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THE HIMALAYAN DISASTER: TRANSNATIONAL DISASTER MANAGEMENT MECHANISM A MUST

We talked with Palash Biswas, an editor for Indian Express in Kolkata today also. He urged that there must a transnational disaster management mechanism to avert such scale disaster in the Himalayas. http://youtu.be/7IzWUpRECJM

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS TALKS AGAINST CASTEIST HEGEMONY IN SOUTH ASIA

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Saturday, July 13, 2013

पतनशील मीडिया के पत्रकार कॉमेडियन रीलीफ देते हैं

पतनशील मीडिया के पत्रकार कॉमेडियन रीलीफ देते हैं

12 JULY 2013 ONE COMMENT

विकास संवाद में पी साईंनाथ ने मीडिया को मुनाफे का गुलाम बताया

♦ पशुपति शर्मा

P Sainath 350सुखतवा, केसला के जंगलों को रात के अंधेरे में चीरती हुई हमारी गाड़ी रात करीब डेढ़ से दो बजे के बीच प्रदान के कैंपस में पहुंची। पेट में चूहे दौड़ रहे थे और उनींदी सी रोली शिवहरे पुरानी चिरपरिचित गर्मजोशी से सभी साथियों का स्वागत कर रही थीं। बावजूद इसके इतनी रात गये ये बेतकल्लुफी कौन करता… कौन ये कहता कि हमें भूख भी लग रही है, सो हम सभी अपने-अपने कमरों में जा विराजे। कुछ देर बाद अखलाक ने मेरा दरवाजा खटखटाया, वो बिस्किट का एक डिब्बा कहीं से जुगाड़ लाया था। तब तक मैं भी अपने बैग से बिस्किट के एक-आध पैकेट ढूंढ चुका था। खैर, दो चार बिस्किट चबाये, पानी गटका और सो गये।

सुबह नींद खुली, तो सतपुड़ा के जंगलों का पिछले साल सा एहसास। आंखें रूम के कमरों से ही वो पंडाल भी ढूंढने लगीं, जो पचमढ़ी में तना था। नाश्‍ता हुआ और कुछ देर बाद हम उस हॉल में जा पहुंचे, जहां सातवां विकास संवाद शुरू हो चुका था। साथियों के परिचय का सिलसिला जारी था। सत्र की औपचारिक शुरुआत के साथ ही संचालक चिन्मय मिश्र ने वो बात कह डाली, जो मन में उमड़-घुमड़ रही थी – पचमढ़ी का एक्सटेंशन है केसला। सच, वही सतपुड़ा की पहाड़ियां और वैसे ही सघन सत्र। बंदरों की धींगामुश्ती इस बार के सत्रों में व्यवधान उत्पन्न नहीं कर पायी, क्योंकि पंडाल का विस्तार प्रदान के पक्के सभागृह में तब्दील था।

सुनील भाई ने 'संघर्षों के राष्ट्रीय संदर्भ' से अपनी बात शुरू की। उन्होंने कहा कि निराशाजनक संकेतों के साथ ही आशाजनक संकेत भी मिल रहे हैं। विकास के मौजूदा ढांचे और उसके गुणगान पर उन्होंने सवाल उठाये। विकास की बलि चढ़ने वाले लोग कोई और हैं और उनका फायदा गिनाने वाले कोई और। मीडिया के चरित्र की विडंबना को उन्होंने रेखांकित किया। नक्सली आंदोलन में जब बड़ी हिंसात्मक घटना होती है, तो पूरा मीडिया उस पर टूट पड़ता है लेकिन अहिंसक तरीके से चलने वाले आंदोलन और अनशन के कवरेज की मीडिया को फुर्सत नहीं होती। 'शक्तिमान' परियोजना के उदघाटन की मिसाल पेश करते हुए उन्होंने कहा कि इस दौरान मुकेश खन्ना की मौजूदगी का 'स्टार कवरेज' हुआ, लेकिन परियोजना का विरोध कर रहे लोगों, उनके धरने और उनकी गिरफ्तारी के लिए एक दो लाइन लिखना भी पत्रकारों ने मुनासिब नहीं समझा। मंच से उन्होंने अन्ना और उनके साथियों के लिए एक सवाल भी उछाल दिया – भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन को व्यापक कवरेज मिली लेकिन आंदोलनकारियों ने इसके बाद भ्रष्टाचार की जड़ें कहां हैं, इस पर कोई सेमिनार क्यों नहीं करवाया?

'संवैधानिक तंत्र का बदलता चेहरा' विषय पर परिचर्चा की शुरुआत माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति वीके कुठियालाजी की 'सुख की अनुभूति' के साथ हुई। कुठियालाजी ने अपने व्याख्यान को इतने आयाम और इतना विस्तार दे दिया कि उनकी 'सुख की अनुभूति' में श्रोता अपने लिए 'सुख' तलाशते रह गये। स्वतंत्रता प्राप्ति का नशा खत्म होने के बाद के लोगों के इस जमावड़े के सामने उन्होंने मछलियों को डूबने से बचाने के बंदर के प्रयास की मिसाल रखी। वैज्ञानिक विकास, हरित क्रांति, न्यूक्लियर विकास से लेकर क्रायोजेनिक इंजन तक कई मोर्चों पर मिली विजय को उन्होंने बड़ी उपलब्धि बताया। मनुष्य के नवजात शिशु को उन्होंने सबसे ज्यादा हेल्पलेस प्राणी करार दिया और इस सिलसिले में संवाद की महती भूमिका को रेखांकित किया।

संचालक चिन्मय मिश्र ने रवींद्र नाथ टैगोर की एक कविता से कुठियालाजी के भाषण का समअप किया, लेकिन इस दौरान माइक ने व्यवधान पैदा कर दिया। तभी भीड़ से एक जुमला उछला – 'ये वर्तमान मीडिया की कविता है।' हल्की-फुल्की टिप्पणियों के इस मिजाज को अगले वक्ता अनिल बैरवाल ने अपने अंदाज में 'मैनटेन' किये रखा। हॉल में बैठे एक साथी की टी शर्ट पर लिखी चंद लाइनों पर उनकी नजरें जा टिकीं – 'लव इज लाइक चाइनीज मोबाइल, नो गारंटी।' इसे उन्होंने विस्तार दे दिया – 'पॉलिटिक्स इज लाइक चाइनीज मोबाइल, नो गारंटी।' हालांकि उनका अपना ऑब्जर्बेशन कुछ ऐसा है कि आजादी के पहले प्यार और पॉलिटिक्स दोनों ही चाइनीज मोबाइल की तरह नहीं थे।

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स और नेशनल इलेक्शन वॉच, जैसे मिनी मूवमेंट चला रहे अनिल बैरवाल ने बातों ही बातों में मौजूदा राजनीतिक तंत्र और राजनेताओं की कुंठाओं और विंडबनाओं को भी बेपर्दा करना शुरू कर दिया। उन्होंने बताया कि कैसे संसद में एक दूसरे के खिलाफ हो-हंगामा मचाने वाले राजनीतिक दल, तब एक सुर में बातें करने लगते हैं, जब उनकी जवाबदेही तय करने का सवाल सामने आता है। 1991 में एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स ने एक पीआईएल दायर कर चुनावी मैदान में उतरने वाले प्रत्याशियों की पृष्ठभूमि सार्वजनिक करने की मांग उठायी थी। साल 2002 में दिल्ली हाईकोर्ट ने इस मांग को जायज ठहराया। सारे राजनीतिक दल इस मुद्दे पर एक हो गये और हाईकोर्ट के फैसले को बेअसर करने के लिए एक अध्यादेश लेकर आये। राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने एक बार इस पर हस्ताक्षर नहीं किया, तो कैबिनेट ने दोबारा इसे उनके पास भेजा। हालांकि सरकार की ये कोशिशें सुप्रीम कोर्ट में जाकर बेकार साबित हुईं। राजनेताओं को जवाबदेह बनाना इस वक्त की सबसे बड़ी चुनौती है।

अनिल बैरवाल ने सवाल उठाया कि राजनीतिक दल इस बात के लिए राजी क्यों नहीं होते कि उन्हें आरटीआई के दायरे में लाया जाए? राजनीतिक दल ये बताने को तैयार क्यों नहीं होते कि उनके पास पैसा कहां से आ रहा है? राजनीतिक दल ये क्यों नहीं बताते कि सरकार से उन्हें कितना पैसा या सुविधाएं मिल रही हैं? सुप्रीम कोर्ट जब आरटीआई के दायरे में आ सकता है तो फिर राजनीतिक पार्टियां इसके लिए क्यों हामी नहीं भरतीं? इसके साथ ही उन्होंने कहा कि जब सजायाफ्ता चुनाव नहीं लड़ सकते तो फिर सजा के एलान के बाद विधायकों सांसदों को हटाये जाने की समुचित व्यवस्था क्यों नहीं?

भोजन के पूर्व सत्र के आखिरी वक्ता के तौर पर दैनिक हिंदुस्तान के पूर्व संपादक अरविंद मोहन ने मंच संभाला। संवैधानिक तंत्र के बदलते चेहरे पर बेहद अहम टिप्पणी के साथ उन्होंने अपनी बात शुरू की – अब कानून अपराधियों के साथ कॉरपोरेट हाउस और उनके दलाल बना रहे हैं। उन्होंने चुनाव आयोग की मजबूती को देश की जनता में स्थापित करने के लिए टीएन शेषन की तारीफ की, तो वहीं सीएजी रिपोर्ट के जरिये एक के बाद एक प्राकृतिक संसाधनों की सार्वजनिक लूट को जगजाहिर करने के लिए विनोद राय के काम की सराहना की। हालांकि इस सिलसिले में मोंटेक सिंह अहलूवालिया पर चुटकी भी ली – 'वो तो प्लानिंग कमीशन में बेरोजगारी के दिन काट रहे हैं वरना देश के वित्त मंत्री होते'।

अरविंदजी ने कहा कि जेनुइन डेमोक्रेसी की लड़ाई अभी बाकी है लेकिन अन्ना के आंदोलन से ये भरोसा भी पैदा होता है कि कोई भी पीढ़ी खामोश नहीं रहती, वो हस्तक्षेप जरूर करती है। डेमोक्रेसी की परिभाषा को उन्होंने दो स्तरों पर समझाया – एक तो सांस्थानिक डेमोक्रेसी और दूसरी – दिल की डेमोक्रेसी। जब तक हम दिल से लोकतंत्र को स्वीकार नहीं करते, अपने व्यवहार में उसे नहीं लाते, सांस्थानिक लोकतंत्र मजबूत होता नहीं दिखेगा।

भोजन उपरांत का सत्र – 'बाबा बागदेव' के पाठ के साथ हुआ। पचमढ़ी में भवानी प्रसाद मिश्र की कविता 'सतपुड़ा के घने जंगल' का जो वाचन प्रशांत ने किया था, यहां उसे कश्मीर उप्पल ने अपनी ही कविता के जरिए विस्तार दिया।

कभी किसी ने
बाघ नहीं कहा उन्हें
न ही कहा शेर
बाबा के बारे में
बोलते लोगों की आंखें
चमकने लगतीं
सांस भर आती

बाबा मायाराम ने इलाके में चल रहे जनसंघर्षों और उनकी नियति पर संक्षेप में प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि ये अजीब विडंबना है कि मानव एक तरफ मंगल पर जीवन तलाश रहा है और दूसरी तरफ पृथ्वी पर जीवन के खात्मे में सहभागी बना बैठा है। टाइगर रिजर्व में वन विभाग के अधिकारियों की एक अजीबोगरीब दलील का जिक्र किया – मछली से बाघ चमकता है इसलिए मछली पालन का काम इस इलाके से खत्म कर दिया जाए। विस्थापन के नाम पर आदिवासियों के साथ हो रही लूट-खसोट को उन्होंने बेहद दुखद घटना बताया।

इसके बाद फागराम ने आपबीती सुनायी। उन्होंने बताया कि लकड़ी-गट्ठे के झूठे केस में पुलिस ने उन्हें जेल भेजा और सताया। ग्रामीण शिक्षा के बारे में बातचीत करते हुए उन्होंने कहा कि 150 बच्चों पर एक गुरुजी। ऐसे में गुरुजी की हालत बेहद दयनीय हो जाती है – इते देखईं कि उते देखईं। अब ऐसे में मास्टरसाहब क्या तो 'मास्टरप्लान' समझेंगे और समझाएंगे। बिना लड़े इस देश में कुछ नहीं मिलता, संघर्ष की राह चुननी ही पड़ेगी।

चाय के उपरांत, दिन के तीसरे सत्र में 'मौजूदा दलीय लोकतंत्र – कितना संवैधानिक' विषय पर 'कल्पतरु एक्सप्रेस' के संपादक अरुण त्रिपाठी ने अपनी बातें रखीं। उन्होंने 1975 और उसके बाद 1992 को भारतीय लोकतंत्र के लिहाज से दो खतरनाक 'काल' बताया। देश की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस को परिवारवाद, पक्षपात, तानाशाही का गढ़ बताया, तो वहीं क्षेत्रीय दलों के उभार का भी जिक्र किया। इस बात पर अफसोस भी जाहिर किया कि उत्तरप्रदेश जैसे सूबे की दो बड़ी पार्टियां चाहे सवारी हाथी या साइकिल की कर रही हों, परशुराम जयंती मनाने में दोनों ही दलों के कार्यकर्ताओं का उत्साह एक सा है।

बातचीत के क्रम में अरुण त्रिपाठी ने बीडी शर्मा का एक कथन उद्धृत किया – संविधान ने लोगों को आजादी दी, आदिवासियों को गुलामी। इसके साथ ही इस बात पर चिंता भी जाहिर की कि देश की सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका ऐसी भी लंबित है, जिसमें संविधान से 'समाजवाद' शब्द को हटाने की गुहार लगायी गयी है। त्रिपाठीजी ने कहा कि अब लोकतंत्र में भागीदारी के लिए भी बड़ी पूंजी चाहिए। दिनोंदिन पूंजी का बोलबाला बढ़ा है और बौद्धिक लोगों की उपेक्षा हर मोर्चे और हर पार्टी में नजर आने लगी है। सबसे बड़ी विडंबना तो ये है कि देश का नेता भी विदेश में तय होने लगा है।

इस सत्र में हस्तक्षेप के तौर पर एशियन ह्यूमन राइट्स के सदस्य समर अनार्य ने अन्ना के आंदोलन को मौजूदा दौर का सबसे गैर-लोकतांत्रिक आंदोलन बताया। सत्र की अध्यक्षता कर रहे अखलाक अहमद ने कहा कि विदेशी शक्तियों का दखल केंद्र सरकार ही नहीं राज्य सरकारों का मुखिया तय करने में भी बढ़ रहा है, जो चिंता का विषय है। पहले दिन का आखिरी और खुला सत्र कश्मीर उप्पल, रजनी बख्शी, सुनील, सचिन जैन और राकेश दीवान की टिप्पणियों के साथ समाप्त हुआ।

दूसरे दिन के पहले सत्र की शुरुआत गांधी शांति प्रतिष्ठान से जुड़े गांधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता अनुपम मिश्र के प्रजेंटेशन से हुई। पानी और उनके संरक्षण के कई उदाहरण चित्रों के जरिए सामने आये और उनके साथ अनुपमजी की लाइव कमेंट्री चलती रही। पानी के संरक्षण को जितने सुंदर चित्रों में सहेजा गया था, उतनी ही कोमल वाणी में उसका महात्म्य बखाना जा रहा था। हॉल में बैठे लोग मंत्रमुग्ध से कभी सेलुलाइड के चित्रों को और कभी अनुपम मिश्र को निहार रहे थे। पानी के इसी जनतांत्रिक संरक्षण के जरिए उन्होंने 'समाज के लोकतंत्र और संवैधानिक लोकतंत्र' के फर्क को बड़ी सरलता और सहजता से मन में उतार दिया।

इस सत्र में कश्मीर उप्पल ने नागार्जुन, श्रीकृष्ण कुमार और सच्चिदाननंद सिन्हा के कुछ पत्रों का वाचन किया। ये वो पत्र थे, जिनसे पत्रकारिता के क्षरण का इतिहास झांक रहा था। पशुपति शर्मा ने बतौर हस्तक्षेप एक पत्रकार के स्टाइलशीटिया बन जाने पर अफसोस जताया। अखबारों के संपादकों से जैसा तादात्म्य आम लोगों का था, ठीक वैसा ही चैनलों के संपादकों के साथ क्यों नहीं, ये सवाल भी उठाया।

इस सत्र के खत्म होते-होते हॉल में वो शख्स दाखिल हो गया, जो पत्रकारिता जगत में एक आदर्श नायक की तरह स्थापित है। 70 के दशक के अमिताभ (गरीब, मजलूम और किसानों के हक की लड़ाई का प्रतीक नायक) सरीखा कद हासिल कर चुके पी साईंनाथ मंच पर आसीन थे। 'कॉरपोरेट हस्तक्षेप और मीडिया' पर अपनी बात इस मुनादी के साथ शुरू की कि असहमति का कोई भी सुर, कोई भी सवाल बीच व्याख्यान में मुमकिन है। पी साईंनाथ ने कहा कि विकास संवाद की परिचर्चा के इन तीन दिनों में देश में समानांतर रूप से जो कुछ घटित हो रहा है, वो काफी चिंतनीय है। इन तीन दिनों में देश के 147 किसान आत्महत्या कर चुके होंगे, इन तीन दिनों में 3000 बच्चे कुपोषण और उसकी वजह से होने वाली बीमारियों से दम तोड़ चुके होंगे।

मीडिया को उन्होंने राजनीतिक रूप से स्वतंत्र लेकिन मुनाफे का गुलाम बताया। शारदा चिटफंड से लेकर एनडीटीवी प्रॉफिट से पत्रकारों की छंटनी का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि पत्रकारों की नौकरी की किसी को चिंता नहीं है बल्कि इस पूरे गोरखधंधे में मीडिया हाउसेस कॉरपोरेट घरानों की मनमर्जी और इशारे के तहत काम कर रहे हैं। इतना ही नहीं उन्होंने मीडिया मॉनोपॉली को कॉरपोरेट मोनोपॉली का एक हिस्सा बताया।

पी साईंनाथ ने कहा कि अब मीडिया हाउसेस रिपोर्टिंग पर खर्च कम करते जा रहे हैं। यही वजह है कि चैनलों पर टॉक शो की बाढ़ आ गयी है, क्योंकि इसमें खर्च कम है। इसी तरह संपादकों की जगह सीईओ, मैनेजिंग एडिटर, एक्जक्यूटिव एडिटर जैसे पदों के गठन को भी उन्होंने पत्रकारिता के लिए दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया। मीडिया हाउसेस और कॉरपोरेट हाउसेस के बीच होने वाली 'प्राइवेट ट्रीटी' को भी उन्होंने पत्रकारिता की आजादी में बाधक बताया। उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे मीडिया घरानों के हित बाजार के हित के साथ जुड़ते जाएंगे, एक तरह का खतरनाक नेक्सस खबरों को दबाने, छिपाने और उन्हें विकृत करने में सक्रिय होता जाएगा।

पी साईंनाथ ने कहा कि हाल के दिनों में इलेक्ट्रानिक मीडिया ने कोई बड़ी खबर ब्रेक की हो, इसके उदाहरण बेहद कम मिलते हैं। मीडिया के पतन के साथ पत्रकार 'कॉमेडियन रिलीफ' देने का काम करते नजर आते हैं। ऐसे में पत्रकारों को गुरिल्ला जर्नलिज्म की आदत डाल लेनी चाहिए। संस्थानों में रहते हुए वो कैसे समाज और आम आदमी की बात सामने रख पाते हैं, ये उनकी निजी काबिलियत का विषय है।

इसके साथ ही उन्होंने पेड न्यूज को लेकर भी अपनी राय रखी। एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि इलेक्शन के दौरान पेड न्यूज की पकड़ आसान हो जाती है लेकिन बहुत बड़ा हिस्सा नॉन इलेक्शन पेड न्यूज का भी है। उन्होंने पत्रकारिता जगत में आने वाले युवाओं से वैकल्पिक मीडिया को अपनाने की बात कही। उन्होंने कहा कि एक पत्रकार को एक से ज्यादा हुनर का मास्टर होना चाहिए ताकि वो अलग-अलग माध्यमों से अपनी बात कह सके। उन्होंने अपनी ओर से किये जा रहे आर्काइव प्रोग्राम की एक झलक भी दिखायी। पी साईंनाथ ने उन लोगों के दिमाग के तारों को झंकृत कर दिया जो न्यूज रूम के शोर में भी सोने की आदत पाले बैठे हैं।

विकास संवाद में इसके बाद के सत्रों में भी कुछ बातें हुईं लेकिन पी साईंनाथ ने मीडिया के इतने आयाम खोल दिये कि दिमाग में लंबे समय तक वो उमड़ते घुमड़ते रहेंगे।

केसला से वापसी में एक अलग तरह की भूख का एहसास तीव्रतर हो गया। 'भूख' उदर से कुछ ऊपर शिफ्ट हो चुकी थी। विकास संवाद की सार्थकता बस इतनी है कि वो इस भूख को जगा तो सकता है मिटा नहीं सकता। भूखे पेट भजन भले न हो भूखे मन में नये गीत गूंजते हैं… शायद हममें से कोई साथी कभी ऐसा ही कोई नया गीत गुनगुनाएं तो इस आयोजन की सार्थकता और ज्यादा बढ़ जाएगी।

(पशुपति शर्मा। युवा, शालीन पत्रकार। बिहार के पूर्णिया जिले से आते हैं। कभी-कभार लेख और टिप्पणियां लिखते हैं। इनके मित्र बताते हैं कि इनका बड़े दावों में यकीन कम, छोटी और ईमानदार कोशिशों में भरोसा ज्यादा है। न्‍यूज 24 और इंडिया टीवी में लंबे समय तक काम करने के बाद पशुपति फिलहाल न्‍यूज नेशन में सीनियर प्रोड्यूसर हैं। उनसे pashupati15@rediffmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

http://mohallalive.com/2013/07/12/7th-vikas-samvad-media-convention-report/

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