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THE HIMALAYAN DISASTER: TRANSNATIONAL DISASTER MANAGEMENT MECHANISM A MUST

We talked with Palash Biswas, an editor for Indian Express in Kolkata today also. He urged that there must a transnational disaster management mechanism to avert such scale disaster in the Himalayas. http://youtu.be/7IzWUpRECJM

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS TALKS AGAINST CASTEIST HEGEMONY IN SOUTH ASIA

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Wednesday, June 13, 2012

राष्ट्रपति चुनाव की बाजी

राष्ट्रपति चुनाव की बाजी


Tuesday, 12 June 2012 11:06

अरुण कुमार 'पानीबाबा' 
जनसत्ता 12 जून, 2012: भारत गणतंत्र संघ है। संविधान में 'संसदीय उतरदायी' शासन तंत्र की व्यवस्था है। शासन का मुखिया प्रधानमंत्री है, लेकिन राज्याध्यक्ष राष्ट्रपति। शासन-प्रशासन की व्यवस्था, कार्यप्रणाली में संविधान ने राष्ट्रपति को सीमित और मूलत: औपचारिक कर्तव्य ही सौंपे हैं। 
मूल पाठ की इस सरल व्याख्या में दोष देखना उचित नहीं। विचारणीय प्रश्न केवल यह है कि क्या भारत संघ के राष्ट्रपति का गौरव, महिमा, भूमिका और कर्तव्य का व्यापक से व्यापक, संविधान की विस्तृत से विस्तृत व्याख्या में सीमांकन किया जा सकता है? शुभारंभ वाक्य है: भारत संघ गणतंत्र है। क्या यह घोषणा या निर्णय संविधान की कृपा पर निर्भर है? यह सहज विधान भूगोल, इतिहास, भाषा, संस्कृति आदि के वैविध्य से स्वत: निर्मित तथ्य है, बिल्कुल उसी तरह जैसे कि भारत की एकता। इसलिए भारत-विवेक से यह तथ्य चेतना-गम्य बनाना होगा कि राष्ट्रपति मात्र संघ-राज्य का मुखिया नहीं, वह गणतंत्र की समस्त इकाइयों का संरक्षक है।
यह तथ्य एक पल को भी दृष्टि से ओझल नहीं होना चाहिए कि भारत संघ की तुलना न तो संयुक्त राज्य अमेरिका से की जा सकती है और न इंग्लैंड, फ्रांस से। हमारा संघ और गणतंत्र एक सर्वथा निराली घटना है। भारत के सिर्फ अनेक राज्य नहीं, बल्कि विविध अंचल, जनपद (जिले) और गांव तक के सभी सीमांकन प्रकृति प्रदत हैं, न कि रेखा-गणितीय या प्रशासनिक सुविधा-आधारित।
नेतृत्व की अदूरदर्शिता कहिए या संयोग कि संविधान निर्माण ऐसे दौर में हुआ जब देश की एकता चिंता का केंद्रीय बिंदु थी। देश का बंटवारा हुआ था। भयावह खून-खराबा हुआ। व्यापक विस्थापन हुआ। अत: संविधान निर्मात्री सभा का भाव और मानस संघीय एकता की तरफ झुका हुआ था। प्रतिनिधियों ने लगभग एकमत से इस रुझान को स्वीकार कर लिया था। उस दौर के जटिल और नाजुक यथार्थ को देखें तो यह स्वीकार करना पड़ता है कि संविधान निर्माताओं की बड़ी उपलब्धि यही थी कि तमाम मतभेदों के बावजूद उन्होंने 'राष्ट्रीय मतैक्य' स्थापित कर लिया, शीघ्रता से संविधान पारित कर लागू करवा दिया। उस संकट काल में अनिश्चितता के वातावरण को घसीटना उचित नहीं होता।
इसके बरक्स हमें यों भी विचार करना चाहिए कि देश के बंटवारे के तत्काल बाद हम समस्त ऊर्जा और सरोकार उस समय की समस्याओं से निपटने में लगाते, गुलामी की विरासत में जो राज्य और प्रशासन मिला था उससे तत्काल छेड़छाड़ न करते- यों भी मुलम्मे से ज्यादा तो कुछ किया भी नहीं। गणतंत्र घोषणा की तिथि 1950 के बजाय 1955 तय कर लेते। संभव था, धैर्य से विचार कर सकते, बेहतर देशज सूझ-बूझ से संविधान रचते। यह तथ्य कभी नहीं भूलना चाहिए कि जल्दबाजी में जो संविधान पारित किया गया, वह मूलत: फिरंगी हाकिम का लिखा है- भाव और रूप में, पाठ और व्याख्या में भारत सरकार अधिनियम-1935 की प्रतिच्छाया है।
अपने विवेक से संविधान रचना पर संवाद करते तो सत्ता का केवल द्विस्तरीय बंटवारा नहीं करते- बल्कि चार-पांच या छह स्तरीय प्रशासन की नींव रखते। सरदार वल्लभ भाई पटेल को इतना तो सूझ भी गया था कि जिलों में चुनी हुई सरकार अनिवार्य है। थोड़ा विचार का समय मिला होता तो प्रांत के नीचे आंचलिक मंडल (जिसे कमिश्नरी कहते हैं), उसके नीचे जनपद (जिला), उसके नीचे तहसील मंडल और प्रशासन की प्राथमिक इकाई ग्राम पंचायत होती। तब राष्ट्रपति निर्वाचन मंडल में किस जनप्रतिनिधि को न रखते? 
संविधान सभा में 'पंचायत राज' विषय पर गंभीर संवाद हुआ था। मगर संविधान विधेयक के मूल पाठ में ग्राम पंचायत का जिक्र नहीं था। इस पर अनेक सदस्यों ने आवेशपूर्ण आपत्ति दर्ज करवाई। लगभग चालीस सदस्यों ने गांधीजी के हवाले से पंचायत राज का विषय उठाया था।
गांधीजी ने आजादी की पूर्व-वेला में अपने उत्तराधिकारी नेहरू से 'ग्राम स्वराज' और उसकी स्वायत्त अर्थव्यवस्था का प्रश्न उठाया था (5 अक्तूबर 1945)। नेहरू ने प्रस्ताव तभी अस्वीकृत कर दिया था। बापू ने भी कभी यह स्पष्ट नहीं किया कि वे 'स्वप्निल आदर्श' की बात नहीं कर रहे, बल्कि भारत के भूगोल-इतिहास का सवाल उठा रहे हैं। गुलामी के लंबे दौर में यह तथ्य तो विस्मृत हो चुका था कि गांव स्वायत्त सत्ता-संपन्न क्यों हैं?
स्वायत्त गांव एक रूढ़ि था या पहेली? इस तथ्य का कोई अनुमान ही शेष नहीं था कि भारतीय गांव महज प्रशासनिक इकाई नहीं है। सभी गांव एक जैसे भी नहीं थे। हर गांव का अपना सामाजिक-आर्थिक चरित्र था। यह स्पष्ट तथ्य दृष्टि से ओझल हो चुका था कि हर गांव भौगोलिक और जैव-संपदा आधार पर एक सुगठित जल भंडारण, जल निर्गम है। अत: प्रकृति प्रदत्त एक सुनियोजित कृषि-उद्योग-कौशल व्यवस्था है और इस नाते स्वायत्त प्रशासनिक इकाई भी। एक विशिष्ट निर्दिष्ट भौगोलिक क्षेत्र में बसने वाले गणों का समुदाय है- जहां पांचों मानव नृवंशों का वास है, अत: व्यवस्था का आधार पंचायतन है।
पंडित नेहरू को उस काल में यह मुहावरा तो याद था कि 'भारत अनंत वैविध्य में एकता' है। लेकिन इस मुहावरे के अर्थ से, उसकी वस्तु-स्थिति से उनका संबंध नगण्य था। गांधीजी को भी अवशेष व्यवस्था का भान तो था, लेकिन इसका 'हेतु' उन्हें भी विस्मृत हो चुका था। औपनिवेशिक शासन ने विभाजन की योजना प्रस्तुत की, तब भी हम 'अखंडता' 'अखंडता' का नारा लगाते रहे, यह तथ्य कभी स्पष्ट नहीं   किया कि हमारी एकता आंचलिक वैविध्य की परस्परता पर निर्भर एकीकृत भूगोल की है। हमने कभी यह दावा प्रस्तुत नहीं किया कि भारतवर्ष, जिसे इंडिया भी कहने लगे हैं, मूलत: आंचलिक संस्कृतियों के वैविध्य का देश है- इसकी भौगोलिक एकता इन समस्त विविधताओं की परस्परता पर निर्भर है- हिमालयी मेघदूत (जिसे फिरंगी मानसून कहने लगे) इस एकता को सूत्रबद्ध करता है। मानसून एक अतिविशिष्ट सिद्धांत है, जिसकी एकता भारतीय वैविध्य पर निर्भर है। वैविध्य है तो भारत का अस्तित्व है- यह केवल राजनीतिक उपयोग का मुहावरा नहीं।

पंडित नेहरू इस वास्तविकता से अवगत होते तो 1949 में पारित संविधान में निश्चित ही प्रांत के नीचे अंचल, जैसे उत्तर प्रदेश में कौरव प्रदेश (पश्चिमी दोआब), ब्रज प्रदेश, बुंदेलखंड, बघेलखंड, रुहेलखंड, अवध, भोजपुर, गढ़वाल, कुमायूं, भाभड़ (तराई) आदि में स्वायत्तता की बाबत अवश्य विचार करते। पंडित जी स्वयं अंग्रेज हाकिम की तरह आधुनिक-अनुदारवादी विचारों के व्यक्ति थे। लेकिन अंचल, जनपद, मंडल, गांव की विविधता और परस्परता के सिद्धांत से अपरिचित थे।
इस काल में, जैसा भी आधा-अधूरा, लंगड़ा-लूला कहिए, 'पंचायती राज' तो संविधान का हिस्सा बन चुका है। आंचलिक प्रदेशों का गठन और मांग चालू है- उत्तराखंड, झारखंड का निर्माण हो चुका है- तेलंगाना की मांग लगातार तीव्र बन रही है। हम सिर्फ यह ध्यान दिला रहे हैं कि अगर 1947-49 में पूरी तरह से परायी बुद्धि के दास न होते और थोड़ा भी स्वविवेक जागृत होता तो राष्ट्रपति चुनाव मंडल में से किस स्तर के जनप्रतिनिधि को अलग कर देते या ऐसा संविधान कैसे पारित कर लेते जिसमें जनता पर वास्तविक हुकूमत तो सुलतानशाही कलक्टर की चले, लेकिन केंद्र में नेहरू जी का प्रजातंत्र हो?
फिर स्पष्ट कर दें, हमारा मुद्दा राष्ट्रपति निर्वाचन मंडल के सीमित या अनंत विस्तार का नहीं है। हम मात्र यह विमर्श खड़ा करने का प्रयास कर रहे हैं कि पद की महिमा के अनुरूप व्यक्तित्व गढ़ने की कला भी विकसित हो सके। गांधीजी जो प्रयास अधूरा छोड़ गए हैं, उसे पूरा करने, आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी अब भारत समुदायम की है। गणतंत्र तभी बनेगा जब गण-गण सक्रिय होंगे।
वर्तमान संदर्भ में देखें तो यह कतई महत्त्वपूर्ण नहीं है कि कौन बनेगा राष्ट्रपति। आज प्रश्न है कौन बनाएगा राष्ट्रपति। इस बार निर्णय का अवसर दो नौजवान नेताओं के हाथ में है। एक हैं कांग्रेस के राहुल गांधी। दूसरे हैं समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव। शोचनीय विषय है कि जिन दो नेताओं को भारतीय राजनीति में लंबी पारी खेलनी है वे दोनों अभी तक इस विषय पर मौन हैं, या उदासीन?
राहुल फिलहाल हारे हुए नेता हैं, इसलिए उनका पहल करने से हिचकना उचित दिखाई पड़ता है। लेकिन अखिलेश क्यों रुचि नहीं ले रहे? पिता मुलायम सिंह यादव (सपा सुप्रीमो) से अनुमति ग्रहण करना अनिवार्य जैसा हो तो उस औपचारिकता का निर्वहन अवश्य करें, लेकिन उत्तर प्रदेश का युवा मुख्यमंत्री राष्ट्रपति के चुनाव में निष्क्रिय दिखाई न दे। अखिलेश को यह तथ्य नहीं भूलना चाहिए कि वे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं। निर्वाचन मंडल में कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बाद सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण मताधिकार उन्हीं के पास है।
उम्र के हिसाब से देखें तो अखिलेश यादव को अगले तीन दशक भारतीय राजनीति में सक्रिय भाग लेना और महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करना है। स्वयं उनके पिता मुलायम सिंह को इस तथ्य की गहरी सूझ-बूझ होनी चाहिए। राष्ट्रपति का चुनाव 1950 से निरंतर राजनीतिक दांव-पेच में उलझा हुआ विषय है। लंबे अरसे बाद अवसर आया है कि समाजवादी गुट महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकने की स्थिति में है। भारतीय राजनीति को दुरुस्त करने के लिए पहला कदम यही हो सकता है कि समुचित व्यक्तित्व इस पद की शोभा बढ़ाए।
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री निश्चित ही ऐसा उम्मीदवार प्रस्तुत कर सकते हैं जो राजनीति में सिर्फ बड़ी उथल-पुथल नहीं, बल्कि वास्तव में रायसीना पहाड़ी पर नई बयार बहा सकता है। आज के निराशाजनक राजनीतिक माहौल में एक नई किरण दिखाई देने लगेगी। ऐसे समुचित उम्मीदवार का नाम है गोपाल कृष्ण गांधी। और नाम भी तलाशे जा सकते हैं।
समाजवादी पार्टी पहल करने का निर्णय करे- खुल कर मैदान में उतरे। पार्टी के अधिकृत संयोजक की हैसियत से अखिलेश प्रथम संवाद राहुल गांधी से शुरू करें। दूसरी मुलाकात के लिए ममता दीदी के पास कोलकाता पहुंच जाएं। किसी भी सूरत में, इस संबंध में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री निष्क्रिय दिखाई न पड़ें। ऐसी निष्क्रियता उत्तर प्रदेश की राजनीति के लिए घातक सिद्ध होगी।
समाजवादी पार्टी चाहे तो एक सर्वथा उपयुक्त उम्मीदवार उपराष्ट्रपति पद के लिए भी मौजूद है- नाम है के विक्रम राव। उन्होंने राजनीति में 1950 के दशक से सक्रिय भागीदारी की है। वे मात्र वरिष्ठ पत्रकार नहीं, आपातकाल के विरुद्ध संघर्ष के योद्धा भी हैं।
केवल समाजवादी पार्टी नहीं, सभी राजनीतिक दलों में जो युवा नेतृत्व विकसित हुआ है वह अपनी भूमिका का महत्त्व समझेगा तो नई राजनीति का जन्म होगा।
राष्ट्रपति का चुनाव उचित अवसर है, सब मिल कर प्रयास करेंगे तो निश्चित ही शुभारंभ होगा।              (समाप्त)

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