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THE HIMALAYAN DISASTER: TRANSNATIONAL DISASTER MANAGEMENT MECHANISM A MUST

We talked with Palash Biswas, an editor for Indian Express in Kolkata today also. He urged that there must a transnational disaster management mechanism to avert such scale disaster in the Himalayas. http://youtu.be/7IzWUpRECJM

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS TALKS AGAINST CASTEIST HEGEMONY IN SOUTH ASIA

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Thursday, June 7, 2012

लालची लोग मजारों को भी नहीं बख्शा! Written by डॉ .असगर अली इंजीनियर

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लालची लोग मजारों को भी नहीं बख्शा!

जैसा कि हम लगातार कहते आए हैं, सूफी इस्लाम किसी भी बहुसांस्कृतिक व बहुवादी समाज के लिए पूरी तरह से उपयुक्त है। यही कारण है कि सूफी इस्लाम भारत में फला-फूला। न केवल भारत की धरती ने कई महान सूफियों को जन्म दिया वरन् हमारे देश ने ईरान, अरब देशों और मध्य एशिया से बड़ी संख्या में सूफी संतों को आकर्षित भी किया।

वे यहां आए और उनमें से कई यहीं के होकर रह गए। भारत सदियों से बहुवादी देश रहा है। इतिहास में भारत कभी एक धर्म, एक भाषा या एक संस्कृति का देश नहीं रहा। यहां हमेशा से कई धर्म और संस्कृतियां एक साथ पल्लिवत-पुष्पित हुईं।

हजरत मोईनुद्दीन चिष्ती मूलतः ईरान के थे। वे ईरान से मध्य एशिया के रास्ते भारत पहुंचे। कहा जाता है कि पैगम्बर मोहम्मद ने उन्हें स्वप्न में आकर कहा था कि वे भारत जाएं और इस्लाम के सन्देश को वहां फैलाएं। हदीस साहित्य हमें बतलाता है कि पैगम्बर साहब को भी भारत बहुत प्यारा था। एक हदीस के अनुसार उन्होंने एक बार फरमाया था कि "मुझे हिन्दुस्तान की तरफ से ठंडी हवा आ रही है।"

इस साल हजरत मोईनुद्दीन चिश्ती को गुजरे 800 साल हो जाएंगे। उनकी मृत्यु 1212 ई. में हुई थी। अजमेर में, जहां उनका मकबरा है, 30 हजार से ज्यादा जायरीन इस अवसर पर आयोजित विशेष कार्यक्रम में उनके प्रति अपने सम्मान का इजहार करने पहुंचे।

आखिर सूफी संतों की मजारों पर मेले क्यों लगते है? क्या कारण है कि इसके चौथाई लोग भी बड़े से बड़े बादशाह की कब्र पर नहीं जुटते-चाहे फिर उस बादशाह ने आधी दुनिया पर राज क्यों न किया हो। अगर हम धर्म को सही परिपेक्ष्य में समझना चाहते हैं तो हमारे लिए इसका कारण समझना आवश्यक है।

बादशाह भी उसी धर्म के थे जिसके सूफी संत। परंतु बादशाहों को षायद ही कोई श्रद्धा की निगाह से देखता हो। दूसरी ओर इन फकीरों, जिनके पास कोई दुनियावी दौलत नहीं थी और जिनके लिए दो वक्त की रोटी जुटाना भी मुश्किल था, की स्तुति करने वालों की संख्या लाखों-करोड़ों में है। इस प्रश्न का उत्तर बहुत कठिन नहीं है। बादशाह जबरदस्ती अपनी प्रजा पर शासन करते थे, वे गरीब किसानों का खून चूसते थे और खुद अत्यंत ऐश्वर्यपूर्ण जीवन बिताते थे। उन्हें उनकी शानोशौकत बहुत प्यारी थी और उन्हें अपनी इस शानोशौकत और अपने राज को बचाए रखने के लिए लंबी-चैड़ी सेनाओं की जरूरत पड़ती थी।

दूसरी ओर, सूफी संतों का जीवन पूरी तरह सादगीपूर्ण था। वे सभी को सम्मान और प्रेम की दृष्टि से देखते थे। उनके लिए राजा और रंक में कोई अंतर न था। अगर वे भूखे भी हों तब भी वे अपनी रोटी किसी गरीब को देने में नहीं हिचकिचाते थे। वे किसी को निराश नहीं करते थे। यह अलग बात है कि आज इन सूफी संतों की मजारों पर लालची लोगों का कब्जा हो गया है जो चमत्कार का वायदा कर परेशानहाल लोगों को लूटते हैं। परंतु जहां तक सूफी संतों का सवाल है वे बहुत सादा और पूर्णतः नैतिक जीवन जीते थे।

जो लोग धर्मों और सभ्यताओं के टकराव की बात करते हैं उन्हें धर्म और सभ्यता का असली अर्थ समझने के लिए सूफी संतों के जीवन का अध्ययन करना चाहिए। सूफी संत कभी सत्ता के पीछे नहीं दौड़े। उन्होंने कभी किसी पर अपनी प्रभुता कायम करने की कोशिश नहीं की। धर्मों के बीच टकराव तब होगा जब धर्म का इस्तेमाल व्यक्तिगत हितों व महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने और सत्ता पाने के लिए किया जाएगा। जब धर्म का इस्तेमाल सत्ता पाने के लिए किया जाएगा तो अलग-अलग धर्मों के शासकों के बीच तो टकराव होगा ही, एक ही धर्म के राजा भी एक-दूसरे से लड़ेंगे।

आज के वैश्विक परिदृश्य को देखने से हमें सतही तौर पर ऐसा लगता है कि धर्मों और सभ्यताओं के बीच टकराव हो रहा है। दरअसल, यह विभिन्न देशों, विशेषकर विश्व पर अपनी प्रभुसत्ता कायम करने के इच्छुक अमरीका, की अपने-अपने हितों की रक्षा की लड़ाई है। इसके ठीक विपरीत, सूफी संत सभी को एक बराबर चाहते थे। वे हरेक के अधिकारों और गरिमा की रक्षा करते थे। वे दयालु थे और किसी की भी सहातया करने से उन्हें गुरेज न था। वे लोगों के दिलों पर राज करते थे, जमीनों और महलौ पर नहीं।

मोईनुद्दीन चिश्ती वह्दत्-अल्-वजूद के सिद्धांत पर विशवास करते थे। यह सिद्धांत सभी मानवों की एकात्मकता की बात कहता है और इसके केन्द्र में है सबके प्रति प्रेम। वह्दत्-अल-वजूद के प्रणेता महियादीन-इब्न-अरबी कहते थे कि दीन और शारीयत प्रेम में केवल है और प्रेम के अतिरिक्त कुछ नहीं है।

वे अलग-अलग धर्मों के मानने वालों के बीच भेद नहीं करते थे। मोईनुद्दीन चिश्ती इब्न-अरबी के सच्चे अनुयायी थे और हमेशा उनके बताए रास्ते पर चलते रहे। वे पूरी मानव सभ्यता के प्रति प्रेम से परिपूर्ण थे। वे कहा करते थे कि सूरज अपनी रोशनी देने में भेदभाव नहीं करता। नदी बिना यह विचार किए की कोई व्यक्ति किस धर्म का है, सबकी प्यास बुझाती है।

पेड़ फल देने के पहले यह नहीं सोचता कि उसे पाने वाला कौनसी भाषा बोलता है और किस सांस्कृतिक पृष्ठभूमि का है। ख्वाजा साहब ने हमेशा समाज के कमजोर और दमित वर्गों, शोषितों और गरीबों का साथ दिया।

एक बार एक व्यक्ति उनके पास आया और उनसे कहा कि एक सरकारी मुलाजिम ने उसकी जमीन पर बेजा कब्जा कर लिया है और उसकी रोटी-रोजी का सहारा छिन गया है। ख्वाजा साहब तुरंत उसे लेकर दिल्ली पहंऊचे और सुल्तान शमसुद्दीन इल्तुतमिश से मिलकर उस गरीब व्यक्ति की जमीन उसे वापिस दिलवाई। सुल्तान ने ख्वाजा से पूछा कि उन्होंने दिल्ली तक आने की तकलीफ क्यों की। सुल्तान ने कहा कि अगर यह व्यक्ति आपकी चिट्ठी लेकर भी आ जाता तो मैं उसे उसकी जमीन वापिस दिलवा देता। ख्वाजा ने उत्तर दिया कि किसी दमित व्यक्ति के साथ समय बिताना और व्यक्तिगत तौर पर उसकी मदद करना सच्ची इबादत है।

ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की बगदाद में एक ऐसे दरवेश से मुलाकात हुई जो अपने रहने के स्थान से पिछले 30 सालों से बाहर नहीं निकला था। ख्वाजा साहब ने उससे पूछा कि वह अपने घर से बाहर क्यों नहीं जाता। दरवेष ने जवाब दिया कि "पहले मैं भी आपकी तरह खूब घूमा-फिरा करता था। एक दिन जब मैं कहीं जा रहा था तब मैंने देखा कि एक बाहुबली एक असहाय गरीब को सता रहा है। मैंने अत्याचारी के खिलाफ आवाज नहीं उठाई और वहां से चला आया।

उसके बाद मुझे एक दैवीय वाणी सुनाई दी जिसने मुझसे कहा कि हे दरवेश, तूने एक व्यक्ति का दमन होते देखा और तू चुप रहा। इससे बड़ा कोई गुनाह तू नहीं कर सकता था।" दरवेष ने कहा कि तबसे उसने घर से बाहर निकलना ही बंद कर दिया कि कहीं ऐसा न हो कि वह फिर किसी गरीब-असहाय को पिटता देखे और चुप रह जाए।

ख्वाजा अक्सर दरवेश की इस कहानी को दोहराया करते थे ताकि लोगों को यह प्रेरणा मिले कि वे हमेशा गरीब, दमित और शोषित की मदद करें। इसी उद्धेश्य से ख्वाजा ने एक बड़ा लंगर शुरू किया था। लंगर में केवल शाकाहारी खाना पकाया जाता था ताकि किसी भी धर्म के गरीब को वहां खाने में संकोच न हो। वे नहीं चाहते थे कि उनकी दर से कोई भी आदमी भूखा जाए।

सभी सूफी संत सुलह-ए-कुल अर्थात पूर्ण शान्ति के सिद्धांत में विशवास करते थे। वे सभी धर्मों के मानने वालों के साथ शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के हामी थे। वे सभी धर्मों और पंथों के प्रति सहिष्णुता में विशवास रखते थे। स्पष्ट है कि अगर धर्म का इस्तेमाल केवल आध्यात्मिक शक्ति के रूप में किया जाए तो वह आदमी को पूरी तरह बदल डालने में सक्षम है।

धर्म किसी भी व्यक्ति को दूसरों के प्रति सहिष्णुता, प्रेम और सभी का सम्मान करने वाला व्यक्ति बना सकता है। इसके विपरीत, जब धर्म का इस्तेमाल सत्ता पाने के लिए, किसी अन्य निहित स्वार्थ की पूर्ति के लिए या लालच में अंधे होकर किया जाता है तो इससे उपजती है हिंसा, घृणा और युद्ध।

विभिन्न धर्मावलंबियों के बीच हिंसा, धर्म के कारण नहीं बल्कि उसके गलत इस्तेमाल के कारण होती है। धर्म का इस्तेमाल किस उद्धेश्य से किया जा रहा है इसपर यह निर्भर करता है कि वह शान्ति का वाहक बनेगा या युद्ध का कारण। ठीक सूफी संतों की तरह थे हिन्दू परंपरा के भक्ति संत। वे भी केवल और केवल ईश्वर से प्रेम करते थे। सत्ता और माया में उनकी तनिक भी दिलचस्पी न थी। अधिकाँश आम हिन्दू और मुसलमान अपने-अपने धर्मों के प्रति सच्चे मन से निष्ठावान थे और इसलिए उनमें कभी कोई प्रतिद्वंद्विता या टकराव नहीं होता था। टकराव तो होता था बादशाहों, राजाओं, जमीदारों और सामंतों के बीच जो धर्म के नाम पर अपने साम्राज्य का विस्तार करने के लिए खून-खराबा करते थे।

जहां तक सत्ता की खातिर धर्म के बेजा इस्तेमाल का सवाल है आज का सत्ताधारी वर्ग, 13वीं शताब्दी के सत्ताधारी वर्ग से कोई बहुत अलग नहींे है। आज के अधिकाँश राजनैतिक दल वोट कबाड़ने के लिए धर्म का इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्हें न साम्प्रदायिक तनाव की चिन्ता है और न दंगों से कोई परेशानी बशर्ते उनके हित सधते रहें। राजनीति के अध्येताओं का एक बड़ा हिस्सा यह मानता है कि नरेन्द्र मोदी ने सन् 2002 के गुजरात विधानसभा चुनाव में विजय प्राप्त करने के लिए ही गुजरात में साम्प्रदायिक दंगे करवाए थे। हमारे देश में होने वाली अधिकाँश साम्प्रदायिक हिंसा का मूल चरित्र राजनीतिक होता है।

जो राजनेता जानबूझकर साम्प्रदायिक हिंसा भड़काते हैं, उन्हें भी अजमेर के ख्वाजा की दरगाह पर मत्था टेकने में कोई समस्या नहीं है, यदि इससे उनकी छवि बेहतर होती हो और उन्हें मुसलमानों के वोट मिलने की संभावना बढ़ती हो। हमारे राजनेताओं की अवसरवादिता की कोई सीमा नहीं है। उनके लिए सत्ता का प्रेम इतना महत्वपूर्ण है कि वे प्रेम की सत्ता का स्वाद तक चखने की स्थिति में नहीं हैं। इसके ठीक उलट, सूफी संत सत्ता से प्यार नहीं करते थे। उनके लिए प्यार की सत्ता ही सबसे महत्वपूर्ण थी।

वे सत्ताधारियों से पर्याप्त दूरी बनाकर रखते थे। ख्वाजा ने एक बार कहा था कि उनके लिए लोगों की सेवा सबसे महत्वपूर्ण है क्योंकि लोगों से प्रेम करना ही ईश्वर से प्रेम करना है। उनका धर्म, प्रेम और सेवा का धर्म था। राजा-बादशाह तो डंडे के बल पर राज करते ही थे हमारे आज के कथित प्रजातांत्रिक शासक भी यही कर रहे हैं। दूसरी ओर, संत प्रेम के बल पर राज करते थे।

राजाओं और बादशाहों का नाम उनके इस दुनिया से जाने के कुछ ही सालों बाद मिट जाता है। जो लोग मानवता से प्रेम करते हैं और उसकी सेवा में अपना जीवन होम कर देते हैं वे हमारे दिलों में बसते हैं। वे कभी नहीं मरते। चूंकि सूफी संतों ने सभी से प्रेम किया और सभी की मदद और सेवा की इसलिए उनके भक्तों में सभी धर्मों और जातियों के लोग शामिल हैं।

कुछ महीनों पहले जब मैं सुश्री अरूणा राॅय, युगल किशोर षास्त्री और अन्यों के साथ शान्तियात्रा में अजमेर पहुंचा था तब मैंने ख्वाजा साहब की दरगाह पर लगभग एक घंटा बिताया था। उस समय मैंने देखा था कि दरगाह में मत्था टेकने वाले हिन्दुओं की संख्या मुसलमानों से कई गुना थी। यह दृश्य मैं कभी नहीं भूल सकता।

जिस गहन शान्ति और परमानंद का अनुभव मुझे दरगाह में हुआ था ठीक वैसा ही मैंने तुर्की में मौलाना रूमी की दरगाह पर महसूस किया था। इस दरगाह के मुख्य दरवाजे पर लिखा है "यह प्रेमियों का काबा है।" मुसलमान, ईसाई, यहूदी और अन्य धर्मों के लोग इस दरगाह पर आते हैं। मैंने इन दो स्थानों पर जिस शान्ति और आनंद का अनुभव किया, वह न भूतो न भविष्यति था। प्रेम और सेवाभाव हमें कितनी आध्यात्मिक शक्ति देता है यह वही समझ सकता है जो इस अनुभव से गुजरा हो।

आप पूछ सकते हैं कि इन स्थानों पर होने वाले कर्मकाण्ड और वहां के बारे में फैलाए गए अंधविश्वासों का क्या? उन खादिमों का क्या जो जायरीनों को लूटने पर आमादा रहते हैं? मेरा उत्तर वही होगा-यह भी धर्म का दुरूपयोग है। यद्यपि इसकी प्रकृति राजनीतिज्ञों द्वारा धर्म के दुरूपयोग से भिन्न है। यह उन सिद्धांतों के खिलाफ है जिनकी ख्वाजा साहब ने जीवन भर पैरवी की थी। कहने की आवश्यकता नहीं कि इस मंजर को बदला जा सकता है। मैं इस सिलसिले में एक बार फिर मौलाना रूमी की दरगाह की चर्चा करना चाहता हूं। वहां एक भी खादिम नहीं है। कोई भी आसानी से अंदर जा सकता है और शांतिपूर्वक खड़े होकर प्रार्थना कर सकता है और आध्यात्मिक आंनद का अनुभव कर सकता है। इसके बाद वहां पर फातेहा पढ़कर आप वापिस जा सकते हैं। अगर आप कोई रकम दान देना चाहते हैं तो दान पेटियां उपलब्ध हैं परंतु कोई आपसे यह नहीं कहता की आपको इतना दान देना ही है।

क्या हम भारत की सूफी दरगाहों के हालात में सुधार नहीं ला सकते? अगर हम अपने आपको नहीं बदल सकते तो कम से कम सूफी दरगाहों में मची अफरातफरी और लूटमार को तो नियंत्रित कर ही सकते हैं। यह महान सूफी संतों को हमारी छोटी सी विनम्र श्रद्धांजलि होगी।

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