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THE HIMALAYAN DISASTER: TRANSNATIONAL DISASTER MANAGEMENT MECHANISM A MUST

We talked with Palash Biswas, an editor for Indian Express in Kolkata today also. He urged that there must a transnational disaster management mechanism to avert such scale disaster in the Himalayas. http://youtu.be/7IzWUpRECJM

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS TALKS AGAINST CASTEIST HEGEMONY IN SOUTH ASIA

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Thursday, June 14, 2012

मनमोहन सिंह को चाहिए नई छवि

http://www.jansatta.com/index.php/component/content/article/20-2009-09-11-07-46-16/21692-2012-06-14-04-26-39

Thursday, 14 June 2012 09:55

अरुण कुमार त्रिपाठी 
जनसत्ता 14 जून, 2012: अण्णा टीम की तरफ से चौदह मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोपों की सूची के साथ प्रधानमंत्री को भी नत्थी किए जाने, कांग्रेस कार्यसमिति में सोनिया गांधी का वरदहस्त हासिल होने और आर्थिक सुधारों के लिए पहल किए जाने के साथ ही ममता बनर्जी का वीटो हो जाने की नाटकीय घटनाओं के बीच देश और दुनिया के दो महत्त्वपूर्ण पत्रकारों की टिप्पणियां गौर करने लायक हैं। एक टिप्पणी है, मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार रह चुके हरीश खरे की। वे लिखते हैं कि प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने तमाम गलतियां की होंगी लेकिन वे भ्रष्ट नहीं हो सकते। उन्होंने राजनीतिक मोर्चे पर भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को सम्मान और छूट देकर गलती की और आर्थिक मोर्चे पर उन नीतियों को अपना कर गलती की, जो देश को एक ऐसे लालची और दमनकारी पूंजीवाद की तरफ ले जाती हैं जिससे असमानता और अन्याय का जन्म होता है। खरे मानते हैं कि मनमोहन सिंह की शालीनता और सुलह-सपाटे की राजनीति ने उनके नेतृत्व को नुकसान पहुंचाया। अगर उन्होंने राडिया टेप का मामला सामने आते ही कार्रवाई की होती तो इस कॉरपोरेट युद्ध में वे इतनी बुरी तरह से घिरे न होते।
दूसरी तरफ 'न्यूयार्क टाइम्स' के अपने स्तंभ में थामस एल फ्रीडमैन लिखते हैं कि आज के वैश्विक आर्थिक संकट का सबसे पीड़ादायक पहलू यह है कि कहीं कोई राजनीतिक नेतृत्व नहीं है। किसी के पास जनता को सच बताने का साहस नहीं है। उनका मानना है कि अर्थव्यवस्था का संकट गहरा है और नेतृत्व कमजोर है। यह एक बुरा संयोग है जिसे आने वाले दिनों में अस्थिरता पैदा करने वाली नीतियों का सामना करना पड़ सकता है और उसके कारण आर्थिक बहाली मुश्किल हो सकती है। हालांकि फ्रीडमैन अपनी टिप्पणी में वैश्विक अर्थव्यवस्था के चार स्तंभों में यूरोप, अमेरिका, चीन और अरब का ही हवाला देते हैं, वे भारत का जिक्र भी नहीं करते। फिर भी अगर किसी पांचवें खंभे की कल्पना की जा सकती है तो वह भारत ही है। 
जो लोग मानते हैं कि आज भारत की राजनीतिक स्थितियां किसी आर्थिक नीति के लिए आमराय कायम करने वाली नहीं हैं और उनमें जितना टकराव आज है, भविष्य में उससे भी ज्यादा होगा, वे इसके लिए महज प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के शालीन व्यक्तित्व को दोष देकर नहीं बच सकते। मनमोहन सिंह चुनाव जीत कर और दांव-पेच खेल कर आगे बढ़ने वाले राजनीतिज्ञ नहीं हैं। उनका मजबूत पक्ष अर्थशास्त्र या साफ कहें तो उदारीकरण की नीतियों की समझ और उसके प्रति विश्वास रहा है। लेकिन उनकी राजनीति हमेशा कमजोर रही है। वह उनका क्षेत्र भी नहीं रहा है। उस काम को कांग्रेस पार्टी और यूपीए की प्रमुख सोनिया गांधी को संभालना था, उनके अन्य सहयोगियों को संभालना था। 
यूपीए-2 के गठन के साथ सोनिया गांधी के नेतृत्व में जो राष्ट्रीय सलाहकार परिषद बनी वह प्रधानमंत्री से जुड़ी आर्थिक सलाहकार परिषद के मुकाबले एक रचनात्मक राजनीतिक संस्था के तौर पर ही काम करने वाली इकाई दिख रही थी। पर पिछले कई महीनों से वह ठप पड़ी है। लोगों को सामाजिक सुरक्षा देने के लिए आवश्यक खाद्य सुरक्षा विधेयक लटका पड़ा है। इस बीच योजना आयोग 28.35 रुपए रोजाना कमाने वाले शहरी और 22.42 रुपए कमाने वाले ग्रामीण को गरीबी रेखा से ऊपर मान कर लोगों के भीतर नई निराशा और खीझ का संचार किया है। उधर शिक्षा को मौलिक अधिकार बना कर सरकार ने जो एक बड़ा बदलाव लाने का इरादा जताया था वह राज्य सरकारों और निजी स्कूलों के विरोध के बीच जमीन पर उतर नहीं पा रहा है। 
अगर यह कहा जाए कि उदारीकरण की अर्थनीति गरीबों को अमीर बनाने के लिए थी भी नहीं, वह जीडीपी बढ़ाने और मध्यवर्ग को समृद्ध बना कर सामान्य व्यक्ति तक लाभ देने की थी तो भी प्रधानमंत्री की आर्थिक कहानी विफल होती नजर आ रही है। गरीब और किसान के अपने दुख तो हैं ही, वह मध्यवर्ग भी निराश और बेचैन है जो मनमोहन सिंह को अपना नायक मानता था। मनमोहन सिंह इस देश में किसी जाति, धार्मिक समुदाय या किसी राज्य की जनता के नायक कभी नहीं रहे। वे आम आदमी के नायक भी नहीं थे। उन्हें सिर-माथे पर बिठाने वाला मीडिया और वह मध्यवर्ग है जो उनके उदारीकरण में अपना मोक्ष देख रहा था। वे उस मध्यवर्ग की आकांक्षाओं के ही नहीं, वैश्विक पूंजीवाद के एक प्रबंधक हैं। उन्होंने इन नीतियों की राष्ट्रीय स्तर पर कोई मौलिक परिकल्पना नहीं की है। उन्होंने 'वाशिंगटन सहमति' और विश्व व्यापार संगठन के समझौतों के स्तर पर तैयार होने वाले ढांचागत सुधार कार्यक्रमों को लागू करने का काम किया है। 
यही वजह है कि जब अण्णा हजारे का भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन जोर पकड़ने लगा तो उन्हें समझाया गया कि यह तो आप का ही प्रशंसक मध्यवर्ग है। इस पर दमन न कीजिए। इसे थोड़ी सक्रियता दिखा कर, कुछ सम्मान देकर और कोई संस्था बनाने का आश्वासन देकर फुसला लीजिए। सब कुछ ठीक हो जाएगा।कुछ लोगों ने यह भी कहा कि यह आंदोलन स्वयं मनमोहन सिंह की तरफ से प्रायोजित है, ताकि उनकी सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ बढ़ता गुस्सा निकल जाए और बाकी तमाम जनवादी आंदोलन कमजोर पड़ जाएं। यह अलग बात है इसी बहलाने और फुसलाने में वह मध्यवर्ग हाथ से निकलता नजर आया। 

तब दो व्याख्याएं प्रस्तुत की गर्इं। कहा गया कि हो न हो, इसके पीछे संघ परिवार हो। दूसरी व्याख्या यह थी कि ये लोग उदारीकरण के भूखे हैं। इन्हें   आपने उसके 'हैवी डोज' की इतनी आदत डाल दी है कि वे 'कम डोज' में बेचैन होने लगते हैं। प्रधानमंत्री के सहयोगियों ने बाबा रामदेव का शुरू में लाल कालीन बिछा कर स्वागत इसलिए किया कि रामदेव तमाम स्वदेशी डुगडुगी बजाने के बावजूद योग के अंतरराष्ट्रीय ब्रांड हैं। अब भला बहुराष्ट्रीय निगमों के उदारीकरण की भक्तिमें डूबे सलाहकार कैसे किसी ब्रांड की अवहेलना कैसे करते। वह तो बाद में रामलीला मैदान में देहाती समर्थकों को पाकर आधी रात को लाठी चलाने और लोगों के हाथ-पैर तोड़ने का फैसला किया गया जो मनमोहन सिंह की शालीनता वाली छवि के सर्वथा विपरीत था। 
मनमोहन सिंह सचमुच बुरे नहीं हैं, न ही उनके परिवार के किसी सदस्य पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं। पर वे लालची और क्रूर पूंजीवादी हितों को साधने वाले सलाहकारों से घिरे हैं। उनके सलाहकार इन आंदोलनों की आड़ लेकर अपना उल्लू सीधा करने में लगे हैं। उनकी स्थिति उस नवाब जैसी है जिसने रात में महल के आसपास सियारों को हुंआते हुए सुना तो सुबह दरबारियों से पूछा कि वे क्यों रो रहे हैं? दरबारियों ने कहा महराज वे ठंड में ठिठुर रहे हैं। उन्हें कंबल चाहिए। नवाब ने आदेश दिया कि उन्हें कंबल बांट दिया जाए। लेकिन सियारों का रोना बंद नहीं हुआ। इस पर उन्होंने पूछा कि अब वे क्यों रो रहे हैं तो दरबारियों ने कहा कि अब रो नहीं रहे हैं, आपको दुआएं दे रहे हैं। जाहिर है कंबल कहां गया होगा। प्रधानमंत्री इसी तरह के प्रशासकों, बौद्धिकों और जनमत बनाने वालों से घिरे हैं जो उन्हें आर्थिक सुधारों का कंबल बार-बार बांटने की सलाह दे रहे हैं, बिना इस बात की परवाह किए कि इस देश की आर्थिक और राजनीतिक समस्याओं की हकीकत क्या है? 
प्रधानमंत्री की मुश्किल यह है कि वे यह कैसे स्वीकार करें कि उदारीकरण की कहानी अब उपसंहार पर पहुंच चुकी है। उसका नफा-नुकसान पूरी दुनिया के सामने है। दुनिया के संपन्न तबके ने उसका खूब फायदा उठाया है, लेकिन अब वह उससे ज्यादा फायदा नहीं उठा पा रहा है क्योंकि उसके सामने विशाल गरीब वर्ग और वित्तीय और पर्यावरणीय अड़चनें आकर खड़ी हो गई हैं। लेकिन यहां भी प्रधानमंत्री का सलाहकार वर्ग उन नीतियों की विफलता के लिए पहले वामपंथ और अब ममता बनर्जी को दोषी बता कर उन्हें गलतफहमी में रखे हुए है। बीच में माओवादी बहाने के तौर पर मिले थे और अब अण्णा हजारे और रामदेव मिल गए हैं। 
बहुत संभव है मनमोहन सिंह इन नीतियों की सीमाएं समझते हों, तभी वे कह भी रहे हैं कि स्थिति 1991 जैसी आ गई है। उनकी दिक्कत यह है कि वे एक घाघ राजनीतिक हो नहीं सकते और अपनी नीतियों को पूरी तरह पलट देने वाले अर्थशास्त्री भी नहीं बन सकते।
हालांकि एक प्रोफेसर के तौर पर उनका अतीत वामपंथी रुझानों का रहा है। इसके दो प्रमाण मौजूद हैं। पंजाब के एक नक्सली नेता हाकम सिंह पर तो पुलिस ने उन्हें अपना सहयोगी बताने के लिए दबाव भी डाला था। पर उन्होंने उनका नाम न लेकर उन्हें बचा दिया। दूसरी बार जब वे 1980-82 के बीच योजना आयोग के सदस्य थे तो बिहार के नक्सलवाद पर किया गया उनका अध्ययन भी जन-विरोधी नहीं था। 
लेकिन आज जिस तरह से उनके सलाहकार और समर्थक उन्हें कड़े फैसले लेने के लिए ललकार रहे हैं, वह आर्थिक भाषा तो हो सकती है लेकिन राजनीतिक कतई नहीं। इस भाषा-शैली से कट््टर नवउदारवादी भले खुश होते हों लेकिन आम जनता चिढ़ती है। मनमोहन सिंह के पास दो साल का मौका है। इस बीच वे अपनी ही नीतियों को नया आयाम दे सकते हैं और देश में बढ़ती राजनीतिक अनिश्चितता को स्थिरता। यह तभी हो सकता है जब वे तमाम सलाहकारों को दरकिनार कर नया राजनीतिक अर्थशास्त्र गढ़ें, जो चीन की तरह तरक्की को आम जन तक ले जाए, उसकी गरीबी मिटाए और विभिन्न क्षेत्रों में घटते उत्पादन और घटती वृद्धि दर को रोक सके। यानी वह सचमुच समावेशी हो। 
हालांकि अच्छा अर्थशास्त्र किसी अच्छी और कामयाब राजनीति की गारंटी नहीं होता, लेकिन अगर वह मायावती जैसे अहंकारी तेवर के बजाय मनमोहन सिंह जैसी शालीनता के साथ किया जाए तो कोई वजह नहीं कि उसके अच्छे परिणाम न निकलें। वैश्विक मंदी के बावजूद 2009 के आम चुनाव में यूपीए का ज्यादा संख्याबल के साथ सत्ता में लौटना उसका प्रमाण है। संभव है ऐसा करते हुए मनमोहन सिंह एक राजनेता के तौर पर अपनी अविस्मरणीय छाप छोड़ जाएं।

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