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THE HIMALAYAN DISASTER: TRANSNATIONAL DISASTER MANAGEMENT MECHANISM A MUST

We talked with Palash Biswas, an editor for Indian Express in Kolkata today also. He urged that there must a transnational disaster management mechanism to avert such scale disaster in the Himalayas. http://youtu.be/7IzWUpRECJM

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS TALKS AGAINST CASTEIST HEGEMONY IN SOUTH ASIA

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Tuesday, August 6, 2013

वरवर राव का दूसरा बयान

वरवर राव का दूसरा बयान


Posted by Reyaz-ul-haque on 8/06/2013 12:30:00 PM

'मित्रो, 31 जुलाई 2013 को प्रेमचंद जयंती पर हुए कार्यक्रम में आयोजकों द्वारा सिद्धांतविहीन तरीके से एक हिंदू साम्‍प्रदायिक व्‍यक्ति व वैश्‍वीकरण के समर्थक एक कॉरपोरेट साहित्‍यकार को तर्कहीन बहस खड़ी करने की मंशा से मंच पर वरवर राव के साथ बैठाने का जो असूचित फैसला किया गया और जिसके कारण वीवी ने इसका बहिष्‍कार किया, उसके बाद शुरू हुई बहस के संदर्भ में उन्‍होंने अपनी दूसरी टिप्‍पणी भेजने के लिए मुझे कहा है। इस बात को लेकर काफी अटकलबाज़ी हुई है कि आयोजकों ने उन्‍हें यात्रा का खर्च दिया था, इसलिए यहां यह मसला साफ कर दिए जाने की ज़रूरत है। वीवी ने आयोजकों से यात्रा का कोई खर्च नहीं लिया था। उन्‍हें टिकट बुक करवा कर आयोजन में आने को कहा गया था। उन्‍हें आयोजन के स्‍वरूप के बारे में पहली बार तब पता चला जब आयोजकों ने उन्‍हें लाने के लिए कार भिजवाई। कार में उनकी सीट पर एक आमंत्रण पत्र पड़ा हुआ था जो उसमें बैठते ही उन्‍हें दिखा। वे जैसे ही गंतव्‍य तक पहुंचे, उन्‍होंने वक्‍तव्‍य नहीं देने का फैसला लिया और निकल लिए। इसके बाद उन्‍होंने एक पत्र के रूप में अपना बयान जारी किया। वीवी हिंदी में नहीं लिखते हैं। वे बोलते हैं और उनके मित्र उसे टाइप करते हैं। लेकिन भाषा के बंधन दिलो-दिमाग के अहसास को साझा करने में आड़े नहीं आ सकते। यह वीवी का दूसरा बयान है। यह उनके पहले बयान के बाद जनसत्‍ता में आई टिप्‍पणियों के संदर्भ में है।'

(जीएन साईबाबा द्वारा ईमेल से भेजे गए वरवर राव के दूसरे पत्र पर पाद टिप्‍पणी, जिसे अनुवाद कर के लगाने का अनुरोध किया गया है: मॉडरेटर, जनपथ )  


31 जुलाई 2013 को प्रेमचंद जयंती पर 'हंस' द्वारा आयोजित कार्यक्रम में हिस्सेदारी न करने का कारण मैंने उसी दिन जारी अपने पत्र में स्पष्ट कर दिया था। मैंने मुझे सुनने आए श्रोताओं से माफी की दरख्वास्त की थी। इस पत्र के जबाब में 'जनसत्ता' अखबार के संपादक ने 'हंस अकेला' शीर्षक  से संपादकीय लिख दिया। उसके दूसरे दिन अपूर्वानंद ने 'प्रेमचंद परंपरा का दायरा' लिख कर मेरी अनुपस्थिति की काफी सख्त पड़ताल की। ब्लॉग पर इस पत्र के आने के बाद टिप्‍पणियां लिखी गईं और मेरे बारे में क़यास लगाया गया कि मैंने किसी के उकसावे या बहकावे में आकर इस तरह का पत्र लिखा। 'जनसत्ता' ने तो 'युवा लेखकों का एक गुट' की खोज तक कर डाली। मुझे अभी तक ऐसे युवा लेखकों का 'गुट' नहीं मिला जो साहित्य और राजनीति में इस कदर हस्तक्षेप कर मुझे सचेत करे। मैं ऐसे किसी भी राजनीति, साहित्य और विचारधारा से लैस युवा लेखकों का जरूर स्वागत करूंगा जो मेरे होने वाली गलतियों से बचने के लिए हस्तक्षेप करे और हो गई गलतियों की आलोचना करे। यह मेरे ही नहीं बल्कि समाज के लिए भी स्वास्थ्यकर माहौल होगा जब ऐसे 'युवा लेखकों के गुटों' का उभार हो और नई ऊर्जा के साथ ठहराव को तोड़कर सर्जना की महान धारा को नेतृत्व करते हुए आगे ले जाय। निश्चय ही मुझे आगामी दिनों में जब भी दिल्ली आऊंगा तो ऐसे लेखक 'गुटों' और लेखकों से मिलने की बेसब्री रहेगी।

एक बार फिर मैं अपनी बात दुहरा दूं कि प्रेमचंद की जयंती के अवसर पर 'हंस' ने 'अभिव्यक्ति और स्वतंत्रता' विषय पर आयोजित व्याख्यानमाला में बुलाया था। यह बहस या संवाद का मसला नहीं था। मैं परिचर्चा, बहस, संवाद के आयोजनों में जाता रहा हूं और अपनी बात रखता रहा हूं। वहां निश्चय ही आयोजक को परिचर्चा में किसी को भी बुलाने की छूट रहती है और भागीदार को भी हिस्सेदारी करने की उतनी ही छूट होती है। आयोजन का स्वरूप, समय और प्रकृति से ही भागीदारी का अर्थ बनता है। इस कार्यक्रम का स्वरूप, समय और प्रकृति इसमें भागीदार वक्ता और आयोजक की मंशा दोनों से ही मेल नहीं खाता। इसलिए यह जरूरी बन गया कि मैं न केवल इसमें भागीदार न बनूं बल्कि अपना विरोध भी दर्ज कराऊं।

प्रेमचंद के संदर्भ में परंपरा और इतिहास के हवाले से मैंने जिन बातों का पिछले पत्र में उल्लेख किया था वह सामंतवाद-साम्राज्यवाद विरोधी, फासीवाद विरोधी धारा को साहित्य में मजबूत करने और अभिव्यक्ति की आजादी के लिए सतत संघर्ष करने से जुड़ा हुआ है। 1930 के दशक में भगत सिंह, राम प्रसाद बिस्मिल जैसे सैकड़ों क्रांतिकारी आर्य समाज और अन्य धार्मिक धाराओं से प्रभावित और जुड़े रहे थे। इन क्रांतिकारियों की सीख का अर्थ आज आर्यसमाजी होने या आर्य समाज के कार्यक्रमों में हिस्सेदारी करना नहीं है। इतिहास और परंपराएं समय के साथ बनते और मजबूत होते हुए हमारे तक आती हैं और आगे जाने के लिए उतनी ही जिम्मेदारी, सतर्कता और सक्रियता की मांग करती हैं। 'हंस' जिस परंपरा का निर्वाह करने का दावा कर रहा है वह उसके द्वारा आयोजित किए जा रहे पिछले कुछ कार्यक्रमों से तो फिलहाल मेल खाता नहीं दिख रहा है। शायद यही कारण भी है जिसके चलते ये कार्यक्रम विवाद के घेरे में आ रहे हैं। यह अच्छी बात है कि युवा लेखकों ने हर बार अपना प्रतिरोध, प्रतिवाद दर्ज कराया और सवाल उठाकर बहस को आगे बढ़ाया। मुझे खुशी है कि मैं इन युवा लेखकों के प्रतिरोध और प्रतिवाद का हिस्सा बन सका और उनकी उठाई बहस में हिस्सेदार बना।

यह अच्छी बात है कि ज्यादातर बहस मेरे पत्र में अशोक वाजपेयी के संदर्भ में लिखी बातों पर हो रही है। गोविंदाचार्य के समर्थन में बातें नहीं आई हैं। जितनी तेजी से दक्षिणपंथी ताकतों का असर बढ़ा है और उन्हें जितनी बेशर्मी से मंच देने का प्रचलन बढ़ा है ऐसे में गोविंदाचार्य के समर्थन में बात न आना थोड़ा आश्चर्य में डालता है। हिंदी साहित्य में दक्षिणपंथी और फासिस्ट हिंदू ताकतों को मंच देने का मुद्दा बार-बार आ रहा है और हर बार इस पर विरोध के स्वर भी बनते दिखते हैं। इस बार 'हंस' के इस कार्यक्रम में गोविंदाचार्य को बुलाने पर मुद्दा न बनना आश्चर्य में डालता है।

अशोक वाजपेयी कारपोरेट घरानों और सत्ता के गलियारे से पूरी तरह नत्थी हैं, इस बात से अस्वीकार शायद ही किसी को है। उन्हें 'धर्मनिरपेक्ष' बताकर उनकी प्रगतिशीलता सिद्ध करने का तर्क दिया गया है। विनायक सेन की रिहाई के लिए अकादमी में जगह बुक कराने के लिए सहर्ष सहयोग के आधार पर उन्हें प्रगतिशील बताया गया है। अशोक वाजपेयी को प्रगतिशील सिद्ध करने के आग्रह के दौरान उतनी ही बार मुझे 'संकीर्ण' भी बताया गया जो सिर्फ 'अपनों' के बारे में बात करता है और 'दूसरों' के बारे में चुप रहता है। यह तर्क और उसका निष्‍कर्ष जितना गुस्से का परिणाम है उससे अधिक साहित्य और राजनीति में घट रही घटनाओं में पक्षधरता और सक्रियता का भी परिणाम है। लगभग दो साल पहले जीतन मरांडी को निचली अदालत द्वारा दी गई फांसी की सजा के खिलाफ संस्कृतिकर्मियों द्वारा दिल्ली में बुलाई गई मीटिंग में मदन कश्यप ने धर्मनिरपेक्षता को वर्ग दृष्टिकोण से देखने का आग्रह किया था। वे ठीक ही इस बात को रेखांकित कर रहे थे। मैं उनकी इस बात में इतना ही और जोड़ देना चाहता हूं कि भारत की धर्मनिरपेक्षता में धर्म के दृष्टिकोण से भी देखने की जरूरत है। हिंदी साहित्य में इन दिनों सीआईए द्वारा की गई 'साहित्य सेवा' के विवाद के केंद्र में जो मुख्य बात दिख रही है वह यह कि साहित्य, साहित्य है। यही स्थिति देश में 'विकास की राजनीति' की है जिसे नरेंद्र मोदी करे तो अच्छा और टाटा-अंबानी-एस्सार करे तो अच्छा, के राग पर आगे बढ़ाया जा रहा है। यही स्थिति जन हितों की रक्षा का हो गया है जिसके झंडाबरदार आज एनजीओ के गैंग ने उठा रखा है। इनका राजनीति, साहित्य, जनसंगठन के स्तर पर विरोध संकीर्णता के दायरे में रखकर देखा जाने लगा है। इस 'संकीर्णता' को उदार लोकतंत्र की जड़ में मट्ठा डालने की तरह देखा जा रहा है। यह एक भयावह स्थिति है। यहां तसलीमा नसरीन पर हैदराबाद में हुए हमले के संदर्भ में मेरे ऊपर लगाए गए एक आरोप का जबाब देना जरूरी समझ रहा हूं। तसलीमा नसरीन को हैदराबाद बुलाने वाले लोग मुस्लिम विरोधी, कम्युनिस्ट विरोधी और अमेरीकापरस्त लोग थे। यह कार्यक्रम मुस्लिम विरोध के एक खास संदर्भ में बुलाया गया था। बहरहाल, इस हमले का मैंने और विप्लव रचितल संघम ने इसकी भर्त्सना और साथ ही आयोजक की मंशा की आलोचना किया।

तेलुगु और हिंदी साहित्य हाल के दिनों में कमोबेश एक जैसी ही घटना और विवाद से ग्रस्त रहे हैं। जब यहां मारुति मजदूरों का आंदोलन हो रहा था तो उसके सामानान्तर कान्हा रिसॉर्ट में वहां की परियोजना से प्रभावित होते लोगों से बेखबर होकर कविता पाठ का आयोजन किया गया। हमारे यहां भी येनम मजदूरों के दमन के समय गोदावरी नदी पर तैरती नावों पर पंडाल बनाकर कविता पाठ आयोजित किया गया। हिंदी में जितना यह मुद्दा विवादित रहा उतना ही तेलुगु में भी यह विवाद जोर पकड़ा। हिंदी के विश्व सम्मेलन जैसी ही स्थिति तेलुगु के विश्व सम्मेलन की स्थिति बन गई है। इस समानता और विभिन्नता के कई बिंदु हैं जिसमें कारपोरेट सेक्टर, फासिस्ट ताकतों और सत्ता की घुसपैठ एक मुख्य पहलू है। इनके हस्तक्षेप से साहित्य में तेजी से एक विभाजक रेखा पैदा हुई है और इसका असर तेजी से फैला है। 'उदार लोकतंत्र' के हवाले से अपूर्वानंद का तर्क ऐसे ही विभाजक स्थिति को दिखाता है: 'राव और उनके सहयोगियों के अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाली कविता श्रीवास्तव, तीस्ता सीतलवाड़, शबनम हाशमी या हर्ष मंदर पर हो रहे हमले उतने गंभीर नहीं हैं कि एक क्रांतिकारी कवि अपने वक्तव्य में उन्हें अपने बगल में इनायत फरमाए। (जनसत्ता, 3 अगस्त 2013)।' उपरोक्त मानवाधिकार कार्यकर्ता क्या ऐसे ही सोचते हैं जैसा अपूर्वानंद ने लिखा है? क्या उनके संगठन की चिंतन प्रक्रिया भी ऐसी ही है जिसके तहत यह तर्क गढ़ा गया है? या यह विनायक सेन की रिहाई के लिए अपूर्वानंद के किए गए उन प्रयासों से निकाले गए नतीजे हैं जिनमें 'राव और उनके सहयोगियों' के लिए कोई जगह नहीं थी? यहां इस बात की याद दिलाना जरूरी है कि उपरोक्त जितने भी नाम हैं वे विभिन्न संगठनों से जुड़े हुए लोग हैं और मानवाधिकारों के लिए संघर्ष उन संगठनों की वैचारिक अवस्थिति से निर्धारित होता है। ठीक वैसे ही जैसे अपूर्वानंद की वैचारिक अवस्थिति निर्धारित होती है। 'मैं और मेरे सहयोगी' इस सांगठनिक और वैचारिक अवस्थिति से बाहर नहीं हैं। 'राव और उनके सहयोगी' कौन हैं? अपूर्वानंद के शब्दों में 'स्वतःसिद्ध ब्रह्मांड' हैं! सरकार की नजरों में 'देश की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं'। कारपोरेट सेक्टर की नजर में उनकी लूट और कब्जे के रास्ते में 'सबसे बड़ी बाधा' हैं। मीडिया की नजर में 'राव और उनके सहयोगी' गुड़गांव के मजदूरों से लेकर छत्तीसगढ़ के आदिवासी लोगों तक में 'घुसे' हुए हैं। मैं और मेरे सहयोगियों के अधिकार और 'उदार लोकतंत्र' के अधिकार की यह खींची गई विभाजक रेखा सिर्फ बिम्ब का गढ़न नहीं है। यह कॉरपोरेट सेक्टर और फासिस्ट ताकतों द्वारा अपने मंसूबों को पूरा करने के लिए 'उदार लोकतंत्र' की सड़क को हाइवे बना देने के विचार का आरम्भिक तर्क है। 'धर्मनिरपेक्षता' में कितना धर्म छुपा हुआ है और 'उदार लोकतंत्र' में कितना कॉरपोरेट सेक्टर, कितना साम्राज्यवाद समर्थित एनजीओ और कितना सत्ता के दलाल छुपे हैं, इसकी पड़ताल किए बिना एक गोल गोल घूमने वाले दुष्चक्र में हम फंसे रहेंगे।

साहित्य का इतिहास और उसकी परंपरा इस गोल गोल घूमने वाले दुष्चक्र से निकल कर आगे जाने की रही है। प्रेमचंद ने इसी जिम्मेदारी को मशाल की तरह आगे चलने के बिम्ब की तरह ग्रहण किया और इस बात को जोरदार ढंग से कहा। तंलुगु के महान आधुनिक कवि श्री श्री ने इसी जिम्मेदारी को उठाने के लिए सक्रिय भागीदार होने का आह्वान किया। मैं ऐसी ही सीधी भागीदारी का तरफदार हूं। मुझे खुशी है ऐसी सीधी भागीदारी के तरफदारों, खासकर युवा पीढ़ी की काफी संख्या है जो आज के हालात में खड़े होने, बोलने और सक्रिय होने का साहस रखते हैं। ऐसे हमसफर साथियों को क्रांतिकारी अभिवादन के साथ,

वरवर राव
हैदराबाद, 
5 अगस्त 2013

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