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THE HIMALAYAN DISASTER: TRANSNATIONAL DISASTER MANAGEMENT MECHANISM A MUST

We talked with Palash Biswas, an editor for Indian Express in Kolkata today also. He urged that there must a transnational disaster management mechanism to avert such scale disaster in the Himalayas. http://youtu.be/7IzWUpRECJM

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS TALKS AGAINST CASTEIST HEGEMONY IN SOUTH ASIA

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Monday, July 6, 2015

अमीरज़ादों के लिए स्मार्ट सिटी, मेहनतकशों के लिए गन्दी बस्तियाँ

अमीरज़ादों के लिए स्मार्ट सिटी, मेहनतकशों के लिए गन्दी बस्तियाँ

आनन्द

dholera cityनरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली मौजूदा केन्द्र सरकार के एक साल के कार्यकाल पर नज़र दौड़ाने से यह साफ़ हो जाता है कि वह इस देश की तमाम समस्याओं का समाधान करने के लिए समस्याओं की गहराई में जाने की बजाय कुछ लोकलुभावन जुमले उछाल देती है और तमाम पूँजीवादी अख़बार और टीवी चैनल इन जुमलों को लपककर भाड़े के बुद्धिजीवियों और पत्रकारों के ज़रिये माथापच्ची का दिखावा करते रहते हैं जिनसे समस्याओं का समाधान तो नहीं होता, लेकिन लोगों में यह उम्मीद जग जाती है कि उनके अच्छे दिन भले ही एक साल में न आये हों लेकिन जल्द ही अच्छे दिन आयेंगे। इन दिनों स्मार्ट सिटी का जुमला ख़ूब उछाला जा रहा है। हमें बताया जा रहा है कि गाँवों से शहर की ओर बढ़ते हुए पलायन और शहरीकरण की बढ़ती रफ्तार के मद्देनज़र कुछ ही सालों में इस देश में 100 स्मार्ट शहर बनाये जायेंगे, जिनमें सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी की मदद से पानी व बिजली की सप्लाई, कचरा प्रबन्धन, यातायात प्रबन्धन, ऊर्जा संरक्षण, महिलाओं की सुरक्षा आदि जैसी चुनौतियों से आसानी से निपटा जा सकेगा। अच्छे दिनों की आस लगाये मोदी के अन्धसमर्थक और मध्यवर्ग का अराजनीतिक एवं कूपमण्डूक तबका अभी से एक ऐसे शहर में रहने के सपने देख रहा है जहाँ चप्पे-चप्पे पर वाई-फ़ाई होगा जिससे वे मनचाही जगह पर इण्टरनेट से जुड़ सकेंगे, जहाँ ब्लूटूथ तकनीक से वे अपने घर की बत्तियाँ व अन्य उपकरण दूर से ही नियन्त्रित कर सकेंगे, जहाँ चप्पे-चप्पे पर सीसीटीवी कैमरा लगा होगा जिससे छुटभैया चोरों से लेकर आतंकवादियों और बलात्कारियों को पकड़ना आसान हो जायेगा। लेकिन मध्यवर्ग के इन मुंगेरीलालों के हसीन सपनों के बारे में शब्द ख़र्च करने की बजाय आइये हम इस सवाल पर संज़ीदगी से सोचें कि ऐसे स्मार्ट शहरों के बनने से आम मेहनतकश आबादी की ज़िन्दगी में क्या बदलाव आयेगा।

मोदी सरकार और उसके अन्धभक्तों द्वारा स्मार्ट सिटी का जुमला उठाये जाने पर कोई भी तार्किक व्यक्ति यह सवाल उठायेगा कि मौजूदा शहरों में जो करोड़ों-करोड़ मेहनत-मजूरी करने वाले लोग नरक जैसे हालात में रह रहे हैं, उनके बारे में यह सरकार क्यों नहीं सोचती। इस देश के शहरों में तेज़ी से पनप रहे शॉपिंग मॉलों, फ्लाईओवरों और लक्ज़री अपार्टमेण्टों की चकाचौंध में आँख चौंधियाने की बजाय अगर हम उनसे थोड़ी ही दूर किसी मज़दूर बस्ती में जाकर आम मेहनतकश लोगों के रहने के हालात देखने का साहस करें तो हमें इस देश के शासकों द्वारा उठाये जा रहे जुमले किसी भद्दे मज़ाक़ जैसी उबकाई पैदा करने लगेंगे।

dharavi-slumइन शहरों की गगनचुम्बी इमारतों और शॉपिंग मॉलों की लकदक से लहालोट और मेहनतकश अवाम से कटकर अलगावग्रस्त जीवन बिता रही मध्यवर्गीय जमात आमतौर पर इस देश के बारे में जानने के लिए टीवी, अख़बारों और इण्टरनेट का सहारा लेती है। अगर वे भारत में विकसित हो रहे शहरों की असलियत जानने के लिए किसी मज़दूर बस्ती में जाने की हिम्मत करें तो पायेंगे कि जिस आबादी की वजह से शहरों की चकाचौंध क़ायम रहती है, वह ख़ुद कितनी अँधेरी दुनिया में रहती है। मज़दूर बस्तियों में पानी के लिए सुबह जल्दी उठने के बावजूद लम्बी क़तारें लगती हैं, पीने के लिए स्वच्छ पानी तो फिर भी नहीं मिलता। बोतलों में भरकर पीने वाले पानी बेचने का धन्धा मज़दूर बस्तियों में भी ख़ूब फल-फूल रहा है। ज़ाहिर है बमुश्किल पेट भरने लायक कमाने वाली मज़दूर आबादी का बड़ा हिस्सा तो साफ़ पीने के पानी से पूरी तरह महरूम होता जा रहा है। गन्दा पानी पीकर या कम पानी पीने से वे और उनके बच्चे आये दिन बीमार पड़ते रहते हैं। इन बस्तियों में नालियाँ गन्दगी से बजबजाती रहती हैं, उनमें सीवर का पानी यूँ ही बहता रहता है। कूड़ा-कचरा खुले में ही पड़ा रहता है जो बीमारियों और महामारियों का कारण बनता है। इन बस्तियों में बिजली का कोई भरोसा नहीं रहता। दिन में कई घण्टे बिजली रहती ही नहीं है और कभी-कभी तो पूरा दिन बिजली गुल रहती है। इन बस्तियों की सड़कों की खस्ता हालत देखकर कोई कह ही नहीं सकता कि ये शहर का ही हिस्सा हैं।

किसी भी सरकार की पहली प्राथमिकता तो यह होनी चाहिए कि मौजूदा शहरों की मज़दूरों एवं ग़रीबों की बस्तियों में बिजली, पानी, स्वच्छ वातावरण जैसी बुनियादी सुविधाएँ मुहैया हों। लेकिन अच्छे दिनों का वायदा करने वाली मोदी सरकार इन बुनियादी समस्याओं को हल करने की बजाय अब स्मार्ट सिटी के सब्ज़बाग दिखा रही है।

आइये देखें कि स्मार्ट सिटी होती क्या है और स्मार्ट सिटी बनाने की योजना के तहत किस तरह के शहर विकसित किये जायेंगे और इन नये शहरों में मज़दूरों की क्या स्थिति होगी। दुनियाभर में फैल चुकी मौजूदा महामन्दी के दौर में अपने मालों के लिए नये बाज़ारों के निर्माण के लिए आईबीएम एवं सिस्को जैसी कम्पनियों ने स्मार्ट सिटी के जुमले को उछालने की शुरुआत की जिसमें ऐसे नये शहर बनाने के लिए दुनियाभर की सरकारों को लालच दिया गया जिनमें सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी की मदद से पानी, बिजली, कचरा प्रबन्धन, यातायात प्रबन्धन, ऊर्जा संरक्षण जैसी बुनियादी सुविधायें मुहैया की जायेंगी। चीन एवं दक्षिण कोरिया जैसे देशों की सरकारें कई स्मार्ट शहर पहले ही बना चुकी हैं। ये बात दीग़र है कि इनमें से अधिकांश इतने ख़र्चीले हैं कि वहाँ लोग रहना पसन्द नहीं कर रहे हैं और कम जनसंख्या की वजह से इनमें से कई स्मार्ट सिटी अब घोस्ट सिटी यानी भुतहा शहर के रूप में जाने जाते हैं।

मोदी सरकार स्मार्ट शहर बनाने की योजना को पूँजीवादी विकास को द्रुत गति देने एवं विदेशी पूँजी निवेश को बढ़ावा देने की अपनी मंशा के तहत ही ज़ोर-शोर से प्रचारित कर रही है। ग़ौरतलब है कि ये स्मार्ट शहर औद्योगिक कॉरिडोरों के इर्द-गिर्द बसाये जायेंगे। इन स्मार्ट शहरों में हरेक नागरिक को एक पहचान पत्र रखना होगा और उसमें रहने वाले हर नागरिक की गतिविधियों पर सूचना एवं संचार उपकरणों एवं प्रौद्योगिकी की मदद से निगरानी रखी जायेगी। इस योजना के पैरोकार खुलेआम यह बोलते हैं कि निजता का हनन करने वाली ऐसी केन्द्रीयकृत निगरानी इसलिए ज़रूरी है ताकि किसी भी प्रकार की असामान्य गतिविधि पर तुरन्त क़दम उठाये जा सकें। स्पष्ट है कि इस तरह की निगरानी रखने के पीछे उनका मक़सद आम मेहनकश जनता की गतिविधियों पर नियन्त्रण रखना है ताकि वो अमीरों की विलासिता भरी ज़िन्दगी में कोई खलल न पैदा कर सके। इसके अलावा ग़ौर करने वाली बात यह भी है कि इन शहरों में अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी की मदद से सुविधाएँ प्रदान की जायेंगी, वे इतनी ख़र्चीली होंगी कि उनका इस्तेमाल करने की कूव्वत केवल उच्च वर्ग एवं उच्च मध्यवर्ग के पास होगी। निम्न मध्यवर्ग और मज़दूर वर्ग इन स्मार्ट शहरों में भी दोयम दर्जे के नागरिक की तरह से नगर प्रशासन की कड़ी निगरानी में अलग घेट्टों में रहने पर मज़बूर होगा।

भूमण्डलीकरण के इस दौर में जहाँ एक ओर उत्पादन से जुड़ी गतिविधियों को अनौपचारीकरण, ठेकाकरण और दादनी प्रथा के ज़रिये छोटी-छोटी फ़ैक्टरियों में बिखराने से कार्यस्थल पर मज़दूरों की एकता का आधार कमज़ोर हुआ है, वहीं दूसरी ओर इस दौर में शहरीकरण की प्रक्रिया में स्पष्ट वर्गीय ध्रुवीकरण होने से मज़दूरों के रिहायशी इलाक़ों में उनकी एकजुटता का आधार पहले से कहीं मज़बूत हो रहा है। ऐसे में मज़दूर आन्दोलन को स्मार्ट सिटी जैसी योजनाओं के मज़दूर विरोधी चरित्र का पर्दाफ़ाश करते हुए मज़दूर बस्तियों में पानी, बिजली, सड़क, नाली, सफ़ाई आदि जैसी बुनियादी सुविधाओं को मुहैया कराने की माँग के इर्द-गिर्द मज़दूरों को एकजुट करने के काम को अपने एजेण्डे में प्रमुखता से लाना होगा।

 

मज़दूर बिगुलजून 2015


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