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THE HIMALAYAN DISASTER: TRANSNATIONAL DISASTER MANAGEMENT MECHANISM A MUST

We talked with Palash Biswas, an editor for Indian Express in Kolkata today also. He urged that there must a transnational disaster management mechanism to avert such scale disaster in the Himalayas. http://youtu.be/7IzWUpRECJM

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS TALKS AGAINST CASTEIST HEGEMONY IN SOUTH ASIA

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Thursday, June 6, 2013

फासिज़्म से लड़ने का बीड़ा मध्यवर्गीयों और उनके बुद्धिजीवियों ने ही उठाया

फासिज़्म से लड़ने का बीड़ा मध्यवर्गीयों और उनके बुद्धिजीवियों ने ही उठाया


मध्य वर्ग का बदलता चरित्र -2

अनिल राजिमवाले

 (विगत 26 अप्रेल 2013 को   जाने माने विचारक अनिल राजिमवाले का व्याख्यान रायगढ़ इप्टा और  प्रगतिशील  लेखक संघ  (प्रलेस) के संयुक्त आयोजन में हुआ था। इसके बाद 27 तथा 28 अप्रेल को रायगढ़ इप्टा द्वारा वैचारिक कार्यशाला भी आयोजित की गयी। अनिल जी ने मध्य वर्ग के बदलते चरित्र पर विस्तार से रोशनी डाली। उनके व्याख्यान का लिप्यान्तरण, उषा आठले के सौजन्य से इप्टानामा पर प्रकाशित है। इस महत्वपूर्ण व्याख्यान को हम यहाँ किस्तों में दे रहे हैं  -हस्तक्षेप )

कहा गया है कि साहित्य समाज का प्रतिबिम्ब है। अगर मज़दूर वर्ग को समझना है तो इस बात को समझेंगे। हालाँकि साहित्य में मेरा कोई दखल नहीं है मगर अगर मज़दूर ओर किसानों को समझना है तो विश्व साहित्य को समझना पड़ेगा। उसका अध्ययन करना पड़ेगा। क्योंकि साहित्य समाज का दर्पण होता है, प्रतिबिम्ब होता है, जो समय के अन्तर्विरोधों और टकरावों के बीच, गति के बीच व्यक्ति के संघर्षों को चरित्रों के रूप में प्रतिबिम्बित करता है और जो लेखक या लेखिका या कवि या कवयित्री इन बिंदुओं को समझ लेते हैं, वे महान साहित्यकारों की श्रेणी में आ जाते हैं। ये है मध्यम वर्ग और मध्यम वर्ग द्वारा रचित महान साहित्य।

साथियो, एक बात की ओर अक्सर ही इशारा किया जाता है बातचीत के दौरान, कि मार्क्स ने यह बात कही थी कि जैसे-जैसे पूँजीवादी उत्पादन प्रणाली आगे बढ़ती जायेगी, मध्यम वर्ग दो हिस्सों में बँटता जायेगा। लेनिन ने भी इस ओर इशारा किया है। मध्यम वर्ग एक ढुलमुल वर्ग है। वह बनना तो चाहता है पूँजीपति, लेकिन सारे तो पूँजीपति नहीं बन सकते। यह सम्भव नहीं है। इसीलिये ज़्यादातर मध्यम तबके या छोटे उत्पादक या टीचर, डॉक्टर, वकील या दूसरे मध्यम वर्ग के तथाकथित हिस्से आम मेहनतकशों की ओर धकेले जाते हैं। यह पूँजीवाद का अन्तर्विरोध है। इस बात की ओर मार्क्स और अन्य विद्वानों की रचनाओं में इशारा किया गया है कि कैसे दरमियानी तबके हैं, जब हम पूँजीवाद की बात करते हैं तो पूँजीवाद में केवल एकतरफ पूँजीपति और दूसरी ओर सिर्फ मेहनतकश वर्ग नहीं होता है, इन दोनों से भी बड़ा एक तबका होता है, जिसे हम दरमियानी तबका कहते हैं, मध्यम वर्ग कहते हैं। उनमें हमेशा अन्तर्विरोधी परिवर्तन होता रहता है। उनका झुकाव आज यहाँ है तो कल वहाँ है, तो परसो और कहीं, उसके एक हिस्से के रूझान इस तरफ है तो दूसरे हिस्से के रूझान दूसरी तरफ हैं। लेकिन दुर्भाग्य से या सौभाग्य से, दुनिया का या हमारे देश का भी ज़्यादातर राजनैतिक नेतृत्व मध्यम तबके से ही आया है। हिटलर का जब उदय हो रहा था जर्मनी मेंतो मिडिल क्लास उसका बहुत बड़ा आधार था और उसे हिटलर से बहुत आशायें थीं।

जब पूँजीवाद शोषण करता हैखासकर बड़ा पूँजीवादतो मज़दूर वर्ग से ज़्यादा नाराज़गी इसी मध्यम वर्ग को होती है। उसके थोड़े-थोड़े, छोटे-छोटे विशेषाधिकार भी, या सम्पत्ति भी अगर उसके हाथ से निकल जाये तो विद्रोह की भावना से वह भर जाता है। विद्रोह भी कई प्रकार के होते हैं। एक विद्रोह अपने लिये होता है, व्यक्ति के लिये, अपनी सम्पत्ति, अपने मकान के लिये होता है, अपनी ज़मीन के लिये होता है। एक विद्रोह समुदाय के लिये होता है। एक विद्रोह इस या उस पूँजीपति को हटाने के लिये होता है और एक विद्रोह जो होता है, वह व्यवस्था को बदलने के लिये किया जाता है। इसमें अन्तर किया जाना चाहिये। और यह अन्तर करने का काम बुद्धिजीवियों का है। इसीलिये समाजवाद भी कई प्रकार के होते हैं – ये आज की बात नहीं है, बहुत पुरानी बात है। इन समाजवादों को आप एक जगह नहीं ला सकते। सर्वहारा समाजवाद होता हैपूँजीवादी समाजवाद होता हैसामन्ती समाजवाद होता हैमध्यवर्गीय समाजवाद होता हैटुटपूँजिया समाजवाद होता हैबदलता हुआ – परिवर्तनीय समाजवाद होता है। जो हमारा औद्योगिक समाज है, वह लगातार व्यक्तियों में परिवर्तन लाता है और उनको अपनी वर्तमान स्थिति से वंचित करता है, यह बात सही है। इसीलिये पढ़े-लिखे लोग, छात्र, नौजवान, टीचर, नेता, मध्यम तबके के लोग नाराज़ रहते हैं जो आखिरकार विद्रोह की भावना का रूप धारण करता है। लेकिन यह विद्रोह दो प्रकार का हो सकता है – पूँजीवाद का नाश कर के उसकी जितनी उपलब्धियाँ हैं, उन्हें हम नष्ट कर सकते हैं। उसने जो प्रगतिशील काम किया है इतिहास में, उसे नष्ट करके उसकी जगह प्रतिक्रियावादी सत्ता कायम कर सकते हैं। इसे ही फासिज़्म कहते हैं।मुसोलिनी और हिटलर ने यही किया था। एंटोनियो ग्राम्शी नाम के बहुत बड़े इटालियन दार्शनिक हो चुके हैं। उन्होंने बड़े अच्छे तरीके से इस मध्यवर्गीय प्रक्रिया और फासिज़्म के मध्यवर्गीय आधार को उजागर किया है। लेकिन ग्राम्शी तो स्वयम् फासिज़्म विरोधी बुद्धिजीवी थे और ग्राम्शी और तोग्लियाकी जैसे महान विचारकों ने फासिज़्म का पर्दाफाश किया। लेकिन वे इटली या जर्मनी में फासिज़्म को रोक नहीं सके क्योंकि बुद्धिजीवियों के दूसरे तबके फासिज़्म सेफासिज़्म की चमक-दमक से चमत्कृत थे। यह अन्तर्विरोध इस तबके में होता है लेकिन फिर भी फासिज़्म से लड़ने का बीड़ा मध्यवर्गीयों ने ही उठाया, उनके बुद्धिजीवियों ने उठाया। ऐसे बुद्धिजीवियों को ग्राम्शी ने कहा है – ऑर्गेनिक इन्टलेक्चुअल – जो मेहनतकशों का, आम जनता का, आम लोगों के हितों का, मेहनतकश जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसीलिये मैं इस बात पर ज़ोर देना चाहूँगा कि किसी भी प्रस्थापना को यान्त्रिक रूप से नहीं लिया जाना चाहिये। मार्क्स और लेनिन खास परिस्थितियों में, खास प्रक्रिया का विश्लेषण कर रहे थे। लेकिन साथ-साथ त्रात्स्की ने भी एक बात कही कि इज़ारेदार पूँजीवाद के विकास के साथ मध्य वर्ग बढ़ रहा है यूरोपीय देशों में। यह बात और भी कई विचारकों ने कही है। बाद का इतिहास यह साबित करता है – खासकर प्रथम विश्व युद्ध एवम् द्वितीय महायुद्ध के बीच का जो इतिहास है और उसके बाद का इतिहास, कि उनकी यह बात सही है। जहाँ इज़ारेदार पूँजीवाद विनाश करता है, वहीं गैरइज़ारेदार पूँजीवाद उत्पादन के साधनों का विकास भी करता है। और उत्पादन के साधनों और संचार साधनों के विकास के साथ, अखबारों के विकास के साथ, यातायात के साधनों के विकास के साथ मध्य वर्ग का जन्म होता है, आगे विकास होता है। इसीलिये इंग्लैण्डअमेरिका याफ्रांस जैसे देशों में और स्वयम् तत्कालीन सोवियत संघ में भी बुद्धिजीवियों ने एक बहुत बड़ी भूमिका अदा की है – बहुत बड़ी संख्या में। रोम्यां रोला जैसे महान लेखक, इलिया एहरेनबर्गशोलोखोव या मैक्सिम गोर्की या हमारे देश में राहुल सांकृत्यायन हो, इनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

इसीलिये बुद्धिजीवियों की भूमिका इतिहास में घटी नहीं है, बल्कि बढ़ी है, उनकी संख्या बढ़ी है। विज्ञान और तकनीक के विकास में, अर्थतन्त्र और अर्थशास्त्र के विकास ने हमारे सामने नये तथ्य लाये हैं। इन तथ्यों का अध्ययन करना बुद्धिजीवियों की बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। और इसीलिये विचारधारा की लड़ाई चलती है। हम अक्सर विचारधारा की लड़ाई या विचारधारा के संघर्ष की बात करते हैं। लेकिन एक बात को, कम से कम मेरे व्यक्तिगत विचार से, हम भूल जाते हैं, इस बात को दरकिनार करते हैं, खासकर उस सच्चाई को, जब हम कहते हैं कि विचारधारा या विचार, चाहे वे किसी भी किस्म के हों, वे हमारे मानस या मस्तिष्क से जुड़े होते हैं और इसलिये यह सीधे मध्य वर्ग से भी जुड़े होते हैं। मध्य वर्ग ने ही फासी विरोधी चेतना पैदा की है और उसका विरोध किया है। भारत के आज़ादी का आन्दोलन अगर देखा जाये तो उसमें पढ़े-लिखे लोगों की भूमिका निर्णायक रही। हमारे यहाँ पश्चिमी शिक्षा अँग्रेजों ने लागू की – सीमित रूप में, और अँग्रेजों के राज में कुछ मुट्ठी भर विश्वविद्यालय, कॉलेज, स्कूल बने, उनमें शिक्षित वर्ग पैदा हुआ। यह शिक्षित वर्ग राष्ट्रवाद, राष्ट्रीयता और उसका एक हिस्सा आगे चलकर समाजवाद का वाहक बना। हमारे देश में वह इतिहास पैदा हुआ, वह संस्कृति पैदा हुयी, वह साहित्य पैदा हुआ, जिसने साम्राज्यवादविरोध की आवाज़ बुलन्द की, जनता को शिक्षित किया। उस साहित्य के बिना हमें आज़ादी नहीं मिलती। राहुल सांकृत्यायन की रचनायें पढ़कर आज भी नौजवान, बिना किसीप्रगतिशील लेखक संघ या पार्टी के, क्रान्तिकारी और समाजवादी विचारों की ओर झुकते हैं, यह सच्चाई है। और इसीलिये प्रिन्टेड वर्ड्समुद्रित साहित्य में बड़ी ताक़त होती हैवो ताक़त हथियारों में नहीं होतीआर्म्स और आर्मामेंड्स में वह ताकत नहीं होती हैजो किताबोंअखबारों और छपी हुयी रचनाओं में होती है क्योंकि वह बच्चों से लेकर बड़ों तक, पीढ़ी दर पीढ़ी हमारी चेतना का विकास करती हैं, हमें तैयार करती हैं, हमें मानव बनाती हैं।

और इसीलिये मध्य वर्ग बहुत महत्वपूर्ण स्थिति में है आज। आज इसका चरित्र बदल रहा है। यह एक अन्तर्विरोधी वर्ग है। इसमें विभिन्न रूझानें हैं, इसका विकास द्वंद्वात्मक है। लेकिन इतना समझना या कहना काफी नहीं है। इतना कह लेने के बाद, समझ लेने के बाद इसमें यह अनिश्चितता कैसे कम की जाये, इसके नकारात्मक रूझानों को कैसे कम किया जाये और सकारात्मक रूझानों को कैसे मजबूत किया जाये? मेरा ख्याल है कि सचेत और सोद्देश्य आन्दोलन बुद्धिजीवियों की, जो अपने को सोद्देश्य होने का दावा करते हैं, उनकी यह बड़ी जिम्मेदारी है।

जारी….

इप्टानामा से साभार

मध्य वर्ग का बदलता चरित्र -1 यहाँ पढ़ें

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