर कांग्रेस की अपनी गुटबाजी ने उसकी सरकार को भी नहीं चलने दिया। माणिक सरकार ने न सिर्फ लगातार चौथी बार जीत पाई और ज्योति बसु के रिकार्ड की बराबरी की बल्कि त्रिपुरा में जातीय टकराव को भी इतिहास की चीज बना दिया। इस बार डरावनी पहचान वाले आदिवासी नेता विजय हरांखल चुनाव में भागीदारी कर रहे हैं यह लोगों को ठीक से पता भी नहीं चला। कांग्रेस ने ममता बनर्जी की देखादेखी परिवर्तन के नारे के साथ चुनाव लड़ा था, पर वह खुद इस बात को लेकर गंभीर है यह कभी नहीं लगा। दूसरी ओर, आज के नेताओं में ईमानदारी और कर्मठता की मिसाल बन गए माणिक सरकार ने न सिर्फ केंद्र की मनरेगा जैसी योजनाओं को बेहतर ढंग से लागू किया है बल्कि गरीबों को सस्ता चावल देने के वादे पर लोगों का भरोसा जीतने में सफल रहे हैं। माणिक सरकार राजनीतिक और प्रशासनिक रूप से चौकस रहे, साथ ही बल्कि विकास के कई बडेÞ काम करके भी बंगाल के कामरेडों से अलग छवि बनाने में कामयाब रहे हैं। इनमें बिजली उत्पादन की बड़ी योजना को सफलतापूर्वक चलाना भी शामिल है। सो संगठन से लेकर सरकार तक उनकी चौकसी ही है कि वे न सिर्फ चुनाव जीतने में सफल रहे बल्कि उनकी सीटों की संख्या और वोट प्रतिशत में भी इजाफा हो गया। वाम मोर्चा इस बार पहले से तीन फीसद ज्यादा वोट पाने में सफल रहा। अपने चुनावी नामांकन पत्र में माणिक सरकार ने अपनी संपत्ति ग्यारह हजार से कम घोषित करके सबको हैरान कर दिया था। उनके पास न अपना घर है न कार। वे अपना पूरा वेतन पार्टी को दे देते हैं और वहां से पूर्णकालिक कार्यकर्ता के तौर पर मिलने वाले पैसों से अपना काम चलाते हैं। उनके उधार बीड़ी पीने का एक चुटकुला भी चलता है। पर त्रिपुरा में वाम मोर्चे को मिली सफलता सिर्फ उनकी अपनी लोकप्रियता की देन नहीं है। यह माकपा की भी जीत है। अलबत्ता में वाम मोर्चे में शामिल आरएसपी और फारवर्ड ब्लाक को निराशा ही हाथ लगी। त्रिपुरा में मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस थी, पर वह कभी गंभीर चुनौती देती नहीं लगी। कांग्रेस साठ सदस्यों की विधानसभा में सिर्फ दस सीटें जीत पाई, जो उसका अब तक का सबसे बुरा प्रदर्शन था। कांग्रेस के दो क्षेत्रीय सहयोगी दलों का खाता भी नहीं खुल सका। कांग्रेस को ही नहीं, बहुत-से राजनीतिक पंडितों को भी लगता था कि नगालैंड में नगा पीपुल्स फ्रंट सरकार कुछ खास नहीं कर पाई है और अगर नगा समस्या को सुलझना है तो केंद्र की भूमिका महत्त्वपूर्ण होगी। ऐसे में कांग्रेस के लिए वहां गुंजाइश है। कांग्रेस ने दो-तीन महीने पहले से यह दावा करना भी शुरू कर दिया था कि इशाक-मुइवा से चल रही बातचीत सहमति के मुकाम पर पहुंच गई है। इस दावे की असलियत जो भी हो, पर कांग्रेस को इसका लाभ नहीं मिला। दूसरी ओर, नेफ्यू रिओ की अगुआई वाले नगा पीपुल्स फ्रंट ने नौजवानों और बेरोजगारी के सवाल को केंद्र में रख कर चुनाव का मुद््दा बदल दिया। कांग्रेस इस चक्कर में पिट गई और उसके अंदरूनी झगडेÞ और बढ़ गए। और जब नतीजे आए तो वे रिओ की उम्मीद से भी बेहतर थे। उनके मोर्चे को पिछली बार के मुकाबले ग्यारह सीटें ज्यादा मिली हैं। यह नगा पीपुल्स फ्रंट का अब तक का सबसे अच्छा प्रदर्शन है। दूसरी ओर, पिछली बार की तेईस सीटें हासिल करने वाली कांग्रेस इस बार महजआठ सीटों पर सिमट गई। रिओ नगालैंड के दिग्गज नेता जमीर के शिष्य हैं। इस बार की जीत के साथ वे उन जैसी हस्ती बन गए लगते हैं। वे पहले भाजपा की अगुआई वाले राजग के साथ थे, मगर राजग में बने रहने में उन्हें कोई भविष्य नजर नहीं आया और वे उससे अलग हो गए। असम को छोड़ कर भाजपा आज भी पूर्वोत्तर में अपनी पैठ नहीं बना पाई है। कांग्रेस चाहे तो इस बात पर राहत महसूस कर सकती है कि उसने अपने दम पर मेघालय जीता ही नहीं है, वहां उसकी सीटें पहले से बढ़ गई हैं। उसे साठ सदस्यों वाली विधानसभा में उनतीस सीटें मिली हैं, जो कि पिछली बार की सीटों से चार ज्यादा हैं। वह बहुमत से दो सीट पीछे रह गई। पर उसके सहयोगी दलों को बारह सीटें मिली हैं, लिहाजा अगली सरकार बनने में उसे कोई दिक्कत नहीं होगी। मुकुल संगमा मेघालय के पहले मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने पांच साल का कार्यकाल चैन से पूरा किया है। पर इससे भी बड़ी उपलब्धि यह मानी जा रही है कि उन्होंने पीए संगमा के प्रभाव वाली गारो पहाड़ियों की चौबीस में से तेरह सीटों पर कांग्रेस को सफलता दिलाई है। इसी के चलते कई राजनीतिक पंडित इसे कांग्रेस की जीत की जगह मुकुल संगमा की जीत और पीए संगमा की हार मान रहे हैं। पीए संगमा हार कर भी हार मानने को तैयार नहीं हैं- राष्ट्रपति चुनाव की तरह। वे इसे धनबल और बाहुबल की जीत बताने से भी नहीं चूके। उनकी नवगठित पार्टी सिर्फ दो सीट जीत सकी और पार्टी की ओर से मुख्यमंत्री पद के दावेदार के तौर पर पेश किए गए उनके सुपुत्र कोनार्ड अपनी विधानसभा सीट भी नहीं जीत सके। पूर्वोत्तर के तीन राज्यों के चुनाव इसलिए भी महत्त्वपूर्ण थे कि इस साल नौ विधानसभा चुनावों की शुरुआत इनके साथ ही हो रही थी। फिर अगले साल लोकसभा के चुनाव होने हैं। इसलिए इनके संकेत महत्त्वपूर्ण हैं। कांग्रेस के लिए तो बहुत साफ दिख रहा है कि अगर उसे राज्यों में मजबूती से जमना है तो क्षेत्रीय सूरमा भी खडेÞ करने होंगे। एकमात्र मेघालय में उसके पास ऐसा नेता था तो उसने चुनाव जितवा दिया। बाकी जगह उसे मुंह की खानी पड़ी। इससे जाहिर है कि अगले आम चुनाव की राह उसके लिए आसान नहीं होगी। अलबत्ता कांग्रेस तो इतना कर भी गई और आलोचना सुनने जैसी हालत में भी है। पर भाजपा और कथित राष्ट्रीय राजनीति करने वालों की तो मौजूदगी भी नहीं दिखी। अगर उनकी भागीदारी इतनी दूर-दूर की होगी तो उनका पूर्वोत्तर से क्या जुड़ाव होगा! यही सवाल मीडिया और कथित सिविल सोसाइटी से भी पूछा जा सकता है। साफ है कि पूर्वोत्तर के चुनावों ने जितने सवालों का जवाब दिया है उससे ज्यादा सवाल खडेÞ कर दिए हैं। और मुल्क का ध्यान उन सवालों पर है, यह भी नहीं दिखता। http://www.jansatta.com/index.php/component/content/article/20-2009-09-11-07-46-16/40087-2013-03-04-06-21-31 |
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